वैश्विक परिदृश्य में कला फिल्मों के आंदोलन का भारत में प्रभाव

- भगवत प्रसाद पटेल


शोध सारांश:-
भारतीय सिनेमा का विकास भी किसी आंदोलन जनित सिनेमा से कम नहीं रहा है। भारत में फिल्मों की विकास यात्रा देखें तो इसका पहला युग 1896-1930 तक है। यह मूक सिनेमा का समय था। व्यावसायिकता पहले से ही हावी। ‘सावकारीपाश’ से सामाजिक समस्याओं पर आधारित फ़िल्में बनने लगीं, बाद के दिनों में सवाक फिल्मों के निर्माण में कई सार्थक फिल्मों का निर्माण हुआ। पचास-साठ के दशक में सार्थक फ़िल्में अधिक बनीं। प्रथम भारतीय अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल में नवयथार्थवादी फिल्मों ने कला फिल्मों के लिए रास्ता साफ कर दिया। फ्रांस ने न्यू वेव सिनेमा की शुरुवात की जो आन्दोलन के रूप में विश्व में फ़ैल गया। भारत भी इससे प्रभावित हुआ तथा 1968 में अरुण कौल और मृणाल सेन ने कला फ़िल्म के लिए घोषणा पत्र जारी किया और 1969 में ‘भुवनसोम’ फ़िल्म से शुरुआत हो जाती है। छोटी-छोटी आकस्मिक गतिविधियों को छोड़ दें तो मूक फिल्मों के निर्माता “दादा साहेब फाल्के” को भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है। भारतीय कला फिल्म यानि यथार्थवादी सिनेमा से एक नये दौर की सिनेमा की शुरूआत होती है। यह दौर 70 के दशक का होता है । इस दौर में सिनेमा के कलारूप का बहुत विकास हुआ। काफी दिनों तक भारतीय भाषाओँ की फ़िल्में आदर्शवाद से उत्प्रेरित होती थीं। धीरे-धीरे यथार्थवाद की ओर झुकाव बढ़ा। मार्क्सवाद का कुछ असर हुआ तो फिल्मों में शोषण-उत्पीडन की पोलें खुलने लगी। साहित्य में जब प्रगतिवाद चरम पर था और कला फिल्मों की समीक्षा पूरे देश में होने लगी थी तभी से फिल्मों में इस विचारधारा के प्रभाव दिखायी पड़ने लगे। इप्टा के मँजे हुए कलाकार फिल्मों में आए थे। वे निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और गीतकार के रूप में सक्रिय हुए। उल्लेखनीय फ़िल्में इनकी योजनाओं से बनी। मार्क्सवाद के प्रभाव से अलग आधुनिकतावादी मूल्यों से अनुप्राणित फ़िल्में भी बनायीं जाती थीं। वैश्विक स्तर पर कला फिल्मों के आंदोलनों से भारतीय सिनेमा में जो बदलाव देखने को मिला वो बदलाव रचनात्मकता की थी। सिनेमा में यथार्थ का समावेश बड़े स्तर पर देखने को मिला। सामाजिक यथार्थ से जुड़े अनगिनत फिल्मों का निर्माण शुरू हो गया।

बीज शब्द :- कला सिनेमा, भारतीय कला सिनेमा और वैश्विक परिदृश्य।

परिचय :-
कला सिनेमा फ्रांस से शुरू होकर पूरे विश्व में फ़ैल गया जो एक आन्दोलन का रूप ले लिया।द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की जो युवाओं की फ़ौज थी उनमें एक छटपटाहट थी इसलिए वे आक्रामक थे, वे जनरल पत्रिकाएँ निकालते थे तथा व्यावसायिक फ़िल्म निर्माताओं पर क्रूर होकर लिखते थे। इन युवाओं ने फिल्मों का गहन अध्ययन किया, घोषणा पत्र निकाला और खुद से फ़िल्में बनाना शुरू कर दिया। इन युवाओं की फ़िल्में यथार्थपरक थीं। युवाओं को ये फ़िल्में बहुत प्रभावित कीं। इस सिनेमा ने विश्व के अनेक देशों को प्रभावित किया क्योंकि समस्याएँ बहुत से देशों में थीं, लेकिन प्रत्येक देशों की अपनी-अपनी समस्याएँ थीं जिसका चित्रांकन कला सिनेमा में हुआ है। भारत भी इस आन्दोलन से प्रभावित हुआ। इसने भी 1968 में घोषणा पत्र जारी किया और फ़िल्म निर्माण शुरू कर दिया। भारतीय कला सिनेमा लगभग दो दशक तक प्रभावी रहा। विश्व के अनेक देशों की क्या परिस्थियाँ रही जिसके कारण कला सिनेमा ने निर्देशकों को आकर्षित किया। यही इस शोधपत्र में पता किया जायेगा। इसके लिए जर्मनी जापान और भारत को अध्ययन के हेतु चयन किया गया है।
उद्देश्य :-
 कला फिल्मों में सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक पृष्ठभूमि का अध्ययन।
 कला फिल्मों के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अध्ययन।
 भारतीय कला फिल्मों पर वैश्विक कला फिल्मों का प्रभाव।
शोध प्रविधि :-
शोध से संबंधित तथ्यों के प्रस्तुति और संकलन के लिए द्वितीयक आंकड़ों का प्रयोग किया गया है। फिल्मों का चयन उद्देश्यपरक निदर्शन से किया गया है। तथ्यों के विश्लेष्ण के लिए अंतर्वस्तु विश्लेषण विधि का प्रयोग किया गया है।

विश्लेष्ण:-
विश्व पटल पर कला फिल्मों का उभार फ़्रांस से होता है, इस उभार की एक लम्बी प्रक्रिया है। अध्ययनशील व्यक्तित्व हमेशा स्वस्थ समाज के निर्माण में संलग्न होते हैं। वे इतिहास से विधिवत भिज्ञ होना चाहते हैं। इतिहास,साहित्य आदि से जानकारी प्राप्त होती है जिनका वे अध्ययन करते हैं और पुनर्मूल्यांकन करते हैं। इसी क्रम में इतिहास के पन्नों में द्वितीय विश्वयुद्ध उद्घृत है जो यूरोप को झकझोर कर रख दिया था। युद्ध की त्रासदी ने सम्बंधित देशों को इतना प्रभावित किया कि ग़रीबी, चोरी, निराशा आदि का साम्राज्य हो गया। इसी दौरान यूरोप में अनेक दर्शन उभरते हैं जो युद्ध से उपजी परिस्थितियों के कारण उभरीं।शून्यवाद, निराशावाद, असंगतता आदि। लेकिन यूरोप तीब्र गति से विकास किया और पुनर्स्थापित हो गया। विश्व दो ध्रुवों में बंट गया, एक पूंजीवादी अमरीका के नेतृत्व में द्वितीय साम्यवादी सोवियत संघ के नेतृत्व में। विश्व के अनेक देश इन्हीं दो गुटों में बंटे हुए थे। ग़ुलाम देश जो उपनिवेशित थे इसी समय स्वतंत्र हो रहे थे। इनमें से ज़्यादातर देश इन दोनों गुटों में से किसी में भी शामिल नहीं होना चाहते थे। इन सबों ने मिलकर अपना एक अलग गुट बनाया ‘गुट-निरपेक्ष’ ये आपस में एक दूसरे के सहयोग से अपना विकास करना चाहते थे। तकनीकी व अन्य सहयोग ये दोनों गुटों से लेते थे। सभी देशों की अपनी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पहचान अलग थीं, समस्याएँ भी अलग थीं, उन्हीं पर केन्द्रित साहित्य थे, सिनेमा भी साहित्य जैसा हो जो सामाजिक सरोकार रखता हो। इसे ध्यान में रखकर फ़्रांस ने नया सिनेमा विकसित किया जो आन्दोलन का स्वरुप ग्रहण कर लिया और पूरे विश्व में फैल गया लेकिन अलग-अलग देश अपनी अलग-अलग समस्याओं को पिरोए है।

फ्रेंच न्यू-वेव के पहले इसकी पृष्ठभूमि नवयथार्थवादी सिनेमा ने रख दी थी। इसका कोई निश्चित स्रोत नहीं है फिर भी यह सबसे पहले 1940 में इटली के आलोचकों के लेखन में दिखा। यथार्थ चित्रण की कला ने इटली के युवाओं को सामान्य इटालियन सिनेमा की रूढिओं से मुक्त कर दिया। मुसोलिनी के अधीन चलचित्र उद्योग असाधारण ऐतिहासिक कथाओं और भावनात्मक उच्च वर्ग से सम्बंधित अतिनाटकीय (उपनाम वाइट-टेलीफोन फिल्म्स) फ़िल्में निर्मित करते थे और बहुत से आलोचक इसे कृत्रिम और पतनोंमुख अनुभव करते थे। नये यथार्थ की आवश्यकता थी। नव यथार्थवादी आन्दोलन की शुरुआत इतालवी फ़िल्म आलोचक अल्बर्टो बारबरो ने की थी। उनका कहना था कि सबसे पहले हमें अब तक बनाए गए सब आसान और पके पकाए फार्मूलों से मुक्त होना है। सीधे-सीधे अच्छे और बुरे की लड़ाई दिखाकर, पूरे मनुष्य जाति के आधे हिस्से को महान तथा आधे को कुरूप में बदलने की मनोवृत्ति से छुटकारा पाना है। क्योंकि यह फ़ार्मूला समस्याओं का विश्लेषण करने तथा उन्हें मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर पाने से कतराता है।

नवयथार्थवादी सिनेमा से सहज शूटिंग का फार्मूला न्यू-वेव सिनेमा ने लिया। स्टूडियो से निकलकर वास्तविक लोकेशन पर खुले में, गली मुहल्लों में, व्यक्तिगत भवनों आदि में शूटिंग करना। इतालियन कैमरा संचालक इतने माहिर होते थे कि वे हॉलीवुड की ‘थ्री पॉइंट लाइट’ को नकार दिए। हलके कैमरे का प्रयोग किया जाने लगा, सहज ले जाने योग्य सामान को ही शूटिंग के समय प्रयोग करते थे। कलाकार मजदूर व गैर प्रशिक्षित हुआ करते थे यदि कोई प्रशिक्षित होता था तो थिएटर से होता था। आवाज़ अलग से डव नहीं की जाती थी बल्कि लोकेशन की ही आवाज़ रखते थे। कम बजट में फ़िल्में तैयार कर ली जाती थीं। इटालियन नवयथार्थवादी फ़िल्में इटली की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी व मनोवृत्तियों का चित्रण करती थीं।

फ्रेंच न्यू वेव सिनेमा ने फ़िल्म मेकिंग में नवयथार्थवाद के इन टूल्स को अपना लिया क्योंकि ये फ़िल्में भी कम बजट की होती हैं। डेविड और क्रिस्टिन लिखते हैं, “स्पस्ट रूप से न्यूवेव में क्रन्तिकारी गुण दिखते हैं, न्यू वेव के डिरेक्टेर्स ने नवयथार्थवादपर विचार किया और उसके स्टूडियो फ़िल्म मेकिंग के प्रति विद्रोह को अपनाया। जैसा कि स्टूडियो के विपरीत नवयथार्थवादी फ़िल्में अपने ‘मेज़-एन-सीन’पेरिस के आसपास के वास्तविक लोकेशन्स को रखते थे। सामान्य तौर से शूटिंग लोकेशन पर ही होती थी। स्टूडियो के तड़क-भड़क लाइट की जगह वास्तविक लाइट व आसान प्राप्त होने वाली लाइट उपयोग करते थे। कुछ पोस्टवार फिल्मों में कम रोशनी वाला अपार्टमेंट और उसके कारीडोर को जो पेरिस से संबंध रखते थे उन्हें मैला कुचैला दिखाना होता था।” आगे लिखते हैं, “सिनेमेटोग्राफी भी बदली। न्यू वेव में कैमरा के व्यवहार में बड़ा बदलाव आया, पैनिंग और ट्रैकिंग का प्रयोग चरित्र को फालो करने के लिए अथवा लोकेशन से उसे जोड़ने के लिए किया जाता था तथा साथ ही लोकेशन परसस्ती शूटिंग के लिए लचीला, सहज सामान की आवश्यकता पड़ती थी, सौभाग्य से उसी समय एक्लेयर कैमरा विकसित हो गया था, हल्का था जो सहज रूप से हाथ में लेकर शूट किया जा सकता था।” न्यू वेव फ़िल्म का निर्माण होने से पहले इन निर्देशकों ने गहन अध्ययन किया, फिल्मों को विधिवत गहनता से देखते थे, उसपे चर्चा करते थे ‘कोहिअर डू सिनेमा’ जर्नल पत्रिका में लिखते एवं विश्लेषित करते थे। इनका एक ग्रुप था, ये युवा थे, उस समय के सम्मानित फ़िल्म निर्देशकों पर आक्रामक होकर लिखते थे।ज्यां लुक गोदार इक्कीस प्रमुख निर्देशकों को ज़ोर देकर संबोधित करते हैं, “तुम्हारा कैमरा मूवमेंट गन्दा है क्योकि तुम्हारा सब्जेक्ट बुरा है, तुम्हारा कास्ट एक्ट बुरा है क्योंकि तुम्हारे संवाद निरर्थक हैं, एक शब्द में कहें तो तुम नहीं जानते कि सिनेमा का कैसे सृजन किया जाय क्योंकि तुम आज तक यह भी नहीं जान पाए कि यह क्या है।” इस ग्रुप के युवाओं ने खुद फ़िल्में बनानी शुरू कर दी, इनका मानना था कि एक साहित्यकार की तरह एक फ़िल्म निर्देशक भी सृजनकर्ता होता है इसलिए निर्देशक को ‘ऑटर’ कहा।

फ्रेंच न्यू वेव से पूरे विश्व के युवा प्रभावित हुए वे अपने-अपने देश में अपनी देशीय समस्याओं के अनुसार न्यू वेव की शुरुआत की। जर्मनी ने अपनी राजनितिक आर्थिक व समाजिक समस्याओं के अनुसार न्यू वेव सिनेमा को अपनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी अमेरिका के अधिकृत था। अमेरिका जर्मनी से नाज़ीवाद के प्रभाव को ख़त्म करने के लिए मनोरंजन के माध्यम से शिक्षा दे रहा था जिसके लिए सिनेमा का सहारा लिया, लेकिन दर्शकों को लगा नाज़ीकरण को ख़त्म करने के लिए फ़िल्म नरेशन गड़बड़ है, नैतिक रूप से उदाहरण गलत है क्योंकि अमेरिका की साम्यवाद विरोधी राजनीति थी। ऐसी स्थिति में श्रीनेति कहते हैं, “युवा फिल्मकारों के एक ग्रुप ने मेनिफेस्टो जारी किया, जिसमें कहा गया था ‘पुराना अपनी मौत मर चुका है, हमारा यकीन नए सिनेमा में है। इस दौर में यंग जर्मन फ़िल्म कमेटी का गठन किया गया। न्यु जर्मन सिनेमा कलात्मक रूप से बेहद महत्वाकांक्षी और सामाजिक रूप से आलोचना से भरा हुआ था। उसने यह प्रभाव इटैलियन नियोरियलिज्म, ब्रिटिश न्युवेव और फ्रेंच सिनेमा से ग्रहण किया। इस दौर में जर्मनी की महिला निर्देशक भी सामने आयीं और उन्होंने स्त्रीवादी नज़रिए को अपने फिल्मों में प्रमुखता से जगह दी।” इस तरह जर्मनी में भी सामानांतर नई धारा की फ़िल्म चल रही थीं।

जापान में भी जर्मनी की तरह फ़िल्मकारों की दो धारा थी जो एक तरफ समाज का वास्तविक चित्रण करती थी तो दूसरी तरफ अतिरंजनापूर्ण फिल्मांकन करती थी। युद्ध के समय में कुछ फ़िल्मकार समझौतावादी हो गए और मिलिट्री के पक्ष में प्रोपोगंडा वाली फ़िल्में बनाते थे लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो इस तरह के समझौते नहीं करते थे वे युद्ध के खिलाफ थे। शुरू में जापान में फ़िल्म निर्माण के दो केंद्र थे एक टोकिओ में जहाँ मुकोजिमा स्टूडियो था, दूसरा केंद्र क्योटो था। 1923 में टोकिओ के भूकंप के प्रकोप से शहर तहस-नहस हो गया जिसका असर यह हुआ कि फिल्मों की शूटिंग क्योटो में होने लगी। “निकात्सू स्टूडियो क्योटो में जो फ़िल्में बना रही थी वह टोकिओ की शिकोकू और अन्य कंपनियों से अलग बना रही थी। टोकियो की फ़िल्में लोगों के सामान्य जीवन से सम्बंधित रोजमर्रा की ज़िन्दगी को प्रदर्शित करने के लिए आधुनिक समाज की मानवीय संबंधों पर फोकस होता था, जबकि इसके विपरीत निकात्सू जो क्योटो में फ़िल्म निर्माण करती थी वो बिल्कुल दिखावटी दुनिया के रोजमर्रा की ज़िन्दगी को चित्रित करती थी, ठीक वैसे जैसे सहित्यों और मंचन में या विदेशी फिल्मों में किया जाता है।” 5 यह दौर क्लासिकल फ़िल्म का था युद्ध के समय में जैसा कि ऊपर उल्लिखित है कि एक ग्रुप युद्ध के विपरीत था 1940 के आस-पास नई कंपनियां उभरी जिनमें ‘PCL Films’ और ‘तोहो’ उभरकर आईं; निकात्सू और शिकोकू तो पहले से थीं ही।

“तोहो नई कम्पनी ने अन्य कंपनी के लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया जबकि बहुत से युवा लोग इम्प्लाई भी हो रहे थे जो वामपंथ के मूवमेंट में फेल हो जाने के कारण फ्रस्टेड थे। इस तरह के निर्देशकों में जैसे अकिरा कुरोसावा, सत्सुओ, यामामोतो और तादाशी इमाई उभार कर आए।”

1937 और 1940 में फ़िल्म इंडस्ट्री सरकार के कंट्रोल में आ गई। लेकिन जापान कई हार के बाद अमेरिका फ़ोर्स के सर्वोच्च कमांड में आ गई। जो थीम फ्यूडल समझ में आती थी उन्हें बैन कर दिया जाता था।1948 में यू। एस। ने तोहो में लम्बी चली आ रही औद्योगिक झगड़े का सीधे हस्तक्षेप किया और ट्रेड यूनियन से संबंध रखने वाली कम्युनिस्ट पार्टी की हार निश्चित कर दिया।1950 में उन्हें पेशे से बहार कर दिया और जो कम्युनिस्ट से सहानुभूति रखते थे उन्हें भी निकाल दिया गया। इस तरह 109 लोग फ़िल्म इंडस्ट्री से निकाल दिए गए, इसे ‘लाल शुद्धीकरण’ कहा गया। यह अधिकार 1952 तक था। 1950 जापानी सिनेमा के लिए स्वर्णयुग था अकिरा कुरोसावा की फ़िल्म ‘रासोमन’ अप्रतिम थी। इस दसक के अंत में बड़ी संख्या में टैलेंटेड युवा फिल्मी दुनिया में आए , वहां युवाओं की मांग बढ़ रही थी, साठ के दसक में इन युवाओं का ग्रुप उभरा, ये वही युवा थे जो युद्धकाल में बड़े हुए या कहें कि जापान के हार के समय में युवा हुए। ये युवा अतिरंजना की जगह वास्तविकता को चित्रित किया, लोकेशन पर शूटिंग की जाती थी फ़िल्में देखने में डाकुमेंट्री जैसी लगती हैं।

अब भारत में कला सिनेमा पर चर्चा करते हैं, भारत में पहले इटली से नव यथार्थवादी सिनेमा पदार्पण करता है भारत के प्रथम फ़िल्म फेस्टिवल के साथ। सत्यजीत राय, बिमल राय, राजकपूर, ऋत्विक घटक आदि सभी प्रभावित हुए थे। और उसी तरह की फ़िल्म ‘पथेर पंचाली’ का निर्माण करते हैं जो भारत को फ़िल्म के क्षेत्र में पहिचान दिलाती है। यह बंगाली फ़िल्म थी। बिमल राय ने भी अनेक सार्थक फिल्मों का निर्माण किया। इनकी फ़िल्में बंगाली में ‘उदयेर पाथे’ जिसे बाद में इसे हिंदी में ‘हमराही’ नाम से बनाया। अन्य फ़िल्में हिंदी में ‘दो बीघा ज़मीन’,‘सुजाता’ ‘बंदिनी’ जैसी अनेक फिल्मों का निर्माण किया। ऋत्विक घटक ने ‘मेघे तारा’ जैसी रिफ्यूजी लोगों कि समस्याओं का यथार्थ चित्रण किया। कला फिल्मों की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी, विदेशी साहित्य का अध्ययन, फिल्मों का अवलोकन तथा विश्लेषण ने न्यू वेव सिनेमा के निर्माण में सहयोग किया। इसके साथ भारत भूमि की समस्याएं जैसे राजनैतिक गतिविधियां, नक्सल मूवमेंट, गरीबी,जहालत की ज़िन्दगी,भ्रष्टाचार, स्त्रियों एवं दलितों की दुर्दशा,आदिवासियों का विस्थापन आदि ने कला फिल्मों की ओर उकसाया। तब 1968 में मृणाल सेन और अरुण कौल ने एक घोषणा पत्र जारी करते हैं। व्यावसायिक सिनेमा को खूब कोशा। भदेसपन, अश्लीलता परोसने, बुरे मनोरंजन से सिर्फ़ धन उगाहना जैसे अनेक अभियोग लगाए। मृणाल सेन ने ‘भुवन सोम’ बनाकर 1969 में कला फ़िल्म का आगाज कर दिया। इसी वर्ष मणि कौल ने मोहन राकेश की कहानी पर आधारित फ़िल्म ‘उसकी रोटी’ का निर्माण किया, इसी समय बसु चटर्जी ने राजेंद्र यादव की कहानी पर आधारित फ़िल्म ‘सारा आकाश’ का निर्माण किया। फिर तो भारत में कला फिल्मों की शुरुआत हो गई। बाद में श्याम बेनेगल,गोविन्द निहिलानी, कुमार साहनी, एम्।एस।सथ्यु,सईद अख्तर मिर्ज़ा आदि ने कला फिल्मों का निर्माण किया। अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में भी कला फिल्मों का निर्माण होने लगा जैसे मलयालम उड़िया असमिया मराठी आदि। असम प्रान्त के जहानु बरुआ, मलयालम के अदूर गोपाल कृष्णन,गोविंदन अरविन्दन, कन्नड़ के गिरीश कसरावल्ली, गिरीश कर्नाड आदि अनेक कला फिल्मों के निर्माता हुए। समय के साथ कला फिल्मों में बदलाव आता रहा हैं। कुछ ही वर्षों तक ही जीवित रह सका।

निष्कर्ष :-
लगभग सभी देशों में कला फिल्मों के विकास के कारण अलग-अलग होते हुए भी इन सभी देशों ने अपनी समस्याओं का यथार्थ चित्रण अपने कला फिल्मों के माध्यम से किया। कला सिनेमा यथार्थ चित्रण का एक खोज है। कला सिनेमा एक आन्दोलन था जो पूरे विश्व में फैला क्योंकि सभी देशों की अपनी अलग-अलग समस्याएं थीं जो कला फिल्मों के लिए ज़मीन तैयार की। यह प्रतिरोध था जो समस्याएं पैदा करने वाले कारकों के विरोध में था। इसने निर्देशकों को पहिचान दिलाई। जर्मनी, अमेरिका के देख रेख में था इससे वहां के युवा अमेरिका की नीतिओं का विरोध, सामाजिक दशाओं पर कार्य ये सब उसके विषय थे। जापान भी अमेरिका के देखरेख में था इस पर भी अमेरिका अपनी दृष्टि से देखता था जिससे कि जापान से फ़ायदा उठा सके। जापान के युवा परिवर्तन चाहते थे सोशियलिस्ट भी उभर रहे थे जो फ़िल्म निर्माण कर रहे थे,वे व्यवस्था में परिवर्तन चाहते थे जिसके लिए वे कला फिल्मों का उपयोग कर रहे थे।भारत भी ब्रिटेन का उपनिवेश रह चुका था जिससे इतना दोहन हो चुका था कि भारत का आर्थिक ढांचा ही चरमरा गया था, दूसरे सामाजिक ढांचा भी कला सिनेमा की ओर प्रेरित किया। इस तरह यह निष्कर्ष निकलता है कि विश्व में कला सिनेमा एक आन्दोलन के रूप में शुरू हुआ और अपनी सामाजिक, आर्थिक और राजनातिक कारणों से भारत भी कला सिनेमा के प्रभाव में आया।

कला सिनेमा इन्हीं देशों में ही नहीं बल्कि बहुतायत देशों में फ़ैल गया था। इसी समय बल्कि कला सिनेमा के बाद थर्ड सिनेमा का उभार हुआ जो लैटिन अमेरिका के अनेक देशों में पसरा है, यह पूंजीवाद के खिलाफ़ आवाज़ उठाता है। हालाँकि अपने प्रकृति में थर्ड सिनेमा बहुत पहले से था लेकिन एक आन्दोलन के रूप में बाद में आया अर्जेंटीना, ब्राज़ील आदि देशों में विद्यमान है वैसे यह अफ्रीका, एशिया में भी फैला है।

सन्दर्भ सूंची :-
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पत्रिकाएं :-
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12. शंकर, विजय.(2008 मई – जून ), “सिनेमा की अन्तः कथाएँ”, (कला सम्पदा एवं वैचारिकी), वर्ष : 5, अंक 3 नवचेतन प्रिन्टर्स नई दिल्ली.


शोधार्थी, पीएच. डी. , प्रदर्शनकारी कला विभाग (ड्रामा एवं फ़िल्म स्टडीज),
कमरा नं -18 गोरख पाण्डेय छात्रावास,
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र
संपर्क: +91 830 835 3537
ई मेल: bhagwatdfs@gmail.com

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