हम अनिकेतन - धरोहर

जनपद शाजापुर (मध्य प्रदेश) के ग्राम भयाना में जन्मे कवि, लेखक और वक्ता बालकृष्ण शर्मा नवीन जी को सन् 1960 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उनकी कविताओं में भक्ति-भावना, राष्ट्र-प्रेम तथा विद्रोह का स्वर मुखर है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वे कुल नौ वर्ष तक जेल में भी रहे थे। उन्होंने ब्रजभाषा और खड़ी बोली हिन्दी में साहित्य रचना की है। उनकी प्रमुख कृतियों में प्राणार्पण, उर्मिला, रश्मिरेखा, कुंकुम, क्वासि, अपलक, बिनोवा-स्तवन, हम विषपायी जन्म के शामिल हैं। वे भारतीय संविधान निर्मात्री परिषद के सदस्य थे। सन् 1955 में स्थापित राजभाषा आयोग के सदस्य के रूप में हिन्दी भाषा को राजभाषा के रूप में स्वीकार कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सन् 1952 से 1960 तक वे भारतीय संसद के सदस्य थे।

- बालकृष्ण शर्मा नवीन

हम अनिकेतन, हम अनिकेतन
हम तो रमते राम हमारा क्या घर, क्या दर, कैसा वेतन?

अब तक इतनी यों ही काटी, अब क्या सीखें नव परिपाटी
कौन बनाए आज घरौंदा हाथों चुन-चुन कंकड़ माटी
ठाट फकीराना है अपना वाघंबर सोहे अपने तन!
हम निकेतन, हम अनिकेतन

देखे महल, झोंपड़े देखे, देखे हास-विलास मज़े के
संग्रह के सब विग्रह देखे, जँचे नहीं कुछ अपने लेखे
लालच लगा कभी पर हिय में मच न सका शोणित-उद्वेलन!
हम निकेतन, हम अनिकेतन

हम जो भटके अब तक दर-दर, अब क्या खाक बनाएँगे घर
हमने देखा सदन बने हैं लोगों का अपनापन लेकर
हम क्यों सने ईंट-गारे में हम क्यों बने व्यर्थ में बेमन?
हम निकेतन, हम अनिकेतन

ठहरे अगर किसी के दर पर कुछ शरमाकर कुछ सकुचाकर
तो दरबान कह उठा, बाबा, आगे जा देखो कोई घर
हम रमता बनकर बिचरे पर हमें भिक्षु समझे जग के जन!
हम निकेतन, हम अनिकेतन!
धरोहर

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