इंसानियत - कहानी

रवि कुमार गोंड़
वर्षों पहले की बात है। फ़ैजाबाद जिले के अंतर्गत अयोध्या नाम का एक गाँव था। जहाँ पर राम जैसे महापुरुष का जन्म हुआ था। और कभी बाबर का भी वहाँ शासन रहा था। उसी गाँव में हिन्दू और मुसलमान बड़े ही भाई-चारगी के साथ रहते थे। राम और रहीम तो मानो जैसे दो जिस्म एक जान थे। उनकी दोस्ती अटूट थी, उनके अन्दर इर्ष्या, द्वेष की बुराई जरा भी नहीं थी। दोनों के परिवार आपस में इतने घुले-मिले थे कि लगता ही नहीं था कि दोनों परिवार अलग धर्म को मानने वाले थे। वह जात-पात की भेदभावना से मुक्त थे। उनके अंदर कडुवाहट का नामोनिशान नहीं था। राम और रहीम जब हिन्दू और मुसलमान को धर्म के नाम पर लड़ते-झगड़ते हुये देखते थे तो उनका मन दुखित हो जाता था।

राम ने रहीम से कहा – रहीम भाई। क्या भगवान सच में है।
रहीम – हाँ बिलकुल है।
राम – वह दिखता कैसा है।
रहीम – भाई यह तो मुझे पता नहीं है। लेकिन इतना जरूर पता है कि कम से कम इन हिन्दू और मुसलमान की तरह से तो नहीं ही दिखता होगा।
राम – तो क्या वह सभी के अंदर है।
रहीम – हाँ, उसने ही सबको बनाया है। उसको लोग अलग-अलग नाम से पुकारते हैं।
राम – तो लोग भेदभाव क्यों करते हैं।
रहीम – यहाँ भेदभाव की बात नहीं है भाई। बल्कि मेरे हिसाब से तो यह धर्मों के बीच वर्चस्व की लड़ाई है।
राम – सही कहते हो भाई।

शाम हो जाने के कारण दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ते हुये अपने घर की तरफ चल पड़ते हैं। एक बार दीपावली और ईद का त्यौहार एक दिन आगे और पीछे पड़ता है। राम और रहीम के ख़ुशी का ठिकाना न रहा। दीपावली का दिन पहले था इसलिए राम कामों में बहुत व्यस्त हो गया था। उसके काम में हाथ बटाने के लिए रहीम भी लगा हुआ था। दोगुने जोश के साथ रहीम राम के कामकाज में साथ दे रहा था और दीपवाली उत्सव का आनंद उठा रहा था। राम ने रहीम के पूरे परिवार वालों को रात्रिभोज पर बुलाया था। रहीम के घर वाले बहुत खुश थे। दूसरे दिन ईद का त्यौहार था राम ने भी रहीम के कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। रहीम ने राम के सभी परिवार वालों को भोजन का निमंत्रण भेजा। रहीम जानता था कि राम के परिवार वाले सात्विक हैं इसलिए उनके अनुरूप उनको भोजन कराया। राम और रहीम का इस तरह से व्यवहार देखकर गाँव के हिन्दू और मुसलमान लोग उनके परिवार वालों से नफ़रत करने लगे थे। दिनोंदिन अब दोनों परिवार के आगे सामाजिक चुनौतियाँ बढ़ने लगी थीं।

अचानक एक दिन बाहर से कुछ उपद्रवी ताकतों ने आकर विवादित स्थान पर बने बाबरी मस्जिद को विध्वंस कर दिया। फिर क्या था धर्म के ठेकेदारों में तनाव बढ़ गया। अब हिन्दू और मुसलमान के बीच कत्लेआम मचने लगा। दोनों वर्गों के धार्मिक ठेकेदारों ने वर्चस्व के लिए हिन्दू और मुसलमान को उकसा रहे थे। जिसके चलते न जाने कितने लोग धर्म के नाम पर बलि का बकरा बना दिये गये। अब जगह-जगह दंगे-फसाद शुरू हो गये थे। सारे भारत में हिंसा की आग भड़क चुकी थी। मुसलमानों को जबरन पकिस्तान भेजा जाने लगा। रहीम का घर भी हिंसा की चपेट में आ गया। रहीम के घर वाले राम को बिना बताये पाकिस्तान चले गये। राम को जब रहीम के जाने की खबर मिलती है तो वह फूट-फूट कर रोने लगता है। वह एकदम से टूट सा जाता है। वह लोगों को हिंसा करने से मना करता है। परन्तु धर्मांध हो चुके लोग एक दूसरे के खून के प्यासे बन गए थे। चारो चरफ अफरा तफरी मची हुई थी। सभी जगहों पर कर्फ्यू लगा दिया गया था।

कुछ दिनों बाद जाकर माहौल शांत हुआ। राम को रहीम की हरपल याद सताती रहती थी। उसे देखे हुये भी बहुत दिन हो चुके थे। रेडियो पर प्रधानमंत्री के मन की बात का प्रसारण आ रहा था। प्रधानमंत्री ने घोषणा किया कि जो भारतीय मुसलमान बाबरी हिंसा के दौरान पाकिस्तान चले गए हैं वह वापस भारत आ सकते हैं। उन्हें उनकी सारी जमीनें वापस दी जायेंगी। यह सुनकर राम का मन प्रफुल्लित हो उठा। अब उसकी आँखों के सामने रहीम का चेहरा आने लगा। रहीम के घर वालों को जब प्रधानमंत्री की बात का पता चला तो वो भारत वापस आने के लिए सामान पैककर वहाँ से निकल पड़े। वह अपने गाँव अयोध्या फिर से वापस आ गए थे। उनको यह विश्वास ही नहीं हो रहा था। वह सबसे पहले राम के घर गए और दरवाजा खटखटाने लगे। राम ने दरवाजा खोला। और देखकर चौक पड़ा। उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। वह दौड़कर रहीम के गले लग गया और फूट-फूटकर रोने लगा। राम और रहीम के परिवार वाले एक दूसरे के गले मिले और साथ में मिलकर खाना भी खाया। अब दोनों के बीच खुशियों की लहर दौड़ पड़ी। सबने मिलकर यह प्रण किया कि अब किसी भी कीमत पर हम अलग नहीं होंगे।

राम और रहीम के परिवार वालों ने गाँव वालों तथा अन्य लोगों के साथ मिलकर एक अभियान चलाया और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सुप्रीमकोर्ट को एक अर्जी लिखी। उनकी माँग थी कि राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का हल जल्दी निकाला जाए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि हमें नफ़रत के जहर में डूबकर नहीं मरना है। हम सब एक हैं। हम अपने भाइयों का खून होते हुये नहीं देख सकते हैं। हमें न तो मंदिर चाहिए और न ही मस्जिद। बल्कि हमें शांति चाहिए और देश का विकास। नफरतों की आग में इंसानियत झुलसती जा रही है। हमें आने वाली भावी पीढ़ी को इस आग में झुलसने से बचाना होगा। इसलिए हम सभी हिन्दू और मुसलमान भाइयों-बहनों ने मिलकर यह फैसला किया है कि विवादित स्थान पर वसुधैव कुटुम्बकम नाम से एक विश्वविद्यालय का निर्माण किया जाये। जिसमें सभी धर्मों के लोग शिक्षा-दीक्षा ले सकें। जिसकी नींव भाई-चारगी पर रखी जाए।

भारत के राष्ट्रपति ने सभी वर्गों के चिंतकों और राजनेताओं को इकट्ठा किया। इस विषय पर सबकी राय माँगी। सभी लोगों की बातों को सुनने के पश्चात् यह निर्णय लिया गया कि अब विवादित ढाँचे के स्थान पर वसुधैव कुटुम्बकम नाम से एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना किया जायेगा। जिसमें सभी धर्मों के लोगों को शिक्षा प्रदान की जायेगी। इस निर्णय से भारत में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी। अब कभी भी हिन्दू और मुसलमान अपनों से अलग नहीं होंगे। और न ही कभी इंसानियत का गला घोंटा जायेगा। अब कोई भी ताकत राम और रहीम को अलग नहीं कर सकती। राम और रहीम एक दूसरे के गले मिलते हुये प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! सब खुश रहें, कोई किसी का शत्रु न हो बल्कि लोग मित्रता की मिसाल बनें।