वैज्ञानिक वार्नर हाइजेनबर्ग और लेखक रॉबर्ट जङ्क के बीच संवाद

मेहेर वान

मेहेर वान

यह पत्राचार प्रसिद्ध वैज्ञानिक और अनिश्चित्ता के सिद्धान्त के प्रणेता प्रोफ़ेसर वार्नर हाइजेनबर्ग और “ब्राइटर दैन थाउज़ेंड सन्स” के लेखक रॉबर्ट जङ्क के बीच हुआ था। इन पत्रों में नील्स बोर और हाइजेनबर्ग की मुलाकात और अन्य घटनाओं सहित तात्कालिक परिस्थितिओं का ज़िक्र है। नील्स बोर और हाइजेनबर्ग की मुलाकात राजनैतिक रूप से काफ़ी महत्वपूर्ण और रहस्यमय मानी जाती रही है, इसके बारे में नाटकीय रूप से तमाम कयास लगाये जाते रहे हैं। 

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17 नवंबर, 1956

प्रिय डॉ. जङ्क,

अपने प्रकाशक के ज़रिये परमाणु वैज्ञानिकों के बारे में लिखी गई बेहतरीन और रोचक किताब मुझे भेजने के लिये आपको बहुत धन्यवाद. चूँकि मैं पिछले कुछ दिनों से बीमार था इसलिये मुझे पूरी किताब पढ़ने का मौका मिल गया और मैंने पाया कि आपने परमाणु वैज्ञानिकों के इर्द-गिर्द के वातावरण की काफ़ी अच्छी तरह से पड़ताल की है। एक तथ्य यह भी है कि आपके द्वारा उठाये गये कुछ नाज़ुक मुद्दों पर किसी न किसी को कुछ समस्या हो सकती है। हालाँकि, यह कोई महान खतरा नहीं हैं। किताब के अंत में फ़्रेंक की रिपोर्ट और बोर का रुजवेल्ट को दिया गया ज्ञापन मेरी समझ में आपकी किताब की विशेष उपलब्धि है। पुनरावलोकन में इस बात से शायद ही कोई इनकार कर सकता है कि राजनैतिक प्रक्रियाओं को समझने और उनका विश्लेषण करने में उस समय के प्रकृति वैज्ञानिक राजनीतिज्ञों से कहीं अधिक बेहतर थे।

हालाँकि, आपकी किताब में दिये गये कुछ ब्यौरों के सम्बन्ध में मुझे कुछ कहना है यह किताब के दूसरे संस्करण में भूल सुधार करने में आपकी काफ़ी मदद करेगा (जो कि इस तरह के वचन के साथ अपरिहार्य है)। 
सर्वप्रथम, पृष्ठ 52: यह बिन्दु मेरे लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है. आपने वाइज़सेकर के राजनैतिक दृढ विश्वास के बारे में वर्णन (जो कि मेरी समझ में टेलर से की गई बातचीत से निकाला गया है) किया है और इसके लगभग अंत में लिखा है “उस (टेलर Teller) को ऐसा मानना पड़ा था कि उसका यह पुराना दोस्त और सहपाठी हिटलर का वफ़ादार रहेगा”। यद्यपि इसके ठीक बाद वाला वाक्य इसका प्रतिद्वन्द्वी है, मेरा मानना है कि उपरोक्त वाक्य वाइज़सेकर के राजनितिक विश्वास का पूरी तरह से गलत चित्रण करता है। सन 1931 से 1935 के बीच मैंने वाइज़सेकर को लगभग रोज़ देखा है और उसके राजनीतिक विचारों को शायद मैं किसी और की अपेक्षा काफ़ी लम्बे समय से जानता हूँ। पहले तो, वाइज़सेकर हिटलर के व्यक्तित्व और उसके द्वारा किये गये अपराधों से उतनी ही घृणा करता है जितना कि कोई अन्य अच्छा इंसान कर सकता है। यह घृणा बाद में भी कभी कम नहीं हुई, हालाँकि यह संभव है कि यह समय के साथ, डर के कारण की गई प्रशंसा हो, जब उसने (अपने परिवार के ज़रिये) यह बहुत नज़दीकी से देखा हो कि हिटलर ने किस तरह से सत्ता को उन अत्यंत समर्थ, पढ़े-लिखे लोगों से हथियाने में सफ़लता पाई जिनके प्रयास जर्मन राजनीति में सकारात्मक दिशाओं की ओर थे, इसके साथ ही उसे (हिटलर को) बिना किसी प्रतिरोध के जिस प्रकार की सुविधायें और रियायतें विदेशों से प्राप्त हुईं, उनके लिये ब्रूनिंग और स्ट्रेसेमेन हमेशा पाने की बेकार कोशिशें करते रहे। वाइज़सेकर की ओर से हिटलर के लिये किसी भी प्रकार की वफ़ादारी की भावनाओं के बारे में बात करना निश्चित रूप से दूर की कौड़ी हैं।
युद्ध के शुरु होते ही, हर एक जर्मन भौतिकविद के मन में एक सहज असमंजस था कि उनके हर एक काम-काज का मतलब या तो हिटलर की जीत था या फिर जर्मनी की हार, और हमारे हिसाब से निस्संदेह उनके समक्ष प्रस्तुत दोनों विकल्प भयंकर थे। वास्तव में, मैं मानता हूँ कि इस तरह का असमंजस अन्य मित्र-देशों के भौतिकविदों के समक्ष भी रहा होगा, जैसे ही उन्हें युद्ध के दौरान किसी प्रोजेक्ट के लिये हस्ताक्षर किये होंगे, उसी समय वह स्तालिन की जीत और रुस के यूरोप पर सशक्त आक्रमण के लिये भी प्रतिबद्ध हो गये होंगे। कुल मिलाकर, इस असमंजस में जर्मन भौतिकविदों ने उस तरह के रूढ़िवादियों की तरह काम किया, जिस तरह के व्यवहार की न सिर्फ़ ज़रुरत थी बल्कि यह उपयुक्त भी था और जो भी भाग्यशाली थे और इस दौरान बचे रहे उन्होंने इस प्रलय के अंत का इंतज़ार किया। 

तत्पश्चात पृष्ठ 91: मुझे गॉडस्मिथ के घर पर हुयी फ़र्मी से मुलाकात याद है, पर यह एकदम याद नहीं है कि फ़र्मी ने यूरेनियम समस्या क कोई ज़िक्र किया था। अगले युद्ध में परमाणु हथियार इस्तेमाल किये ही जाने वाले हैं, सम्बन्धी संभवनाओं को मैंने निश्चित तौर पर गंभीरता से नहीं लिया था, हालाँकि उसको मैंने अंदरूनी डर के कारण अपने अंदर ही दबा दिया था। किसी भी कीमत पर, मुझे यह याद नहीं आ रहा कि जैसे कि मैंने कहा कि यूरेनियम की समस्या का ज़िक्र हुआ हो, हो सकता है कि याद्दाश्त का इस तरह कमज़ोर होना खुद ही उस समय के दमन के स्तर का संकेत हो। पेग्राम के साथ बातचीत थोड़ा बाद में हुयी और मैंने उस समय दृढ़-विश्वास से पेग्राम को कहा कि आने वाले युद्ध में हिटलर हार जायेगा हालाँकि मुझे महसूस हुआ था कि मुझे अधिकाधिक रूप से जर्मनी में मौजूद जितना भी कुछ अच्छा था उसे सुरक्षित करने के लिये जर्मनी में रुकना चाहिये था। इसी मुलाकात के दौरान ही, मैंने गंभीरता से यह विचार नहीं किया था कि परमाणु बम हिटलर के साथ युद्ध का एक अहम हिस्सा बन जायेगा। एक तरफ़ मुझे आशा थी कि युद्ध जल्दी खत्म हो जायेगा और दूसरी तरफ़, मुझे यह एहसास था कि परमाणु बम के निर्माण में उच्च कोटि की कठिनाइयाँ आयेंगीं (जिनके बारे में मैंने उस समय सोचा नहीं था)

पृष्ठ 100 के बारे में: यहाँ दूसरे अनुच्छेद के अंत में आप हिटलर के खिलाफ़ सक्रिय प्रतिरोध के बारे में बात कर रहे हैं, और मैं सीधे-सीधे यह लिखने के लिये माफ़ी चाहता हूँ- मुझे विश्वास है कि यह अनुच्छेद अधिनायकवादी तानाशाही की समग्र गलतफ़हमी को बयाँ करता है। तानाशाही में सक्रिय प्रतिरोध का इस्तेमाल केवल वही लोग कर पाते है जिन्हें व्यवस्था के सहभागियों की तरह देखा जाता है। यदि कोई सामाजिक रूप से व्यवस्था के विपिरीत बोलता है, वह निश्चित रूप से सक्रिय प्रतिरोध की किसी भी सम्भावना से खुद को निश्चित रूप से ठग लेता है। क्योंकि या तो वह व्यव्स्था की आलोचना केवल विशेष अवसरों पर राजनैतिक रूप से क्षति-शून्य तरीके से करता है, तब उसका राजनैतिक प्रभाव आसानी से प्रतिबाधित किया जा सकता है; उदाहरण के लिये कोई नौजवानों के ज़रिये अपनी बात कह सकता है: अरे वाह! प्रोफ़ेसर ’अ’ एक बहुत अच्छे वृद्ध आदमी हो सकते हैं लेकिन बेशक वह नौजवानों के उत्साह को समझने में असक्षम हैं अथवा ऐसी ही कोई बात। अथवा, विरोधी/ क्राँतिकारी वास्तव में छात्रों को राजनैतिक सक्रियता के लिये प्रेरित करता है, ऐसे में वह कुछ ही दिनों में कंसन्ट्रेशन कैंम्प्स में कैदी होकर पड़ा मिलता है, और यहाँ तक कि उसकी शहादत व्यावहारिक रूप से अज्ञात रह जाती है क्योंकि उसके बारे में बोलने का मौका नहीं दिया जाता। मैं नहीं चाहता कि मेरी इस टिप्पणी के जरिये इस बात का गलत अर्थ निकाला जाये कि मैं खुद हिटलर की खिलाफ़त में सक्रिय रहा हूँ। इसके विपरीत, मुझे 20 जुलाई के पहले हमेशा लोगों (जिनमें से कुछ मेरे दोस्त हैं) के समक्ष शर्म का एहसास हुआ है, जिन्होंने एक समय पर प्रतिरोध में अपने गंभीर प्रयासों के कारण जानें भी गंवाईं हैं। लेकिन यहाँ तक कि उनके उदाहरण दर्शाते हैं कि सच्चा प्रतिरोध केवल उन्हीं लोगों की तरफ़ से हो सकता है जो कि एक-दूसरे के सहगामी प्रतीत होते हैं। हमारा सबसे प्रसिद्ध उदाहरण “केनारिस” था जिसने कि हमारे भौतिकविदों के समूह को इकट्ठा करने में भी एक समय पर मदद की थी।

पृष्ठ संख्या 175: उर्फ़ेल्ड की साइकिल यात्रा के दौरान की एक छोटी सी घटना का ब्यौरा इस तरह है। चूँकि सभी पुरुष नागरिकों के “फोक्स्टर्म” (राष्ट्रीय नाज़ी सेना, जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय साधारण नागरिकों को मिलाकर बनाई गई थी) में शामिल होने का मसौदा तैयार किया गया, हालाँकि यह कोई साधारण घटना नहीं थी, कई नागरिक देश के आगे और पीछे की ओर से भाग गये थे। इसे रोकने हेतु सेना ने ऐसे भगोड़ों को पकड़ने के लिये अपने पहरेदारों को सड़क पर छोड़ दिया था जहाँपर उन्हें यदा-कदा बिना किसी सैन्य न्यायिक प्रक्रिया के फ़ाँसी पर चढ़ा दिया गया था। मैंने इस विपत्ति से ख़ुद को बचाने के लिये अपने संस्थान से एक पहचान पत्र लिया था। हालाँकि एक फ़ौजी ने पहचान लिया था कि इस तरह का दस्तावेज़ संस्थान से बहुत आसानी से बनवाया जा सकता है और उसने कहा था कि वह मुझे अपने कमाँडिंग अधिकारी के समक्ष पेश करेगा। इस खतरनाक मोड़ से मैं खुद को पाल-माल सिगरेट्स के पैकेज की रिश्वत देकर बचा पाया था। वैसे, मेरा संस्थान से चला आना न तो कर्नल पाश की फ़ौज से भाग आना था और न ही फ़ोक्स्टर्म से; यह संस्थान में बहुत ही एहतियात से लिया गया निर्णय था जो कि मेरे उस विश्वास का परिणाम था कि मुझे अंतिम युद्धों के क्षणों में अपने परिवार की तरफ़ होना है। इसीलिये मैं उस क्षण तक हेचिंजन में बना रहा जब तक “फ़ोक्सटर्म” भंग कर दिया जा चुका था और फ़ाँसीसी टैंक्स आ रहे थे। तब मैं रात के 3 बजे अपनी साईकिल से निकल आया था।  

अब कुछ मामूली ब्यौरे: 

पृष्ठ 177 पर उर्बैच के स्थान पर उर्फ़ेल्ड होना चाहिये।

पृष्ठ 224: मैंने अंग्रेजी उपन्यासकार टोबाइस स्मोलेट नहीं, एन्थोनी ट्रोलोप की सारी रचनायें पढ़ी हुईं हैं। 
अंततः पृष्ठ 225: पहली रिपोर्ट में, मैंने सच में परमाणु बम पर भरोसा नहीं किया था, क्योंकि मैं जानता था कि परमाणु बमों के निर्माण में अविश्वस्यनीय प्रयासों की आवश्यक्ता होगी। केवल दूसरी रेडियो रिपोर्ट के बाद जहाँ यह साफ़ तौर ऐसे प्रयासों के बारे में बताया गया, जिनके ज़रिये मैं इस तथ्य के साथ सामंजस्य बना पाया कि अमेरिका ने परमाणु बम पर वास्तव में अरबों खर्च किये हैं और इस काम में सैकड़ों हजार लोगों ने इसपर काम किया है। समाचारों के दूसरे प्रसारण के बाद मैंने इस विचार को निश्चित रूप से गंभीरता से नहीं लिया कि अमेरिकियों ने भारी बम गिराया है, क्योंकि इसने रेडियो-एक्टिव प्रदूषण के ज़रिये बहुत ही सीमित रूप से प्रभावित किया होगा। और क्योंकि यह वास्तव में बहुत आसान था, चूँकि हमने इसे बहुत अगंभीरता से लिया कि अमेरिकी लोगों ने पाइल (बारूद के ढेर) इतनी आसानी से बना लिये होंगे तो इसमें उन्हें रुचि शायद ही होनी चाहिये। लेकिन हमारे लिये पाइल (बारूद के ढेर) और बम के बीच का साफ़ अन्तर था, हमने सेमिनार में अगले ही दिन बम के आकार और उसकी कार्यप्रणाली की गणना कर ली थी। हालाँकि मैं इस सम्बन्ध में यह कहना चाहूँगा कि सन 1944 में गोएरिंग इन्स्टीच्यूट से एक दूत हमारे यहाँ आया था, उसने यह इंगित किया था कि यह खबर जासूसों के ज़रिये जर्मनी तक आई है कि अमेरिकी जर्मन सीमा में परमाणु बम गिराने की तैयारी में हैं और उसने मुझसे पूछा था कि क्या मेरे हिसाब से यह संभव है? उस समय मेरा जवाब था कि यद्यपि मेरे हिसाब से उस समय तक (1944 की गर्मी तक) इसकी बहुत कम संभावना है, क्योंकि परमाणु बम के निर्माण में बहुत अधिक तकनीकी प्रयासों की आवश्यक्ता है, हालाँकि मैंने इसकी संभावना से इन्कार नहीं किया था।

पृष्ठ 227:  ब्रिटिश अफ़सर का अंतिम वाक्य वैज्ञानिक ऑटो हान के लिये नहीं था: वास्तव में हान उस वार्तलाप में उपस्थित ही नहीं थे और मुझे दृढ़ विश्वास है कि घोर रणनीति के कारण ही ब्रिटिश अफ़सर ने सवाल का इस तरह से जवाब नहीं दिया होगा। यदि मुझे ठीक-ठाक याद है तो यह वार्तालाप ब्रिटिश ऑफ़िसर, वाइज़शेकर और मेरे बीच का है। इस वार्तालाप में, जो कि बम गिराने के नैतिक अधिकारों पर हो रहा था, इसी बीच ब्रिटिश अफ़सर को एक प्रकार से पराजय सी महसूस हुई और उसने यह बात ज़ोर देकर कही कि हमें उसकी बात समझनी ही पड़ेगी: उसके लिये एक ब्रिटिश या अमेरिकी फ़ौजी का जीवन 70 हजार जापानी नागरिकों से अधिक महत्वपूर्ण था। तब हममें से किसी ने उत्तर दिया था “लेकिन यहाँ आप हिटलर के नैतिक सिद्धान्तों के बेहद करीब हैं”। इसके बाद वह अफ़सर अपने चेहरे पर बहुत ही व्यथित भाव लेकर वार्तालाप छोड़्कर चला गया, जिसके साथ हमारे हमेशा दोस्ताना सम्बन्ध हुआ करते थे। स्पष्टतः अपने स्पष्ट मत से उस अफ़सर का मतलब हमें आहत करना नहीं था और शायद वह खुद बाद में अपने कथन से दुखी था।

यह बहुत ही अच्छा होगा यदि आप अपनी किताब की दूसरी छपाई में कुछ सुधार कर लें, और मेरी यह धारणा है कि आपको इस तरह के सुधारों की सलाह अन्य वैज्ञानिकों की ओर से भी मिलेगी। एक बार फिर इतनी रोचक किताब के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।

सादर आपका,
(हस्ताक्षर)

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लॉस एन्जेल्स
29 दिसम्बर 1956

प्रिय और माननीय प्रोफ़ेसर हाइजेनबर्ग,

आपको इतने दयालु पत्र के लिये सुझाये गये सुधारों के सहित मेरा धन्यवाद। 15 जनवरी को आने वाले किताब के नये संस्करण में आपके सुझावों को मैंने पहले ही सम्मिलित कर लिया है।
हालाँकि कुछ को मैं सिर्फ़ फ़ुट्नोट्स की तरह ही इस्तेमाल कर पा रहा हूँ ताकि किताब का खाका अव्यवस्थित न हो। जनवरी या फ़रवरी में, मैं किताब के अंग्रेजी संस्करण पर काम करना शुरु करने जा रहा हूँ जो कि ग्रेट ब्रिटेन में एक साथ दो प्रकाशकों (Gollancz and Hart-Davis) के साथ और अमेरिका में Harcourt, Brace and Co. के साथ आयेगा। किताब फ़्राँस और पश्चिमी यूरोपीय देशों में इस बसन्त के पहले ही आने वाली है।
क्या आप की इच्छा या झुकाव है कि उन बहुत से अपूर्णतओं में से कुछ को पूरा किया जाये ओ कि किताब में स्पष्टतया मौजूद हैं, इसके लिये मैं आपका बेहद आभारी रहूँगा। विशेषतया, और स्पष्ट रूप से मेरी रुचि  आपके और नील्स बोर के द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुये कोपेनहेगन वार्तालाप को बेहतरी से समझने में है। मुझे युद्ध के बाद की झूठी चेतावनी के बारे में और भी जानना अच्छा लगेगा, जब दो तथाकथित जासूस गोटिंजन से आपके अपहरण के लिये धमकियाँ दे रहे थे (बाद में पता चला कि वह धोखेबाज थे)।

आपके पत्र का सिर्फ़ एक बिन्दु मैं शामिल नहीं कर पाया। वॉन वाइजशेकर ने कुछ समय पहले गोटिंजन में खुद मुझसे कहा था कि यद्यपि वह इस आन्दोलन (जो कि ठीक 1939 के बाद नहीं) के लिये राजनेताओं से घृणा करते थे, इसकी शुरुआत में उनके मन में एक सहानुभूति थी अथवा इसे राष्ट्रीय समाजवाद के लिये समझदारी कह लें, क्योंकि उन्हें ऐसा लगा था कि वहाँ गम्भीर सघन बलों का एक ज़ोर काम कर रहा था। इस मनोभाव के लिये मेरी समझदारी थी और अब भी है, चूँकि मैं जर्मन युवा आन्दोलन में आन्तरिक रूप से और बाह्य स्तर पर उसके साथ रहा हूँ, जिसके बौद्धिकतावाद की आलोचना पर नाजियों ने अपना कब्ज़ा जमा लिया था और कुटिलता से उसका इस्तेमाल एक भोंडे दिमाग-रहित हथियार की तरह किया था।      

वैसे, मुझे आशा है कि मेरी किताब अमेरिका में भी “नाज़ी” हाइजेनबर्ग के मिथक को तोड़ेगी, जिसके बारे में नोर्बर्ट वाइनर में कुछ ही महीने पहले अपनी आत्मकथा के दूसरे भाग में एक बहस गरमा दी है। 
आगे आने वाले साल के लिये शुभकामनायें, सादर

आपका,
 (हस्ताक्षर) रॉबर्ट जङ्क

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18 जनवरी, 1957

प्रिय डॉ जङ्क,

पत्र के लिये और मुझसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नील्स बोर के साथ हुये कोपेनहेगन वार्तालाप के बारें थोड़ा और विस्तार से लिखने के लिये कहने हेतु आपको अनेकानेक धन्यवाद। मेरी याद में, जो कि लम्बा अरसा होने के कारण मुझे बेशक़ धोखा दे सकती है, वार्तालाप कुछ इस तरह हुआ था। मैनें कोपेनहेगन की यात्रा 1941 के पतझड़ वाले मौसम में की थी; मुझे ऐसा याद आता है कि वह अक्टूबर के अन्तिम दिन थे। उस समय, युरेनियम और भारी जल सम्बन्धी प्रयोगों के परिणामतः हम अपने “यूरेनियम क्लब” में निम्नलिखित निष्कर्षों तक पहुँचे थे: यूरेनियम और भारी जल की सहायता से नाभिकीय रियक्टर का निर्माण निश्चित रूप से संभव है जो कि ऊर्जा उत्पादन करे। इस रियक्टर में (वॉन वीजसेकर के सैद्धान्तिक कार्य पर आधारित) यूरेनियम-239 के क्षय से एक उत्पाद बनेगा जो यूरेनियम-235 जैसा विस्फोटक होगा और परमाणु बमों में इस्तेमाल किया जा सकेगा। हम युद्ध-कालीन जर्मनी में उपलब्ध संसाधनों से यूरेनियम-235 के पर्याप्त मात्रा में उत्पादन की विधि नहीं जानते थे। यहाँ तक कि इन रियक्टरों से नाभिकीय विस्फोटकों का उप्तादन केवल उस दशा में संभव है जब इन रियक्टरों को कई वर्षों तक लगातार चालू रखा जाये। इस तरह हम इस तथ्य के संबंध में काफ़ी हद तक स्पष्ट थे कि परमाणु बम का उत्पादन प्रचुर तकनीकी संसाधनों के साथ ही संभव है। अतः हम सैद्धान्तिक रुप से जानते थे कि परमाणु बम बनाना संभव है, यद्यपि हमने आवश्यक तकनीकी प्रयासों के बारे में गणनायें की थी जो कि तत्कालीन योजनाबद्ध प्रयासों से काफ़ी अधिक थीं। यह परिस्थिति हमें उस विशेष रूप से पक्षधर शर्त की तरह महसूस हुई क्योंकि इसने भौतिकविदों को आगामी परमाण्विक विकास को प्रभावित करने के लिये सक्षम बनाया था। यदि परमाणु बमों का निर्माण असंभव होता तो यह समस्या ही उत्पन्न नहीं हुयी होती, लेकिन यदि यह आसान होता तो भौतिकविद निश्चित रूप से इसके उत्पादन को नहीं रोक पाते। इस परिस्थिति का वास्तविक परिणाम यह था कि इसने भौतिकविदों को धोखेबाज़ी से उस समय में आगामी घटनाओं के ऊपर निर्णयात्मक रूप से महत्वपूर्ण प्रभाव प्रदान किया, चूँकि उनके पास अपने प्रशासकों को बताने के लिये अच्छे तर्क थे- परमाणु बम युद्ध में महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं निभा पाते, अथवा बोधगम्य तरीके के प्रयासों को अपनाते हुये यह भी संभव था कि इन्हें (बमों को) युद्ध में महत्वपूर्ण हिस्सा निभाने के लायक बना दिया जाता। आगामी घटनाओं ने दोनों तरह के तर्कों को तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह से न्यायसंगत ठहराया; वास्तव में जिनके कारण आगे चलकर अमेरिकी जर्मनी पर परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं कर पाया। 

इस परिस्थिति में हमें विश्वास था कि नील्स बोर के साथ एक मुलाकात महत्वपूर्ण होगी। यह वार्तालाप शाम के वक्त नाय-कार्ल्सबर्ग के पास शहरी जिले में पैदल चलते हुये सम्पन्न हुई थी। क्योंकि मैं जानता था कि नील्स बोर को जर्मन राजनैतिक जासूस अपनी निगरानी में रखे हुये हैं, और मेरे बारे जो विवरण बोर देंगे वह वापस जर्मनी तक पहुँचेगें, मैंने वार्तालाप को संकेतों के उच्च स्तर तक रखने की कोशिश की ताकि इससे तात्कालिक रूप से मेरी जान को खतरा ना हो। यह वार्तालाप शायद सामान्य रूप से मेरे यह पूछने के साथ शुरु हुआ कि क्या यह न्याय संगत है कि भौतिकविद इस समय खुद को युद्ध के समय यूरेनियम समस्या को सुलझाने के लिये सौंप रहे हैं, जबकि लोगों को कम से कम इस संभावना की ओर ध्यान देना चाहिये कि इस क्षेत्र में कोई भी प्रगति युद्ध तकनीक के लिये गहरे परिणाम छोड़ेगी। बोर ने इस प्रश्न की गंभीरता को तुरंत समझ लिया था जो कि मैं उनके भावों से समझ पाया था। जहाँ तक मुझे याद है, उन्होंने इसका उत्तर, मुझसे एक और प्रश्न पूछकर दिया था, “क्या तुम्हें सचमुच विश्वास है कि यूरेनियम विखंडन प्रक्रिया को हथियारों के निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है?” शायद मैंने उत्तर दिया था, “मैं जानता हूँ कि यह सैद्धान्तिक रूप से संभव है, लेकिन इसके लिये भयानक रूप से तकनीकी प्रयासों की आवश्यकता होगी, जो कि हम आशा कर सकते हैं कि यह इस युद्ध के दौरान संभव नहीं हो सकेगा।“ परोक्ष रूप से बोर इस उत्तर से इतना हैरान हो गये थे कि उन्होंने कयास लगाया था कि मैं उन्हें यह कहना चाहता हूँ कि जर्मनी ने परमाणविक हथियारों के निर्माण की प्रक्रिया में बेहतरीन प्रगति कर ली है। इस गलत धारणा को ठीक करने के आगामी प्रयास में, मैं उसके बाद पूरी तरह से बोर का विश्वास नहीं जीत पाया, विशेष रुप से क्योंकि मैं अपने डर के कारण बहुत ही सावधानी से सांकेतिक भाषा में बात कर रहा था (जो कि मेरी ही गलती थी) बाद में शब्दों के खास तौर पर चयन ने मेरी खिलाफ़त कर दी। इसके बाद मैंने एक बार और बोर से पूछा कि इन स्पष्ट नैतिक चिंताओं को मद्देनज़र रखते हुये, क्या यह संभव है कि सभी भौतिकविदों को इस विषय पर शोध न करने प्रयास करने के लिये राजी किया जा सके, चूँकि वे ही हैं जो कि किसी भी तरह से भारी तकनीकी मदद से इसका निर्माण कर सकते हैं। लेकिन बोर ऐसा सोचते थे कि हर एक देश के वैज्ञानिकों के क्रिया-कलापों को प्रभावित करना निराशाजनक होगा, और यह कि, वैसे तो दुनियाँ की वर्तमान प्राकृतिक परिस्थितियों में भौतिकविद अपने अपने देशों के लिये हथियारों के उत्पादन हेतु काम कर रहे हैं। 

इस उत्तर को समझाने के लिये किसी को भी निम्नलिखित जटिलता को शामिल करते हुये यह समझना होगा कि यद्यपि इसके बारे में बहुत बातचीत नहीं हुयी लेकिन जितना भी मुझे याद है और जितने के लिये मुझे संज्ञान है, और यह संज्ञानात्मक और गैर-संज्ञानात्मक रूप से बोर के दिमाग में भी होगा। ऐतिहासिक कारणों से परमाणविक हथियारों के इस्तेमाल की संभावना जर्मनी की अपेक्षा अमेरिकी ओर से अप्रतिम रुप से अधिक थी। सन 1933 से, जर्मनी ने तमाम विद्वान वैज्ञानिकों को उत्प्रवासन के कारण खो दिया था, विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालायें सरकारों की उपेक्षाओं के कारण गरीब और  पुरानी पड़ गय़ी थीं, प्रतिभाशाली युवा अक्सर दूसरे व्यावसायिक रोजगारों की ओर जाने को बाध्य कर दिये थे। हालाँकि, अमेरिका में सन 1932 से कई विश्वविद्यालय और (तकनीकी) संस्थानों को पूरी तरह से नये और आधुनिक उपकरण दिये जा रहे थे और उन्हें नाभिकीय भौतिकविदों का नेतृत्व दिया जा रहा था। बड़े और छोटे साइक्लोट्रोन (एक प्रकार का तकनीकी प्रयोगशाला) को शुरु किया जा रहा था, तमाम सक्षम भौतिकविदों को अन्य क्षेत्रों से यहाँ लाया जा रहा था और यहाँ तक कि नाभिकीय भौतिकी में जनता की रुचि काफ़ी अधिक थी। अगर कोई अतिशियोक्तिपूर्वक सोचे तो हमारा यह प्रस्ताव कि दोनों तरफ़ के भौतिकविदों को परमाणु बमों के निर्माण की दिशा में आगे नहीं बढ़ना चाहिये, परोक्ष रूप से हिटलर के पक्ष में था। स्वाभाविक रुप से मानवीय स्थिति “एक बेहतरीन इंसान होते हुये कोई परमाणु बम नहीं बना सकता” अब जर्मनी के हित और लाभ से एक-रुप हो गई थी। यह नील्स बोर को किस हद तक प्रभावित कर रही थी यह स्पष्टतझ मैं नहीं समझ सकता। मैं यहाँ जो भी लिख रहा हूँ, वह एक प्रकार से जटिल मनोवैज्ञानिक परिस्थिति के बाद किया गया विश्लेषण है, जहाँ यह संभव नहीं है कि हर बिन्दु बहुत ही सटीक हो- मैं स्वयं इस वार्तालाप से बहुत नाखुश था। अतः यह बातचीत कुछ सप्ताहों या महीनें बाद दोबारा जेन्सन द्वारा शुरु की हुयी, लेकिन उतनी ही असफ़ल रही। यहाँ तक कि अब भी जब मैं उस वार्तालाप के बारे में लिख रहा हूँ, मुझे अच्छा महसूस नहीं हो रहा है, चूँकि कई कथनों के शब्द अब बहुत सटीक नहीं हो सकते, और इसके लिये सभी वार्तालाप के सटीक बिन्दुओं की बारीकियों का उनकी मनोवैज्ञानिक छाया में दोबारा से ब्यौरा देना होगा।

आपके पत्र में दूसरा प्रश्न सन 1947 में मेरे गोटिंगन से तथाकथित रूप से अपहरण जाने की योजना को लेकर है। स्पष्टतः इस घटना का पुनरावलोकन करते हुये, इसे केवल मज़ाकिया लहजे में ही देखा जा सकता है। इस घटना ने उन अंग्रेजो (ब्रिटोन्स: प्राचीन ब्रिटिश नस्ल) को काफ़ी परेशान किया था, जिन्हें हमारी देखभाल और रखवाली करनी पड़ रही थी, यहाँ तक कि उन्हें हमें (यानि कि ऑटो हान और मुझे) कुछ समय के लिये गोटिंगन से किसी और स्थान पर भेजना पड़ा था। मेरे गोटिंगन वाले घर के बाहर आधी रात को दो नकाबपोश देखे गये थे जिन्हें मुझे एक जासूस को सोंपने के बदले भारी इनाम दिये जाये का वादा किया गया था। बाद में जब उन्हें पकड़ा गया तो पता चला कि वह दो हैमबर्ग बन्दरगाह पर काम करने वाले मजदूर थे जो सस्ते में बड़ी रकम पाना चाहते थे। वास्तव में, जिस आदमी ने इन दो मजदूरों को सुपारी दी थी उसी ने ब्रिटिश एजेंसी को इस शरारत के बारे में सूचना भी दी थी, वह एक जालसाज था जो कि सीक्रेट सर्विस (जासूसी सेवा) में ऊँची कुर्सी पाने के लिये खुद को तैयार कर रहा था। केवल एक साल के बाद ही इस झूठ का पर्दाफ़ाश हो पाया जिसने स्वाभाविक रुप से हमें बहुत हँसाया था।

आपने जो वाइज़सेकर के बारे में लिखा है, उससे मैं सहमत हो सकता हूँ। केवल “अपने शुरुआती क्षणों में राष्ट्रीय समाजवाद की समझ” और “हिटलर की वफ़ादारी” में ज़मीन आसमान का अन्तर है जिसे आपने अपनी पुस्तक में इस्तेमाल किया है। कोई भी अपनी राष्ट्रीय समाजवाद की समझ को अपने नेता से की जाने वाली घृणा के साथ खुद को सबसे अलग-थलग करके यह कहते इतने साफ़ तौर पर क्यों मिश्रित करेगा, “जर्मनी के लोगों की एक सच्ची, आदर्शवादी इच्छा को एक हिटलर जैसे नीरस आदमी ने गाली दी है”। शुरुआती दिनों में तमाम जर्मन लोग “हिटलर राष्ट्रीय समाजवाद के बराबरी करते हैं” का मतलब समझ नही पाये, जोकि बाद के वर्षों में सिद्ध हुआ।
क्या आपको बोर के साथ मेरे वार्तालाप को अपनी किताब में संशोधित करना चाहिये, मैं आपका बहुत आभारी रहूँगा यदि ज़रूरत पड़ने पर किये गये संशोधनों को किताब के प्रकाशन से पूर्व स्वयं देख सकूँगा।
गर्मजोशी पूर्ण अभिवादन के साथ
आपका,
(हस्ताक्षर)
वार्नर हाइजेनबर्ग

1 comment :

  1. महत्वपूर्ण संवाद । युवा वैज्ञानिकों को इन पत्रों का अध्ययन करना चाहिये । विज्ञान और विवेक में संतुलन ही विश्व को परमाणु युद्ध से बचा सकता है । किम-जोंग-उल जैसे लोगों के सामने वैज्ञानिकों को विवेकपूर्ण निर्णय लेने ही होंगे जिसमें हर प्रकार की सजा को स्वीकार करने का साहस भी हो अन्यथा विज्ञान मात्र एक विस्फोट बन कर रह जायेगा । कदाचित इन्हीं सम्भावनाओं के पूर्वानुमान के कारण महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आविष्कारों के बाद भी भारतीय ऋषियों का चिंतन भौतिक दिशा को छोड़कर तात्विक दिशा में आगे बढ़ता रहा ।

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