अपर्णा भागवत की कविताएं

- अपर्णा भागवत

अपर्णा भागवत 
(1) उस पूर्णमासी

 दूधिया चाँद, उस रात 
 धरती के बहुत करीब था
 और हम मानों चमक चांदनी में
 सिर से पैर तक रुपहले हो गए थे

उसने हाथ थाम कहा
 देखो वो जो सितारा है चाँद के पास
 मंगल, वो आज कैसे इस सुपर मून
 से बने बिना लहरों वाले सागर में
 एक छोटी सी नाव बन
 स्थिर है अपनी जगह
 शायद जब हम सो जाएंगे
 जीने की एक चाह लिए
 ये अपना सफर पूरा करेगा
 और फिर धूप में रुका रहेगा
 रात फिर सफ़ेद टिकुली के नीचे
 एक लाल बूँद लगाने को
 पर चलो न, तुम मेरे साथ भाग चलो
 आज हम भी सफ़र करें
 इस महासागर में
 तुम मुझे ज़मीं के नन्हें पोखर और झरने दिखाना
 और मैं तुम्हारी पहचान
 इन सितारों से करवा दूँगा।

एक मौन का भास था, तब शब्दों की गरज न थी
 मैं सिर्फ मुस्कुरा दी,
 मैं धरा थी
 वो मेरा आसमां
 हमारी ही धुरी थी 
 हमारे ही ध्रुव थे
 और वह तरल सृष्टि 
 हम दोनों के बीच, 
 हमारी ही परिक्रमा में
 कब से लहरा रही थी।


(2) पराया धन

 सयानी हुई तबसे
 ढूँढ रही है
अपनाघर!

माँ के आँचल की छाँव से बड़ी हुई
 पिता के कांधो का बोझ बनी
 पति की ज़िम्मेदारी, 
 ससुराल वालों के लिए “फलाने” की बेटी

लोगों में अपना घर ढूँढती
 परायापन झेलती रही
 किसीने उसे बताया नहीं
 लोगों में किसीके घर नहीं बसते

उनमें बसता है एक सफ़र
 बहता,राह बदलता, कुचलता हुआ
 और, दूसरों का सफ़र कब किसीको अपनाता है
 वह तो बस, तुमसे तुम्हारी पहचान ले लेता है

काश! उसके कानों में कोई कह दे-
 सुनो लड़की! अपना ठौर तलाशना बंद करो
 और प्रेम करो खुद के "स्व" से, 
 तुम में ही तुम परायी नहीं, तुम अपना ही धन बनो

भीतर देखो, तुम में एक हृदय भी है
जो धड़कता है सिर्फ तुम्हारे लिए


(3) द्रुत गति से विपरीत

कभी कभी ऐसा लगता है मानों 
 मेरी नस नस से उभर रही हों
 हज़ारों चंद्रिकायें और मैं खुद
 उस उजाले में खो गयी हूँ
 और कभी मैं खुद एक ब्लैक होल बन जाती हूँ
 मेरे अंदर ही समाती हैं
 जाने कितनी आकाश गंगाएं
 हर बार एक सितारे को 
 जन्म देते रहने की ज़िम्मेदारी से
 मैं स्वयं, घट गयी हूँ

करीने से तह ज़िन्दगी के
 रोज़ उधड़े किनारे सिलते सिलते
 सुबह से शाम, मैं खुद छोटी हो गयी हूँ
 मानों मेरे विशाल डैनों के फैलाव से
घुटनभरेअनंत को संभालते हुए
 खुद समय से बंधती जा रही हूँ
 छटपटा जाती हूँ जब
 एक गहरी सांस लेना चाहती हूँ
 और अपनी ही मजबूरी का
 एक तीखा अम्ल महसूस करती हूँ

मैं क्यों खुद से अलग
 कुछ और "बनना" चाहती हूँ?

हाँ, अब मैं धीमी हो गयी हूँ
 उतर गई हूँ उस भागती ट्रेडमिल से
 सड़क किनारे से चल रही हूँ
 पंखों का फैलाव काम कर
 बैठ गयी हूँ सुस्ताने, एक नो वोल्टेज तार पर
 और बेफिक्र खुले आसमां में 
 सांसें भर रही हूँ, रास्ते जब किसी
 बगीचे से हो गुज़रते हैं
 मैं झुककर फूलों की खुशबू से
 अपना अंतर भरना सीख गई हूँ
 जबसे "बनना" छोड़ दिया है
 महसूसती हूँ नसों में दौड़ती ताकत
 अब मैं चाहूँ तो सितारों को मोड़ सकती हूँ
 पर मैं मुस्कुराकर बस, एक कप चाय
 पर कविता सुनना पसंद करती हूँ
 हाँ, अब कहीं मैं
 ज़िन्दगी जीना सीख रही हूँ!


(4) तुम सुन सकती हो न?

माँ, आजकल आप "लव यू बेबी" नहीं बोलतीं
 जब भी मैं लव यू कहती हूँ आप बस हम्म कहती हैं

ना, मेरी जान, माँ ने कभी "लव यू" कहा ही नहीं
 पर तुम बराबर उसे सुनती आयीं
 याद है जब तुम ढाई साल की थी
 घर की सीढ़ियों से फिसली 
 गिरने, चोट खाने से अनभिज्ञ
 घुटने पर एक खरोच ले
 मेरे सामने खड़ी रह बोली
 "मम्मा, मैं गिरी और यहाँ से फट गई,
 मुझे ठीक कर दो!"
 बहुत देर तक तुम्हें अपनी गोद ले 
 चूमचूमकरतुम्हारी चोट सिलती रही
 वहीँ तुमने लव यू सुना होगा.....

मुझे याद है काँटों की अनगिनत खरोंचे ले
 तुम मेरे लिए जंगली फूलों का गुलदस्ता लायीं
 मैं भावातिरेक में रोई थी
 और तुमने हौले से एक पीली तितली, मेरे हाथ पर बिठा दी
 उसके उड़ने पर हम दोनों ने तालियां बजायीं थीं
 या इतने साल जो तुम क्लास से निकलते ही
 मुझे बाहर खड़ा देख मुस्काती हो
 तुम भी जानती हो
 इन सभी छोटी छोटी बातों में वही एक छिपा वाक्य है न!

हमने नहीं सीखा, बात बात में,आय लव यू, उछालना
 न सीखा इसी वाक्य को अपनी ज़रुरत बनाना
 हाँ, तुम्हारी फ़िक्र करने, और तुम संग बड़े होने में
 एक मखमली अहसास जो है
 वही कहता है न सब, हम पिछड़े ही सही, पर अनकहे की कीमत जानते हैं!

देखो! फिर रूठकर जा रही हो? सीढ़ियां संभलकर उतरना!


(5) वह लड़की

माँ ने कई बार समझाया था उसे,
 खिलखिलाकर हंसने की ज़रुरत नहीं
 ठहाके लड़कियों के नहीं होते, सुनो,
 तुम सिर्फ, मुस्कुरा दिया करो।

लड़की हो, लडकियां कहाँ हर चोट सुखाती हैं
 कुछ बुरा लगे, तो दफ़्न करो उसे अपने अंदर
 हर कहीं अपना रोना न रोओ
 लड़कियों की तरह सहना सीखो।

ज़्यादा बाहर निकलने की ज़रुरत नहीं
 कपडे सलीके के पहनों
 अजनबियों से बात न करना
 अपने काम से मतलब रखना

बाहर तो नहीं, घर में ही किसी अपने की दरिंदगी का शिकार हुई लड़की
 माँ की सोच और उसकी कमी से लाचार
 अपनों की ही सहूलियत की मारी
 आज, गुमें, छोड़े गए बच्चों में शुमार हुई बच्ची!

वो रोती कम और काँपती ज़्यादा है
 रात आँखों में काटती और खुदको ढांकती ज़्यादा है
 कुछ कहने की चाह में हिचकियाँ बंध जाती हैं
 बदन पर जले के निशानों का दर्द ज़्यादा है

पुनरुद्धार गृह के दीवारों को घंटों ताकती है
 अजनबियों के बीच आने से घबराती है
 जाने कब कौन फिर नोच खसोट ले
 जाने कौन फिर सड़क पर रोता छोड़ दे!

हैरान देखती हूँ मैं
 उस खंडर को जो इस नन्हें शरीर में बसता है
 खाली वीरान गुप्त सा
 जहाँ बस सीलन भरा इंतज़ार सजता है!

कभी तो “माँ” की बेबस सोच बदलेगी
 कभी तो बेटियाँ निडर हँसेगी
 कभी तो वो भरोसे लायक नेह के दो शब्द सुनेगी
 कभी तो उसकी रौशनी किसी घर को भरेगी!