सेतु का प्रथम वार्षिकांक - सम्पादकीय

अनुराग शर्मा
एक नई द्विभाषी पत्रिका के रूप में सेतु की यात्रा जून 2016 में आरम्भ हुई थी। एक-एक कर बारह अंक सामने आ चुके हैं। आप सभी के प्यार की बदौलत यह सब इतनी जल्दी हुआ कि खबर भी न हुई। आज सेतु का प्रथम वार्षिकांक प्रस्तुत करते समय मैं प्रसन्न भी हूँ और आपका आभारी भी। जैसा कि आपको विदित है सेतु अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अनुमत सूची में है। पहले की तरह अब भी यहाँ आपके शोधपत्रों का स्वागत है।

जून का रौशन और खुशनुमा महीना कुछ खट्टी-मीठी यादें भी साथ लाता है। यह महीना मेरे प्रिय नायकों पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, आंग सान सू ची, इब्न ए इंशा, बाबा नागार्जुन, पॉल मैककॉर्टनी, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय और ब्लेज़ पास्कल के जन्म दिन का शुभ अवसर तो है ही, खगोलशास्त्रियों के एक वर्ग के अनुसार तो ईसा मसीह का जन्म भी इसी माह, 17 जून, 2 ईसा पूर्व को हुआ था। स्वतंत्र भारत के योजना आयोग के सदस्य और 'महालानोबिस दूरी' के प्रवर्तक गणितज्ञ प्रशांत चंद्र महालानोबिन का जन्म और देहांत दोनों ही जून में हुए थे। एलेक्ज़ेंडर पुश्किन, विक्रम सेठ, जॉर्ज ऑर्वेल सहित 'सैटैनिक वर्सेज़ के लिये प्रसिद्ध भारतीय मूल के अंग्रेज़ी लेखक सलमान रश्दी जैसे ख्यातिनामों के जन्मदिन भी जून में ही पड़ते हैं।

शरीरमाध्यम् खलुधर्म साधनम् - 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस बीता है। यदि इस शुभ दिन को आप अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत और प्रयत्नशील रहने का प्रण लेने से रह गये तो अब भी कर सकते हैं। इसके अलावा, अमेरिका में जून के तीसरे रविवार को पितृदिवस मनाने की परम्परा है। आप सभी को पितृदिवस पर मंगलकामनाएँ।

जून की कुछ दुखद घटनाओं में 1857 के स्वाधीनता संग्राम की नायिका वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई की 17 जून 1858 की वीरगति भी है। रानी आज भी भारतीयों के हृदय में रहकर यह याद दिलाती हैं कि अन्यायी कितना भी अधिक बलशाली हो, उसका डटकर सामना करना है।

18 जून 1576 को हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। सिपाहियों, घोड़े व हाथियों की संख्या सहित हर प्रकार से भारी सैन्यबल वाली मुगल सेना के सामने सीमित पैदल व घुड़सवार राजपूत लोहा ले रहे थे। दंतकथाओं और गीतों में प्रसिद्ध महाराणा प्रताप के मारवाड़ी घोड़े चेतक ने इसी युद्ध में प्राण त्यागे थे। स्‍वातंत्र्यवीर महाराणा प्रताप भारतीय संस्कृति में गहराई तक रची-बसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आदर की भावना के प्रतीक हैं। उन जैसे वीर चरित्र हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि भारतभूमि ने स्वतंत्रता को कितना महत्व दिया है। राष्ट्रप्रेम को किसी वाद-विवाद की नहीं कृतित्व की आवश्यकता है। इस यज्ञ में हम अपनी आहुति अनेक प्रकार से दे सकते हैं, चाहे वह किसी बालक को शिक्षा देना हो, चाहे कोई अन्य सामान्य स्वयंसेवा।

4 जून 1989 को बीजिंग के त्यानआनमेन चौक और उसके आस-पास के क्षेत्र में लोकतंत्र के इच्छुक प्रदर्शनकारियों के विरोध को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने क्रूरता से कुचल दिया था। चीनी सेना द्वारा छात्रों के दमन के समय राजधानी में सैनिक टैंक के सामने खड़े व्यक्ति का चित्र कम्युनिस्ट दमन के विरुद्ध जागृत जनता का प्रतीक बनकर सारे विश्व में देखा गया। दुख की बात यह है कि वह व्यक्ति कौन है और चीनी सरकार ने उसकी क्या गति की इसकी जानकारी किसी को नहीं है। लेकिन ऐसी घटनाएँ बार-बार याद दिलाती हैं कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र को साम्यवाद या किसी भी अन्य तानाशाही प्रवृत्ति से लम्बे समय तक दबाया नहीं जा सकता है, यह प्राकृतिक सत्य है।

बब्बर खालसा के आतंकवादियों ने एयर इंडिया के मॉंट्रियल से दिल्ली आ रहे कनिष्क बोइंग 747 विमान को 23 जून 1985 को  बम विस्फोट से उड़ाया था। 329 हत्याओं के साथ यह 9-11 के पहले की सबसे घृणित आतंकवादी कार्यवाही कही गयी थी। आतंक का खतरा तब से अब तक और बढ़ा है। कभी भारत की निजी समस्या समझकर जिस मुद्दे पर पश्चिमी विकसित देशों ने तब ध्यान नहीं दिया था, वह आतंकवाद अब इतना विकराल रूप ले चुका है कि उसकी अवहेलना नहीं की जा सकती है। समय आ गया है जब सारा संसार एकजुट होकर इस समस्या के मूल कारणों और इसके पक्षधरों की निरपेक्षता से पहचान करके दृढ़ता से सामना करे।

आधुनिक भारतीय इतिहास के ताज़ा और गहरे ज़ख्मों में से एक आपातकाल की चोट है। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संयुक्त विपक्ष उस समय सरकार के विरुद्ध जनजागरण में लगा था।  समझा जाता है कि सेना और केंद्रीय पुलिस बलों को विद्रोह के लिये उकसाया जा रहा था। 25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा के इस्तीफा देने तक देश भर में रोज प्रदर्शन करने का आह्वान किया। उसी दिन आंतरिक आपातकाल का अध्यादेश निकाला गया। रेलों के समय से चलने और समय पर पहुँचने के लिये प्रसिद्ध उस काल में असंतुष्टों पर बहुतेरे दमन हुए। 1977 के चुनावों में भारत की बहुसंख्य अल्पशिक्षित और ग्रामीण जनता ने लोकतंत्र में विश्वास जताया। उस चुनाव में इंदिरा गांधी की हार के बाद मिश्रित सरकारों का युग आया। जहाँ आईबीएम और कोकाकोला भारत छोड़कर गये वहीं बाद में ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ से सम्मानित होने वाले मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व में हुए पुलिस विद्रोह के दमन की घटनाओं ने यह भी साबित किया कि राजनेता एक से ही होते हैं।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता भारतीय संस्कृति की आत्मा है, लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता भी कम महत्वपूर्ण नहीं। 15 अगस्त 2017 को जब भारत गणतंत्र अपनी स्वतंत्रता की 70 वीं वर्षगाँठ मनायेगा, सेतु पत्रिका के माध्यम से हम भारत के वर्तमान सरोकारों पर बात करेंगे, भारत विशेषांक द्वारा। इस विषय पर आपकी मौलिक व अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है, शीघ्रातिशीघ्र भेजिये।

शायद आपको पता हो कि साहित्यकार प्रबोध गोविल जी पिछले कुछ वर्षों से हिंदी साहित्य के सर्वप्रिय-100 साहित्यकारों की सूची पर काम कर रहे हैं। इस बार भी उन्हें आपके सहयोग की आवश्यकता है। कृपया उन्हें ईमेल या फ़ेसबुक द्वारा अपने पसंदीदा जीवित हिंदी साहित्यकारों के नाम भेजिये ताकि उनकी सूची को आपका प्रतिनिधित्व मिल सके।

 55 रचनाओं के साथ यह अंक सेतु का अब तक का सबसे बड़ा अंक है। आशा है आपको रुचिकर लगेगा। कविता, कहानी, व्यंग्य, लघुकथा, निबंध, शोध सहित 12 आलेख, बिस्मिल की जीवनी, फ़ोटो-फ़ीचर, जैसे वर्तमान स्थाई स्तम्भों के साथ मॉरिशस से वत्सला राधाकिसुन तथा भारत से विवेक मिश्र के साक्षात्कार इस अंक के विशेष आकर्षण हैं। इस अंक से हम प्रसिद्ध कवि, व्यंग्यकार, ब्लॉगर व पॉडकास्टर समीर लाल द्वारा प्रस्तुत खाद्यविधियों (रेसिपी) का नया स्तम्भ 'उड़नतश्तरी चौकाआरम्भ कर रहे हैं। आगामी अंकों में  कुछ अन्य रोचक और उपयोगी स्तंभ जोड़ने का विचार है। यदि आप सेतु के स्तंभकार बनने के इच्छुक हैं तो कृपया सम्पादकीय ईमेल पर भावी स्तम्भ की पूरी जानकारी भेजकर सम्पर्क करें।


शुभकामनाओं सहित,

अनुराग शर्मा