तीसरा बेटा

आशा शर्मा

- आशा शर्मा

गाँव के बाहर वाली पहाड़ी पर बना गढ़ राजीव के लिए सदा से ही आकर्षण का केंद्र रहा है।  उसके भीतर सबसे ऊपर वाली टेकरी पर बने देवी माँ के मंदिर की लाल ध्वजा जब हवा के साथ फहरती, अपने अस्तित्व का अहसास कराती थी तो वह सम्मोहित सा एकटक उसे निहारने लगता।  गाँव के बड़े बुजुर्ग ध्वजा के फहरने की दिशा से बारिश और अकाल का अनुमान लगाया करते थे।  राजीव के मन पर उस गढ़ और लाल ध्वजा का सम्मोहन आज भी कायम है।

बचपन में वह अपने दादा के साथ कभी-कभी वहां जाया करता था।  होली हो या दीवाली, गाँव के सभी बच्चे और युवा ठाकुर वीर भद्र सिंह की ड्योढ़ी पर राम-राम करने और उनका आशीर्वाद लेने जरुर जाते थे।  दशहरे पर रावण दहन के लिए चंदा इकठ्ठा करने की शुरुआत ठाकुर साब से ही होती थी और आखातीज पर भी पहला चांदा उसी ड्योढ़ी से उड़ाया जाता था।

ठाकुर साब का व्यक्तित्व बहुत ही रौबीला था।  उनकी बड़ी-बड़ी घुमावदार मूँछें और माथे पर लगा लाल तिलक किसी को भी सहज ही अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखता था।  जब वे गाँव की चौपाल में आ कर बैठते थे तो हर नज़र झुक जाती थी।  कुछ आदर से और कुछ उनकी गरिमा से... बनी-ठनी ठकुरानी सा भी माथे पर बोरला लगाये, गले में “आड” पहने, झीना घूंघट काढ़े एकदम गणगौर सी लगती थी।  उनकी ममतामयी छवि आज तक उसके जेहन में बसी है।

गाँव की किसी भी बेटी की शादी हो तो रावले से एक राजपूती पौशाक “बेस” और कन्यादान की रकम जरुर आती थी और अगर बेटी किसी दलित या वंचित समुदाय की होती तो खुद ठकुरानी सा उसे आशीष दे कर अपने हाथों से बेस देकर उसकी खोल यानि झोली भरती थी।  

गाँव के स्कूल में स्वतन्त्रता दिवस हो या फिर गणतन्त्र दिवस ... उसके मुख्य अतिथि हमेशा ही ठाकुर साब हुआ करते थे।  उसे याद है जब दसवीं कक्षा में उसने पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया था तो कितना खुश हुए थे ठाकुर साब ... 15 अगस्त को तिरंगे के नीचे गर्व से उसकी पीठ थपथपाते हुए उन्होंने उसे 2100 रुपये नगद पुरस्कार दिया था और उससे वादा भी लिया था कि चाहे कैसी भी मुश्किल घड़ी हो, वह पढाई जारी रखेगा।  साथ ही हर परिस्थिति में उसकी पीठ पर अपना हाथ होने का भरोसा भी उन्होंने दिलाया था।  वे हमेशा कहा करते थे, “मैं हूँ ना!”

शायद वो हौंसला, वो भरोसा ही था जिसके दम पर राजीव सफलता की सीढियाँ चढ़ता चला गया।  अपनी हर कामयाबी का श्रेय वह ठाकुर साब के चरणों में ही अर्पित करता था।  जब भी गाँव आता था, ठाकुर साब का आशीर्वाद लेना नहीं भूलता था।

ठाकुर साब के दोनों बेटे पढाई के सिलसिले में विदेश गए तो फिर वहीँ के हो कर रह गए।  पिछले साल कैंसर की बीमारी ने ठकुरानी सा को भी उनसे छीन लिया।  बेटे तो माँ की अंत्येष्टि पर भी नहीं पहुँच सके।  इस गम ने ठाकुर साब को तोड़ के रख दिया।  अब उन्होंने लोगों से मिलना-जुलना भी काफी कम कर दिया था मगर राजीव के लिये उनकी ड्योढ़ी के पोल हमेशा ही खुले रहते थे।

राजीव की मेहनत आख़िरकार रंग लाई और उसका चयन प्रशासनिक सेवा में हो गया।  पहले कोचिंग, फिर एग्जाम और फिर चयन के बाद ट्रेनिंग के कारण राजीव तीन साल से गाँव नहीं जा सका था।  उसे पहली पोस्टिंग समाज कल्याण विभाग में मिली थी मगर वह जॉइन करने से पहले ठाकुर साब के दर्शन कर उनका आशीर्वाद लेना चाहता था।  जब पिताजी ने उसे बताया कि पिछले साल ठाकुर साब का बेटा विदेश से आ कर उन्हें अपने साथ ले गया तो उसे बहुत निराशा हुई।  मगर न जाने क्या आकर्षण था उस ड्योढ़ी का कि शाम को टहलते हुए सम्मोहित सा उस तरफ निकल ही गया।

गढ़ के चौकीदार ने बताया कि ठाकुर सा कुछ विक्षिप्त से हो गए तो छोटे बाबू उन्हें अपने साथ ले गए।  इस गढ़ के एक हिस्से को भी उन्होंने किसी मोबाइल टावर की कंपनी को किराये पर दे दिया है।  शायद गढ़ को होटल में बदलने की बातचीत भी किसी हेरिटेज ग्रुप के साथ चल रही है।  राजीव उदास सा लौट आया।
नई-नई नौकरी में राजीव व्यस्त से व्यस्ततम होता चला गया।  पिताजी अक्सर उसे गाँव बुलाते थे मगर शायद अब उसका चार्म खत्म हो गया था गाँव के प्रति ... इसलिए उसने माँ-पिताजी को ही अपने पास बुला लिया और फिर गाँव से नाता ही टूट गया।

एक दिन विभाग की तरफ से उसे शहर के वृद्दाश्र्म जांचने के आदेश हुए।  जब वह वहां के विमंदित लोगों के वार्ड की तरफ गया तो ठाकुर साब को वहां देखते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।  “ये तो विदेश चले गए थे...फिर यहाँ...इस हाल में...” उसने झुक कर ठाकुर साब के पैर छुए मगर उनका मानसिक संतुलन ठीक नहीं था, वे उसे पहचान नहीं पाए।

राजीव ने उनका रिकॉर्ड मंगवाया तो पता चला कि साल भर पहले उनका बेटा उन्हें यहाँ छोड़ कर गया था।  उसके बाद आज तक कोई इनसे मिलने तक नहीं आया।  ये अक्सर शाम को आश्रम की छत पर जा कर डूबते हुए सूरज को निहारा करते हैं।  हाँ! विक्षिप्त होते हुए भी उनका व्यवहार काफी संयमित है।

राजीव ने वहां के इंचार्ज को उनका विशेष ख़याल रखने के निर्देश दिए तथा किसी भी आपातकाल की स्थिति में उनसे सम्पर्क करने की भी हिदायत दी।

राजीव ने आश्रम के रिकॉर्ड से ठाकुर साब के बड़े बेटे के मोबाइल नंबर ले लिए थे।  फोन पर जब उनसे ठाकुर साब की हालत का जिक्र किया तो वे कहने लगे, “क्या करूँ! न तो मैं बाबोसा को अपने साथ ले जा सकता था और ना ही सब कुछ छोड़छाड़ कर खुद यहाँ आ सकता था।  इसलिए मुझे यही विकल्प सूझा...कम से कम आखिरी सांस अपनी मिट्टी में तो लेंगे...” फिर रिक्वेस्ट कर के कहा, “आप बाबोसा का ध्यान रखिये, पैसे आप जितने चाहें, मैं खर्च करने के लिए तैयार हूँ...” दौलत के आगे रिश्तों को दम तोड़ते देख राजीव के भीतर कुछ चटक सा गया।  इसके बाद उस ने अधिक कुछ भी कहना उचित नहीं समझा।

राजीव हर सप्ताह फोन पर उनके हालचाल लेता रहता था और महीने- 20 दिन के अंतराल पर उनसे मिलने भी जाता था।  एक बार पिताजी को भी लेकर गया था आश्रम...।  उन्हें देखते ही ठाकुर साब की आँखों में पहचान की एक बिजली सी कौंधी मगर अगले ही पल बुझ भी गई।  पूरे गाँव के पालनहार को आज अनाथों सी स्थिति में देख पिताजी द्रवित हो गए।  उन से एक शानदार महल को खंडहर में तब्दील होते हुए देखा नहीं गया और फिर वे चुपचाप वापस लौट गए।

ठाकुर साब उसे देखते ही खुश हो जाते थे।  राजीव भी उनका हाथ थाम कर जैसे उन्हें अहसास दिलाता था, “मैं हूँ ना!” हालाँकि उन्हें राजीव से जुड़ी कोई पुरानी बात याद नहीं थी मगर एक स्नेह का रिश्ता जरुर वे उसके साथ महसूस करने लगे थे।

रविवार का दिन... राजीव अपने बंगले के लॉन में बैठा चाय की चुस्कियों के साथ अखबार का आनन्द ले रहा था।  प्रशासनिक अधिकारियों को फुर्सत के क्षण कम ही नसीब होते हैं इसलिए वह उनका पूरा लुत्फ़ उठाना चाहता था।  पिताजी भी पास ही खड़े माली को लॉन में मौसम के अनुसार फूल लगाने के निर्देश दे रहे थे।  तभी मोबाइल बजा।  स्क्रीन पर आश्रम के नंबर देख कर उसका कलेजा अनहोनी की आशंका से काँप उठा।  
आश्रम इंचार्ज ने बताया कि कल रात ठाकुर साब को दिल का दौरा पड़ा था।  उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट करवा दिया गया है मगर अभी भी वे खतरे से बाहर नहीं हैं।  आश्रम की तरफ से उनके बेटे को भी खबर भिजवा दी गई है।

राजीव तुरंत हॉस्पिटल पहुंचा।  उसे देखते ही ठाकुर सा हमेशा की तरह मुस्कुराये और उसका हाथ कस कर थाम लिया।  मानो वे उसे छोड़ कर नहीं जाना चाहते।  राजीव की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।  दो बूँदें ठाकुर साब की आँखों से भी लुढ़क आई जैसे राजीव के दुःख में उसका साथ दे रही हों।  राजीव ने डॉक्टर से बात करके उनके स्वास्थ्य के बारे में पूरी जानकारी ली और उनके लिए सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था करने का आदेश दिया।  इसके बाद राजीव ने ठाकुर साब के बड़े और फिर छोटे बेटे को खबर दे कर उनकी नाजुक हालत के बारे में बताया मगर दोनों ने ही जैसा कि वे पहले भी राजीव को अपनी मजबूरी बता कर उन्हें अपने साथ ले जाने में या फिर भारत आ कर उनकी देखभाल करने में असमर्थता जता दी।

राजीव ने ठाकुर साब की सेवा में जी जान लगा दी।  उनके वृद्ध शरीर को खून की आवश्यकता पड़ी तो राजीव ने अपना खून भी सहर्ष उन्हें दिया।  उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसे पता चला कि उन दोनों का ब्लड ग्रुप एक ही है।  वह मन ही मन मुस्काया, “अब तो ठाकुर साब आपसे मेरा खून का रिश्ता जुड़ गया है।  मैं आपका तीसरा बेटा हूँ।” डॉक्टरों के अथक प्रयास और राजीव की दुआएं रंग लाई और ठाकुर साब जिन्दगी की जंग जीत गए।

अब तक राजीव मन ही मन एक ठोस निर्णय ले चुका था।  उसने वृद्दाश्र्म के अधिकारियों से बात करके ठाकुर साब की जिम्मेदारी ले कर उन्हें अपने साथ घर ले जाने की बात की क्योंकि अब वह उन्हें इस हालत में अकेला नहीं छोड़ सकता था।  हालाँकि ये आश्रम के नियमों के विरुद्ध था कि किसी भी व्यक्ति को बिना खून के रिश्ते के यूँ ही किसी के भी साथ भेज दिया जाये मगर राजीव के प्रशासनिक रुतबे और उसकी भावनाओं को देखते हुए आश्रम समिति ने ठाकुर साब की जिम्मेदारी राजीव को सौंप दी।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद राजीव ठाकुर साब को अपने बंगले पर ले कर आया तो ठाकुर साब ने पूछा, “ये हम कहाँ आ गए?”

“हम अपने घर आये हैं बाबोसा।” राजीव ने कहा तो ठाकुर साब ने पहले शानदार बंगले की तरफ और फिर गर्व से राजीव की और देखा।  आँखों की चमक बता रही थी कि कोई पुरानी याद कौंधी है।

राजीव उन्हें हाथ थाम कर भीतर ले आया।  सामने आते पिताजी को देख कर कुछ कहता इससे पहले ही वे बोल उठे, “मुझे तुमसे यही उम्मीद थी मगर इतनी देर क्यूँ लगाईं बेटा! ये निर्णय तो तुम्हें बहुत पहले ही ले लेना चाहिए था।”

राजीव अपने पिता के पैरों में झुक गया।  वह खुश था कि अब उसके सिर पर दो-दो पिताओं के आशीर्वाद के हाथ रहेंगे।
                                                                                                        अनुक्रमणिका, जनवरी 2017