काव्य: चंद्र मोहन भण्डारी

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

डायनोसौर

अंतहीन कतारों में खडे लोग
सीमित अंतकरणीय आयतन
कहीं नहीं दीखता बीहड, बियाबान
या कोई भी विस्तार, सिवाय कतारों के
हर कही ईंट, सीमेंट के चौखटे
एक इंच भी जमीन खाली नहीं
पैर भी पसार सको, नामुमकिन
अंगडाई ले सको, गनीमत है
इससे ज्यादा की उम्मीद
निहायत बेवकूफी है,
जो वैसे भी हर कहीं बिखरी है
हर तरफ, कूड़े की तरह, और कूड़ा है
हमारी सबसे अमूल्य धरोहर।
और इस सबके बावजूद तुम्हारी ये अकड़
कि देश को बदल दोगे तुम
नागवार नहीं लगती
मात्र कल्पना ही सही, है कुछ अच्छी भी,
आखिर कम आयतन में ही खुलता है
विस्तार का द्वार,
और विस्तार की बात करें
आसानी से पकड़ मे नहीं आता
कोशिश करो देखो कैसे उंगलियों के बीच
सरक जाता है
फिर भी तुम कोशिश करोगे
मैं जानता हूँ, बिना लड़े नहीं दोगे
एक इंच भी जमीन
और जमीन का हाल सुन लो
जमीन खिसक रही है
हरियाली गुम हो गयी है
सभ्यता के बीहड़ दामन में
फसल पक रही है इंसानी सफलता की
इंसानी जरूरतों का सैलाब उमड़ता जाता है
उसकी उपलब्धियों की दास्तान
दस्तावेजों मे बंद है
जरूरतों का दाब, आगत का तनाव,
लालसाओं का फैलाव, बढता हुवा रक्तचाप
ध्यान न जाने कहाँ है
अरे उधर खिसक रही है जमीन
पैरों के नीचे।
पैरों के नीचे खिसकती है जमीन
जमीन के नीचे की परत
जार जार रोती है
बाहर निकाले जाने को मजबूर
उसका पानी मर रहा है
इंसानी लालसा का डायनोसौर
धरती को चर रहा है।
ये हरियाली, जो बची है मुमकिन है
कुछ दिन और ठहर जाय
कुदरत का करिश्मा हो
कुछ और धरती संभल जाय
देखो, होते होते, जो हो जाय
वैसे उम्मीदों से उम्मीद कहाँ तक करते जायेंगे
खुद को कितना और छलते चले जायेंगे
बीहड पथरीली जमीन में
पानी के सोतों की कहानी
बच्चों को भी ज्यादा दिन
यकीन नहीं दिला पायेंगे।

बाढ़ आ गई

बाढ़ आ गई
पानी बढ़ता जा रहा है
और सिकुड़ता जा रहा है
घर, आंगन, खेत, खलिहान
बटोरता अपना सामान
झूला बन गयी खटिया पर
ताकता हुवा आसमान, अनुभव करता
अंतरिक्षीय फैलाव, प्रकाशवर्षीय दूरियाँ,
और दूरियों का सैलाब
फिर यह सैलाब का पानी
मेरे ही घर का रुख
क्यों करता है बार बार।

यही होता है हर साल
लेकिन इस बार बहा ले गयी बहुत कुछ
जिन्दगी का अर्थ, गुणवत्ता
रिश्तो की खुशबू, खुशबुओं के प्रकार
बहा चुकी है बाढ और भी बहुत कुछ
बेफिक्र बचपन, अल्हड़ जवानी,
हिरनी आँखें, आँखों की बात
टिमटिमाते तारे, चांदनी रात
उफनता समंदर, सिर उठाये शिखर
आकाश, शिखर, तारे, समंदर
सब को एक साथ आलिंगन में लेते हाथ
नहीं दीखता कुछ, बस पानी ही पानी
और बाढ के पहले की याद।

लेकिन सपने नहीं बहा पाती बाढ़
कुछ दे ही जाती है
हर लहर के साथ
पहले सिर्फ रात ही आते थे सपने
कभी रुलाते तो कभी हँसाते भी थे
अब रात दिन हर वक्त आते हैं
और रुलाते हँसाते नहीं
सिर्फ डरा जाते हैं

पहले कहानी हुआ करती थी
नन्हा राजकुमार, बहादुर घुड़सवार
श्वेताम्बरा परियाँ, जादुई तलवार
सपने कहीं भी उग जाते थे
कल्पना की उपजाऊ जमीन पर
वैसे सपने अब नहीं दिखते –
राजकुमार, घुड़सवार, परियाँ व जादुई तलवार
आखिर दिखें भी कैसे
जहां जरूरत नहीं है पानी की
वहाँ बाढ़ का पानी है
और जहाँ जरूरत है
रिस रिस कर धीरे धीरे
चेतन की जमीन से सूखता रहता है
जीवनदायी जल का भंडार

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