लघुकथाएँ - उषा छाबड़ा

उषा छाबड़ा

नोट

जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में एक माँ अपनी बच्ची को मंदिर लेकर गई। मंदिर सुंदर सजा हुआ था। बच्ची ने दस रुपये का एक नोट नन्हे कृष्ण जी के झूले में डाल दिया और उन्हें झूला झुलाया। वह बहुत खुश थी। उसकी माँ वहीँ बैठ गई। थोड़ी ही देर में बच्ची माँ के पास आई और माँ के पर्स में और पैसे दूँढने लगी। माँ के पर्स में एक दस का, एक सौ का और एक पांच सौ का नोट था। बच्ची ने पांच सौ का नोट पकड़ लिया और वह चढाने के लिए ज़िद करने लगी। माँ घबरा गयी। पाँच सौ का नोट! माँ ने कहा, "अभी तो भगवान जी को चढ़ाया है, अब और नहीं चढ़ाना।" बच्ची ने कहा, "नहीं, दूसरे भगवान जी जो मंदिर में हैं उन्हें चढ़ाना है।" फिर उसे समझाया गया कि जब एक भगवान को चढ़ाया तो सब मिलकर उसी में से आपस में बाँट लेंगे। बच्ची फिर भी ज़िद पर अड़ी हुई थी। माँ उसे फिर पर्स में से दस रुपये का नोट निकाल कर दे रही थी पर बच्ची थी कि राजी ही नहीं हो रही थी। वह पाँच सौ के नोट को ही चढ़ाने पर ही अड़ी हुई थी। माँ को भी उसे मना करने में दिक्कत महसूस हो रही थी और बच्ची थी कि मान ही नहीं रही थी। थोड़ी देर बाद माँ ने उसे डाँटा, "नहीं, ये नहीं चढ़ाना है। बार बार ज़िद क्यों कर रही हो?" तभी बच्ची बोल पड़ी, "ये नोट नरम (सॉफ्ट) सा है, मुझे यह नहीं चाहिए। मुझे कड़क (हार्ड) नोट चाहिए।" माँ को अब समझ आई कि बच्ची क्या चाहती थी! असल में बच्ची को कड़क नोट उस पेटी में डालना था।   पर्स में सिर्फ पांच सौ का नोट ही कड़क था, इसलिए वह उसे लेने की ज़िद कर रही थी। अब समस्या को कैसे सुलझाया जाए। फिर उसे यह कहा गया कि भगवान जी के झूले में यह नरम वाला दस रुपए का नोट डाल आओ और वहाँ से कड़क नोट ले आओ। बच्ची ने देखा कि एक बूढी महिला ने अभी-अभी एक कड़क दस का नोट झूले में डाला है। उसने जल्दी से अपना नोट झूले में डाला और दूसरा कड़क वाला दस रुपए का नोट उठा लिया। वह ख़ुशी-ख़ुशी दस का कड़क नोट पेटी में डाल आई। अब बेटी भी खुश थी और माँ भी!

एक कहानी

आज मैं स्कूल बस से जब अपने स्कूल की ओर जा रही थी तो पास ही कक्षा चार की एक  छात्रा बैठ गई।    मैं एक किताब पढ़ रही थी जिसमें छोटी-छोटी कहानियाँ थी।   वह लड़की भी मेरी किताब में झाँकने लगी।   थोड़ी देर बाद उसने मुझसे पूछा,” मैम, क्या आप भी छोटी कहानियाँ पढ़ना पसंद करती हैं?”
मैंने कहा,“हाँ, मुझे छोटी कहानियाँ पढ़ना अच्छा लगता है।”
उसने कहा, “मुझे भी छोटी कहानियाँ पसंद हैं।”
मैंने पूछा, “क्यों?”
“मैम, कहानी बड़ी होने से बीच में छोड़ने का मन नहीं करता और फिर बहुत पढ़ाई भी करनी होती है, इसलिए ज्यादा समय नहीं निकाल पाती।”
फिर मैंने कहा, “अच्छा।”
“मैम, मैं आपको एक कहानी सुनाऊँ?” लड़की ने  पूछा।
मैंने कहा, “सुनाओ।” मैंने अपनी किताब बंद की और उसकी बात सुनने लगी।
उसने बताया कि उसकी मम्मी ने उसे एक किताब से यह कहानी सुनाई थी, जिसमें एक  शैतान अपने मालिक से कहता है कि मुझे काम नहीं दोगे तो मैं तुम्हें मार डालूँगा। इसलिए फिर उसका मालिक एक सीढ़ी बनाता है जिसमें वह उस शैतान को यह काम दे देता है कि वह सीढ़ी से ऊपर नीचे - उतरे।   इस तरह वह आदमी उस शैतान को ऐसे काम में लगा देता है जो कभी ख़त्म नहीं होता और उसके चंगुल से  छूट जाता है।
 बच्ची कहानी सुना कर कहने लगी, “ रात को सोते वक्त मैं भी सीढ़ी पर चढ़ने- उतरने की बात सोचती हूँ और मुझे अच्छी नींद आ जाती है।”
मैंने उससे पूछा, “यह तुम क्यों करती हो?”
उसका जवाब था कि किताब में ऐसा लिखा था और उसकी मम्मी ने उसे समझाया था।
उसकी बात  सुनकर अच्छा लगा। मैं सोच में पड़ गई। एक कहानी ने उसके मानस पटल पर इतना गहरा असर किया कि वह बचपन से ही ध्यान लगाना सीख गई। अनजाने ही रात को सोने से पहले वह ध्यान करती है।  अगर अभिभावक बचपन से ही बच्चों को सुंदर कहानियाँ सुनाएँ, उनके साथ सही मायने में वक्त बिताएँ, तो बच्चे क्यों नहीं सुंदर फूल की तरह खिलेंगे!


दीप जल उठे

आज दीपावली है।  राजी पलंग पर बैठी खिड़की से बाहर देख रही है। आज बाहर कितनी रौनक है। सब कितने खुश दिखाई दे रहे हैं। कितने ही लोग परिवार समेत एक दूसरे से मिल रहे हैं। कुछ बच्चे एक तरफ मिलकर अपने घर के आगे दीये जला रहे हैं। कुछ लोग थाली में दीये जलाये मंदिर की ओर जा रहे हैं। थोड़ी दूर पर कुछ औरतें सजावट का सामान खरीद रही हैं। सब कितने उत्साहित हैं! वह एक गहरी सांस लेती है और अपने घर की ओर देखती है। अभी तक उसने कमरे की बत्ती भी नहीं जलाई है। वह बुझे मन से पलंग से उठती है और रसोई की ओर बढ़ जाती है। उसके घर, उसके मन में कोई आनंद नहीं। उसके दोनों बच्चे परिवार समेत दूसरे शहर में रहते हैं। वह घर सजाएगी तो क्यों? फिर कुछ सोचकर एक दीया उठाती है। वह बाती के लिए हाथ बढ़ाती ही है कि तभी दरवाज़े की घंटी बज उठती है। उसके घर कौन आएगा? वह मन ही मन सोचते हुए दरवाजे की ओर बढ़ती है। धीरे से दरवाज़ा खोलती है। "अरे छुटकी, तू यहाँ क्या कर रही है? जा अपनी सहेलियों के साथ घर को सजाओ।" राजी कहती है।

छुटकी झट कह उठती है, "वही तो करने हम सब आये हैं। हम सब सोच कर आये हैं कि आज आपका घर भी सजाएँगे। देखिये हम सब सजावट का सामान भी ले आये हैं।" उसकी सहेलियां भी धीरे से पीछे से निकल आईं। राजी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। इन छोटी बच्चियों ने उसे दीपावली के दिन कितनी ख़ुशी दी है। वह भी सब कुछ भूलकर उनके साथ घर सजाने में जुट गयी। उसके मन के दीप कितने सुन्दर जल उठे।
 

प्रश्न

मेट्रो स्टेशन पर एक लड़की ट्रेन के आने का इंतज़ार कर रही थी। जैसे ही ट्रेन आई, वह उसमें चढ़ गई।  चढ़ते ही उसने देखा उसकी एक सहेली वहाँ पहले से मौजूद थी। दोनों कालेज की बातें करने लगीं। तभी उसकी  निगाह अपनी सहेली के टीशर्ट पर पड़ी। उसमें फूल बना हुआ था।
लड़की ने उससे पूछा, "क्या भाई की टीशर्ट पहनी है?"
"देखती नहीं, इस पर एक फूल बना है।  यह भाई की  कैसे हो सकती  है?"
"क्यों लड़के फूल वाली कमीज़ नहीं पहन सकते?"
"नही!"
पहली ने फिर पूछा, "अच्छा बता, अगर शर्ट पर रेलगाड़ी बनी हो फिर?"
दूसरी लड़की को समझ नहीं आया, वह क्या उत्तर दे।
हलकी  चुप्पी  छाई, फिर वे दोनों हँस  पड़ीं और कॉलेज की बातें करने लगीं।
बदलते दौर में यह प्रश्न  अभी भी अपना उत्तर ढूँढ  रहा था।