साक्षात्कार: डाॅ. अशोक भाटिया से राधेश्याम भारतीय की वार्ता

बड़ा बनने के लिए उद्देश्य बड़ा एवं सामाजिक रखिएः डॉ. अशोक भाटिया
अशोक भाटिया
लघुकथा विधा को पल्लवित-पुष्पित करने में जिन लघुकथाकारों का विशेष योगदान रहा है,उनमें डॉ. अशोक भाटिया का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जा सकता है। अब तक इनकी 12 मौलिक और 15 सम्पादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके दोनों लघुकथा संग्रह ‘जंगल में आदमी’ और ‘अंधेरे में आंख’ का तमिल व मराठी में अनुवाद हो चुका है। इसके साथ लघुकथा विधा की रचना प्रक्रिया पर भी इनकी आलोचनात्मक पुस्तक ‘समकालीन हिंदी लघुकथा’ प्रकाशित हो चुकी है। वह पुस्तक खूब चर्चा में रही। अब तो डॉ. भाटिया लघुकथा के पर्याय से बन गए हैं।

पिछले दिनों मन-मस्तिष्क में उठ रहे प्रश्नों को लेकर मैं डॉ. भाटिया से मिला। डॉ. भाटिया के द्वारा दिये उन प्रश्नों के उत्तर सुविज्ञ पाठकों के लिए निम्न प्रकार से प्रस्तुत किये जा रहे हैंः

राधेश्याम भारतीयः निःसन्देह आप बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न रचनाकार हैं। लघुकथा के अतिरिक्त आपने कविता, कहानी, तथा बालसाहित्य की रचना सुरूचिपूर्ण शैली में की है। परन्तु पिछले बारह-तेरह वर्षाें में आपने जिस तरह लघुकथा को पोषित किया है, इस तथ्य को जानकर मेरे मन में भी एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि लघुकथा में ऐसी कौनसी चमत्कारिक शक्ति है जिसने आपको मोहित किया?

डॉ. अशोक भाटियाः वास्तव में हर रचनाकार अपने तरीके से सोचता है। कवि जब सोचेगा, कविता में ज्यादा सोचेगा। और लघुकथा लेखक जब सोचेगा तो इस तरह से सोचेगा, उसकी कलम लघुकथा की ओर बढ़े। दरअसल हुआ यह है कि 1975 में आपातकाल के दौरान ‘धर्मयुग’ पत्रिका में लक्ष्मीकांत वैष्णव की लघुकथा ‘लोग’ आपातकाल के खिलाफ प्रकाशित हुई थी। वह मैंने अम्बाला छावनी में इंग्लिश बुक डिपो से लेकर वहीं खड़े-खड़े पढ़ी थी। उस लघुकथा का उद्देश्य और स्वरूप मेरे मन में बस गया। उस समय ‘हिंदुस्तान’, कादम्बिनी’ जैसी पत्रिकाओं से लघुकथाएं पढ़-पढ़कर मेरे जेहन में भी लघुकथाओं का तानाबना बनने लगा। इस तरह से पढ़ते-पढ़ते मेरे मन में जो सोच पैदा हुई उससे लघुकथा बनने लगी।

राधेश्याम भारतीय: जब कभी भी लघुकथा की विकास यात्रा का साहित्यिक इतिहास लिखा जायेगा, उसमें आपका नाम बड़े सम्मान से लिखा जायेगा। वह कौनसी सौभाग्यशाली लघुकथा है जिसे आपकी लघुकथा की विकास यात्रा में पहली सोपान बनने का गौरव प्राप्त हुआ? वह लघुकथा कब, किस पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुई? कृपया बताइए।

डॉ. अशोक भाटिया: मुझे याद आता है, मेरी पहली लघुकथा ‘अपराधी’ जनवरी 1977 में कालका में लिखी गई थी। तब मैं वहां राजकीय महाविद्यालय में पढ़ाता था। सड़क के ऊपर ही एक छोटा-सा बस-अड्डा था। वहां से रेलवे स्टेशन को जा रहा था। एक ढाबे के आगे से गुजरते हुए सूनी सड़क और ढाबे पर किसी को न पाकर सोचा-‘अगर कोई उसके बर्तनों को उठा ले जाए तो!’ सहसा ढाबे वाला भीतर से नमूदार हुआ। बस, अपने कमरे तक पहुँचते-पहुँचते लघुकथा ‘अपराधी’ तैयार हो गई। यह लघुकथा 1978 में ‘समग्र’ के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित हुई।

राधेश्याम भारतीय
राधेश्याम भारतीय मैं जानना चाहूंगा कि आपको साहित्य विरासत में मिला या साहित्यिक साधना करते हुए यहां तक पहुँचे?

डॉ. अशोक भाटिया: डॉ. भारतीय, शायद आप नहीं जानते कि मैं एक मजदूर का बेटा हूं। मुझे साहित्य विरासत में तो नहीं मिला लेकिन ईमानदारी और मेहनत के संस्कार जरूर मिले। मेरे मामा ओमप्रकाश भाटिया ‘अराज’ उन दिनों कविता लिखा करते थे। मुझे उनकी कविता की भाषा ने प्रभावित किया। वहीं से मैंने कविता का शिल्प सीखा। शुरूआती दौर में मेरी लघुकथाएं अलग-अलग पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। 1977 में ही ‘मृतक’ लघुकथा लिखी, जो चन्द्र त्रिखा की पत्रिका ‘युगमार्ग’ में प्रकाशित हुई। 1981 में ‘कथाबिम्ब’ के विशेषांक में मेरी लघुकथा ‘पीढ़ी दर पीढ़ी’ प्रकाशित हुई। उसके बाद मुझे प्रतियोगिता में भाग लेने का खुमार चढ़ा। मेरी लघुकथा ‘चैथा चित्र’, ‘पीढ़ी दर पीढ़ी’, ‘भूख’, ‘टूटते हुए तिनके’आदि पुरस्कृत हुई। बस उम्र की उमंग ऐसी थी कि मैं लघुकथा में आकंठ डूब गया। बिहारी की उक्ति है-‘अनबूडे़ बूड़े, तरे जे बूड़े सब अंग।’ मैं तो लघुकथा में सब अंगों सहित डूब चुका हूं। अब पार पा ऊंगा या नहीं कुछ नहीं कहा जा सकता।

राधेश्याम भारतीयः अपनी रचना प्रक्रिया के बारे मे बताने का कष्ट करें।

डॉ. अशोक भाटियाः हर लेखक की लिखने की अपनी प्रक्रिया होती है। वह कहां से शुरू होती है, कुछ कहा नहीं जा सकता । यदि वह विचारशील अधिक होगा तो रचना किसी विचार से जन्म लेगी। किसी स्थिति, प्रसंग ,पात्र से भी ली जा सकती है।

एक उदाहरण देता हूं -लघुकथा ‘तीसरा चित्र’ जिसमें एक बूढ़ा बाप अपने बेटे को तीन चित्र बनाकर लाने को कहते हैं। बेटा पहले दो चित्रों को रंगों से संजाता है और तीसरे चित्र को काली पैंसिल से। तो पिता पूछता कि इसे काली पैंसिल से क्यूं। तो बेटा कहता है कि पिता जी इस चित्र तक आते आते सब रंग खत्म हो गए थे। इस लघुकथा ने कैसे जन्म लिया- एक दिन मेरी बेटी घर के बाहर मिट्टी से खेल रही थी। उसके उलझे बाल, मिट्टी से सने हाथ और जेब में पत्थर भरे थे। वहीं से वर्ग चेतना उभरी। वर्ग चेतना का जानना जरूरी है। बाकी सब कल्पना है। तो रचनात्मक कल्पना ने जन्म लिया। सब अलग-अलग तरीके हैं और फिर अलग अलग तरीकों से लिखना होता है।

राधेश्याम भारतीय: डॉ. साहब आप इस विधा के विकास हेतु निरन्तर प्रयासरत हैं, इसके लिए आपको घर से बाहर भी रहना पड़ता है ऐसे में अपने परिवार के सहयोग को किस रूप में देखते हैं?

डॉ. अशोक भाटिया: रचनाकार को सक्रिय सामाजिक सम्पर्क के लिए बाहर निकलना ही पड़ता है। वैसे भी घर के सहयोग बिना यह सब संभव नहीं। मेरी पत्नी साहित्य की बहुत बड़ी पाठक है जिसने मेरे घर में कहानी की ऐसी कोई किताब नहीं जो उसने नहीं पढ़ी। मेरी दो बेटियां हैं लेकिन उन्होंने कभी मेरे लेखन में व्यवधान नहीं डाला। बस थोड़ी नींद कम करनी पड़ती है। आदमी में कुछ करने की उमंग हो तो कहीं भी पहुँचा जा सकता है।

राधेश्याम भारतीयः सर, लघुकथा को एक साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करने वालों में हरियाणा राज्य का अपना एक विशेष स्थान है। बीसवीं शताब्दी के आठवें-नौवें दशक के मध्य लघुकथा लेखन को लेकर सिरसा और करनाल में एक आंदोलन की तरह कार्य किया गया था। करनाल में इस आंदोलन का नेतृत्व आप कर रहे थे और सिरसा में डॉ. रूपदेवगुण और राजकुमार निजात के हाथों में था। आप उनके इस कार्य को किस दृष्टि से देखते हैं?

डॉ. अशोक भाटिया: आपने ठीक कहा है हरियाणा में लघुकथा के दो केन्द्र थे। सिरसा और करनाल। सिरसा में डॉ. रूपदेवगुण और राजकुमार निजात का इस विधा के उत्थान में विशेष प्रकार का योगदान रहा है। उन्होंने निरन्तर साहित्यिक आयोजन करवाए। उन आयोजनों में लघुकथा का मंचन भी करवाया। उन दोनों के संम्पादन में ‘हरियाणा का लघुकथा संसार’ नाम से पुस्तक आई। यह पुस्तक बड़ी मेहनत से तैयार की गई थी। जो रचनाकारों के लिए विशेष महत्व रखती है। करनाल का प्रश्न है तो हमारे यहां रचनात्मक, लेखन और संपादन का कार्य अधिक हुआ।

राधेश्याम भारतीयः हरियाणा में समकालीन लघुकथा लेखन पर आप क्या टिप्पणी करना चाहेगे? और इस कार्य में किस-किस लघुकथाकार का योगदान सराहनीय मानते हैं?

डॉ. अशोक भाटिया: राष्ट्रीय स्तर पर हरियाणा से दो ही लघुकथाकारों के नाम मेरे जेहन में आ रहे हैं। एक पृृथ्वीराज अरोड़ा और दूसरा रामकुमार आत्रेय। इसके अतिरिक्त पूरण मुद्गल जोकि सिरसा से ही हैं। उनका 1982 में ‘निरन्तर इतिहास’ नाम से लघुकथा-संग्रह आया । मुद्गल जी प्रगतिशील चेतना के साहित्यकार हैं। उनकी बेटी शमीम शर्मा ने भी लघुकथा पर कार्य किया है। 1982 में ही शमीम के संपादन में ‘हस्ताक्षर’ नाम से लघुकथा संकलन आया, जिसमें तीन सौ के आसपास लघुकथाकार शामिल थे। उनकी एक-एक रचना उसमें शामिल की गई थी। सिरसा से शील कौशिक, अम्बाला से विकेश निझावन, सुरेन्द्र गुप्त, हिसार से रामनिवास मानव एवं कमलेश भारतीय और मधुकांत रोहतक में तथा अरूण कुमार कुरूक्षेत्र में बैठकर लघुकथा लेखन में योगदान दे रहे हैं। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जो पहले दिल्ली में थे, अब हरियाणा में रहकर स्वयं तो लघुकथा लिख रहे हैं साथ में ‘लघुकथा डॉ.ट काॅम’ (इंटरनेट पत्रिका) के माध्यम से लघुकथा के विकास हेतु प्रयासरत हैं।

 राधेश्याम भारतीयः लघुकथा को एक साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करने का महान कार्य संपादन करने वालों शीर्षस्थ नामों में आपका नाम भी शामिल है। मैं यह जानना चाहता हूं कि हरियाणा के ऐसे अन्य कौनसे लघुकथा लेखक हैं जो आज राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं। और इसके पीछे क्या कारण हैं।

डॉ. अशोक भाटियाः हरियाणा से कई बड़े नाम ऐसे हें जो बाद में दिल्ली में स्थापित हो गए। विष्णु प्रभाकर कुछ समय हरियाणा में रहे। वे तो विख्यात नाम है। रमेश बतरा चंडीगढ़ में नौकरी करते थे। इसलिए हरियाणा से माने जाते हैं। उन्होंने साहित्य निर्झर, ‘सारिका’ और ‘संडेमेल’ जैसी पत्रिकाओं में बैठकर लघुकथा को संवारा। न केवल अपनी रचनाओं से बल्कि नए लेखको को लिखना सिखने का भी उन्होंने बखूबी काम किया।

उसके बाद दो नाम लेना चाहता हूं। एक पृथ्वीराज अरोड़ा ,दूसरे रामकुमार आत्रेय। पृथ्वीराज अरोड़ा जो कुरूक्षेत्र से थे जिन्होंने आठवे दशक की शुरूआत में सारिका के माध्यम से लघुकथा को नये आयाम देने का काम किया। उनकी ‘दया‘, ‘दुख‘ ‘कथा नहीं’, ‘विकार’ आदि कई श्रेष्ठ रचनाएं हैं। दूसरा नाम रामकुमार आत्रेय का है जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुडे साहित्यकार हैं। मूलतः कहानीकार होने के कारण उनकी रचनाओं में सहजता और सजगता का बड़ा सुन्दर मिश्रण मिलता है। पाठक की दृष्टि से आत्रेय की लघुकथाएं सफल मानी जाती हैं। इनकी कई लघुकथाएं मुझें विशेष रूप से प्रभावित करती हैं, जिनमें ‘बिन शीशों का चश्मा’, ‘दूसरा जल्लाद’, ‘दो कोण वाली त्रिभुज’ आदि हैं। हरियाणा की मिट्टी की गंध इनकी लघुकथाओं में व्याप्त है। ये अभी भी निरन्तर लिख रहे हैं। ये दो नाम हमारी हिंदी लघुकथा में बड़े गर्व से लिए जाते हैं।

राधेश्याम भारतीयः आप हरियाणा की महिला लघुकथाकारों के लेखन बारे क्या कहना चाहेंगे?

डॉ. अशोक भाटियाः इस पुरूष प्रधान समाज में जब महिलाएं कलम उठाती हैं तो उनकी रचनाएं दो अर्थों में पुरूषों से अधिक महत्वपूर्ण होती है। एक तो वे घर से समय बचाकर कलम उठाती हेैं। दूसरे, उनकी रचनाओं में संवेदना का घनत्व पुरूषों की तुलना में कहीं अधिक होता है। हरियाणा में आम तौर पर कहानी लेखिकाओं ने ही लघुकथा में कलम चलाई है। इनमें उर्मि कृष्ण, कमल कपूर,अंजु दुआ जैमिनी और कमला चमेाला तो कहानी के जाने माने नाम हैं। इनकी लघुकथाओं में शोषण का विरोध और मुक्ति की छटपटाहट मुख्य रूप से महसूस की जा सकती है, साथ ही इनकी लघुकथाओं में कथा की जो रवानगी है, उसमें कहानी का-सा आकर्षण छिपा होता है। यही बात शील कौशिक, डॉ. मुक्ता, इन्दिरा खुराना, उषा लाल, मीनाक्षी जिजीविषा, कमलेश चैधरी, इन्दु गुप्ता आदि की लघुकथाओं के बारे भी कही जा सकती है।

 राधेश्याम भारतीयः क्या लघुकथा के लिए अपनाई जाने वाली वाली रचना प्रक्रिया तयशुदा होती है अथवा प्रत्येक लेखक की अपनी-अपनी?

डॉ. अशोक भाटियाः एक कवि नाटककार है राजेश जोशी। उनकी एक पुस्तक ‘एक कवि के नोट्स’ उसमें लिखते हैं -‘‘ रचना प्रक्रिया को जाना नहीं जा सकता। मेरी क्या, किसी की भी नहीं। इससे तो रचने का रहस्य ही समाप्त हो जायेगा।’’ वैसे भी एक लेखक को कोई प्रसंग, घटना, स्थिति या पात्र प्रभावित कर सकते हैं दूसरे को नहीं। ऐसे ही एक व्यक्ति के विचार दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करें जरूरी नहीं। कोई लेखक कल्पना से ही किसी कथ्य या प्रसंग को लेकर अपनी कल्पना शक्ति से साहित्य रच डालता है। मैं समझता हूं रचना प्रक्रिया तयशुदा होनी भी नहीं चाहिए क्योंकि इससे तो रचना का विकास ही रूक जायेगा।

राधेश्याम भारतीयः किसी भी लघुकथाकार को अपनी खुद की रचना को उत्कृष्ट बनाने के लिए क्या करना चाहिए? क्या आप इस विषय में सुझाव देना चाहेंगे?

डॉ. अशोक भाटियाः आज जो नए लघुकथाकार लिख रहे हैं उनमें आमतौर से जल्दी स्थापित होने की हड़बड़ी है। उनकी रचना पाठक ,या समाज पर क्या प्रभाव छोड़ रही है, इसकी चिंता उन्हें नहीं है। एक दो सुझाव दिए जाने जरूरी हैं। पहली बात, उन्हें रचनात्मक विकास के लिए हिंदी का ही नहीं, विश्व का सर्वश्रेष्ठ साहित्य पढ़ना चाहिए, वह हिंदी और अन्य भाषाओं का हो। लघुकथा ही क्यूं कहानी पढ़ें... नाटक पढें, उनके पढ़ने से उन्हें पता चलेगा कि रचनाधर्मिता क्या होती है। यथार्थ के कितने आयाम होते हैं। उसकी सूक्ष्मता क्या होती है। हम अपने सामाजिक सम्पर्कों को सक्रिय रखे।

दूसरा, समाज में जो बदलाव आ रहे हैं या समाज में निरन्तर हो रहे परिवर्तनों का ज्ञान हमें होना चाहिए। दोनों चीजें हमारी रचनाधर्मिता को प्रभावित करती है।

 तीसरा, लघुकथा किसी एक प्रसंग का वर्णनभर नहीं है। आज कल ‘फेसबुक’, ‘व्हाटएप’ पर प्रायः ऐसी ही सामग्री आ रही है। ऐसी सामग्री से केई लेखक बड़ा नहीं बन सकता। बड़ा बनने के लिए उद्देश्य बड़ा रखिए, सामाजिक उद्देश्य रखिए। पाठक को ध्यान में रखकर लिखिए। लिखिए क्या! जब हम एक रचनाकार को सृजनकर्ता मानते हैं तो किसी स्थिति, किसी प्रसंग को पुनर्सृजन कीजिए। उसको एक तरफ रखिए और फिर अपनी कल्पना एवं रचनात्मक भाषा के साथ नए सिरे से लिखिए। एक बात को सड़क पर खड़ा आदमी कह रहा है। वही बात आप कहिए। अर्थ भी वही निकलेगा। आपकी भाषा संरचनात्मक होनी चाहिए। उसमें सौन्दर्य आना चाहिए। कहा भी गया है सत्यम, शिवम, सुन्दरम। सत्य और शिव के बाद सुन्दर ही आतां है। यदि रचना सुन्दर नहीं बनेगी तो उसमें आकर्षण नहीं आयेगा और पाठकों को भी प्रिय नहीं होगी। फिर रचना इस तरह छुटती है जैसे गाड़ी सब कुछ पीछे छोड़ती चली जाती है।

राधेश्याम भारतीयः क्या लघुकथाकार समाज की नब्ज टटोलने में पूरी तरह कामयाब हो रहे हैं। मेरा मतलब गंभीर विषयों पर लेखनी चला रहे हैं या उन्हें अनदेखा कर रहे हैं।

डॉ. अशोक भाटियाः बड़ा गहरा सवाल किया है। दरअसल कुछ लेखक तो विषय की तलाश इस तरह करते है जैसे प्लाॅट की तलाश करते हैं। रचनाकार कभी ऐसा किया नही करता। एक विषय है प्रेम। एक गजलकार इस विषय पर अनेक रचनाएं लिख सकता है तो एक लघुकथाकार एक ही विषय पर दस-बीस लघुकथाएंँ क्यों नहीं। जैसे हमारे समाज में साम्प्रदायिकता की समस्या है, जातिवाद, संकीर्णता है क्या एक लघुकथा लिखकर उसका कर्तव्य पूरा हो जायेगा। भीष्म साहनी ने सांप्रदायिकता पर एक पूरा उपन्यास ‘तमस’ लिख डाला। उस उपन्यास के बाद भी उन्हें संतुष्टि नहीं हुई। उसके बाद ‘पाली’, ‘झुटपुटा’, ‘अमृतसर आ गया है’जैसी कई कहानियाँ इसी विषय पर लिखीं। उन्हें लगा कि यथार्थ के और अनेक आयाम हैं जो उपन्यास में पूरे नही आ सकते हैं। जब एक उपन्यासकार विषय के यथार्थ को एक उपन्यास में नहीं उकेरा सकता तो लघुकथाकार ऐसा कैसे कर सकता है। लघुकथाकार को भी ऐसे ही अनेक रचनाएं लिखने की जरूरत है। पर वह बनी बनाई रचनाएं अधिक दे रहा है। पिष्टपेषण अधिक हो रहा है। उन्हें स्थापित होने की हड़बड़ी है। दिक्कतें आती हैं। हमारे समाज में कितने सामाजिक परिवर्तन हुए अब वैश्वीकरण सिर चढ़कर बोल रहा । काॅपोरेट जगत के लोग पूरी दुनिया को एक ही रंग में रंग देने को आतुर हैं। यह चुनौती रचनाकार के सामने है कि वह कैसे अपनी विविधता, अपनी संस्कृति, अपने रीतिरिवाज, और कैसे अपनी परम्पराओं को बचाकर रख सकता है। उसके लिए यथार्थ के नए-नए रूपों को तलाशना होगा। इसे लघुकथाकर अभी पूरी तरह से ला नहीं पा रहे हैं। हां, कोशिश की जा रही है पर अभी पूरी तरह कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। आज केवल पारिवारिक संबंधों की टूटन, वृद्धों के प्रति व्यवहार लिखने मात्र से काम नहीं चलेगा। आज जो राजनीतिक अधःपतन हो रहा है; किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं; मजदूर दो जून की रोटी के लिए मारा-मारा फिर रहा है; धार्मिक उन्माद सिर पर चढ़कर बोल रहा है। उनपर लिखने की जरूरत है।

राधेश्याम भारतीयः आज के समय में लेखकों के सामने कौनसी चुनौतियां हैं और उनका सामना किस प्रकार किया जा सकता है?

डॉ. अशोक भाटियाः लघुकथाकारों के सामने सबसे पहली चुनौती यह है कि आज समाज में जो संवेदनहीनता बढ़ रही है उसमें अपनी संवेदना को बचाकर रखने की जरूरत है। दूसरा, जो उनकी लघुकथा हैं वो सही रचनात्मक उभार लेकर हमारे सामने आए। तीसरी बड़ी चुनौती है कि रचनाकार लघुकथा को एक ऐसे शिल्प, शैली, और भाषा में प्रस्तुत करें ताकि वह पाठक को सही दिशा में प्रभावित करे। ये तीनों बड़ी चुनौतियाँ हैं। मैं तो यहाँ तक कहना चाहूँगा कि कई बार लघुकथा को लघु यथार्थ बोध की रचना मानकर एवं सरल मानकर छोटे रास्ते से निकलकर किताबें छापी जा रही हैं।

लघुकथा लिखना कठिन है।यह कहीं से भी सरल नहीं है। इसमें भी चिंतन उतना ही है जितना कहानी, कविता, नाटक, या साहित्य की किसी अन्य विधा में।

राधेश्याम भारतीयः किसी भी विधा की उपलब्धि के लिए उसकी समीक्षा का विशेष महत्व होता है। मैं समझता हूं कि अभी तक लघुकथा के समीक्षकों की कमी रही है। यह कमी कैसे पूरी की जा सकती है?

डॉ. अशोक भाटिया: डॉ. भारतीय, आपने भी पढ़ा होगा कि जब भी कोई नई विधा या नई शैली साहित्य में आती है तो उसकी समीक्षा का कार्य भी उसके लेखकों को ही करना पड़ता है। छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद, निराला यदि छायावादी कविताओं की समीक्षा न करते तो शायद छायावाद इस रूप में स्थापित न हेाता। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के प्रथम संस्करण में छायावाद आन्दोलन की उपेक्षा कीं। जयशंकर प्रसाद और निराला ने अपने समीक्षाकर्म से इसे उभारने का प्रयास किया और फिर इसी से प्रभावित होकर शुक्ल ने दूसरे संस्करण में छायावाद की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

जहाँ तक लघुकथा की बात है, इसमें भी लेखक समीक्षाकर्म निभा रहे रहे है। भगीरथ और बलराम अग्रवाल इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। इनके साथ-साथ कई लेखक ऐसे भी है जो समीक्षा कर्म ही कर रहे हैं जिनमें डॉ. बी.एल आच्छा , डॉ. जितेन्द्र जीतू और उमेश महादोषी हैं। समीक्षा कर्म हो रहा है। पर समीक्षाकर्म की इतनी चिंता नहीं है, जितनी बेहतर लघुकथाओं की है। यदि रचना बेहतर होगी तो कहानी के आलोचक या दूसरी विधाओं के आलोचकों का ध्यान स्वतः ही इधर आ जायेगा।

राधेश्याम भारतीयः लघुकथा लेखन में बिम्ब, प्रतीक, फैंटेंसी की कितनी गुंजाइश रहती है।

डॉ. अशोक भाटियाः लघुकथा में बिम्ब... बिम्ब मनुष्य की कमजोरी है। आपको वे कहानियाँ याद रहेंगी जिसका कोई चित्र आपके सामने आता है, वह भूलते नहीं। चाहे ‘कफन’ कहानी में प्रसव पीड़ा से छटपटाती बुधिया हो या शराब पीकर लड़खड़ाते घीसू ,माधव हों। बिम्ब मनुष्य की कमजोरी भी है और उसकी शक्ति भी। लघुकथा में बिम्ब यानि चित्रात्मकता होगी तो उसकी प्राणवत्ता को बढ़ायेगी।

आपने प्रतीक और फैंटेसी का बड़ा अच्छा जिक्र किया है। प्रतीक लघुकथा में इसलिए जरूरी है क्योंकि आज अधिकतर लघुकथाएं सपाट रूप में लिखी जा रही हैं। कुछ इसके समर्थक भी हैं। सपाट रचना के बहुत अधिक समय तक टिकने के कम ही आसार होते हैं। या उसके प्रतीक या फैंटेंसी (फैंटेंसी दरअसल कलात्मक कल्पना का ही रूप है) उस कल्पना का प्रयोग करके वह फैंटेंसी शैली में रचना लिख रहे हैं। उसमें एक नया रूप आयेगा। पाठक आकर्षित होंगे। इसलिए प्रतीक एवं फैंटेंसी का अपना महत्व है। प्रतीक के द्वारा लघुकथा का छोटा आकार भी बड़े रूप में हमारे सामने खुलता है । इस प्रकार लघुकथाकार लघुकथा का अतिक्रमण भी कर लेता है, जो वह बिना प्रतीक के नहीं कर सकता।

राधेश्याम भारतीयः लघुकथा लेखन में प्रायः शिल्प को लेकर चर्चा की जाती है कृपया बताइए कि लघुकथा लिखते समय कैसे और किस प्रकार शिल्प का ध्यान रखा जाए।

डॉ. अशोक भाटियाः मैं शिल्प से पहले वस्तु पर आता हूं। वस्तु है तो शिल्प है। शिल्प किसका? वस्तु का। हमने वस्त्र औढे़ हैं यह हमारा शिल्प है ,हमारी शैली, स्टाइल है। लेकिन मनुष्य है तभी तो वस्त्र है। इसलिए वस्तु का महत्व पहले है और शैली का बाद में। इसमें दो तीन बातें हैं। यदि लघुकथाकार लघुकथा रचते समय तयशुदा पैमाने अपनायेगा तो लघुकथा कृत्रिम बनेगी। संभव है आप खुले रूप में लिखे जा रहे हैं और लिखते-लिखते कहीं निकल जाए, तो निकल जाने दीजिए... हो सकता है कि वह कहानी का रूप धारण कर ले। यदि जबरदस्ती लिखोगे ना ये लिखना... दूसरी बात, लिखने से पहले तैयारी करें... आप लिखे तो भाषा पर विशेष ध्यान दें। और लिखते समय यह देखें कि संवाद, वर्णन, परिवेश की कितनी गुंजाइश है। यदि पहले की तैयारी होगी तो शिल्प आपके हाथ में होगा। मैंने देखा कि ज्यादातर लेखक संवादों में खुद घुसे रहते हैं। पात्र नहीं बोल रहा, लेखक की अपनी भाषा बोल रही है। अंग्रेजी विद्वान थैकरे कहते हैं, ‘‘आई डोंट कंट्रोल माई करैक्टर्स। आई एम इन देयर हेंड्स’’ यानि, ‘‘मैं अपने पात्रों के हाथों में खेलता हूं। मतलब पात्र मुझे संचालित करते हैं।’’ जब ऐसा हो जाए कि रचनाकार के भीतर बैठकर एक पात्र संचालित करे तो रचना ने जहां पहुँचना है स्वयं ही पहुँच जायेगी।

राधेश्याम भारतीयः लघुकथा में प्रयोगों की कितनी गुंजाइश समझते हैं।

डॉ. अशोक भाटियाः देखिए, समय परिवर्तनशील है और नए समय के यथार्थ को व्यक्त करने के लिए अपनी शैली, और शिल्प में भी बदलाव की जरूरत होती है। यदि वर्णनात्मक पद्धति में ही सब कुछ कहा जाता तो फिर लघुकथा में किसी भी प्रयोग की कोई गुंजाइश नही थी। मैंने आपातकाल का जिक्र किया। उसमें लक्ष्मीकांत वैष्णव की ‘लोग’ लघुकथा और किसी रूप में नहीं आ सकती थी। उसमें एक व्यक्ति घर के बाहर बैठा अपना काम कर रहा है।कुछ लोग आते हैं और कहते हैं कि देखो वह बैठा काम कर रहा है। वह खड़ा हो गया... कहते हैं देखो वो खड़ा हो गया। वह हंसता है तो कहते हैं देखो वो हंस रहा है। वह घर में घुस जाता है तो कहते हैं कि घर में घुस गया... उसके घर का दरवाजा खटखटाया जाता है। दरवाजा नहीं खुला। जब दरवाजा नहीं खुलता तो उसका दरवाजा तोड़ा गया। तो वह छत पर लटका मिला। वे बोले, ‘‘देखो, साला मर गया।’’ फिर वे किसी और के घर की ओर चल दिए। आपातकाल पर यह प्रतीकात्मक लघुकथा इसी शैली में कही जा सकती थी। तो लेखक यदि समय के मुताबिक यथार्थ का दबाव महसूस करेगा तो उसे व्यक्त करने के लिए नए प्रयोग करने होंगे। कोई बेचैनी रचना को अपना नया शिल्प उसमें खोजने की ओर ले जाती है। उसकी प्रतीक शैली, फैंटेसी, आत्मकथात्मक शैली, डायरी, आधे अधूरे वाक्य की शैली, पत्र शैली, एक-एक शब्द की, एक-एक वाक्य की हो सकती है। एक पूरा लम्बा एक वाक्य हो सकता है। मेरी लघुकथा ‘स्त्री कुछ नहीं करती!’ में कोई पूर्ण विराम नहीं। उसमें 27 क्रियाएं हैं। इससे पता चलता है कि स्त्री के जीवन में कहीं पूर्ण विराम नहीं है। इसे प्रयोग करके ही बताया जा सकता है। विष्णु नागर की ‘ईश्वर की कहानी’ तो सारी प्रयोगधर्मी लघुकथाओं की पुस्तक है। असगर वजाहत, भगीरथ, बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी ने प्रयोग किए। इनके प्रयोग देखे जाने की जरूरत है। और लघुकथा में इन प्रयोगों की बहुत गुंजाइश है। इससे रचनाकार अपने समय की चुनौतियो से बेहतर ढंग से जूझ सकेगा और रचना में व्यक्त कर सकेगा।

राधेश्याम भारतीयः लघुकथा लेखन को समृद्ध बनाने में हरियाणा ग्रंथ अकादमी की पत्रिका ‘कथासमय’ और हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘हरिगंधा’ के योगदान से आप कितने संतुष्ट हैं। और साथ में अकादमी को क्या सुझाव देना चाहेंगे जिससे इस विधा को और उचाइयांँ प्राप्त हो सके।

डॉ. अशोक भाटियाः बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। देखिए, हरियाणा साहित्य अकादमी से पहले मैं राष्ट्रीय स्तर के आयोजन की बात बताता हूं। राष्ट्रीय स्तर की साहित्य अकादमी ने पिछले वर्ष रवीन्द्र भवन, नई दिल्ली में पहली बार लघुकथा पाठ करवाया, जिसमें हरियाणा से मुझे शामिल किया। उसके बाद दिल्ली साहित्य अकादमी ने अपने साहित्यिक महोत्सव में अन्य विधाओं के साथ-साथ लघुकथा पर भी कार्यक्रम करवाया, जिसमें मेरे साथ 10 लेखकों ने लघुकथा पाठ किया। अब अकादमियां लघुकथा को गंभीरता से ले रही हैं।

आपको जानकर खुशी होगी कि हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा पहले अंक से ही लघुकथाओं को उचित स्थान दे रही है। नवम्बर-दिसम्बर 1985 में ‘हरिगंधा’ के प्रवेशांक में मेरी दो लघुकथाओं ‘चैथा चित्र’ और ‘भावना’ को शामिल किया गया। हरिगंधा ने 2007 में मेरे सहयोग से लघुकथा विशेषांक निकाला। फिर जनवरी 2011 में मेरे सौजन्य संपादन में वृहद लघुकथा विशेषांक निकाला गया।

 हरियाणा साहित्य अकादमी ने अभी पिछले दिनों पांच कार्यशालाओं का आयोजन किया, जिसमें कालेज के विद्यार्थियों कोे साहित्य की अन्य विधाओं के साथ-साथ लघुकथा विधा का भी प्रशिक्षण दिया।

 हरियाणा ग्रंथ अकादमी ने 2013 में ‘समकालीन हिंदी लघुकथा’नामक मेरी आलोचना पुस्तक प्रकाशित की। हरियाणा ग्रंथ अकादमी की पत्रिका ‘कथा समय’ में शुरू से ही लघुकथाएं प्रकाशित होती रही हैं। इस तरह पत्रिकाओं में लघुकथाएं प्रकाशित होना इसके उन्नयन में महत्वपूर्ण योगदान करती हैं। मैं अवश्य कहना चाहूँगा कि अकादमी कालेज में लेखन के छोटे-छोटे कार्यक्रम करवाती रहे, जिससे नवलेखन को प्रोत्साहन मिलेगा।

राधेश्याम भारतीयः लघुकथा विकास में स्कूल काॅलेजों की क्या भूमिका हो सकती है?

अशोक भाटियाः ये आपने अलग सा प्रश्न किया है। अब कोई बच्चा सबसे पहले उपन्यास तो नहीं लिख सकता। शुरूआती दौर में वह छोटी कविता लिखेगा, लघुकथा लिखेगा। यदि उसमें साहित्य का रूझान होगा तो कहानी भी लिख सकता है। शुरूआती दौर में स्कूल, काॅलेज के बच्चों में जो ईमानदारी, जो जज्बा और भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आक्रोश होता है यदि उसको रचनात्मक दिशा में ले जाया जा सकता है। तो अकादमी ही ले जा सकती है। स्कूल कालेजों में इस तरह के कार्यक्रम करवाते रहने चाहिए। ताकि उनकी कलम चलती रहे।
वास्तव में क्या है कि साहित्य हमें खूंखार होने से बचाता है। वो हमें मानवीय बनाता है। लिखना सिर्फ पाठक के लिए ही नहीं बल्कि रचनाकार भी उससे बनता है। अपनी कमियों से पार पाता है। यह अनिवार्य भी है कि अकादमी ऐसे कार्य करें।

राधेश्याम भारतीयः लघुकथा के विकास में राष्ट्रीय स्तर पर किन-किन लघुकथाकारों का विशेष योगदान मानते हैं।

डॉ. अशोक भाटियाः राष्ट्रीय स्तर पर यदि देखे तो, मैं विष्णु प्रभाकर से शुरू करता हूं। सहजता और मानवीयता उनकी 101 लघुकथाओं में पढ़ने को मिलती हैं। दूसरा नाम हरिशंकर परसाई जिन्होंने लघुकथाओं में व्यंग्यात्मक शैली को स्थापित किया। इसके बाद रमेश बतरा जिनकी सारी की सारी लघुुकथाएं कलात्मकता का अद्भुत उदाहरण हैं। एक भगीरथ है जो रचना और आलोचना में बड़ा नाम है। बलराम अग्रवाल, सतीश दुबे, सुकेश साहनी हैं, ये लघुकथा में निरन्तर सक्रिय रहने वाले नाम हैं। हरियाणा से मैं पहले ही दो नाम बता चुका हूं। एक पृथ्वीराज अरोड़ा, दूसरे रामकुमार आत्रेय जो राष्ट्रीय स्तर पर लघुकथा के प्रतिष्ठित नाम है।

राधेश्याम भारतीयः लघुकथा विधा के प्रचार प्रसार में पत्र-पत्रिकाओं का क्या योगदान रहा है?

डॉ. अशोक भाटियाः डॉ. भारतीय, अक्सर लघुकथाकारों द्वारा कहा जाता है कि पत्रिकाएँ लघुकथा की उपेक्षा कर रही हैं। पर वास्तव ऐसा नहीं है। पत्र-पत्रिकाएँ ही तो लघुकथा का प्रचार- प्रसार करती हैं। जब कमलेश्वर के संपादन में सारिका का अक्तूबर 1973 में लघुकथा बहुल अंक निकला तो उसका असर दूरगामी रहा। उससे लघुकथा वहांँ तक पहुँची जहाँ उसके बिना नहीं पहुँच सकती थी। कुछ पत्रिकाओं ने लघुकथा इसलिए भी छापी क्योंकि वह समय की मांग थी। और सारिका के साथ-साथ साहित्यिक पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांक लगातार छप रहे थें हम याद करें चण्डीगढ से ‘साहित्य निर्झर’, ‘शब्द’ का विशेषांक, अम्बाला कैंट से ‘शुभतारिका’, दिल्ली से ‘समग्र’ बिहार से ‘नवतारा’ मुम्बई से ‘कथाबिम्ब’ ‘वर्षवैभव’ लघुकथा विशेषांक ने लघुकथा की उर्वर भूमि तैयार की। ये सारी पत्रिकाएँ अव्यावसायिक थी। लघुकथाओं का सिलसिला चलता रहा। बहुत प्रमुख पत्रिकाओं में मध्यप्रदेश से ‘समांतर’ पटना से ‘दिशा’ एक और दो भाग, राजस्थान से ‘संबोधन’ दिल्ली प्रकाशन दिल्ली की ‘आजतक’ लखनऊ से ‘सरस्वती सुमन’ और अंडेमान निकोबार से एकमात्र पत्रिका ‘द्वीपलहरी’ पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांक अपना विशेष महत्व रखते हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगंधा ने भी अब तक तीन लघुकथा विशेषांक निकाले हैं।

थोड़ा लघुकथा लेखकों को भी सोचना होगा कि जो पत्रिकाएँ लघुकथा नहीं छाप रही या छापने के बाद बंद कर दी, कहीं इसका कारण उनकी लघुकथाओं में तो मौजूद नहीं। ‘उद्भावना’ में पहले नियमित लघुकथाएँ आती थीं फिर कभी-कभी आने लगी। वर्तमान साहित्य पत्रिका गाजियाबाद से अलीगढ़ चली गई। जब नमिता जी संपादक थी तो लघुकथाएं छपीं लेकिन जब दिल्ली आई तो पत्रिका ने लघुकथाएँ छापना बंद कर दिया। कई बार संपादकों की सोच भी काम कर रही होती है। ‘पहल’ पत्रिका ने कह रखा है कि हमें लघुकथा और समीक्षा मत भेजें। उस दृष्टि से हमें देखना होगा।

आज कथादेश, कथाक्रम, कथासमय, समावर्तन, हंस, मधुमती, उत्तरप्रदेश, शीराजा, हिमप्रस्थ, सरस्वती सुमन, अविराम, शुभतारिका, पुष्पगंधा, पंजाब सौरभ आदि पत्रिकाओं ने लघुकथा को नियमित स्थान दिया हुआ है। अब लघुकथा लेखकों पर निर्भर करता है कि वे लघुकथा को कहाँ ले जाते हैं।

राधेश्याम भारतीयः साहित्य के विकास हेतु प्रकाशकों की क्या भूमिका रहती है?
डॉ. अशोक भाटियाः इस बारे में मेरे विचार थोड़े अलग हैं। पहली बात प्रकाशकों को अपनी भूमिका बदलनी होगी। वे किताबें छापकर आराम से बैठ जाते हैं और यह भी नहीं देखते कि यह पाठक तक कैसे जायेंगी। साथ ही रोना रोते हैं कि किताबें बिक नहीं रही। फिर प्रकाशक क्यों बने हो आप घी तेल बेचिए... छोड़ दीजिए इसको।
दूसरा, लेखकों को भी अपनी भूमिका बदलनी होगी। लेखक अपनी किताब लेकर घर से बाहर क्यों नहीं जाते... प्रदर्शनी नहीं लगाते। पहाड़ी इलाकों या दूर दराज के गांव ,दहात के लोगों को क्या पता कि दिल्ली, इलाहाबाद में कौन सी किताबें छप रही हैं। साहित्य में क्या कुछ हो रहा है। मैं कहता हूं लेखक और प्रकाशक यदि अपनी किताबें लेकर जायेंगे तो पाठक किताबों को हाथों हाथ लेंगे।

मैं फिर कहता है कि किताब के चार चरण- अच्छी सामग्री, अच्छा प्रोडक्शन, कम कीमत, किताब खुद चलकर पाठकों तक जाए... आज जब कहते हैं कि मीडिया में किताबों पर खतरा मंडरा रहा है... बंद हो जायेंगे... वे कहते हैं तो आप इसके लिए क्या करते हैं?

राधेश्याम भारतीयः लघुकथा के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?
डॉ. अशोक भाटियाः सच तो यह है कि मिली-जुली सोच है।लघुकथा के अलग-अलग तरह के पाठक हैं। हर अखबार में लघुकथाएं आती हैं।उसमें अलग तरह के पाठक हैं। स्थापित पत्रिकाओं में भी लघुकथाएं प्रकाशित होती रहती हैं। उसमें दूसरी तरह के गंभीर पाठक हैं। अब तो हर तरह के लघुकथाओं के पाठको की जरूरत है। मैं भविष्य के प्रति अवश्य ही आशान्वित हूं। जिस तरह से मैंने अकादमियों की सरगर्मियों को देखा है और जिस तरह से युवा वर्ग इससे जुड़ रहा है, वह बेहद खास है। दीपक मशाल और सुधीर द्विवेदी की लघुकथाएं देखने में आ रही हैं। इससे आशा बनती है इसमें गंभीर रचनाकर्मी इससे जुडेंगे। और इस विधा को एक नए मुकाम पर ले जायेंगे।

राधेश्याम भारतीयः लघुकथा क्षेत्र में आने वाले नए लेखकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

डॉ. अशोक भाटियाः नए लेखकों को जानना होगा कि किसी विधा का कोई शार्ट कट नहीं होता है। लघुकथा देखने में जितनी सरल है लिखने में उतनी ही कठिन है। नए लेखकों के लिए एक ही संदेश है कि अपनी संवेदना, अपनी जानकारी, अपने अनुभव, अपना अध्ययन तीनांे-चारों चीजों को मिलाकर अपना रचनात्मक व्यक्तित्व बनाएं... लिखने की तैयारी करें उसके बाद आप रचना में खो जाए। रचना को एक बार लिखकर उनको रख छोड़ें... कुछ दिनों बाद उसे फिर से देखें... अज्ञेय, प्रसाद, प्रेमचंद ने अपनी रचना को बार-बार संवारा है। लियोतोलस्तोय ने ‘वार एंड पीस’ सुनने में आया है कि पच्चीस बार लिखा गया। हम एक बार रचना लिखकर उसे अन्तिम नहीं मान सकते । उसकी चर्चा से पीछे न हटें। आलोचना को बर्दाशत करें। पुनः पुनः लिखें उसकी भाषा की, शिल्प की वाक्य विन्यास की बाराकियों पर जाएं, और समय-समय पर उसे देखें। इसी तरह से आप आगे बढ़ सकते हैं।