कुछ कह रहा सम्पादक भी...

प्रिय साथियों, 

दीपक मशाल 
जब कुछ मनुष्य मरते हैं तो मनुष्यता उदास हो जाती है और जब मनुष्य की उदासीनता से मरते हैं तो मनुष्यता कुछ हिस्सा मर जाती है, शर्म से। मानव का असंवेदनशील होना कोई नई बात नहीं है, मेरा ख्याल है कि जब से आदमी प्रकृति का और फिर समाज का हिस्सा हुआ है लगभग तब से ही उसका कुछ प्रतिशत वक़्त-बेवक़्त असंवेदनशील बना रहा है। मगर सिर्फ उतना जितने में इस अवगुण को मानवता से बाहर की बात मानी जाए। आजकल कुछ ख़बरें ऐसी आ रही हैं जिनसे यह संदेह पुष्ट होता है कि मानव के भीतर वह दायरा बढ़ा है जिसमें अमानवीयता घर करे रहती है। 
भौतिकवादी हमारी बनाई दुनिया ने मृगमरीचिका की अंधी दौड़ में हमारे नैतिक मूल्यों को इतना किनारे कर लिया है कि अब 'जा के पाँव न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई' के उलट हालातों को भी अर्थहीन कर दिया है। क्योंकि अब लोग खुद भोगी पीड़ा से जब दूसरों को गुजरते देखते हैं, तब भी उसे नहीं समझते, उन्हें टीस नहीं उठती, जानते समझते सब हैं लेकिन दिमाग को उस एहसास के प्रति शून्य कर लेते हैं। 
कभी हज़ारों लोगों के सामने सड़क हादसे में घायल व्यक्ति मदद की गुहार करता रहता है, तो कभी कोई अपने बीवी-बच्चों को बचाने के लिए रोटा-कलपता  रहता है। और हम हैं कि मशीन बनकर देखते रहते हैं या सिर्फ वीडियो बनाकर समाचार एजेंसी को भेज अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। दया, धर्म की बातें बस राजनीति के लिए बचाकर रख ली गई हैं, जिन्हें वक़्त-जरूरत पर, अपना उल्लू सीधा करने खातिर प्रयोग किया जाता है। 
जानता हूँ कि ये सभी बातें निराशा की प्रसूति लगती हैं लेकिन अफ़सोस कि यह आज के हमारे देश के नागरिकों की कड़वी सच्चाई है। संभव है कि हालात अभी भी इतने बुरे न हों और जैसा मैंने बताया वह पूरा परिदृश्य न होकर सिर्फ कुछ दृश्य हों। लेकिन इनका दृश्य होना भी खतरनाक है। एक डर है कि आज के ऐसे दृश्य कल हमारी आदत न बन जाएँ। इन दृश्यों की बहुलता इसे परिदृश्य बनाते देर नहीं लगाएगी। 
आप खुद गौर कीजिये कि रोज अखबारों में आने वाली चोरी-डकैती, लूट, हत्या बलात्कार की ख़बरें अब आपको कितना विचलित या उद्वेलित करती हैं! दुआ है कि ये ख़बरें भी वैसी ही आम न हो जाएँ। 
दोस्तों, संवेदनशीलता वह डाल है जिस पर मानव प्रजाति सधी बैठी है। और कालिदास के महाकवि बनने से पहले की दास्ताँ पर हंसता आदमी कल को खुद कालिदास बन इस डाल को ही न काट बैठे, क्योंकि इसके नीचे ज़मीन नहीं बल्कि वह दलदल है जो हमारी पूरी प्रजाति को समा लेने का माद्दा रखती है। हम चेत जाएँ तो बेहतर हमारे लिए। 

                                                                                                                                     सेतु, जुलाई 2017

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