प्रवासियों का सतत जीवन-संघर्ष और सृजना की गुणवत्ता

कला एवं भाषा संकाय
लवली प्रोफ़ैशनल यूनिवर्सिटी,
फगवाड़ा (पंजाब)
मोबाइल: 9876758830

विनोद नहीं विषम वेदना का विषय है कि साहित्य को लेकर आज भी हम प्रवासी-अप्रवासी साहित्य के पचड़े में फंसे हुए हैं; और यह हमारे लिए खेदजनक और बहुत ही अपमानजनक है, लेकिन इस थोपे गये या कहें कि अनचाहे परोसे गये नाम ‘प्रवासी-साहित्य’ के साथ भी ‘हिन्दी साहित्य को प्रदेय’ एकलव्य द्वारा कटे अंगूठे की पीड़ा को पीकर विश्व के श्रेष्ठ धनुर्धर के समक्ष समकक्ष पहचान बनाने जैसा है।

लब्धप्रतिष्ठ? अधिकारी? सुधी समालोचकों! की तमाम तरह की सम्यक! ईक्षाओं के बीच, अपनी जन्मभूमि, अपने समाज और अपने लोगों से वियुक्त हो; सहस्त्रों मीलों की दूरी होने पर भी संवेदनात्मक हृदय की पुकार और झनकार शब्दों का जामा पहन विविधरूपा प्रवासी साहित्य के रूप में नि:संदेह हिन्दी साहित्य को पूर्णता प्रदान कर रही है। इस कथन में न कोई अतिश्योक्ति है और न ही अन्योक्ति।

पिछले कुछ दशकों से भारत के बाहर विश्व के अनेक भागों से हिन्दी भाषा एवं साहित्य-चिन्तन का उपक्रम सामने आ रहा है। अपनी जड़ों से उखड़े हुए, अपने ससम्मान अस्तित्व और अस्मिता के संघर्ष को भोगते-झेलते  अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, डेनमार्क, आस्ट्रिया, आस्ट्रेलिया, स्वीडन के साथ-साथ और भी बहुत से देशों में बसे भारतीय रचनाकारों ने अपने आस-पास एक छोटा सा साहित्य-संसार रचा है, जहाँ कविता, कहानी, नाटक, निबन्ध, डायरी, यात्रा, भेंट-वार्ता, लघु-कथा और संस्मरणात्मक विधाओं के माध्यम से अपनी शेष-अशेष होती सांस्कृतिक परम्परा का अंश, पीढ़ी-दर-पीढ़ी पाश्चात्य क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा का अन्त:करण में दंश  और बहुसांस्कृतिक नवाचार एवं नवरंगयुक्त हंस हैं।

भारत-भूमि से दूर, भारतीयता को अपनी संवेदना, अपनी भावनाओं को अपनी कलम-तुलिकाओं से चित्रित करते कलाविदों का पुन: मूल्यांकन करने पर विदित होता है कि हिन्दी साहित्य की पूर्णता में इस प्रवासी हिन्दी साहित्य का प्रदेय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

प्रवासी हिन्दी कथा-साहित्य पर परिचर्चा में प्रवासी साहित्य को उचित स्थान और सम्मान के अवरोध क्या हैं? का उत्तर देते हुए ऊषा राजे सक्सेना कहती हैं कि अनगिनत अवरोध हैं। आलोचकों की बेरुखी और पंडितों का सामन्तवादी अहंकार इसका सबसे बड़ा कारण है। इस मुद्दे पर वे रोहिणी अग्रवाल जी के कथन को सामने रखती हैं- प्रवासी साहित्य को लेकर हिन्दी का आलोचना-जगत ज़्यादा उत्साही और तटस्थ नहीं है। एक तरह का शुद्धतावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए वह भारत की भौगोलिक सीमा में रचित हिन्दी साहित्य को अपना मानता है,

क्योंकि यहीं भारत (हिन्दी पट्टी) का यथार्थ अपनी तमाम विडम्बनापरक विद्रूप सच्चाइयों, सीमाओं और संभावनाओं के साथ उपस्थित होता है। इसी यथार्थ में स्वयं उसके होने और बेहतर भविष्य गढ़ने की आकांक्षाएँ भी निहित हैं और इसी में जड़ें, अस्मिता, भविष्य भी। वह उसका आत्मविस्तार भी है और सृजन भी। प्रवासी साहित्य उसकी इस गदगद विह्‍वता में कहीं बाधा बनता है।”1

भारत के बाहर प्रवास में साहित्य-साधक क्या उपक्रम कर रहे हैं और उनके इस उपक्रम का परिणाम क्या निकल रहा है? इसके बारे में अन्तिम टिप्पणी अथवा अन्तिम निष्कर्ष निकालने से पूर्व पुन: एक दृष्टिपात करना अत्यन्त आवश्यक है।

हिन्दी साहित्य-सृजना में मॉरीशस भारत की ही तरह सक्रिय है। वर्षों पहले के पं. बासदेव बिसुनदयाल से लेकर श्री हेमराज सुन्‍दर जैसे आधुनिक साहित्‍यकारों की यह श्रृंखला अभिमन्‍यु अनत, ब्रजेन्‍द्र भगत मधुकर, डॉ मुनीश्‍वरलाल चिंतामणि, रामदेव धुरंधर, इन्‍द्रनाथ भोला, बेणीमाधव रामखिलावन, महेश रामजियावन, प्रहलाद रामशरण, के. हजारीसिंह, डॉ बीरसेन जागासिंह और राजेन्‍द्र अरुण तक आ पहुँचती है। कभी तो ऐसा भी लगता है कि भाषाओं के झगड़े में उलझे भारतवर्ष से अधिक हिन्दी के प्रति श्रद्धा मॉरीशस में है।

इस अत्यन्त लघु से देश को दो-दो विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन के सफल आयोजन का श्रेय है और लगभग पाँच सौ हिन्दी पुस्तकों का प्रकाशन किया जा चुका है। इस देश के बारे में एक और बात जो हमें दिखाई देती है; वह यह कि सड़क से संसद तक हिन्दी में बात करना सम्मान का विषय माना जाता है; यहां तक कि इस देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति सर शिवसागर रामगुलाम से लेकर राष्ट्रपति सर अनिरुद्ध जगन्‍नाथ तक बड़े गर्व से हिन्‍दी भाषा में बात करते हैं ।

फीजी का सम्बन्ध हिन्दी से बहुत पुराना है। अठारह सौ उन्यासी में भारत से एक अनजान द्वीप की यात्रा पर निकलेभारतीय मजदूरों के साथउनकी भाषा, साहित्य और संस्‍कृति भी उनके साथ वहां पहुँची। संस्‍कृति को संभाले फीजी के गिरमिटिया मजदूरों में हिन्‍दी शिक्षण का व्‍यवस्‍थित कार्य भी शुरू किया गया । इस काम को आर्य समाज और सनातन धर्म महासभा ने आगे बढ़ाया। श्री दिवाकर प्रसाद और श्री भास्‍कर मिश्र जैसे पत्रकारों ने फीजी रेडियो में हिन्‍दी को प्रतिस्थापित किया। पंडित शिवराम शर्मा नेअंग्रेजी के सेटलर नामक समाचार पत्र का हिन्‍दी संस्‍करण निकाला जिसे फीजी में हिन्दी का पहला समाचार पत्रभी माना जाता है । बाद में फीजी समाचार (बाबू राम सिंह के संपादन में), वैदिक संदेश, शान्‍तिदूत भी प्रकाशित हुए। पंडित अमीचन्‍द शर्मा को पहलाहिन्‍दी लेखक कहा जा सकता है । हिन्‍दी बाल पोथी का प्रकाशन यद्यपि बाद मेंहुआ और उससे पहले पंडित रामचन्‍द्र शर्मा की पुस्‍तक फीजी दिग्‍दर्शन वर्ष 1936 में प्रकाशित हो चुकी थी। प्रकाशन की मुश्किलों के कारण फीजी केहिन्‍दी रचनाकारों की पुस्‍तकें कम प्रकाशित हो पाई हैं, फिर भी पंडित कमलाप्रसाद मिश्र, महावीर मित्र, काशीराम कुमुद, ज्ञानी दास, जोगिन्‍द्र सिंहकंवल, अनुभवानंद आनंद जैसे कवि और महेन्‍द्र चन्‍द्र शर्मा, प्रो.सुब्रमणी, गुरुदयाल शर्मा, भारत बी मौरिस जैसे गद्य लेखक फीजी में हिन्‍दीके प्रमुख हस्‍ताक्षर बने हैं।

इसके अतिरिक्त श्री विवेकानन्‍द शर्मा ने प्रशान्‍त की लहरेंकहानी संग्रह से लेकर सरल हिन्‍दी व्‍याकरण तक और फीजी के प्रधानमंत्री से लेकर फीजी में सनातन धर्म-सौ साल की रचना करके वे फीजी हिन्‍दी साहित्‍य को समृद्ध कियाहै ।

भारतेत्तर देशों में सूरीनाम, गयाना और त्रिनीदाद भी महत्त्वपूर्ण हैं। 1873 में गिरमिटिया मजदूरों ने सूरीनाम में प्रवेश किया तो हिन्‍दी भाषा और साहित्य ने एक नया अध्याय लिख दिया था। आज आजाद सूरीनाम में बहुत बड़ी संख्या में हिन्दी प्रेमी वहाँ हैं, जो साहित्य और शिक्षण के माध्यम से हिन्‍दी की सेवा में लगे हुए हैं।मुंशी रहमान खान को सूरीनाम का आदि हिन्‍दी कवि कहा जाता है। उनकी रहमान दोहा शिक्षावली और पंडित रामलाल शर्मा की वेद वन्‍दना के रूप में हिन्‍दी काव्‍य का जो निर्झर उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में शुरु हुआ थावह आज भी जारी है।

सूरीनाम की तरह ही ब्रिटिश गयाना में भी भारतीय मजदूरकाम करने गए और वहां बस गए। महात्‍मा गांधी और दीनबंधु सीएफ एंड्रूज के प्रयत्‍नों से वहां हिन्‍दी शिक्षा की व्‍यवस्‍था, गयाना की स्वतन्त्रता से पूर्व ही हो गई थी। गयाना की स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं के अलावा, भारतीय उच्‍चायोग, गयाना विश्‍वविद्यालय और भारतीय सांस्‍कृतिक केन्‍द्र में भी हिन्‍दीशिक्षण समय समय पर होता रहा है। गयाना हिन्‍दी प्रचार सभा, गयाना हिन्‍दूधार्मिक सभा, महात्‍मा गांधी संगठन, आदि जैसी संस्‍थाओं ने इस कार्य को आगे बढ़ाया है। प्रारम्भ में साहित्यिक प्रकाशन का प्राय: अभाव ही रहा किन्तु अब इस दिशा में भी प्रगति देखी जा रही है। त्रिनिदाद एवं टोबैगो की स्‍थिति भी लगभग गयाना जैसी ही है ।

लगभग डेढ सौ साल से इस देश में हिन्‍दी भाषियों ने हिन्‍दी के प्रति अपना प्रेम है लेकिन पश्‍चिमी प्रभाव में यहाँ  इन भारतवंशियों की भाषाभी क्रियोल हो गई है। त्रिनिदाद में हिन्‍दी शिक्षण के प्रकल्‍प के साथ-साथ चनका सीताराम की हिन्‍दी निधि, रवि महाराज का हिन्‍दू प्रचारकेन्‍द्र और प्रोफेसर एवं महाकवि/संगीतज्ञ हरिशंकर आदेश का भारतीय विद्या संस्‍थान, हिन्‍दी भाषा, भारतीय संगीत और लोकगीतों एवं लोककलाओं को संजोने/बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

प्रारम्भ में भारत से व्‍यापारिक उद्देश्‍य से हजारों गुजराती उद्यमी अफ्रीका गए थे। प्रारंभ में तो अन्‍य साम्राज्‍यवादी ताकतों की भांति ही दक्षिण अफ्रीका शासन ने हिन्‍दी या अन्‍य भारतीय भाषाओं की पढ़ाई की कोई व्‍यवस्‍था नहीं की और हिन्‍दी का पठन पाठन निजी प्रयत्‍नों तक सीमित रहा, लेकिन धीरे-धीरे भारतीय लोगों के प्रयासों से वर्ष 1927 में केपटाउन एग्रीमेंट पर हस्‍ताक्षर किए गए। 1947 में भारत से गएपंडित नरदेव वेदालंकार ने राष्‍ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा में अपने हिन्‍दी शिक्षण के अनुभव को वहाँ लागू किया और हिन्‍दी पाठ्यक्रम में व्‍यवस्‍था एवं शैक्षिक मूल्‍यों की स्‍थापना की । अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों की हिन्‍दी की पढ़ाई के लिए और उन्‍हें भारतीयता से जोड़े रखने के लिए एक और महत्त्वपूर्ण नाम स्‍वामी भवानीदयाल सन्‍यासी जी का है। आज यहाँ भी साहित्य-विमर्श के द्वार खुले हैं।


अमेरिकी उपमहाद्वीप भी हिन्दी साहित्य के संवर्द्धन में अपना बहुमुल्य योगदान दे रहा है। कुंअर चन्‍द्र प्रकाश सिंह की प्रेरणा से 18 अक्‍टूबर, 1980 को अंतरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी समिति और रामेश्‍वर अशांत के द्वारा वर्ष 1989 में विश्‍व हिन्‍दी समिति की स्‍थापना और डॉ राम चौधरी की अध्‍यक्षता में विश्‍व हिन्‍दी न्‍यास की स्‍थापना हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

अमेरिका में प्रवासी हिन्‍दीलेखन की परंपरा बहुत पुष्‍ट है।गीतकार इंदुकान्‍तशुक्‍ल से लेकर सुस्‍थापित कवि श्री गुलाब खंडेलवाल, डॉ विजयकुमार मेहता, श्री ओम प्रकाश गौड़ प्रवासी, रामेश्‍वर अशांत, डॉ वेद प्रकाश वटुक तक और नई श्रृंखला में सुधा ओम धींगरा, हिमांशु पाठक, धनंजय कुमार, राकेश खंडेलवाल, सुरेन्‍द्र कुमार तिवारी, अनंत कौर, अंजना संधीर और नरेन्‍द्र सेठी ने अपने लिए प्रवासी हिन्‍दी कवियों में जगह बनाई है। कथा साहित्‍य में स्‍वर्गीय सोमा वीरा, उषा प्रियंवदा, सुषम बेदी, उमेश अग्‍निहोत्री नेविश्‍व हिन्‍दी प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया है।

इसी के साथ कनाडा में श्रीमती मधु वार्ष्‍णेय, श्री नरेन्‍द्र भागी, आचार्य शिव शंकर द्विवेदी, राज शर्मा, श्री श्‍याम त्रिपाठी, श्री श्रीनाथ द्विवेदी, श्रीसमीर लाल, जसवीर कलरवी, डॉ भूपेन्‍द्र सिंह, श्री हरदेव सोढी, श्री ललित अहलूवालिया, श्री भुवनेश्‍वरी पांडेय, श्री अमर सिंह जैन और श्री कृष्‍णकुमार सैनी का भी उल्लेखनीय योगदान है।

ब्रिटेन: ब्रिटेन में प्रवासी भारतीयों ने सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में अपनी साख बनाई है और इसी कारण से साहित्य-सांस्कृतिक संरक्षण और संवर्धन में भी उनका योगदान अपेक्षाकृत अधिक है। कारण कुछ भी रहे हों, भारतीय लोगों, भारतीय संस्‍कृति, भारतीय भाषाओं में ब्रिटिश समाज की रुचि बढ़ी है। ब्रिटेन में हिन्‍दी लेखन की शुरुआत पत्रकारिता से हुई । आज से लगभग 130 वर्ष पहले कालाकांकर नरेश राजा रामपाल सिंह के संपादन में पहला हिन्‍दी-अंग्रेजी त्रैमासिक समाचार पत्र हिन्‍दोस्‍थान प्रकाशित हुआ। इसके बाद हिन्‍दी प्रचार परिषद, लन्‍दन के तत्‍वावधान में वर्ष 1964 में प्रवासिनी त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन होने लगा । श्री धर्मेन्‍द्र गौतम इस पत्रिका के संपादक थे और श्री राधेश्‍याम सोनी, श्री जगदीश मित्र कौशल, श्री बैरागी, श्री मोहन गुप्‍त, श्री विनोद पांडे, श्री सत्‍यदेव प्रिंजा, अबू अब्राहम, कान्‍ता पटेल आदि का लेखकीय सहयोग होता था। श्री जगदीश मित्र कौशल के संपादन में1971 को लन्‍दन से ही अमरदीप साप्‍ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ हुआ और लगभग 32 वर्ष तक प्रकाशन के बाद यह वर्ष 2003तक चला। अमरदीप साप्‍ताहिक के महत्‍व को देखते हुए श्री जगदीश मित्र कौशल को भारतीय उच्‍चायोग की ओर से पहला आचार्य महावीर प्रसार द्विवेदी हिन्‍दी पत्रकारिता सम्‍मान वर्ष 2006 के लिए दिया गया। 1997 में त्रैमासिक पत्रिका पुरवाई का प्रकाशन, डॉ पदमेश गुप्‍त के संपादन में शुरू हुआ जो अभी तक जारी है।

हिन्‍दी के लिए पूर्णत: समर्पित इस पत्रिका ने ब्रिटेन के हिन्‍दी रचनाकारों को एक मंच दिया। साहित्‍यिक रचनाओं में पहली प्रकाशित रचना डॉ सत्‍येन्‍द्र श्रीवास्‍तव की है, 'मिसेज जोन्‍स और उनकी वह गली' जो एक लंबी कविता है। इसके बाद डॉ निखिल कौशिक का काव्‍य संकलन, 'तुम लन्‍दन आना चाहते हो', वर्ष 1987 में प्रकाशित हुआ।
ब्रिटेन के प्रमुख रचनाकारों में डॉ सत्‍येन्‍द्र श्रीवास्‍तव, श्री प्राण शर्मा, श्रीमती उषा राजे सक्‍सेना, डॉ कृष्‍ण कुमार, श्री तेजिन्‍दर शर्मा, डॉ.कविता वाचक्नवी (अब अमेरिका), डॉ निखिल कौशिक, श्री मोहन राणा, श्रीमती दिव्‍या माथुर, (स्वर्गीय) डॉ गौतम सचदेव, डॉ पद्मेश गुप्‍त, श्री महेन्‍द्र दवेसर दीपक, श्री रमेश पटेल, श्रीमती शैल अग्रवाल, श्री भारतेन्‍दु विमल, श्रीमती उषा वर्मा, श्रीमती कादम्‍बरी मेहरा, श्रीमती पुष्‍पा भार्गव, श्रीमती विद्यामायर, श्रीमती कीर्ति चौधरी, श्रीमती प्रियम्‍वदा मिश्रा, श्रीमती अरुणा सभरवाल, श्रीमती श्‍यामा कुमार, डॉ इन्‍दिरा आनंद, श्री वेद मित्र मोहला, श्रीमती नीना पॉल, श्री नरेश अरोड़ा, श्रीमती अचला शर्मा, श्रीमती चंचल जैन, श्रीमती स्‍वर्ण तलवाड़, डॉ कृष्‍ण कन्‍हैया, श्रीमती जय वर्मा, श्रीधर्मपाल शर्मा, श्री सुरेन्‍द्र नाथ लाल, श्री रमेश वैश्‍य मुरादाबादी, श्री सोहन राही, श्रीमती रमा जोशी, डॉ श्रीपति उपाध्‍याय, श्री एस पीगुप्‍ता, श्री जगभूषण खरबन्‍दा, श्री यश गुप्‍ता, श्री जे एस नागरा, श्रीमंगत भारद्वाज, श्री जगदीश मित्र, श्री रिफत शमीम, श्री इस्‍माइल चुनारा, श्रीमती तोषी अमृता, श्रीमती राज मोदगिल, श्रीमती उर्मिल भारद्वाज, श्रीमतीनिर्मल परींजा आदि हैं, जो यथार्थवादिता की तह को अपनी रचनाओं में देने का निरन्तर प्रयास है। श्रीमती ऊषा राजे सक्सेना प्रदत्त कथन बिल्कुल सच है कि ब्रिटिश में आज यथार्थवादी लेखन हो रहा है।2

ब्रिटिश जीवन-संघर्ष, जीवन-शैली, सोच और द्वन्द्व वैसी नहीं है जैसी भारत में सोची जा सकती है, क्योंकि व्यक्ति और समाज की बदलती परिस्थियाँ ही संवेदनशील रचनाकार को सृजन के लिए उद्वेलित करती हैं।3

ब्रिटेन की ही तरह न्‍यूजीलैण्‍ड, आस्‍ट्रेलिया, नार्वे, डेनमार्क, सउदी अरब, शरजाह, डेनमार्क, जापान आदि में भी प्रवासी भारतीय अल्‍प संख्‍या में हैं और लेखन में संलग्न हैं।

प्रवासी हिन्दी साहित्य के योगदान की चर्चा में श्री कमल किशोर गोयनका का कथन है कि हिन्दी का प्रवासी साहित्य भारतेत्तर देशों को भारत से जोड़ने का एक सेतु बनता है जिसके मूल में भारतवंशियों का स्वदेश-प्रेम, भाषा-प्रेम, संस्कृति-प्रेम के साथ उनकी संलग्नता, सहभागिता एवं सहयोग अटूट रूप में सम्बद्ध है। यह सेतु विश्व-व्यापी हिन्दी साहित्यिक समाज का निर्माण करता है।4

प्रवासी साहित्य गणना की दृष्टि से ही नहीं बल्कि यदि गुणवत्ता की दृष्टि से भी अच्छी स्थिति में है। विषय-वस्तु पर नजर डालें तो यह अनुभव होता है कि प्रवासी हिन्दी रचनाकार आज भी कहीं न कहीं तथाकथित ‘अछूत भाव के दंश’ को झेल रहे हैं, जो रंगभेद के कारण है और स्वाभाविक है कि वह उनके लेखन में आयेगा ही, लेकिन इसके साथ-साथ उनकी अनुभूति ने व्यापक फलक में प्रसार किया है और उनकी कलम उस चिन्तन को भी अपनी रौशनी दे रही है। भारतीय संस्कारों का आत्मसातीकरण, मानवीय संवेदना और मूल्यों की खोज और अस्मिता के प्रति जागरूकता का संयोग प्रवासी साहित्य में पग-पग पर दिखाई देता है। 

एक बिन्दु और भी है जो प्रवासी हिन्दी लेखन में जान फूंकता है और वह है भारतीय संस्कृति की महक, जिसे भारतीय कभी न तो छोड़ पाया है और न ही कभी छोड़ पायेगा। लेखिका ऊषा प्रियंवदा चाहती हैं कि भारत अपनी परम्पराओं, भावनाओं और संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखकर भी अमेरिका जैसे अन्य विकसित देशों से कन्धे से कन्धा मिलाकर चले और लेखिका को अपनी भारतीयता और अस्मिता पर और अधिक गर्व करने का अवसर मिले।5

डॉ. सुधा जितेन्द्र का प्रवासी कविता को लेकर भी यही मानना है कि प्रवासी हिन्दी कविता भाव, विचार और अभिव्यक्ति की दृष्टि से समृद्धतम आधार लिए हुए है। विषय वैविध्य की दृष्टि से उसका फलक व्यापक और अभिव्यंजना कौशल में उसकी प्रस्तुति बेजोड़ है।6

जैसा कि आरोप लगते रहे हैं कि प्रवासी साहित्य में तो बस वही घिसे-पिटे रेशे हैं। इस सन्दर्भ में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रवास का दंश झेलते जीवन की कसक को और अपनी माटी की सुगन्ध को चित्रित करना प्रवासी साहित्य को हीन नहीं बनाता बल्कि उसे एक नया आयाम और नई ऊँचाइयाँ प्रदान करता है। “यह ठीक है कि प्रवासी लेखक में अपनी मातृभूमि और अपने देश का मनोभाव रहता है, किन्तु विदेशी भूमि के संस्पर्श से ही उसमें एक मौलिकता एवं विशिष्टता की चमक उत्पन्न होती है। अपने देश के बाहर जाकर भिन्न-भिन्न देशों की संस्कृतियों, जीवन-शैलियों एवं जीवन-मूल्यों तथा जीवन-संघर्षों तथा चुनौतियों से जो टकराहट उत्पन्न होती है, जो संघर्ष एवं द्वन्द्व होता है, उससे एक नयी सम्वेदना, एक नयी जीवन-दृष्टि एवं जीवन का एक नया स्वप्न जन्म लेता है। हिन्दी का प्रवासी साहित्य इसी जीवन-संघर्ष तथा इसी नये जीवन-स्वप्न का साहित्य कहा जा सकता है और इसी रूप में उसकी अलग पहचान बनती है।”7

निष्कर्ष रूप में मात्र इतना ही कहना है कि प्राकृतिक-अप्राकृतिक आपदाओं से उखड़े पेड़-पौधे धरती के अन्दर की तपन, असंख्य गैस-गन्धों से पहले कोयला ही बनते हैं और समय पाकर वही कोयले कभी हीरे निकलते हैं।
यह सर्वमान्य कथन प्रवासी साहित्य पर शत-प्रतिशत घटित होता है। प्रवासी हिन्दी सृजना को मात्रा और मूल्य दोनों दृष्टियों से देखने और परखने के बाद एक बात निश्चयपूर्वक कही जा सकती है कि जीवन-संघर्ष, विपरीत-परिस्थितियाँ, पाश्चात्य समाजिक-दृष्टिकोण और भारत की भूमि पर विराजमान कुछ तथाकथित स्वयंभू नामित व्यक्तित्व एवं संस्थाओं की संकीर्ण गलियों से गुजरते हुए आज प्रवासी हिन्दी साहित्य ‘दूसरी परम्परा’ के तर्ज पर दूसरा राजपथ तैयार कर रहा है और सशक्त कदमों से आगे बढ़ रहा है। प्रवासियों का सतत जीवन-संघर्ष और सृजना की गुणवत्ता का सही आकलन करने के लिए अभी और अधिक अन्वेषण की आवश्यकता है।हमारी यह दृढ़ मान्यता और स्थापना है कि साहित्य की पूर्णता में प्रवासी साहित्य का अपूर्व प्रदेय है।


सन्दर्भ:
1. प्रवासी हिन्दी कथा-साहित्य पर चर्चा, गवेषणा, अंक-103, जुलाई-दिसम्बर,2014,पृ.138 से साभार
2. श्री राकेश बी. दूबे, हिन्दी और प्रवासी भारतीय, http://www.hindi-bharat.com.2012/09/
3. ऊषा राजे सक्सेना, ब्रिटिश हिन्दी लेखन, प्रवासी हिन्दी साहित्य और साहित्यकार, पृ.9
4. कमल किशोर गोयनका, प्रवासी साहित्य, गवेषणा, अंक-103, जुलाई-दिसम्बर,2014,पृ.43
5. देवेन्द्र कुमार, प्रवासी साहित्य और ऊषा राजे सक्सेना(पत्रों के आयने में), प्रवासी साहित्य और साहित्यकार,पृ. 88
6. सुधा जितेन्द्र, प्रवासी हिन्दी साहित्य के प्रमुख चिन्तन बिन्दु, प्रवासी साहित्य और साहित्यकार,पृ. 26
7. कमल किशोर गोयनका, प्रवासी साहित्य, गवेषणा, अंक-103, जुलाई-दिसम्बर,2014,पृ.43-44