विष्णु प्रभाकर के पत्र - पुनीता सिंह

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पुनीता सिंह
सेतु के फरवरी अंक में उपेंद्रनाथ अश्क के पत्र के बारे में अनुराग शर्मा जी का लेख पढ़कर पुराने दिनों मे विचरण करने लगी। मैं भी कभी बदायूँ से वास्ता रखती थी। कहाँ वो सीधे-सादे शांत दिन और कहाँ दिल्ली की शोर-शराबा भरी ज़िंदगी जिसके शिकंजे मे रहना एक मजबूरी या उस गरम कौर की तरह है जिसे ना उगला जा सकता है ना ही निगला। कैलाश टॉकीज़ अब लुप्त हो चुका है पर उन दिनों मनोरंजन के साधनों मे सबसे अग्रणी था। पिछले दिनों से बदायूँ काफी सुर्खियों मे रहने लगा है, कभी कटरा सहादतगंज, कभी हिन्दू मुस्लिम दंगे, तो कभी निर्भया कांड का आरोपी बदायूँ से संबन्धित होने के कारण बदायूँ काफी कुख्यात हो गया था। आज के लोगों को शायद ही याद हो कि शकील बदायूँनी, जीलानी बानो, इस्मत चुगताई, फ़ानी बदायूँनी, मुल्ला बदायूँँनी, इल्तुतमिश आदि जैसी महान हस्तियाँ इस छोटे से शहर से जुड़ी थी।

 नये लेखकों की भावनाओं को समझने वाले वरिष्ठ रचनाकारों का मुझे हमेशा अच्छा रिस्पांस मिला। इस प्रसंग में स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी के साथ मेरा काफी पत्राचार रहा। किशोरावस्था में मेरी एक रचना पर किसी ने आहत करने वाली टिप्पणी कर दी थी तो उनकी चिट्ठी ने जैसे मुझे अंधेरे में एक रौशनी दिखा दी। उनकी एक पुस्तक में अशोक के इतिहास में मुझे थोड़ा संशय था, मैंने यूँ ही प्रभाकर जी को पत्र लिख दिया। उम्मीद नहीं थी कि उस का जवाब मुझे मिलेगा, परंतु लौटती डाक से मुझे पत्र का उत्तर मिला, मेरे आश्चर्य और खुशी का ठिकाना नहीं रहा। फिर अक्सर मै उनसे पत्राचार करने लगी। बीमारी की हालत में भी वे किसी और से लिखवा कर मेरे खतों का जबाव देते रहे। आज भी वो पत्र मेरे जीवन में एक अंधेरे में किरण की तरह हैं जिन्हें मैंने किसी अनमोल खजाने की तरह संभाल कर रखा है। ज़िंदगी जब भी थोड़ा वक्त देती है मैं उन पत्रों को ज़रुर पढ़तीं हूँ, ताकि आज की संवेदनहीन, रूखी, मनहूसियत-भरी, दिखावा पसंद, दोगली जीवन शैली से अपने को अलग रख सकूँ।

पिछले कुछ सालों से प्रवासी भारतीयों की पत्रिका 'गर्भनाल' मे श्रद्धेय विष्णु प्रभाकर जी के सुपुत्र, श्री अतुल प्रभाकर जी का संदेश निकला था कि वे दुनिया भर मे प्रेषित अपने पिता के पत्रों को एकत्र कर प्रकाशित कराना चाहतें हैं तो मैंने भी स्कैन कराके पत्र भेज दिये हैं। अतुल प्रभाकर जी से पता चला कि बड़ी मात्रा मे सालों से पत्र एकत्र हो रहे हैं। सुखद आश्चर्य की बात है कि इतने महान लेखक अपनी व्यस्तता के मध्य पाठकों की भावनाओं को कितना मान देते थे। वे अपने हाथ से पत्र लिखते और न लिखे जाने की स्थिति में किसी और से लिखवा कर भी पाठक के पत्र का जवाब देना जरूरी समझते थे। आज तो फोन पर भी बात करने का लोगों को समय नहीं हैं लेखक हों या पाठक सभी मे एक बड़ा बदलाव देखा जा सकता है कारण चाहें जो भी रहे हों।

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