जारी हैं.. (कविता: नये हस्ताक्षर)

चेतना शर्मा

यह कविता उन छात्रों के लिए है जो केवल सामाजिक समझौतों मे फँसे हुए है तथा अपनी खूबियों को न पहचानकर जैसा और लोग कर रहे हैं उसी का पीछा कर रहे हैं। अभी उसका जीवन इसी उधड़बुन में लगा हुआ है कि वो कैसे अपने जीवन को सफल बनाए।

- चेतना शर्मा 


एक मेंढक बड़ा ही सीधा-सादा था,
करता वही था जो उसके मन को भाता था,

ऐसे ही चलते चलते उसे एक अनजाना आशियाना मिला,
और उसने उसे अपना घर, संसार और मंजिल मान लिया,

रुक गया वहीं अनजाने में,
करता था खुद में परिवर्तन, उसमें समाने में,

दिन ढल रहे थे और रातें भी कहाँ रुकने वाली थी,
असल मंजिल उससे और दूर होती जाती थी,

तनिक आभास भी न हुआ उसे और दिशाएँ बदलने लगीं,
रुकी हुई वह मंजिल उलटी दिशा में चलने लगी,

उसने कोशिश बहुत की पर मंजिल पर उसका क्या बस था,
इस दशा ने उसे समझाया रुका हुआ पानी क्यों मलिन था।

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