कुछ 'लता: सुर-गाथा' के बारे में

सात सुरों की मलिका के किस्सों और ख़ास बातचीत को समेटे ग्रन्थ 'लता सुर-गाथा' लोकार्पण के कुछ दिन बाद ही भारत से चलकर ठीक सातवें दिन सात समन्दर पार पहुँच गया था लेकिन इसे पढ़ने और इस पर लिखने में कुछ समय लग गया। देर से लिख पाने की वजह एक डर था कि एक ऐसी किताब के बारे में बात करना, जिस पर देश और भाषा के बड़े-बड़े दिग्गज पहले ही सबकुछ कह चुके हों, बहुत टेढ़ा काम है बल्कि खतरनाक है। जिसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित क्या-क्या सम्मान मिल चुके हों उस पर कुछ कहना ताज के बारे में कुछ कहने जैसा ही है।

अब ताज की बात की है तो यहीं तनिक ठहरते हैं। इतिहास गवाह है कि ताजमहल जैसा अजूबा बनने में बीस साल से ऊपर का समय लगा, जाने कितनों का खून-पसीना इसकी नींव में दफ़्न है। जब पहली बार आगरा गया तो समय मिलते ही ताजमहल के आँगन में जा पहुंचा था। ताज के चबूतरे के ठीक नीचे लगा वह शिलालेख पढ़ते हुए और गर्दन उठाकर ताज देखते हुए दोनों का मिलान कर रहा था, बिलकुल अचम्भा नहीं हुआ बल्कि मन में यही आया कि 'इस जैसे खूबसूरती के पर्याय के बनने के लिए बीस साल भी कम ही थे।' 

लगभग यही बात दोबारा तब निकली जब लता सुरगाथा के आख़िरी पन्ने पर पहुंचा। पहले पढ़-सुनकर थोड़ा अचम्भा हुआ था कि एक जीवनी में छह साल क्यों और कैसे लगे होंगे! लेकिन जब पुस्तक हाथ में आई तब जाना कि यह सिर्फ जीवनी नहीं, सिर्फ साक्षात्कार नहीं, यह वास्तव में सुरगाथा है, सुरयात्रा है। बीते वक़्त की कोठरी, अटारी से स्मृतियाँ ढूंढ लाने के लिए आदरणीया लता जी को मन को उम्र की सीढ़ियों पर नीचे उतारकर, पीछे जाकर क्या-क्या न ढूंढना पड़ा होगा!!छोटी-बड़ी यादों के कितने बक्से खोलने और उनके कोने-कोने टटोलने पड़े होंगे, यह कोई मामूली बात नहीं। उनके जैसी दिग्गज का अपनी सुरयात्रा के प्रथम चरण से अब तक हज़ारों लोगों से मिलना हुआ होगा, उनमें से लगभग हर प्रभावशाली व्यक्ति और उससे जुड़े क्षणों को याद कर उन्हें फिर ज़िंदा कर यतीन्द्र जी को सौंपने में अगर छह साल लगे तो यह मामूली बात है। यह भी कहा जा सकता है कि जिस का को करने में एक आम प्रशंसक को बीस साल लगते और एक जिज्ञासु लेखक को दस-बारह साल, वही काम यतीन्द्र ने सिर्फ छह सालों में कर दिखाया है। 
यतीन्द्र मिश्र 
भूमिका और सांगीतिक यात्रा पर विचार में तो उनकी प्रवाहमयी लेखनी का शिल्प और कलात्मकता प्रभाव छोड़ते ही हैं, लेकिन असल चमत्कार संवाद में दिखाई देता है। सवालों से निकले सवाल पाठक को भारतीय फिल्मोद्योग और खासकर संगीत की दुनिया के भारत की आज़ादी के आसपास के समय से लेकर आज तक के समय की उन खोहों में ले जाते हैं जिनके बारे में हर किसी को जानकारी नहीं थी। भारत में शायद ही कोई कान हो जिसमें लता जी की मखमली आवाज़ न पड़ी हो, उस लिहाज से पुस्तक में यतीन्द्र और लता जी के संवाद को पढ़ते हुए महसूस होता है कि बातचीत सीधे पाठक से हो रही है और कानों में उनकी आवाज़ की खनक सुनाई पड़ती है।

कोई कहे कि 'इस किताब का दूसरा नाम क्या हो?' तो छूटते ही मेरे मुंह से 'लता इनसाइक्लोपीडिया' निकले। चाहे फिल्म नगरी के या संगीत या रंगमंच की दुनिया के चर्चित, कम चर्चित या अचर्चित नाम हों या फिर परिवार, खेल, राजनीति, साहित्य, शायरी, पत्रकारिता, उद्योग जगत आदि के, कोई भी उनकी बातचीत के दायरे से छूटा नहीं है। संगीत संसार में लता मंगेशकर जी का जो स्थान, जो सम्मान है उसके साथ लेखक और यह पुस्तक पूरा न्याय कर सके हैं।
हाँ यह जरूर है कि कई सवालों के अस्पष्ट जवाब के बारे में जो राय गुलज़ार सा'ब की है वही मेरी भी है, मगर इससे प्रश्नों की ईमानदारी पर संदेह नहीं हो सकता।  

मेरी अपनी समझ में अगर लता जी पर भविष्य में कभी इससे बेहतर कोई किताब बनेगी तो अब वह सिर्फ ऐसी किताब होगी जिसमें उनके जीवन का हर दिन खंगाला गया हो, जो कि अब संभव नहीं लगता क्योंकि संवाद के दौरान ही लता जी ने खुद कहा है कि शुरुआत में वह डायरी लिखती थीं लेकिन जब उन्हें यह महसूस हुआ कि यदि उन्होंने पूरी ईमानदारी से लिखा और ये सच्चाइयां लोगों के सामने आईं तो कई अपनों की कमियां सामने आएंगीं और उनका दिल दुखेगा, इसलिए उन्होंने युवावस्था में ही डायरी लिखना बंद कर दिया था। सुर-साम्राज्ञी की पसंद-नापसंद हो या पूर्ण-अपूर्ण इच्छाएं या कुछ और, आपको कई जवाब एक जगह मिल जाएंगे। 

अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अगर कहा जाए कि 'लता सुर-गाथा' को किसी भी निजी या सार्वजनिक पुस्तकालय की शान कही जाने वाली पुस्तकों में शुमार कर सकते हैं। संगीत साधक के लिए तो यह किसी धर्मग्रन्थ से कम नहीं। 

जिस तरह किसी पसंदीदा फिल्म के ख़ास चरित्र के बारे में लोग कह उठते हैं कि यह रोल सिर्फ इसी अभिनेता के लिए बना था या इसे सिर्फ यही निभा सकते हैं उसी तरह कहा जा सकता है कि 'लता जी पर इस तरह के ग्रन्थ को तैयार करने का बूता सिर्फ और सिर्फ यतीन्द्र मिश्र में था'।   

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