देश में अब बात नहीं, बस ढिशुम ...

- पंकज रामेन्दु 


'मुन्ना भाई एमबीबीएस' फिल्म के शुरूआती सीन में से एक जहां स्टेशन पर सुनील दत्त का पर्स चोरी हो जाता है. चोर का छोटा सा रोल निभाया है नवाज़ुद्दीन सिद्दकी ने जिसे चोरी करते हुए सुनील दत्त पकड़ लेते हैं और उसके बाद पब्लिक आगे की कार्रवाई अपने हाथ में ले लेती है. चोर की बेतहाशा पिटाई की जाती है. सुनील दत्त लोगों को रोकने की कोशिश करते हुए कहते हैं - क्या कर रहे हैं आप, जेब इसने हमारी काटी है, पर्स इसने हमारा चुराया है औऱ आप ख़ामख्वाह जज़्बाती हो रहे हैं. तभी भीड़  में से एक आदमी बोलता है - आप इन लोगों को जानते नहीं है, आप इसे हमारे हवाले कर दो। इस पर सुनील दत्त इस चोर से बोलते हैं कि – क्यों कर दूँ मैं तुझे इनके हवाले, जानता है ये कौन है ये हमारे देश की जनता है जनता, इनके चेहरे देखे हैं कितने गुस्से में हैं, कोई बीवी से लड़ कर आया, किसी का बेटा उसकी बात नहीं सुनता, किसी को अपने पड़ोसी की तरक्की से जलन है, कोई मकान मालिक के ताने सुन कर आया है, सरकार के भ्रष्टाचार से लेकर क्रिकेट टीम की हार तक हर बात पर नाराज़ है लेकिन सब चुप है किसी के मुंह से आवाज़ नहीं निकलती है और ये सारा गुस्सा तुझ पर निकालेंगे।
मुन्ना भाई एमबीबीएस का ये सीन काफी हद तक मौजूदा हालात को बयां करता नज़र आता है। आए दिनो भीड़ के द्वारा किसी के मारे जाने की खबर सुनना अब एक आम बात हो गई है जिसे की ‘न्यू नॉर्मल’ भी कहा जाने लगा है. न्यू नॉर्मल इसलिए कि अब इस तरह की घटनाएं इस कदर दिखाई-सुनाई दे रही हैं कि धीरे धीरे लोग इसे रोज़ की बात समझने लगे हैं, यह वारदातें इतनी तादाद में हो रही हैं कि लोगों के मन में इसके प्रति संवेदनशीलता कम होती जा रही है.

अभी हाल ही में खबर छपी थी कि एक मोबाईल चोर को पब्लिक ने पकड़कर इतना पीटा की अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। बीते दो सालों में ये एक नई सामान्य बात है जहां जनता बड़ी ही आसानी से लोगों को पीट कर मारने में कोई संकोच नहीं कर रही है। पब्लिक लिंचिग के नाम से चर्चित हो रहे इस शब्द की शुरूआत तो नहीं लेकिन चर्चा 28 सितंबर 2015 से शुरू हुई जब दादरी की जनता ने अख़लाक को गौमांस होने की शंका में पीट पीट कर मार डाला और उसके बेटे को इस कदर घायल किया कि वो अब तक ठीक होने की जद्दोज़हद कर रहा है। उस दौरान सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबका इस घटना को सही साबित करते हुए नज़र आया। अहम बात ये थी कि किसी को भी एक आम इंसान की मौत नज़र नहीं आ रही थी। उसके बाद गुजरात में दलितों को पीटने का वीडियो वायरल हुआ जिसने एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया। अगर सिलसिलेवार नज़र डाले तों -

  • अक्टूबर 9, 2015 को उधमपुर में लोगों को खबर मिली की एक ट्रक में मारी हुई गायों को ले जाया  जा रहा है, जनता ने ट्रक पर हमला किया और इसमें ट्रक ड्राइवर ज़ाहिद अहमद की मौत हो गई।
  • मार्च 2016 को झारखंड के लतेहर में दो पशु व्यापारियों को जनता ने उस वक्त शक की बिनाह पर फांसी पर टांग दिया जब वो जानवरों को लेकर पशु मेले में जा रहे थे।
  • अप्रैल 5, 2016 को मुस्तैन अब्बास को उस वक्त गोली मार दी गई जब वो हरियाणा से बैलों को बेच कर आ रहा था। 
  • सितंबर 8. 2016 को जलपाइगुड़ी जिले में मवेशी चुराने के शक पर एक लड़के को भीड़ ने बुरी तरह पीटा।
  • 1 अप्रैल, 2017 को राजस्थान में अलवर ज़िले के बहरोड़ हाइवे पर 15 लोगों पर भीड़ ने हमला कर दिया जब वो लोग  गायों को ले जा रहे थे। इस हमले में पहलू ख़ान की मौत हो गई।
  • 1मई, 2017 को आसाम के नागांव जिले में जनता ने दो लोगों पर मवेशी चुराने के शक में पिटाई कर दी, ये पहली बार था जब गाय को लेकर इस राज्य में हमले इतने तेज हुए थे।
  • 21 मई ,2017 को बाड़मेर के लोहरवा जिले में भीड़ की पिटाई से एक मौत औऱ हुई जब दो समूहों में ज़मीन के विवाद को लेकर लड़ाई हुई थी।
  • 31 मई, 2017 को जमशेदपुर के सैराइकेला-खार्सवान ज़िले में बच्चा चुराने के शक पर चार लोगों को पीट पीट कर मार डाला गया। उसी दिन तीन अन्य लोगों को भी बच्चा चुराने के आरोप में पूर्व सिंगभूम के नागाडीह में तीन लोगों को बेतहाशा पीटा गया। बाद में ये आरोप लगाया गया कि इन लोगों की पिटाई बीफ चुराने के शंका पर की गई थी।
  • जून 18, 2017 को राजस्थान के प्रतापगढ़ में खुले में शौच कर रही महिलाओं की फोटो लेते नगर पालिका कर्मचारियों को जब 50 वर्षीय ज़फर ख़ान ने रोकने की कोशिश की तो नगर पालिका दल में शामिल कर्मियों ने उसकी लात घूंसों से पिटाई कर दी। गंभीर रूप से घायल ज़फर को अस्पताल ले जाया गया जहां उसकी मौत हो गई।
  • 22 जून 2017 को हरियाणा  के बल्लभग़ढ़ में खांडवली गांव के रहने वाले जुनैद की उस वक्त चलती ट्रेन में हत्या कर दी गई जब वो अपने चार दोस्तों के साथ दिल्ली से ईद की खरीददारी करके लौट रहा था। 
  • जून 23, 2017 को जम्मूकश्मीर के नौहट्टा में गुस्साई भीड़ ने मस्जिद की तस्वीर उतारते पुलिस अधिकारी मोहम्मद अयूब पंडित की हत्या कर दी।
  • 26 जून 2017 को पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में ईद के ठीक दो दिन पहले भीड़ ने गाय चुराने के आरोप में दो लोगों को बुरी तरह पीटा।
  • इससे पहले दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में  31 साल के  ई-रिक्शा चालक रवीन्द्र कुमार की तब कुछ युवाओं ने पीट पीट कर हत्या कर दी जब उसने दो लोगों को खुले मे पेशाब करने से रोका था। 
इस गुस्साई भीड़ के अंदर उबलते लावे के बाहर निकलने का एक  पक्ष तो हमे ऊपर मुन्नाभाई एमबीबीएस के उदाहरण से मिल जाता है लेकिन इस भीड़ के इस तरह गुस्साने को लेकर एक पक्ष और भी हो सकता है जिसकी तरफ भी ध्यान देना ज़रूरी है। अभी हाल ही में दिल्ली के मयूर विहार इलाके की डीडीए कॉलोनी में सुबह सुबह सरकारी स्कूल जाती लड़कियों को बाईक पर सवार तीन युवकों ने छेड़ दिया, लड़कों की उम्र की कोई 14-15 के आसपास रही होगी। बस फिर क्या था गुस्साई भीड़ ने पहले तो उन लड़को को बुरी तरह पीटा फिर उसमें जो मुख्य अभियुक्त था उसे गार्ड के रूम में बद कर दिया गया और पुलिस को इत्तिला कर दिया। कुछ लोग अभी भी उसे और पीटे जाने के पक्षधर थे। कुछ महिलाएं इसे महिला शिक्षा में आने वाले रोड़े के रूप में देखते हुए उन्हें पीटने की पैरवी कर रही थी। इन्हीं के बीच में एक शख्स ऐसा भी था जिसने पहले इधर उधर देखा और हाथ में एक बड़ा सा पत्थर उठा कर उन लड़कों की गिरी हुई बाईक पर दे मारा। उसने जिस तरह से पत्थर मारा और वो पत्थर जिस तरह से आधा बाईक पर आधा ज़मीन से टकराया उसने ये साफ ज़ाहिर कर दिया था कि उसके मन में गुस्सा कम, लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने की भूख ज्यादा थी। वह जिस तरह से चीख रहा था, वह साफतौर पर चाहता था कि लोग उसे एक हीरो के रूप में देखें और जिस तरह से पत्थर सही तरह से बाइक पर नहीं पड़ा उससे ये भी पता चलता है कि उसके मन में एक डर भी था।
इस बात को समझने के लिए बासु चटर्जी की फिल्म ‘एक रुका हुआ फैसला’ का एक सीन याद आता है। अंग्रेज़ी फिल्म ’12 एंग्री मैन’ पर आधारित इस हिंदी फिल्म की कहानी एक ऐसे लड़के की है जिस पर अपने ही बाप की हत्या का इल्ज़ाम है और उसे फांसी की सज़ा सुना दी गई है. अब ज्यूरी को इस बात का फैसला करना है कि यह सज़ा बरकरार रखी जाए या रद्द की जाए। बहस आगे बढ़ती है और गवाही दे चुके तमाम गवाहों की बातों पर फिर से गौर किया जाता है। इस बीच में एक महिला गवाह की बात आती है जिसका कहना था कि उसने लड़के को चाकू घोंपते हुए देखा है। ज्यूरी का एक सदस्य बोलता है कि यह बयान देने वाली महिला गवाह को चश्मा लगा हुआ था लेकिन जब वह गवाही देने आई थी तो उसने यह बात छिपाई थी.

ज्यूरी के दूसरे सदस्य इस बात को मानने से इंकार कर देते हैं - उनका कहना था कि उस महिला को चश्मा लगा ही नहीं है तो छिपाने की बात कहां से आती है। तब चश्मा लगाने वाली बात की पैरवी करने वाला सदस्य इस महिला गवाह की एक छोटी सी बात को सबके सामने लेकर आता है. वह कहता है कि जिस तरह से महिला अपने नाक पर बार बार उंगली फिरा रही थी उससे लगता है कि वो चश्मा पहनती है। खास बात ये है कि उस दिन वो महिला जिस तरह से गवाही देने के लिए तैयार हो कर आई थी, उससे लगता है कि वह एक आम महिला है जिसे पहली बार खास बनने का मौका मिल रहा था और वो इसे गंवाना नहीं चाहती थी। अगर वो चश्मा पहन कर आती तो उसकी इस बात को पहली ही बार में नकार दिया जाता कि उसने आरोपी को चाकू घोंपते हुए देखा है। औऱ इस तरह केस में उसकी अहमियत खत्म हो जाती।

भीड़ में हमला करने वाले भी कुछ ऐसे ही शख्स होते हैं जो आम से खास होने की जल्दी में होते हैं. जिन्हें लगता है कि इस तरह से वो लोगों की नज़र में चढ़ जाएंगे। ये लोग निर्भया मामला हो या भ्रष्टाचार को लेकर आंदोलन रैली, दोनों ही वक्त सेल्फी स्टिक में लगे हुए मोबाईल से अपना वीडियो बनाने में व्यस्त नज़र आते हैं। ये शख्स हरिशंकर परसाई के उस किरदार की तरह हैं जो अपनी प्रेमिका के सामने अपनी ताक़त दिखाने के लिए जबरन सामने बैठे शख्स की पिटाई कर देता है। अब तो इस जबरिया करवाने या अपनी बात मनवाने या हर बात पर हाथ उठाने का असर फिल्मी गानों में तक नज़र आने लगा है। इन दिनों गाने के बोल भी इसी तरह बन रहे हैं, मेरे इंडिया को बुरा कहा तो ढिशुम,  जन गण में खड़ा ना हुआ तो ढिशुम। 

और ढिशुम ढिशुम करती हुई ये भीड़ सही और गलत में उलझी हुई है, वो कभी तंत्र को नकारते लोगों को पीटती है तो कभी तंत्र का समर्थन करने वालों को मारती है। भीड़ बने हुए इन अलबर्ट पिंटो को लगता है कि अब वो ही हैं जो हाथ में गंगाजल लेकर सब ‘पवित्तर’ कर सकते हैं। 

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