चार मौसम, दो देश और काव्य के विविध रस - एक पुस्तक समीक्षा

समीक्षक: पंकज सुबीर

कविता संग्रह: पतझड़ सावन वसंत बहार
सम्पादक: अनुराग शर्मा
संग्रह के कवि: अनुराग शर्मा और साथी
(वैशाली सरल, विभा दत्‍त, अतुल शर्मा, पंकज गुप्‍ता, प्रदीप मनोरिया)
पृष्ठ संख्या 100
मुद्रित मूल्य: ₹ 250.00 ($ 9.95)
प्रकाशक: शाश्वत प्रकाशन

पिट्सबर्ग अमेरिका में रहने वाले भारतीय कवि श्री अनुराग शर्मा का नाम वैसे तो साहित्‍य जगत और नेट जगत में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। किन्‍तु फिर भी यदि उनकी कविताओं के माध्‍यम से उनको और जानना हो तो उनके काव्‍य संग्रह पतझड़, सावन, वसंत, बहार को पढ़ना होगा। ये काव्‍य संग्रह छ: कवियों, वैशाली सरल, विभा दत्‍त, अतुल शर्मा, पंकज गुप्‍ता, प्रदीप मनोरिया और अनुराग शर्मा की कविताओं का संकलन है। यदि अनुराग जी की कविताओं की बात की जाये तो उन कविताओं में एक स्‍थायी स्‍वर है और वह स्‍वर है सैडनेस का, उदासी का। वैसे भी उदासी को कविता का स्‍थायी भाव माना जाता है। अनुराग जी की सारी कविताओं में एक टीस है, और यह टीस अलग अलग जगहों पर अलग अलग चेहरे लगाकर कविताओं में से झाँकती दिखाई देती है। ‘टीस’ नाम की उनकी एक कविता भी इस संग्रह में है।
एक टीस सी उठती है
रात भर नींद मुझसे
आँख मिचौली करती है
मन की अंगुलियाँ
बार-बार
खत लिखती हैं तुम्हें
दीवानी नज़रें
हर आहट पे
दौड़ती हैं
दरवाजे की तरफ़
शायद ये तुम होगे
फिर लगता ह़ै
नहीं
तुम तो मगन हो
अपनी दुनिया मे
अपने ही रंग मे रंगे
अपने सुख दुख मे खोए
अपनों से घिरे
मेरे अस्तित्व से बेखबर
मैं समझ नहीं पाता कि
सिर्फ मेरे नसीब में
अकेलापन क्यों है
अकसर
एक टीस सी उठती है।
अनुराग जी की कविताओं की एक विशेषता ये है कि उनकी छंदमुक्‍त कविताएं उनकी छंदबद्ध कविताओं की तुलना में अधिक प्रवाहमान हैं। जैसे एक कविता है ‘जब हम साथ चल रहे थे तक एकाकीपन की कल्‍पना भी कर जाती थी उदास’।  यह कविता विशुद्ध रूप से एकाकीपन की कविता है, इसमें मन के वीतरागीपन की झलक शब्‍दों में साफ दिखाई दे रही है। विरह एक ऐसी अवस्‍था होती है जो सबसे ज्‍यादा प्रेरक होती है काव्‍य के सृजन के लिये। विशेषकर अनुराग जी के संदर्भ में तो ये और भी सटीक लगता है क्‍योंकि उनकी कविताओं की पंक्तियों में वो ‘तुम’ हर कहीं नजर आता है। ‘तुम’ जो कि हर विरह का कारण होता है। ‘तुम’ जो कि हर बार काव्‍य सृजन का एक मुख्‍य हेतु हो जाता है। एक झलक देखिये:
जब तुम्हें दिया तो अक्षत था
सम्पूर्ण चूर्ण बिखरा है मन

भूकंप हुआ धरती खिसकी
क्षण भर में बिखर गया जीवन

घर सारा ही तुम ले के गए
कुछ तिनके ही बस फेंक गए

उनको ही चुनता रहता हूँ
बीते पल बुनता रहता हूँ।
स्‍मृतियाँ, सुधियाँ, यादें कितने ही नाम दे लो लेकिन बात तो वही है। अनुराग जी की कविताओं जब भी ‘तुम’ आता है तो शब्‍दों में से छलकते हुए आँसुओं के कतरे साफ दिखाई देते हैं। साफ नजर आता है कि शब्‍द उसाँसें भर रहे हैं, मानो गर्मियों की एक थमी हुई शाम को बहुत सहमी हुई सी मद्धम हवा चल रही हो। जब हार जाते हैं तो कह उठते हैं अपने ‘तुम’ से ‘कुछेक दिन और यूँ ही मुझे अकेले रहने दो’। अकेले रहने दो से क्‍या अभिप्राय है कवि का। किसके साथ अकेले रहना चाहता है कवि। कुछ नहीं कुछ नहीं बस एक मौन सी उदासी के साथ, जिस उदासी में और कुछ न हो बस नीरवता हो, इतनी नीरवता कि अपनी साँसों की आवाज को भी सुना जा सके और आंखों से गिरते हुए आंसुओं की ध्‍वनि भी सुनाई दे।
कुछेक दिन और
यूँ ही मुझे
अकेले रहने दो

न तुम कुछ कहो
और न मुझे ही
कुछ कहने दो

इतनी मुद्दत तक
अकेले ही सब कुछ
सहा है मैंने

बचे दो चार दिन भी
ढीठ बनकर
मुझे ही सहने दो

कुछेक दिन और
यूँ ही मुझे
अकेले रहने दो।
एक कविता में एक नाम भी आया है जो निश्चित रूप से उस ‘तुम’ का नहीं हो सकता क्‍योंकि कोई भी कवि अपनी उस ‘तुम’ को कभी भी सार्वजनिक नहीं करता, उसे वो अपने दिल के किसी कोने में इस प्रकार से छुपा देता है कि आँखों से झाँककर उसका पता न लगाया जा सके। "पतझड़ सावन वसंत बहार" संग्रह में अनुराग जी ने जो उदासी का माहौल रचा है उसे पढ़ कर ही ज्‍यादा समझा जा सकता है। क्‍योंकि उदासी सुनने की नहीं, महसूसने की चीज है सो इसे पढ़ कर महसूस करें।
सीमा तुम जकड़े थीं मुझको
अपनी कोमल बाँहों में
भूल के सुधबुध खोया था मैं
सपनीली राहों में
छल कैसा सच्चा सा था वह
जाने कैसे उबर सका
सत्य अनावृत देखा मैंने
अब तक था जो दबा ढंका
सीमा में सिमटा मैं अब तक
था कितना संकीर्ण हुआ
अज्ञ रहा जब तक असीम ने
मुझको नहीं छुआ। 
(आभार: हिंदयुग्म द्वारा पूर्वप्रकाशित)
 अनुक्रमणिका, जनवरी 2017