चुप - ओबैदुल्ला अलीम

ओबैदुल्ला अलीम
(12 जून 1939 – 18 मई 1998)
तू अपनी आवाज़ में गुम है, मैं अपनी आवाज़ में चुप
दोनों बीच खड़ी है दुनिया, आइना ए अल्फ़ाज़ में चुप

अव्वल-अव्वल बोल रहे थे, ख्वाब भरी हैरानी में
फिर हम दोनों चले गये, पाताल से गहरे राज़ में चुप

ख्वाब सराय ज़ात में ज़िंदा, एक तो सूरत ऐसी है
जैसे कोई देवी बैठी हो उज्राए राज़ों नियाज़ में चुप

अब कोई छू के क्यों नहीं आता उधर सिरे का जीवन अंग
जानते हैं पर क्या बतलाएँ लग गई क्यूँ परवाज़ में चुप

फिर ये सारा खेल तमाशा किस के लिये और क्यूँ साहब
जब इसके अंजाम में चुप है, जब इसके आग़ाज़ में चुप

नींद भरी आँखों से चूमा दीये ने सूरज को और फिर
जैसे शाम को अब नहीं जलना खेंच ली इस अंदाज़ में चुप

ग़ैब समय के ज्ञान में पागल कितनी तान लगायेगा
जितने सुर हैं सात से बाहर, उससे ज़्यादा साज़ में चुप

तू अपनी आवाज़ में गुम है, मैं अपनी आवाज़ में गुम है
दोनों बीच खड़ी है दुनिया, आइना ए अल्फ़ाज़ में चुप।

(लिप्यांतर: अनुराग शर्मा)
काव्य :: अनुवाद :: ग़ज़ल