रोल-रिवर्सल

- अनिता ललित

अनिता ललित 
टी. वी. पर एक क्रीम का विज्ञापन देखा !- माँ अपने पाँच -छह वर्षीय बेटे को क्रीम लगा रही होती है, साथ ही उसे कुछ सीख भी दे रही होती है। परन्तु बेटे का ध्यान माँ की बातों पर नहीं बल्कि दूर खेलते बच्चों की ओर होता है। तभी माँ उससे कहती है, 'सुनो ध्यान से, हमेशा नहीं रहूँगी मैं, तुम्हारे पास ये सब बताने के लिए!' -सुनते ही बेटे का चेहरा उदास और दु:खी- सा हो जाता है। माँ जब उसका चेहरा देखती है तो पूछती है 'क्या हुआ?' बेटा बहुत मासूमियत से, दु:खी स्वर में पूछता है, 'आप मुझे छोड़ कर चले जाओगे?' उसके इस सवाल पर माँ का दिल जैसे भर आता है। वह कहती है, 'नहीं! कभी नहीं! मैं तो... (फिर उसकी नाक और गाल पर क्रीम लगते हुए कहती है) यहाँ रहूँगी, यहाँ रहूँगी ...!' बेटा भी ख़ुश होकर भूल जाता है और माँ के साथ खेलने लगता है। यह विज्ञापन दिल को एकदम छू जाता है। मासूम बच्चे के चेहरे के भाव, उसकी आँखों से छलकता माँ को खोने का डर और माँ के आश्वासन देने पर उसकी ख़ुशी और संतुष्टि -माँ तथा एक छोटे बच्चे के बीच -रिश्ते की गहराई,आपसी विश्वास और निश्छलता को बख़ूबी बयान करती है।

       एक छोटे बच्चे का एकमात्र सहारा दुनिया में उसके माता-पिता होते हैं। उनके बिना वह अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर पाता। वह कहीं भी खेले-कूदे-घूमे, उसे यह तसल्ली रहती है कि वहाँ से वह अपने घर, अपने माता-पिता के पास जा सकता है-वही उसकी दुनिया होते हैं! एक वही हैं, जो उसे भूख लगने पर खाना खिलाएँगे, चोट लगने पर सहारा देंगे, उसका दर्द मिटाएँगे, उसे कोई समस्या है, तो उसे हल करेंगे, कोई डर है तो उस डर से लड़ेंगे और छुटकारा दिलाएँगे। यही सुरक्षा और विश्वास की भावना उसकी शक्ति होती है, जिसके बल पर वह अपने जीवन में आगे बढ़ता है। यही आश्वासन उसके व्यक्तित्व के विकास, उसके आत्मविश्वास का आधार होता है, सम्बल होता है। जिस बच्चे के जीवन में यह सुरक्षा-कवच, यह आश्वासन नहीं होता, उसका जीवन अत्यंत कष्टमय और उलझा हुआ होता है-यह बात जग-ज़ाहिर है !

धीरे-धीरे बच्चे बड़े होते हैं, घर से बाहर निकलते हैं, शिक्षा प्राप्त करते हैं, दुनियादारी सीखते है, अपना घर बसाते हैं। इस पूरी जीवन-यात्रा में माता-पिता, अपना हर फ़र्ज़, हर रोलनिभाते हुए अपनी उम्र की ढलान पर पहुँच जाते हैं।

अब वक़्त आता है 'रोल-रिवर्सल' का !यानि अभी तक जिन माता-पिता के मज़बूत हाथ बच्चों को सहारा दे रहे थे, वे थक चुके होते हैं, और अबउनके कँपकँपाते हाथ, लड़खड़ाते पैर, डगमगाता आत्मविश्वास अपने बच्चों की बलिष्ठ बाहों का सहारा चाहते हैं! अब उन्हें सुरक्षा (मानसिक एवं शारीरिक) का आश्वासन चाहिए कि यदि वे गिरने लगें, हारने लगें, तो उन्हें थामने के लिए उनके बच्चे उनके पास हैं। जिस प्रकार उन्होंने अपने बच्चों की हर आवश्यकता, हर ज़िद,  हर इच्छा पूरी की,  उनके जीवन के हर उतार-चढ़ाव में उनके साथ, उनकी ढाल बन कर खड़े रहे, अब उसे पूरी तरह नहीं, तो उसका कुछ अंश तो बच्चे निभा सकें। परन्तु क्या ऐसा हो पाता है? एकल परिवार, विदेश में बसते बच्चे और बढ़ते हुए ओल्ड-एज होम्स तो कुछ अलग ही तस्वीर पेश करते हैं।

जिस प्रकार धूप-गर्मी-सर्दी-बरसात, रास्ते में आने वाले हर पत्थर, हर थपेड़े को सहते हुए अपनी यात्रा पूर्ण करने के बाद पथिक को एक शीतल छाँव की, विश्राम की दरकार होती है, ठीक उसी प्रकार हर वृद्ध माता-पिता को, अपने जीवन की साँझ में, अपने बच्चों के फलते-फूलते गुलशन में, आराम करते हुए, उसकी सुगंध का आनंद लेते हुए, उनकी उपलब्धियों पर, अपने जीवन के बचे हुए पलों को वार देने की चाह होती है !-यह उनका अधिकार है और उनकी इस चाहत को पूरा करना उनके बच्चों का कर्त्तव्य है।

वृद्धावस्था में इंसान की ज़रूरतें मटीरियलिस्टिक कम, भावनात्मक अधिक हो जाती हैं। उम्र के इस पड़ाव में सबसे दुखद और कष्टकारक बीमारी,जो उन्हें सताती है, वह है 'अकेलापन', जिसका निवारण उनके बच्चों के अलावा और कोई नहीं कर सकता! न तो उन्हें खाने-पीने का शौक रह जाता है, न ही पहनने-ओढ़ने का। उनकी दुनिया बस 'भर-भर मुट्ठी दवाइयों' और 'दो मीठे बोलों' पर ही टिककर, सिमटकर रह जाती है।

अतः हर सन्तान का यह कर्त्तव्य बनता है कि उम्र के इस पड़ाव पर वह अपने माता-पिता की सिमटी हुई बेनूर दुनिया को उजालों से भर दे ! उनके स्वाद एवं सेहत के अनुरूप जूस, सूप, फल, सब्ज़ी इत्यादि घर के खाने में शामिल करें। यदि माता-पिता सक्षम हैं तो ठीक, अन्यथा उनकी दवाइयों की ज़िम्मेदारी स्वयं अथवा किसी पढ़े-लिखे, समझदार व्यक्ति को सौंपें, वरना कुछ भी अनर्थ हो सकता है। उन्हें अपनी उपलब्धियों से अवगत कराते रहें , तथा समय-समय पर उनसे छोटी-मोटी समस्याओं पर सलाह भी लें, जिससे उनको यह सुखद एहसास होता रहे कि वे अभी भी इस घर का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं, घर के बड़े हैं-किसी पर बोझ नहीं। जहाँ तक हो सके उनसे सकारात्मक बातें ही करें । कहीं बाहर घूमने जाने पर उनकी सुरक्षा एवं देखभाल का उचित प्रबंध करके जाएँ क्योंकि वृद्ध लोगों को किसी हादसे का शिकार होने में देर नहीं लगती। नियमित अंतराल में उनका डॉक्टर से चेकअप कराएँ !इससे किसी घातक बीमारी के आक्रमण करने के पहले ही सावधान हुआ जा सकता है तथा उनका मनोबल भी बढ़ता है एवं आने वाली परिस्थिति से उबरने की इच्छाशक्ति बढ़ती है।

उम्र बढ़ने के साथ कई बीमारियाँ तो आनी ही होती हैं, वृद्ध माता-पिता को यह संतोष, कि उनके बच्चे हर क़दम पर उनके साथ हैं, उनका पूरी तरह से ध्यान रख रहे हैं, उन्हें मानसिक एवं शारीरिक -दोनों रूपों से सुदृढ़ बनाता है।

हमें यह याद रखना चाहिए कि बच्चों के सिर पर माता-पिता का हाथ ईश्वर का वरदान है, उनको सुखी एवं संतुष्ट रखना ईश्वर को प्रसन्न रखने जैसा है।
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