रूपेश कश्यप का 'अलग़ोज़ा': हिंदी कविता को समृद्ध करता संग्रह

कविता करना सरल काम नहीं, सहज नहीं... क्योंकि कविता रचने के लिए जिस सहजता की जरूरत होती है वह अपने में ला पाना सरल नहीं। सरल इसलिए भी नहीं क्योंकि यह स्वाभाविकता, तरलता लाने की कोशिश की जरूरत नहीं होती। यह जो होता है, आप होता है। ठीक वैसे ही जैसे पानी किसी से पूछते नहीं मिलता कि बहा कैसे जाए, मेघ बरसने की कला के लिए गुरु नहीं रखते। या फिर आपने कभी मधुमक्खियों को शहद बनाने की ट्रेनिंग लेते या सागर को लहरें बनाना सीखने की कोचिंग जाते नहीं देखा होगा। कविता भी उन्हीं चंद चीजों में से एक है जो सीखने- सिखाने के प्रयासों से बाहर की हैं। हाँ शिल्प तराशकर उसे प्रस्तुति योग्य बनाना समझना एक अलग बात है।

जो मुझे लगता है कि साहित्य की किसी भी विधा और खासकर कविता को समझने या लिख पाने के लिए जो सबसे अधिक आवश्यक है वह है एक खूबसूरत दिल रखना। ऐसे ही एक खूबसूरत दिल के मालिक हैं रूपेश कश्यप। यूं तो जब आप किसी की रचनाओं की समीक्षा करते हैं तो निष्पक्ष रहने के लिए रचनाकार को समझने से पहले रचना को समझना चाहिए, पर मेरा मानना है कि कभी-कभी रचनाकार को पहले समझ लेने में भी कोई बुराई नहीं क्योंकि इस तरह आपको रचना को समझना और आसान हो जाता है। 

रूपेश का कविता संग्रह 'अलग़ोज़ा' जब हवाई रास्ते से सात समंदर पार करके इन हाथों में आया। औरों की तरह मुझे भी पहले तो संग्रह के नाम पर हैरानी हुई क्योंकि यह मेरे लिए नया शब्द था। हद से हद इससे मिलता हुआ जो नाम सुना था वह 'चिलगोज़ा' था। बाद में जाना कि कहाँ चिलगोज़ा और कहाँ अलग़ोज़ा! यह जानना कि अलग़ोज़ा पंजाब, राजस्थान और सिंध में बजाया जाने वाला एक वाद्य यंत्र है, इन कविताओं के संगीत को भीतर कहीं गहरे तक उतार गया। मन मोह लेने के लिए एक बाँसुरी काफी होती है, जहाँ दो हों तो कहना ही क्या!! बॉलीवुड के शुरुआती दौर के फ़िल्मी संगीत में या बीती सदी के सातवें-आठवें दशक तक बहुतायत में प्रयोग में लाया गया है 'अलग़ोज़ा'। 

रूपेश कश्यप 
बी.ए.डेविड के रेखांकन  ये कवितायें तीन हिस्सों में हमारे सामने आती हैं। ये हिस्से कवि के जीवन  के वो अंग हैं जिनमें से एक क्या आधे को भी हटा देने पर वह अपूर्णता का उदाहरण लगने लगता है। यह एक यात्रा है एक शहर से दूसरे और फिर आगे के शहरों की, अपरिपक़्व से परिपक़्व होने तक की, किशोर से यौवन के चरम तक पहुँचने की। इस दौरान प्रेम, पीड़ा, दुःख, दर्द, दर्शन आदि की शक्ल में जो भी सामने आता गया कवि उस सब को आत्मसात करता गया, उन्हें कविता के शिल्प में ढालकर अनूठा, अजर और अमर होने का वरदान देता गया।

संग्रह में वर्तमान की जेब से हाल में खिसक कर स्मृतियों के झोले में जा गिरे पलों से लेकर लगभग उछल-कूद के दिनों तक के पल हैं और वे वर्तमान से पीछे की ओर ही जाते हैं। संग्रह की यह एक खासियत ही है कि कवितायें नज़दीकी कल से शुरू हो दूरस्थ कल तक जाती हैं और इनमें नदी की कल-कल सुनाई पड़ती है। तीन पड़ाव, तीन शहर हैं मुम्बई, दिल्ली और इलाहाबाद। मुम्बई में बैठकर कवि पीछे की ओर लौटना शुरू करता है और साथ में अपने पाठक को सहयात्री बना लेता है। 

मुम्बई वाले हिस्से में परिपक़्व हो चुका कवि अपनी कविता 'पहाड़े' में एक बच्चे के पहाड़े रटने से लेकर तारीखों पर आ पहुँचता है और बड़ी सादगी से कटाक्ष करता है कि,
'9/11
12/11
13/11
26/11
चाहे पहाड़े हों या नफरत, रटते रहो 
क्योंकि रटने का एक ही तो फायदा है 
उसमें 'क्यों' पूछने की ज़रुरत नहीं पड़ती।'  

इसी खण्ड की कविता 'एक आम बयान' के द्वारा राजनीति पर क्या खूब व्यंग्य किया है-
'एक अच्छे भले आदमी को 'आम' किसने बनाया?
पूछो, किसने बनाया?
भइया जी, एक अच्छे-भले आदमी को 'आम' बनाया राजनीतिक पार्टियों ने 
ताकि उन्हें 'चूसा' जा सके।'

'ये शहर है न मुम्बई...' में रूपेश मुम्बई से शिकायत नहीं करते, पर हाँ उसका असली मिज़ाज़ भी पाठकों को बताने से नहीं चूकते। व्यंग्य का कविताओं में अच्छा मिश्रण है। तीन पंक्ति की कविता गुस्सा देखिये-
'टीचर गुस्सा है 
कि 5th Std. के एक स्टूडेंट की पूरी कॉपी में 
फ्लाईओवर पर लिखा essay अधूरा मिला है।'

कविताओं में समाज की फ़िक्र है, देश की अवाम की। पंक्तियों के मध्य में कवि की संवेदनशीलता स्पष्ट पढ़ी जा सकती है। 'इस देश का युवा हूँ मैं' उनके जज़्बातों को सामने  तो 'सात रातें, सात बातें' मुखौटाधारी समाज की पोल खोलती है। 
जब 'यादें' का यह हिस्सा-
'और हम खिलते रहे 
इक मासूम वादे पर कि
हम चले जाएंगे बड़े शहर 
और रहेंगे वहां छांव में'
पढ़ते हैं तो बड़े शहरों की मृगमरीचिका का छल फिर उजागर होता है। याद आ जाती है खलील धंतेजवी की वो ग़ज़ल 
'अब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूँ 
अपने खेतों से बिछड़ने  की सज़ा पाता हूँ ...'
'ग' से गरीबी, जिप्सी दिल, दुआ, IQ लेवल काफी कुछ सोचने को मजबूर करती हैं। 
दिल्ली वाले हिस्से में कवि की शटल प्रेम और दर्शन के बीच दौड़ती रही होगी। ऐसा कविताओं के रस से प्रतीत होता है। 'तुम्हारे लिए' देखिये-
दीपक मशाल 
'देखता हूँ 
फैलती हुई सड़कें और सिकुड़ती हुई नदियां 
दोनों को पर करते-करते 
हांफ जाता हूँ 
फिर भी  तुम्हारे लिए 
आवाज़ लगाता हूँ।'
 या 
'तुमसे जो मिलने लगा हूँ 
 लफ़्ज़ों से खेलने लगा हूँ 

ज़िद्दी नहीं था मैं इतना मगर 
आसमां की खातिर मचलने लगा हूँ 

वक़्त ने बना दिया मोहतात इतना 
अब सूरज देखकर चलने लगा हूँ। '
दिल्ली में जो मोहब्बत परवान चढ़ी, जिसके प्रेम में कविता लिखी गई होगी, बहुत संभव है कि वह इलाहाबाद में शुरू हुई और तभी कविताओं से प्रेम हुआ हो-
 तुम ख़त लिखना, दर्द लिखना 
दर्द बढ़ जाए तो हमदर्द लिखना। 
'अलग़ोज़ा' की अधिकांश कवितायें न सिर्फ पठनीय हैं बल्कि मनन करने योग्य भी हैं और इस संग्रह को एक सफल संग्रह बनाती हैं। कुछ कवितायें नए स्वाद की हैं, पाठक को उनसे प्रेम करने में समय लगेगा। 
इंसान बने रहने के लिए क्या जरूरी तत्व हैं यह याद रखने हेतु यह संग्रह समय-समय पर आपके हाथ में आता रहे। और उसके लिए हिन्द युग्म प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह का आपके घर में होना जरूरी है।  
दीपक मशाल