अनुवाद: अतिया दाऊद की सिंधी कविताएँ

हिंदी अनुवाद –देवी नागरानी
अतिया दाऊद

अजनबी औरत 

आईने में अजनबी औरत क्या सोचती है
मैंने पूछा ‘बात क्या है?’
वह मुझसे छिपती रही
मैं लबों पर लाली लगाती हूँ तो वह सिसकती है
अगर उससे नैन मिलाऊँ तो
न जाने क्या-क्या पूछती है
घर, बाल-बच्चे, पति सभी खुशियाँ मेरे पास
और उसे न जाने क्या चाहिये?

देवी नागरानी

बेरंग तस्वीर 

मेरे महबूब, मुझे तुमसे मुहब्बत है
पर मैं, तुम्हारे आँगन का कुआँ बनना नहीं चाहती
जो तुम्हारी प्यास का मोहताज हो
जितना पानी उसमें से निकले तो शफाक़
न खींचो तो बासी हो जाए
मैं बादल की तरह बरसना चाहती हूँ
मेरा अंतर तुम्हारे लिये तरसता है
पर यह नाता जो बंदरिया और
मदारी के बीच में होता है
मैं वो नहीं चाहती
तुम्हारे स्नेह की कशिश मुझे आकर्षित करती है
पर तुम्हारी ख्वाहिशों के हल में
जोते हुए बैल की तरह फिरना नहीं चाहती
तुम्हारे आँगन के भरम के खूँटे से बंधकर
वफाएँ उच्चारना नहीं चाहती
लूली लंगड़ी सोच से ब्याह रचाकर
अंधे, बहरे और गूंगे बच्चों को जन्म देना नहीं चाहती
मेरे सभी इन्द्रिय बोध सलामत हैं
इसलिये देखती हूँ, सोचती भी हूँ
भूख, दुख और खौफ़ मौत की परछाइयाँ बनकर
मेरे खून में खेल रही हैं
और तुम मेरी आँखों में हया देखना चाहते हो
बाहर जो दर्द की लपटें जल रही हैं
उनकी आँच तो मुझ तक भी आई है
और तुम मेरे चेहरे को गुलाब की तरह
निखरा हुआ देखना चाहते हो
मैं तुम्हारे ख़यालों के कैनवस पर
बनाई गई कोई तस्वीर नहीं हूँ
जिसमें अपनी मर्ज़ी से रंग भरते रहो
और मैं तुम्हारे निर्धारक फ्रेम से बाहर निकल न पाऊँ
जानती हूँ तुम्हारे बिना मैं कुछ भी नहीं हूँ
मेरे सिवा तुम कुछ भी नहीं हो
मुहब्बत के रस ज्ञान का लुत्फ़ उठाने के लिये
आओ तो एक दूसरे के लिये आईना बन जायें
मेरे बालों में उंगलियाँ फेरते हुए
मुझसे चाँद के बारे में बात न करो
मेरे महबूब मुझसे वो बातें करो
जो दोस्तों से करते हो!


बर्दाश्त 

बर्दाश्त के जंगल में
मेरी आँखों से
तेरी याद की चिंगारी गिर पड़ी
खुशियों के मेले में
दिल को, फिर नये ग़म की
भनक पड़ गई
तेरे मेरे दरमियान आसमाँ है फ़ासला
देखते देखते नज़र थक गई
सहरा में भटकती हिरणी की प्यास की तरह
प्रीत मरती जीती रही!

जात का अंश 

शहर की रौनकें रास न आईं
महफिलों ने मन में आग भड़काई
दोस्तों की दिलबरी परख ली
दोस्त और दुश्मन का चेहरा एक ही नज़र आया
शहर छोड़कर मैंने सहरा बसाई
पर वहाँ भी सभी मेरे साथ आए
यादों के काफ़िले बनकर मेरे पीछे आए
शहर की तरह सहरा भी मेरा न रहा
मैंने दोनों बाँहें खोल दीं
आओ दोस्तो! मेरे अंदर जज़्ब हो जाओ
मेरे जिस्म की नसें
तुम्हारे पैरों से लिपटी हुई हैं
मैंने क़ुदरत के क़ानून पर संतुष्टि की है
मैं समन्दर बन गई
हर दरिया आख़िर मुझमें ही आकर समा जाता है
मैं मरकब की हैसियत से वसीह हूँ पर
मुझे अपनी जात के अंश की तलाश है
जानती हूँ कि वह इक कतरा होगा
एक पल में ही हवा में सूख जायेगा
मैं एक पल के लिये ही सही
उसे देखना चाहती हूँ
फिर चाहे वह हमेशा के लिये फ़ना हो जाये
मुझे अपनी ज़ात के अंश की तलाश है

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