नुक्कड़ नाटक का सामाजिक सरोकार

- नितप्रिया प्रलय


“नुक्कड़ नाटक” नाटक के क्षेत्र में एक नया प्रयोग है। साहित्य और नाटक के विद्वानों ने शुरुआती दौर में इसे नाट्य विधा मानने से इंकार कर दिया था परंतु यह नाट्य रूप 8वें दशक के दौरान काफी लोकप्रिय हुआ। कई ख्याति प्राप्त नाटककार और रंगकर्मी इस नाट्य रूप (नुक्कड़ नाटक) से जुड़े और साथ ही इस नाट्य रूप ने रंगमंचीय नाटकों को भी प्रभावित किया।

नुक्कड़ नाटक को अँग्रेजी में ‘स्ट्रीट प्ले’ (Street Play) के नाम से संबोधित किया जाता है। कुछ लोगों ने इसे ‘चौराहा नाटक’ भी कहा है किन्तु यह नाम प्राचलित नहीं हो सका। नुक्कड़ नाटक अपने नाम के अनुरूप ही किसी सड़क के चौराहे पर, किसी फैक्ट्री के गेट पर, किसी पार्क, गली या मुहल्ले के नुक्कड़ पर प्रदर्शित होने वाला नाट्य रूप है यह (नुक्कड़) वह जगह होता है जहां पर आमआदमी मजदूर, किसान तथा शोषित तबके के लोग एक-दूसरे से मिलते है और आपस में अपना सुख-दुख बांटते हैं। नुक्कड़ नाटक आमजनता के लिए उसी की भाषा में, उसी की समस्याओं को आधार बनाकर खेला जाता है। इन नाटकों का उद्देश्य देश की जनता को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक अर्थात उन सभी मुद्दों से अवगत कराना होता है। जिसके आधार पर व्यवस्था (system) उनके शोषण उत्पीड़न में संलग्न है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि नुक्कड़ नाटक चेतना के धरातल पर आमजनता को एक जुट करके शोषण और उत्पीड़न के विरोध एक बेहतर मानवीय समाज के निर्माण की भूमिका में दिशा देने का प्रयास करता है। नुक्कड़ नाटकों की एक महत्वपूर्ण भूमिका इस अर्थ में भी है कि वह यथास्थित को तोड़ने और उस अंतर विरोध को सामने लाने का प्रयत्न करता है जिसे पूंजीवाद ढकना चाहता है। उसके समाज के प्रति उत्तरदायित्व का स्पष्ट प्रमाण है।

भारत में नुक्कड़ नाटक सबसे पहले इप्टा (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन या भारतीय जननाट्य संघ) के द्वारा प्रदर्शित किया गया। जिसका उद्देश्य गरीब एवं शोषित तबकों की समस्याओं से आमजनता को अवगत कराना था। नुक्कड़ नाटक का जन्म तथा विकास जनवादी नाट्य आंदोलन के साथ-साथ हुआ है। स्वातंत्र्योतर युग तथा आपात काल के समय जो जनवादी नाट्य आंदोलन हुआ उसके तहत वामपंथी विचारधारा प्रभावित नाट्य निर्देशक ने अपनी लोक-नाट्य परंपरा को नई ऊर्जा देते हुए उसका प्रयोग अपने समाज तथा परिवेश के अनुरूप किया, जिसका विकास नुक्कड़ नाटक के रूप में  हुआ।

नुक्कड़ नाटक के विकास के बारे में प्रसिद्ध लेखिका “प्रज्ञा” अपनी पुस्तक नुक्कड़ नाटक रचना और प्रस्तुति में लिखती हैं कि “ नुक्कड़ नाटक जिन परिस्थितियों में आकार ग्रहण कर रहे थे वे भारतीय लोकतंत्र की यात्रा में जनवादी हस्तक्षेप की परिस्थितियाँ थी। समाज का दलित-शोषित वर्ग अपने जनवादी अधिकारों की रक्षा के लिए और सत्ता की जन-विरोध नीतियों के विरोध में लामबंद हो रहा था। दलितों, महिलाओं, मज़दूरों और किसानों के  आंदोलन समाज में परिवर्तन की आकांक्षाओं के लिए संघर्षरत थे। ऐसे में नुक्कड़ नाटक इस संघर्ष का सांस्कृतिक हथियार बनकर उभरा और संभवत: सभी प्रगतिशील साहित्यिक रूपबंध नुक्कड़ नाटक, जनता के बीच सर्वाधिक पैठ बनाने वाला रूपबंध बन गया।”

उसी पुस्तक में आगे लेखिका लिखती हैं कि आठवें दशक के दौरान उठ खड़े हुए व्यापक जनवादी आंदोलन के तहत अनेक नुक्कड़ नाटककार, उनके द्वारा लिखे गए अनेक नाटक और उन नाटकों को आम जनता तक पहुँचाने वाली कई नाट्य मंडलियाँ सक्रिय हुईं। उस समय निकल रही कई महत्वपूर्ण पत्रिकाओं ने भी इन नाटकों को प्रकाशित किया। इन नाटकों ने आम जनता को उसके अधिकारों के प्रति सचेत करने, शोषणधर्मी व्यवस्था का नकाब उघाड़ने और यथास्थिति को बदलने में तथा कला को सामाजिक परिवर्तन के महत्तर उद्देश्य से जोड़ने की प्रभावशाली भूमिका निभाई।

     इस आंदोलन ने विभिन्न लोककला रूपों को पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित किया। ऐसा भी कहा जा सकता है कि इप्टा ने सारे रंग-संस्कार को लोकधर्मिता से जोड़ा। भारतीय जननाट्य संघ के नाटककारों ने अपने-अपने प्रदेशों कि लोकनाट्य शैली में नाटक लिखे।  जात्रा, तमाशा, माच, नाचा, भवाई, नौटंकी, पवाड़ा, तेरुकुत्तू , बुरीकथा एवं ख्याल आदि लोकनाट्य शैलियों में तत्कालीन सामाजिक संघर्षों को अभिव्यक्ति मिली। किसान आंदोलन एवं मजदूरों कि हड़ताल पर तत्काल नाटक रचे और खेले जाते थे। इप्टा के ज़्यादातर नाट्य-प्रदर्शन शहरों या गांवों में हजारों की भीड़ के सामने किसी खुले मैदान में खेले जाते थे। इप्टा के इन प्रदर्शनों ने साधारण जनसमुदाय को राजनीतिक रूप से शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नुक्कड़ नाटक के दो प्रकार है-
जनवादी नुक्कड़ नाटक
गैर-जनवादी नुक्कड़ नाटक

जनवादी नुक्कड़ नाटक में सामाजिक यथार्थ के प्रत्येक आयाम को उभारा जाता है या समाज में व्याप्त समस्याओं का पड़ताल करता है , वहीं गैर-जनवादी नुक्कड़ नाटक का मुख्य उद्देश्य केवल सरकारी तथा गैर-सरकारी कम्पनियों द्वारा चलाये गए कार्यक्रमों का प्रचार करना मात्र होता है। उपरोक्त दोनों प्रकार के नाटकों में अंतर बताते हुए नीलिमा शर्मा कहती हैं , गैर-जनवादी नुक्कड़ नाटक में पैसा बहुत होता है और प्रतिबद्धता बहुत कम।...... “स्वास्थ्य  और स्वच्छता संबंधी नाटकों में यह तो बताया जाता है कि सफाई कैसे रखें, रोग को किन दवाइयों, उपचारों से खत्म करें। जैसे महिलाओं की स्थिति को ले तो अधिकांश में हीमोग्लोबिन बहुत कम होता है और वे बहुत सी बीमारियों से ग्रस्त है पर ये नाटक सिर्फ बीमारी का इलाज बताते है। जनवादी नाटक इन नाटकों से इस दृष्टि में भिन्न है कि वो बीमारी को व्यापक सामाजिक संदर्भों में देखते हैं। मसलन, औरते क्यों अस्वस्थ हैं? इनकी समस्या का समाधान कुछ दिनों का इलाज नहीं बल्कि खाने की समस्या, रोज़गार, बेहतर जीवन परिस्थिति, शोषण का अंत, सफाई, पैसा सभी कुछ है। इस मायने में जनवादी नुक्कड़ नाटक इनसे भिन्न है।”

जनवादी नुक्कड़ नाटक सामाजिक समस्याओं का समावेश अपने प्रदर्शन में करता है। जो जनतंत्र में पनप रही ताकतवर जन विरोधी शक्तियों का विरोध करता है। आगे कुछ नुक्कड़ नाटकों के उदाहरण द्वारा अपनी बात को विस्तार देना चाहूंगी।

नुक्कड़ नाटक एक ऐसी विधा है, जिसका कथ्य आमजनता से लेकर उन्हीं के बीच दिखलाया जाता है। आमजनता की ऐसी कोई भी समस्या नहीं होगी जिसका समावेश नुक्कड़ नाटकों में नहीं किया गया है। नुक्कड़ नाटक के निर्देशक ने सामान्य जनजीवन से जुड़ी हुई समस्याओं का समावेश इस तरीके से किया कि दर्शक इस बात के लिए मजबूर हो उठे और अपने हालात के बारे में न केवल सोचे बल्कि कुछ करने कि शुरुआत भी करे।

स्वतान्त्र्योतर भारत में बूर्जूआ तथा सर्वहारा वर्ग के बीच का अंतर लगातार बढ़ने लगा था। उच्चवर्ग विलासिता पूर्ण जीवन जीने की लगातार कोशिश कर रहा था। जिससे कि सर्वहारा की स्थिति दिन-प्रति-दिन निम्न स्तर तक पहुँचने लगा। इसी सर्वहारा वर्ग के मजदूरों के शोषण की त्रासद स्थिति का चित्रण नुक्कड़ नाटकों में हुआ है।

जन-नाट्यमंच, दिल्ली द्वारा समूहिक रूप से तैयार किए नुक्कड़ नाटक ‘गाँव से शहर तक’ के माध्यम से मजदूरों की वास्तविक स्थिति को उभारा गया है। मजदूरों की स्थिति इतनी दयनीय है कि उन्हें अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी चलाना भी मुश्किल हो गया है । इस नाटक में बताया गया है कि घर-घर की यही कहानी है। बड़े पद/ ओहदों पर विराजमान मालिक मजदूरों के प्रति कैसा रवैया अपनाता है इसका पता दर्शक को सूत्रधार के माध्यम से पता चलता है। सूत्रधार कहता है –
“बोनस के मामले में मालिक से लेकर लेबर कमिसनर तक सबका एक ही रवैया है- बातचीत चल रही है, थोड़ा सब्र कीजिए।...................हमने जाकर मिनिस्टर से शिकायत की तो उल्टा हमें ही धमकाने लगा, तुमने कंपनी के गुप्त कागजात क्यूँ पढे?”
आगे अपने को सर्वशक्तिशाली मान बैठा मालिक एक ही प्रश्न पूछता है कि-
“यूनियन की आवश्यकता ही क्या है? यह श्रमिकों का चित्त चंचल करती है, उन्नति के पाठ में बाधा डालती है।”

औद्योगीकरण के कारण भारत में जो नई आर्थिक नीति तथा कार्य-विभाजन प्रयोग में आए उसके तहत मजदूरों को कई यातनाएं झेलनी पड़ी। जन नाट्य मंच का पहला नुक्कड़ नाटक ‘मशीन’ में मजदूर वर्ग की समस्याओं का चित्रण हुआ है। इस नाटक का नाम प्रतीकात्मक है। दिन-रात कार्य करने वाले मजदूर वर्ग का प्रतीक है –मशीन। नाटक यह बतलाता है कि यह मशीन कभी भी नहीं रुकती अनवरत चलती रहती है। सूत्रधार कहता है-
“जी हाँ यह है मशीन। लोहे की मशीन, कारखाने की मशीन, मशीन का है एक मालिक और बहुत से पुर्जे यानि कि मजदूर। दिन भर चलती है और रात को भी।”

इस नाटक में मशीन को कामधेनु की बहन कहा गया है। यह ऐसी कामधेनु है जो अपने मालिक की सारी आशाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति करने के लिए बाध्य है और जिनकी अपनी कोई आशा-आकांक्षा नहीं है। लेकिन मालिक की सारी आदेशों का पालन करने पर भी इसको मार-पीट खानी पड़ती है। मजदूरों पर होने वाले इस प्रकार की शारीरिक पीड़ाओं का अंकन भी इस नाटक में है। मजदूर कहता है-
“लात खाते-खाते भेजा ही खराब हो गया। बताना ही भूल गया”

अपने ऊपर होने वाले जुल्म को कोई भी व्यक्ति आसानी से समझ लेता है। किन्तु अशिक्षित होने की वजह से शोषक के खिलाफ आवाज उठाने से शोषित डरता रहता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए नुक्कड़ नाट्य निर्देशकों ने शिक्षा की आवश्यकता और प्रधानता पर बल देने वाले नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन किया। जन नाट्य मंच, दिल्ली द्वारा प्रदर्शित साक्षरता अभियान पर आधारित नाटक ‘पढ़ना लिखना सीखो’ एक महत्वपूर्ण नाटक है। इस नाटक में मास्टर नामक एक प्रतीकात्मक पात्र की रचना करके उसके माध्यम से शिक्षा की जरूरत पर जोर डाला गया है। इस नाटक में शिक्षा की भूमिका को लेकर गाँव वाले नाटक तैयार करते हैं , मास्टर नामक पात्र गाँव से बच्चों को इकट्ठा करता है और पढ़ाने का इंतजाम करता है। लोगों को शिक्षित करने की दिशा में मास्टर को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। गाँव वालों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि उनका चूल्हा चौका कैसे चले ऐसे में वे सहज ही प्रश्न करते हैं-
“जब पेट की भूख आंत नोचती है तब दिमाग के बारे में कौन सोच सकता है”।

इसी नाटक की स्त्री पात्र चंदा भारत की उन हजारों लड़कियों की प्रतिनिधि बनकर आती हैं जिन्हें पढ़ने का शौक होते हुए भी स्कूल का चौखट देखा तक नसीब नहीं होता। चंदा का पिता गोकुल कहता है-
“ यहाँ लड़कियां यूं ना निकला करे हैं बाहर, क्या करेगी पढ़-लिख कर? संभालना तो इन्हें चूल्हा ही है।”
भारत की आज़ादी के बाद स्त्री- सशक्तिकरण तथा सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य से महिला नुक्कड़ नाटकों की शुरुआत हुई। स्त्री की समस्याओं पर केन्द्रित पहला नुक्कड़ नाटक ‘ॐ स्वाहा’ था जो नारी रक्षा समिति की प्रस्तुति थी जो ‘दहेज-हत्या’ विषय पर आधारित था। यह इतना लोकप्रिय हुआ था कि समिति के पास इसके आयोजन करने हेतु अनुरोध पत्र के रूप में पूरे देश से आ रहे थे। नारीवादी कार्यकर्ताओं ने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुप्रथाओं को सबके सामने लाने का तरीका अपनाया।

भारतीय समाज में अधिकांशत: सामंती मानसिकता ही चलती है जो नारी को हमेशा पुरुष नियंत्रण में देखना पसंद करती है।  इस व्यवस्था के प्रति जिस स्त्री ने विरोध प्रदर्शित किया उसे यह समाज हमेशा फटकारता  रहता है। औरत नमक नुक्कड़ नाटक में यह दिखलाया गया है कि दिहारी पर काम करने वाली एक औरत जब अपने मेहनताने पर आवाज उठती है तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है।

स्त्रियों को घूर कर देखना मानो पुरुष का जन्म सिद्ध अधिकार है। जन-नाट्य मंच के नुक्कड़ नाटक ‘यह भी हिंसा है’ में इस बात की ओर संकेत मिलता है

“देखेंगे हर बच्ची को, जवान को, बूढ़ी को, हर औरत को... स्कूल में, सड़क पर, बाज़ार में, कॉलेज में, घर में ऑफिस में .........यहाँ तक की मृत्यु की शैया पर भी घूरेंगे उसे। इसमें हर्ज ही क्या है? ये तो हमारा मौलिक अधिकार है, आखिर हम एक आजाद देश के आजाद बासिन्दे हैं।”

उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय समाज में व्याप्त लगभग सभी समस्याओं, शोषण/उत्पीड़न का इस्तेमाल नुक्कड़ नाटक अपने विषय के रूप में करने में सफल रहा है जो कि नुक्कड़ नाटक के सामाजिक सरोकार होने को वैधता प्रदान करता है।


संदर्भ ग्रंथ-
पुष्कल अजित॰ अग्रवाल हरिशचंद्र (संपादक), : नाटक के सौ बरस, शिल्पायन दिल्ली, 2004
प्रज्ञा, : नुक्कड़ नाटक रचना और प्रस्तुति, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली, 2006
एन. अंजलि : हिन्दी नुक्कड़ नाटकों का सामाजिक सरोकार:एक विश्लेषणात्मक अध्ययन, (शोध प्रबंध) कोचीन यूनिवर्सिटी आफ साइंस एंड टेक्नोलोजी
गाँव से शहर तक : नुक्कड़ नाटक जनम संवाद अंक 16-17
मशीन : नुक्कड़ नाटक जनम संवाद अंक 16-17
हल्ला बोल : नुक्कड़ नाटक जनम संवाद अंक 16-17
औरत: नुक्कड़ नाटक जनम संवाद अंक जनवरी- जून 2003

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