मैत्रेयी पुष्पा

हिन्दी अकादमी, दिल्ली की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा से हिंदी पाठक भली-भांति परिचित हैं। वे वर्तमान हिंदी के शिरोमणि साहित्यकारों में से एक हैं। दिल्ली निवासी मैत्रेयी जी के लेखन में पाठक ब्रज और बुंदेली संस्कृतियों से परिचित हो सका है। दस उपन्यास, आठ कथा संग्रह सहित दो दर्जन से अधिक पुस्तकों की लेखिका मैत्रेयी जी ने अपनी लेखनी में ग्रामीण भारत को साकार किया है, उन्होंने भारतीय नारी के उस पक्ष को प्रस्तुत किया है जिसका चित्रण हिंदी साहित्य में सामान्य नहीं था। उनका कथन '1947 में भारत स्वतंत्र हुआ परंतु भारतीय नारी अभी भी स्वतंत्रता की प्रतीक्षा में है' उनके साहित्य के एक मुखर पक्ष की झलक दिखाता है। लेखक अपनी बात कहता है, परंतु पाठक अपनी ही बात समझते हैं। अच्छे लेखक अपनी अभिव्यक्ति को पाठक तक यथावत पहुँचाने में माहिर होते हैं।  यथार्थ का बेबाकी से चित्रण करने वाली मैत्रेयी जी के लेखन की परिपक्वता उनके गहन अनुभव और गम्भीर अवलोकन का परिणाम है। उनके बारे में अधिक कहने की मेरी सामर्थ्य नहीं है, लेकिन यह सत्य है कि उनकी रचनाएँ एसी कक्ष में रची गई कल्पनाएँ न होकर यथार्थ के धरातल से निकली हुई कोंपलें हैं।    

अलीगढ के सिकुर्रा ग्राम और बुंदेलखंड के खिल्ली ग्राम के सुविधाहीन क्षेत्रों में रहकर भी वे आज भारत की अग्रणी साहित्यकार बनी हैं। उनका जीवन हमें संघर्ष करने और विजयी होने की प्रेरणा देता है। ग्रामीण परिवेश से आने वाले उनके पात्र भी साहसी और अविजित योद्धा हैं। उनके पात्र वास्तविक हैं, और भाषा जीवंत। और वे स्वयं, एक सरल, विनम्र, स्पष्टवक्ता हैं।

सार्क लिटरेरी अवार्ड, महात्मा गांधी सम्मान, इसी उत्तर प्रदेश साहित्य संस्थान का प्रेमचंद सम्मान, हिंदी अकादमी के साहित्य कृति तथा साहित्यकार सम्मान, मंगला प्रसाद पारितोषिक आदि सम्मानों से नवाज़ी गई मैत्रेयी जी द्वारा सेतु सम्मान के लिये स्वीकृति देना ही हमारे लिये गर्व का विषय है। हमारा अनुरोध मानकर उन्होंने हमें ही सम्मान का पात्र बनाया है, उनका क़द तो पहले से ही विशाल है।