पाषाण का स्पर्श - लघुकथा


कविता वर्मा
... एक और अहिल्या पाषाण हो गई। एक झूठा शक उसमें से जीवन हर गया और वह बरसों इंतज़ार करती रही। इंतज़ार किसका? जीवन वापस मिलने का या खुद पर से झूठा शक दूर होने का या बिना उसका पक्ष सुने उसे चरित्रहीन बताने वाले की सजा का?

निर्मला कई सालों से मायके में रह रही थी। छोड़ दिया था उसके पति ने उसे। शक था उसपर कि पडोसी से उसके नाजायज सम्बन्ध थे। कौन सी अग्नि परीक्षा दे? किसे दे अग्नि परीक्षा? उसे जिसे उस पर विश्वास ही नहीं है? निर्मला भी तो पाषाण हो गई है ना हँसना ना बोलना ना कोई उमंग ना उत्साह। भाई भाभी की गृहस्थी में अनधिकृत उपेक्षित धंसी हुई है जाये तो कहाँ जाये।

पिता और भाई पता नहीं उस पर विश्वास करते हैं या नहीं। माँ और भाभी की आँखों में अविश्वास यदाकदा उभर आता है और उस पाषाण पर कुछ अमिट लकीरें खींच जाता है।

निर्मला किसी तरह अपने खर्च जितना कमाने लगी है। ससुराल में सास ने बिस्तर पकड़ लिया है जिठानी अलग चूल्हा जलाने लगी है। आज निर्मला के ससुर उसे लेने आये हैं। घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। आज सारे इलज़ाम धुल गये हालात और जरूरत ने पाषाण को मुक्ति दिलाने का अवसर दिया। पाषाण से कौन पूछे उसकी मंशा क्या है? निर्मला के दिल में खलबली मची है क्या अब वह चरित्रहीन नहीं रही? क्या उसके पति के दिल से अब शक ख़त्म हो गया? क्या उसके पति को कोई पछतावा है? क्या उसे भी कोई सजा दी गई?

घर में हाहाकार मच गया, जब निर्मला ने वापस जाने से इंकार कर दिया। अब पाषाण इंसाफ चाहता था, अविश्वास की सजा चाहता था। अब पाषाण ने बिना अपराधी को सजा दिलाये अपने स्पर्श से किसी को राम बनाने से इनकार कर दिया।
542 A तुलसी नगर, इंदौर - 452010