उषा छाबड़ा की कविता

उषा छाबड़ा


बस यूँ ही याद आ गए।
चिड़ियों का चहचहाना,
हवा के ठंडे झोंके,
अलार्म का बजना,
दिन का आरंभ होना,
वर्ष का एक और दिन,
बस यूँ ही याद आ गए।

पानी आने वाला है,
खाना भी बनाना है,
नहाना भी तो बाकी है,
ओह, हां! बच्चों को भी उठाना है।

दौड़-भाग, यह जिंदगी,
सुबह से शाम बस यूं ही,
बीत जाते हैं पल,
ये फूलये पत्ते,
प्रकृति के सुंदर नजारे,
बैठकर सुस्ता लें
नहीं, नाश्ता बना लें।

बस थोड़ी देर,
फिर आराम करेंगे,
रेडियो में भजन व गाने सुनेंगे।
अरे! पता चला
बाई नहीं आएगी,
चलो उठें, नहीं तो देर हो जाएगी।

बस यूँ ही सुबह से शाम,
शाम से रात का सफर,
एक चैन की तलाश में,
एक सुख की खोज में,
बस एक मिनट

बीत जाते है पल,
न जाने कहाँ,
ला खड़ा कर देते हैं,
बुढ़ापे की छाँह।

वह बच्चों का नाश्ता,
वह खाना बनाना,
वे फूलवे पत्तियाँ,
वे गाने, वे सुस्तियां,
सब कुछ है सामने,
पर वे पल,
जो जवानी के थे,
जाने अनजाने कहाँ खो गए

सब कुछ एक झोली में कैद,
एक पिटारी में बंद,
जो कभी खोल ना पाए,
बस एक मिनट की तलाश में,
वही एक पल,
जो निकाल ना पाए

आज बुढ़ापे में फिर,
अलार्म याद आ गया,
वह बच्चों का नाश्ता,
वह पानी का आना,
हाथों से बालू सा
समय का निकलना,
वह दौड़-भाग की जिंदगी,
तमाम होती जिंदगी,

बस यूँ ही याद आ गए।