कुसुम जोशी की लघुकथा

कुसुम जोशी
त्योहार की जात 

जमीला अभी पाँच कोठियों का काम निपटा के घर पहुँची ही थी कि रिक्शा लेकर आमिर पहुँच गया, बोला, "अरी पाँव पसार के क्या बैठी है,जल्दी से एक आध जोड़ा अपने कपड़े लत्ते रख ले , बस में बिठा आता हूँ तुझे।"

"या अल्लाह, ऐसा क्या हो गया जो सर पे सवार हो रहे हो।"

"तेरे अब्बा का फोन आया था, कि जमीला  को भेज दो, फूफी लोग भी सब आ रहे हैं।"

"ऐसा कौन सा काज तय कर दिया अब्बा ने जो आनन फानन में बुला रहे हैं... कुछ तुम्हारें दिमाग का फितूर लगे है मुझे।"

"तो मैं झूट बोल रिया हूँ क्या? तू जुम्मन भाईजान को फोन काहे ना कर लेती, ले मैं ही लगा के देता हूं..."

"ले, करले बात" कहते आमिर ने फोन लगाकर जमीला को पकड़ा दिया।

फोन में भाई की आवाज सुन जमीला के चेहरे में खुशी भर उठी, "सच्ची कह रहे हो भाईजान... आप मान गये तो फिर कोई बात ही नहीं... अब्बा तो हमेशा ही चाहते थे... ठीक है मैं पहुँच जाऊँगी" जमीला  फोन बंद कर आमिर को देते हुये बोली, "जाना ही पड़ेगा परसों राखी है, जब तक अब्बा का बस रहा, हर राखी में दोनों फूफी को बुलाते रहे,पर जुम्मन भाई चार हरफ क्या पढ़ आये, सबसे पहले राखी मनवाना बंद करवाया, अब्बा कहते रहे "ये भाई बहनों की मोहब्बत का त्योहार है, इसमें धरम कहाँ आता है।"

आज भाईजान कह रहे हैं कि "अब्बा की इच्छा है कि जिन्दगी के आखिर सालों में मेरी बहनों को राखी बांधने आने दे, अब दोनों दोनों फूफी आ रही हैं, तो तू भी आ ही जा, भाई जान की अक्ल तो फिरी, खुदा खैर करे..." 

यह कहते जमीला का चेहरा सूकून से भर उठा।