एकान्त श्रीवास्तव के उपन्यास ‘पानी भीतर फूल’ में सांस्कृतिक आयाम एवं सामाजिक समस्याएँ

- जसबीर सिंह 

        मानव के जीवन का सम्बन्ध एवं व्यवहार सर्वाधिक संस्कृति परिदृश्य की क्रियाओं से है। संस्कृति शब्द का निर्माण ‘सम’ उपसर्ग पूर्वक ‘कृ’ से ‘कितन’ प्रत्यय जोड़ तथा भूषण भाव में ‘सूट’ का आगमन जोड़ निर्माण का शाब्दिक भावार्थ – संचित करना, शोधन करना आदि है। संस्कृति परिभाषा असरल, अस्थिर प्रक्रिया, विकाशील भारतीय-पाश्चात्य भिन्न-भिन्न धारणाएं जुड़ी है। डॉ. बाबूराम के अनुसार, “मनुष्य के लौकिक-पारलौकिक सर्वाभ्युदय के अनुकूल आचारों-विचारों को ‘संस्कृति’ कहा जा सकता है।” सांस्कृतिक आयाम पूर्व सांस्कृतिक-अध्ययन की अवधारणा, परिभाषा और आवश्यकता रूप में भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने योगदान दिया। इन आयामों में सामाजिक, धार्मिक, नैतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक, स्थापित किये जाते है साथ ही ग्रामीण परिवेश, लोक संस्कृति, देशकाल और वातावरण, चरित्र-चित्रण, प्रकृति-भूगोल, परिवारों की स्थिति शामिल किये जाते है।

डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी विचारानुसार, “मनुष्य की विविध साधनाओं सर्वोत्तम परिणति को संस्कृत कहा जाता है।”  हजारी जी ने मनुष्य के सभी साधनात्मक सर्वोच्चता संस्कृति को कहा  है।l
डॉ. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ अनुसार, “संस्कृति जिन्दगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज छाया रहता है, जिससे हम जन्म लेते है।”
कृषणदत्त पालीवाल ने अनुसार, “भारतीय संस्कृति में आज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक जनवाद के बीच भ्रमात्मक द्वंद्व हो रहा है। सवर्ण और दलित के बीच की राजनीति अपना फायदा उठा रही है। प्राचीन भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा पीड़ादायक प्राचीन पहलू यह है कि इस संस्कृति के भीतर से पुरोहितवाद तगड़ा होता गया। इस पुरोहितवाद ने ऋग्वेद के बाद वर्ण-व्यवस्था को ढाल बनाकर समाज को द्विज संस्कृति और द्विजेतर-संस्कृति या शुद्र संस्कृति को विभाजित कर दिया।”
        डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, “वर्गीकृत समाज का साहित्य कभी भी वर्ग हितों, अंतरविरोधों और सामाजिक असंगतियों से परे नहीं हो सकता।”

एकान्त श्रीवास्तव के उपन्यास ‘पानी भीतर फूल’ में सांस्कृतिक आयामों के दर्शन होते है जिनमें ग्रामीण परिवेश युक्त लोकजीवन में खानपान, पहनावा, पात्रों के नाम, ग्रामीण संस्कृति, जानकारी मिलती है। साथ ही प्रकृति-चित्रण प्रवेश दृश्य अंकन, “जेठ के आखिरी दिन आषाढ़ सामने था। दोपहर आधी ढल गई थी। निताई जल्दी-जल्दी झिपारी बना रहे थे। आंगन में लगे मुलमोहर के लाल फूल हवा में झड़ रहे थे।” वे खेतों में मजदूरी करें, सात्विक भोजन लेते तथा कोई-कोई माँस-मछली आदि भी सेवन ग्रामीण लोगों द्वारा किया जाता।

उपन्यास में कुसुमपानी क्षेत्र के भूगौलिक दृष्टिकोण के अंतर्गत लिया गया है। यहाँ भारतीय समयानुसार मौसम परिवर्तन होने के कारण ग्रामीण समूह अपनी दैनिक चर्या निर्धारित करते है। यहाँ प्राकृतिक छटाओं में पर्वत, नदी, झरने देखने को मिलते है। उपन्यास में लोकजीवन के दृश्यों में गाँव के भोले-भाले, प्रातः जल्दी उठने वाले, वर्णाश्रम पद्धति अनुसरणीय, भारतीय त्योहारों में सामूहिक सहभागिता, जातीय-भेद रहित मानसिकता, सामूहिक भोज सहित सांस्कृतिक रंगोली, स्नान-विधि एवं पूण्य धारणा विश्वास, चित्रोत्पला नदी पर वार्षिकोत्सव और लोक गीत आदि आदि रूप में लोकजीवन के दृश्य अंकन होते हैं। एक गीत का अंश –
‘मोरी गौरी सुते, गौर सुते
सुते है चंदनिया हो।’

उपन्यास पानी भीतर फूल अपने सामाजिक आयामों के अंतर्गत सामाजिक सरोकार को पूर्णता: उद्देश्य से विस्तृत रूप में व्याप्त है। संस्कृति और समाज का सम्बन्ध सदैव चिरकाल से अबतक चलता आया है। उपन्यास में नव-नव सम्बन्धों का निर्माण होना के साथ आदर्श दाम्पत्य (निताई-श्यामली), आदर्श मित्रता (निताई-बेशाखु-श्यामली), पालतू पशुओं के प्रति स्नेह (झब्बू-मिट्ठू), दुःख में एक-दुजै को सहयोग, प्रेम रूप में (पति, पत्नी, भाई, बहन आदि) के रूप देखे जा सकते है। प्रेम को उपन्यासिक अंश प्रस्तुत है, “आदमी का प्रेम घर से बाहर निकलकर अड़ोस-पड़ोस में फैलता है तभी सामाजिक होता है। यह आत्मा से अनात्मा तक की यात्रा है।”

उपन्यास में प्रेम की व्यापकता और समस्त सौन्दर्य विषयवस्तु के समावेश रूप में एक तरफ दाम्पत्य प्रेम के रूप में विवाह को सामाजिक स्वीकृति, पवित्र बंधन, विषम-लिंग आकर्षण, यौन-समबन्धों का निर्माण होते एकान्त श्रीवास्तव जी ने दर्शाया है। दाम्पत्य प्रेमी हर समस्या समाधान निकाल लेते है। दूसरी तरफ वात्सल्य प्रेम बाल-शिशु-पशु-पक्षियों आदि प्रति देखने को मिलता है जिसका उपन्यासिक अंश, “अपने लहू का प्रेम क्या होता है, इसे इंसान पिता बनने के बाद ही समझ पाता है। पिता बनने के बाद ही अपने माता-पिता के दुखों को हम समझ पाते है जो उन्होंने जब तक हमारे लिए, अपने संतान के लिए उठाये थे। अल्हड़पन और नासमझी का दौर खत्म हो जाता है और उसकी जगह एक दायित्वबोध आ सकता है।”  व्यक्ति को समझ को विकसित रूप में दर्शाया गया है। वात्सल्य के विषय में डॉ. रामेश्वर लाल खंडेलवाल लिखते है कि, “वात्सल्य प्रेम प्राय: स्तन-दुग्ध जीवी, कलबल व तौतरे बैन बोलने वाले, लार टपकाने वाले, माटी खाने वाले, घुटनों के बल रेंगने वाले और पेट भरा रहने पर प्रसन्न तथा भूख लगने पर रो-रोकर मुख लाल करके घर को सिर पर उठा लेने वाले नितांत अबोध बालक के प्रति प्रकट होने वाले भाव को ही प्रेम कहते है।”  जिससे वात्सल्यमयी दृष्टिकोण सामने आया है। उपन्यास में साख्य-प्रेम के रूप में व्यक्ति के दो समलिंगी अथवा दो विषमलिंगी रूप तथा साख्य-प्रेम एक एवं अनेकों के मध्य नज़र आता है। साख्य-प्रेम ‘अहं त्याग, मित्रता निमंत्रण’ मुख्य आधार सिद्धांत पर होने से बैशाखु-निताई, जोगी-निताई, भगोली-केवड़ा तथा मोंगरा-श्यामली मित्रता उपन्यासिक अंश में विद्मान है। एकान्त श्रीवास्तव ने सांस्कृतिक उपन्यासिक आयामों के अंश रूप में बंधुत्व-प्रेम और प्रकृति-प्रेम में स्थान दिया है। बंधुत्व-प्रेम जहाँ माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-ताऊ, दादी-दादा, सभी को परिवार रूप में विश्व-की-सर्वोतम-लघु अंश को राष्ट्रप्रेम और विश्वप्रेम रूप मानकर सामूहिक त्यौहार को गैर-भेदभाव भुलाकर नवमी भोज का निर्माण कर सामुदायिकता को दर्शाते है तो, प्रकृति प्रेम के अंतर्गत मनुष्य-प्रकृति का सम्बन्ध, महत्व, संशाधनों के रूप में नदी, झरनें, बादल आदि को सांस्कृतिक आयामों में रखा है। बंधुत्व-प्रेम और प्रकृति-प्रेम अंश –
“पंगत से उठने वाले लोग परोसने वालों को पंगत में बिठा देते और खुद परोसने लगते। किसी को सब्जी-दाल कम भी जाती तो कोई मलाल नहीं। ऐसे में भाईचारा और प्रेम आपस में और प्रगाढ़ हो जाता। यों समाज सहकारिता, भाईचारा और प्रेम की धुरी पर ही चलता था। ऐसे गाँव भोज के अवसर पर ऐसा प्रतीत होता था जैसे कोई बहुत बड़ा कुनबा हो, कुटुंब हो जो बहुत दिनों बाद इक्कठा हुआ हो।”  ---- (बधुत्व-प्रेम अंश) तथा “सूर्य पश्चिम में डूबकर भी नहीं डूबता था। वह दिए के तेल में गोता लगाकर छुप जाता था। फिर बाती की फूनगी में ज्योति-फूल बनकर खिल उठता था।”  ---- (प्रकृति-प्रेम अंश)

एकान्त श्रीवास्तव कृत उपन्यास पानी भीतर फूल में सांस्कृतिक आयाम के अंतर्गत पारिवारिक-सम्बन्ध और पारिवारिक-परिवेश को अंकित किया है। समाज में पति-पत्नी के सम्बन्ध-परिवेश रूप में दोनों के मध्य घनिष्ठ एवं अन्तरंग सम्बन्ध, जन्मदाता उद्देश्य से सामाजिक दर्ज़ा प्राप्ति हेतु निर्माण किया जाता है। भारतीय समाज में महिलाओं की आज़ादी पूर्व और पश्चात बहुत अंतर स्थापित हुआ है। महिलाएं अपने अधिकारी के प्रति जागरूक हुयी है तथा भारतीय संविधान ने महिलाओं को सुरक्षा भी प्रदान की है। आदर्श दाम्पत्य रूप में निताई-श्यामली सभी मतभेदों के विपरीत जीवन जीते है तो कहीं-कहीं परिवार-विघटन तीसरे व्यक्ति की चाह में दिखाई देता है। परिवार में सास-बहु के रिश्ता कभी भी पूर्णत: मधुर नहीं हो पाता, कहीं-कहीं ही ऐसा देखने को बहुत कम मिलता है। जिस तरह पति-पत्नी का रिश्ता अहम और उसी तरह माता-पिता के सम्बन्ध एवं परिवेश को समझा जा सकता है। लेखक ने दर्शाया है कि समाज में मातृत्व नारी सम्पूर्णता का सिद्धांत है जिस उद्देश्य से विवाह किया जाता है। आधुनिक युग में स्वार्थी जीवन में संताने माँ-बाप से दूर होने में देरी नहीं लगाती और बुजुर्ग संतानों पर अधिक आश्रित होते जा रहे है। कई जगहों पर मज़बूरी के कारण अंतरजातीय विवाह भी होते दिखाई देते है। उपन्यासिक अंश में दुकलहिन का पति जब दूसरी औरत को घर ले आता है और साथ रखता है तो वह घर छोड़कर चली जाती है। पति-पत्नी के सम्बन्ध मधुर-कड़वे दोनों रूपों में देखें जा सकते है।

       
पानी भीतर फूल उपन्यास में समस्याएँ
एकान्त श्रीवास्तव ने अपने इस उपन्यास में समाज में व्याप्त विशेषताओं सहित समस्याओं पर भी गहन प्रकाश डाला है। उन्होंने समाज के समस्याओं को अपने उपन्यास में सामाजिक परिदृश्य से अधिक अंकित किया है। श्रीवास्तव जी ने इस उपन्यास में पारिवारिक, पुरुष-वर्चस्व, राजनीतिक-धार्मिक, चारित्रिक, नारी-विषयक, अंतरजातीय विवाह, अंधविश्वासम, मद्य-सेवन, मजदूर वर्ग, आर्थिक, कार्य-पूर्ण-उपलब्धता, उच्च-शिक्षा, खेती एवं फसल प्रबंध और स्वास्थ्य सेवा सम्बन्धी अत्यधिक समस्याओं को दर्शाने का प्रयास किया है।
        
एकान्त श्रीवास्तव कृत पानी भीतर उपन्यास में पारिवारिक समस्याओं के अंतर्गत परिवारों में जोड़ने और समझौतावादी परिवारों में विघटन-तनाव-आर्थिक संकट के कारण पारिवारिक विचारों में मतभेद स्थापित होने से पति-पत्नी के आपसी झगडे होते रहते है। जिनमें अधिकतर झगड़े मद्य-सेवन और नाजायज सम्बन्धों के कारण होते है। उपन्यासिक अंश रूप में -
“बैशाखु के घर में घुसते ही गंध से ही मोंगरा समझ गयी कि आज फिर पीकर आया है। उन दोनों के बीच महीनों में एकाध बार जो झड़प होती थी, उसका प्रमुख कारण बैशाखु का पीना ही था। .... मोंगरा चंडी कर रूप धारण कर आई और एक हाथ कमर पर रखकर; दूसरा हाथ हवा में नचाकर बोली-
‘कहिए ! क्या समाचार है?
...संभावित झगड़े की आशंका से बैशाखु चुप रहा
‘मैं क्या पूछ रही हूँ ?- मोंगरा गरजी
‘दोस्तों ने जिद्द की तो थोड़ा-सा पीना पड़ा।’
‘वाह! मोंगरा ने ताली बजाई – पीना पड़ा !
‘क्या हाथ पाँव बांधकर मुँह में बोतल डाल दी ?”

एकान्त श्रीवास्तव ने पारिवारिक विघटन समस्या रूप में गृहस्थ जीवन परिवेश स्वीकृति मार्ग विवाह को माना है। आजकल संयुक्त से एकल परिवार, अलगाव भाव एवं प्रेम में कमी के संग-संग बेरोजगारी इसका मुख्य कारण हैl समाज में पुरुषों का वर्चस्व होने के कारण महिलाओं को कम आँका जाता है और उसके अधिकारों की अवहेलना होती है। पुरुष पहली पत्नी के होते, दूसरी पत्नी की तलाश कर घर ले आना और भोग प्राप्ति करता है जिससे पहली नारी घर से पलायनवादी सिद्धांत के अनुरूप अपनी बेटी को लेकर चली जाती है। कुछ पुरुष घर छोड़कर/भागकर साधु बन जाते है और कई परिवारों में संतान न होने से पारिवारिक विघटन परम्परा निरंतर गतिमान रहती है। संतान समस्या सन्दर्भ उपन्यासिक अंश – “निताई दातुन घिसते हुए चौपाल पर आकर बैठ गए वहां कोंदा, रंगी, फोटकू, इंदरमन, बोटारी और लक्ष्मण पहले से बैठे हुए थे। फोटकू सबसे बुजुर्ग था। वह लक्ष्मण को समझा रहा था। लक्ष्मण की शादी के अनेक वर्ष बीत चुके के पर अभी तक वह नि:संतान था। फोटकू डोकरा उससे कह रहा था – ‘हाड़ा ल चुचरथस रे’ . . . (तू हड्डी को चूस रहा है रे)”  ----                  ‘पुरुष-वर्चस्व’

उपन्यास में चारित्रिक पतन समस्या के रूप में एकान्त श्रीवास्तव जी ने सामाजिक संस्कृति के अंतर्गत रिश्वत लेकर लोगों का नैतिक पतन होते दिखाया है और साथ ही नाजायज सम्बन्धों के कारण घरों के क्लेश निर्माण होते देखा है। लोगों में ‘धन की भूख’ को विशालकाय स्वरुप में देखा है तथा वासनात्मक वृतियों को मनुष्य पर हावी रूप में दर्शाया है। पति के चारित्रिक पतन से दुखी युकलहिन संदर्भ उपन्यासिक अंश- “युकलहिन का पति शराबी, जुआरी, और आवारा किस्म का व्यक्ति था जो किसी की कोई परवाह नहीं करता था। गाँव ने दंड देकर उसे समाज से अलग कर दिया था। दुकलहिन कबतक बर्दाश्त करती। एक स्त्री साड़ी चीजों में सांझा बर्दाश्त कर सकती है, लेकिन सुहाग का सांझा कोई स्त्री बर्दास्त नहीं कर सकती। एक दिन उसने अपने बेटी संतोषी का हाथ पकड़ा और पैदल ही मायके चली आई।”    ---- (चारित्रिक पतन समस्या)

नारी सम्बन्धी समस्या को इस उपन्यास में उठाया गया है। वैसे तो नारी के सभी स्वरूपों एवं स्थितियों का वर्णन किया गया है जिसमें आज़ादी से पूर्व महिला अधिक दुखी और आज़ादी पश्चात संवैधानिक अधिकार मिलने से उसका कुछ जीवन सुखद हुआ है। नारी को लेकर प्रतिकार-अपमान द्वंद्व –‘दो पत्नी, एक पति’ सिद्धांत रूप समाज में विद्यमान है। नारी समस्या उपन्यासिक अंश, “दुकलहिन अपने ही घर में नौकरानी की तरह अपेक्षित रहने लगी और चूड़ी पहनकर आई वह स्त्री राजरानी हो गई थी।”  ---- (तीसरे व्यक्ति की समस्या)। रामबाई के पति की मृत्यु क्षण कुछ इस प्रकार उपन्यासिक अंश रूप में दिखाया गया है कि, “रामबाई ने सब कुछ भूलकर पति-बच्चों के साथ एक नया जीवन शुरू किया। कुछ कुछ वर्ष बहुत अच्छे बीते। थोड़ी बहुत आर्थिक-दिक्कतें चलती रही लेकिन कोई बड़ी मुसीबत नहीं आई। आई तो सीधे चुन्नू की मौत ही वज्रपात बनकर। इस आघात को भी रामबाई ने सहा और नियति मानकर स्वीकार किया।”  इस तरह रामबाई की त्रासदी बनी। इसके अलावा महिला पुरुष प्रताड़ना की शिकार भी होती है।

एकान्त श्रीवास्तव ने अंतरजातीय विवाह की समस्या भी दर्शाया है। विवाह एक सामाजिक दर्जा है और अंतरजातीय विवाह का आज के युग में महत्व के बढ़ने से ग्रामीण लोग अपनी परम्परागत सोच को लेकर इसे सही नहीं मानते और अंतरजातीय करने वालों को सजा और जान से मारने के फरमान भी देते है। भगोली तेली और केवड़ा मरार जाति के विवाह में परेशानियाँ आती है। केवड़ा की माँ अपने से जब भगोली रिश्ते पर चर्चा करती है तो उपन्यासिक अंश इस प्रकार प्रस्तुत होता है, “कुजात में विहाव (शादी) हरगिज नहीं। जात में लड़कों की कौन कमी है और फिर कहाँ हमारा खाता-पिता घर और कहाँ वो कंगाल। क्या मेरा माथा ख़राब हुआ है जो उस घर में बेटी दूंगा। इस युग्दी की इतनी हिम्मत कि सीधे मुंह उठाकर चली आई। जरा अपनी हैसियत तो देखती।”
समाज में अज्ञानता के कारण अन्धविश्वासी लोगों को धार्मिक और तांत्रिक लोग झूठी कहानी और अनिष्ट भय दिखाकर देवी प्रकोप तथा भूतप्रेत जैसे कल्पना करते है। नारियल को देखकर श्यामली का चेहरा पीला पड़ना और होंठ कांपने इसका एक उदाहरण है। गाँव में साधु महात्मा का आना-जाना लगा रहता है। यदि कोई जंगल में मार्ग भूल जाता है तो उसका कारण ‘भूलन कांदा पर पैर आना’ माना जाता है। उपन्यास में दर्शाया गया है कि लोगों को शराब और नशे के कारण नैतिक संस्कृति पतन, भाईचारे का पतन, घरों में झगड़ा, बड़े-छोटे दोनों नशेबाज होना जैसी वस्तु को दर्शाया गया है।

उपन्यास में राजनैतिक समस्याओं और मजदूर वर्ग समस्याओं का भी बोलबाला है। देश आज़ादी से पूर्व और पश्चात राजनैतिक मापदंड बदल चुके है। पञ्च जहाँ परमेश्वर होते है, वे भी भ्रष्टाचार की चपेट में आ चुके है। न्याय अन्यायी की तरह ही किया जाता है तो क्या कैसे न्याय ? महिलाओं में इसमें हिस्सा लेना बुरा माना जाता है और उससे केवल आदेश मानने के लिए विवश किया जाता है।  वही मजदूर वर्ग को किसी भी प्राकृतिक आपदा पर सरकार की अनदेखी झेलनी पड़ती है। कुसुमपानी में अधिकतर लोग मजदूर है और गाँव में पक्की सड़के और रोजगार की समस्या बनी रहती है। जिससे मजदूर वर्ग दुखी है।

पानी भीतर फूल उपन्यास की समस्याओं में शैक्षिक, आर्थिक, खेतीबाड़ी, स्वास्थ्य और पूर्ण कार्य उपलब्ध न होने से गरीबी की समस्या, अज्ञानता की समस्या, दवा हेतु भी धन नहीं, उच्च शिक्षा अभाव, ग्रामीण स्कूल पर निर्भर, बेरोजगारी की समस्या, खेती-बाड़ी एवं मजदूरी पर निर्भर, वर्ष के केवल दो फसलें, गाँव की शिक्षक अभाव के कारण सम्पूर्ण उपन्यास समस्याओं से भरा हुआ है। गाँव में जागरूकता कमी है। उच्च शिक्षा व्यवस्था न होना। कर्मचारी-शिक्षकों की कमी, पाठ्य-पुस्तक अभाव, मिड-डे-मिल पर शिक्षकों का कब्जा, सरकार द्वारा पूर्ण अनुदान न आना। साथ ही खेती बाड़ी में उचित फसल मूल्य न मिलना, प्राकृतिक आपदा, कृषि आधुनिकता कमी, बैल द्वारा जोताई, फसल रख-रखाव अज्ञानता, कृषि की प्राचीन पद्धति, सिंचाई हेतु उपयुक्तता का अभाव है। समस्याएँ यही खत्म नहीं हो जाती गाँव में स्वास्थ्य सेवाओं में लोग अभाव में जाते है। लोग अधिकतर घरेलु ईलाज करवाते है। अस्पातल गाँवों से दूर शहर में है तथा प्रसूति के दौरान कई बच्चे गर्भ में भी मर जाते है। गाँव को कई बिमारियों ने भी घेर रखा है।

अत: कुलमिलाकर कहा जा सकता है कि पानी भीतर फूल उपन्याकार एकान्त श्रीवास्तव में इस कृति में सांस्कृतिक आयामों के अंतर्गत लोकजीवन, सामाजिकता, प्रेम, पारिवारिक सम्बन्ध, राष्टीयता सहित अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक रूप प्रस्तुत किये है तथा उपन्यास में पारिवारिक समस्याओं से होते हुए पुरुष-वर्चस्व, चारित्रिक पतन, नारी समस्याओं, विवाह और अन्धविश्वासी जगत, नशे की आदत, राजनैतिक समस्या, मजदूर वर्ग समस्या, सहित आर्थिक-सम्पूर्ण कार्य सहित उचित शिक्षा समस्या, खेती-बाड़ी एवं फसल प्रबन्धन समस्या के अलावा स्वास्थ्य सम्बन्धी महत्वपूर्ण समस्याओं को उठाया है।

सन्दर्भ सूची:
मूल एवं आधार ग्रन्थ:
1.      एकान्त श्रीवास्तव, पानी भीतर फूल, वाणी प्रकाशन, नई-दिल्ली, प्रथम संस्करण, वर्ष 2013,

सहायक ग्रन्थ:
1.      हजारी प्रसाद द्विवेदी, भारतवर्ष की सांस्कृतिक समस्या ग्रंथावली-1, राजकमल प्रकाशन, प्र. सं 1998
2.      डॉ. रामधारी सिंह ‘दिनकर’, संस्कृति के चार अध्याय, उदयांचल, प्रथम संस्करण, राजेंद्र नगर, पटना, प्र. सं 1958
3.      कृष्णदत्त पालीवाल, उत्तर-आधुनिकतावाद और दलित साहित्य, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रकाशन संस्करण. 2008,
4.      डॉ, रामविलास शर्मा, भाषा, संस्कृति और साहित्य, किताबघर इलाहबाद, प्र. सं 1959
5.      डॉ. रामेश्वर लाल खंडेलवाल, आधुनिक हिंदी कविता में प्रेम और सौन्दर्य, राजकमल प्रकासन, प्र. सं 1981
6.      डॉ. बाबूराम, हिंदी निबन्ध साहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन, वाणी प्रकाशन, प्र. सं

शब्दकोश:
1.      डॉ. श्याम बहादुर वर्मा : बृहद हिंदी शब्दकोश, खंड-2, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली – 2010
2.      डॉ. हरदेव बाहरी : राजपाल हिंदी शब्दकोश, राजपाल एंड सन्ज, कश्मीरी गेट, प्र. सं 2009, दिल्ली 110002

142 तेज कॉलोनी, तहसील कैम्प 
पानीपत, हरियाणा 132103 (भारत)
मोब.: 9034845178

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।