भूल न पाऊँगा - संस्मरण

प्राण शर्मा

 - प्राण शर्मा


1960 में मैं शिक्षा प्राप्त कर के चंडीगढ़ से दिल्ली मे आ  गया था। सनातन धर्म हायर सेकेंडरी स्कूल, कीर्ति नगर में मैंने हिंदी पढ़ाना शुरु कर दिया। मेरी नौकरी लगते ही घर वालों ने मेरे लिए लड़की देखनी शुरु कर दी थी। कई लड़कियाँ उन्हें पसंद आयी थीं। उन्हें देखने के लिए वे बार-बार मुझे चंडीगढ़ बुलाते  थे लेकिन मैं आऊँगा कह कर भी नहीं जाता था। सच तो बात यह थी कि मैं विवाह करना नहीं चाहता था। उसका कारण था - मेरी दोनों बाहों पर एक्ज़ीमा फैल गया था। घड़ी-घड़ी मुझे खाज करनी पड़ती थी। बाहें दिन प्रति दिन सड़-गल  रही थीं। सबसे छिप-छिप कर कर खाज करने से मैं अपने आप से तंग पड़ गया था। लोग शेर या चीते के आतंक से  भयभीत होते हैं लेकिन मैं अपनी खाज से भयभीत रहने लगा था। ऐसी ख़ौफनाक हालत में मैं विवाह कैसे करता?

मैं लाजपत नगर रहता था। एक बहुत नजदीकी दोस्त के सुझाव पर मैंने कभी किसी डॉक्टर के चक्कर काटे और कभी किसी वैद्य के लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ, अलबत्ता रोग बढ़ता ही गया।

मुझे तीन सौ रूपये महीने की तनख्वाह मिलती थी, आधी तनख्वाह का ज्यादा हिस्सा डॉक्टर, वैद्य, औषधियों और मलहमों को भेंट हो जाता था। परेशानी में मैं कभी-कभी इतना दुखी होता कि आत्महत्या करने को जी कर उठता। ऐसी सूरत में विवाह करता तो किसी बेचारी की ज़िंदगी को दुःख भरा कर देता और मैं ताज़िंदगी पछतावे की आग में जलता रहता।

मैं कोई न कोई बहाना कर के घर वालों को टालता रहा। टालते रहने का सिलसिला तीन साल चला। एक दिन बाऊ जी ने मुझे अपने पास बिठा कर बड़े प्यार स मुझे समझाया, “देख बेटे, तेरी  उम्र अब गृहस्थी सम्भालने की है। तू सत्ताईस साल का हो गया है। कुछ ही सालों  में तेरे बाल सफ़ेद होने लगेंगे। क्या बुढ़ापे में ब्याह करेगा?” घर के अन्य  सदस्य भी मेरे पीछे पड़ गए। मैं अपने रोग के बारे में किसीको बताना नहीं  चाहता था। सोचता था कि मेरी गली - सड़ी बाहें देख कर सभी मुझसे नफ़रत  करने लगेंगे, मुझसे दूर रहने लगेंगे। सोचता था कि मैं तो परेशान हूँ ही, सभी को परेशान क्यों करूँ ?

सबने मेरा विवाह करवा कर दम लिया।

पत्नी से मैं कई महीनों तक अपनी बाहें छिपाता रहा। उसके सामने खाज होती तो मैं कभी किचन की ओर भागता और कभी टॉयलेट की ओर। प्यार-व्यार करना मुश्किल हो  जाता। अजीब हालत में गुज़र रहा था मैं।

पंजाब में मुहावरा है, “इशक ते खुर्क (खाज) लुकोये नईं लुकदे।” एक  दिन पत्नी ने मुझे खाज करते हुए देख लिया। उसके पसीने छूट गए। वह आहत हो कर पूछ बैठी. “ये क्या हुआ है आपको?”

जवाब में मेरे मुँह से इतना ही निकला, “एक्ज़ीमा।”

“एक्ज़ीमा? कबसे है?”

“तीन-चार साल से।”

“तीन-चार साल से! आपने मुझे बताया क्यों नहीं? बाऊ जी या घर में किसी को ख़बर है?”

“नहीं।”

“आपकी पत्नी हूँ, मुझे तो बताया होता। उफ़!”  पत्नी ने हाथ अपने माथे पर दे मारा।

मैं मन ही मन काँप उठा। तलाक शब्द मेरे दिमाग में कौंध गया। अब  तो पत्नी मुझे छोड़ कर चली जाएगी। मैं झुँझला उठा। कुछ महीने पहले मेरे एक मित्र की पत्नी घरेलु झगड़े के कारण उसे छोड़ कर मायके चली गयी थी।

“देखिये, मैं आपको वैष्णो देवी ले जाऊँगी। मुझे पूरा विश्वास है कि देवी आप पर कृपा करेगी। घबराइए नहीं, आप बिलकुल स्वस्थ हो जाएँगे।”

पत्नी के सहानुभूति के शब्द मेरे कानों में क्या पड़े, मेरी आँखों से खुशियों का झरना बह उठा। पत्नी हो तो ऐसी हो। मेरे मन में उसके लिए दुआएँ ही दुआएँ पैदा होने लगीं ।

एक-दो दिन बाद एक महिला ने मेरी पत्नी को बताया, “अजमल खाँ रोड, करोल बाग में एक हकीम हैं - हाकिम राय। वह इस रोग के विशेषज्ञ हैं। अपने पति को उनको दिखाएँ।”

उसी दिन हम हकीम हाकिम राय के दवाखाने में हाज़िर हो गए। दवाखाने के बाहर रोगियों की लम्बी क़तार थी।  लगभग डेढ़ घंटे के बाद मेरी बारी आयी।

हकीम साहब बड़ी आत्मीयता से पेश आये। मिशरी से घुले उनके बोल थे। मन आनंदित हो गया। उन्होंने मेरे दोनों हाथों की नब्ज़ों को कई बार पढ़ा। कहने लगे, “बेटे, आपके शरीर में सूरज की तपन है, उसे निकालना होगा। वो तभी निकलेगी जब आप दवाई और मलहम के साथ-साथ अपने खान-पान पर भी ध्यान देंगे।”

“इन्हें क्या-क्या खाना और पीना पड़ेगा?” पत्नी पूछ बैठी।

“क्या आपके पति मांस-मछली खाते हैं?”

“जी, कभी-कभी।

“तली हुयी चीज़ें?”

“बहुत ज़्यादा।”

“मिर्च-मिसाला?”

“वो भी  ज़्यादा।”

“शराब?”

“कभी-कभी दोस्तों के साथ।”

“ये सब इन्हें त्यागना पड़ेगा। नारियल का पानी ख़ूब पीएँ। तरबूज का मौसम है, पेट भर के खाएँ। चाँदनी रातों में बाहर टहलें। कुछ ही दिनों में आपके पति चंगे-भले हो जाएँगे।”

दिन में दो बार मैंने दवाई लेना शुरु कर दिया। दवाई पीते ही पेट और बाहें शीतल हो जातीं, सन्दल जैसी सुगंध मेरी रग-रग में भर जाती। मलहम का जादू भी मैंने वैसा ही महसूस किया। हकीम हाकिम राय की औषधि और मलहम किसी ऋषि या मुनि के वरदान से कम नहीं निकलीं ।