शोध: सङ्गीतोपयोगी स्वर - एक अन्य दृष्टिकोण

वागीशा शर्मा
(vsipdlin@gmail.com) इन्द्रप्रस्थ महाविद्यालय, दिल्ली

सारांश: शास्त्रीय सङ्गीत के स्वर सा, रे, ग, म, प इत्यादि व्यञ्जन होते हुये भी स्वर कहलाते हैं और उनकी सङ्ख्या भी सात ही निश्चित कर दी गई है जबकि वर्णमाला में तैंतीस व्यञ्जनों की उपस्थिति सर्वविदित है। यह व्यवस्था कुछ रहस्यमयी सी प्रतीत होती है। प्रस्तुत शोधपत्र में वैयाकरणिक और आध्यात्मिक तर्कों के माध्यम से इस रहस्य को खङ्गालने की चेष्टा की गई है। विषय की गहनता, नीरसता की सीमाओं को न छू पाये अतः चर्चा को ‘स्वर’ नाम के औचित्य तथा उनकी सङ्ख्या की सार्थकता तक ही सीमित कर दिया गया है जबकि सङ्गीत के स्वरों के लिए चयनित व्यञ्जनों और स्वरों के नामकरण का औचित्य भी काफ़ी रोचक विषयवस्तु है। इस चर्चा को अगले किसी शोधपत्र में प्रस्तुत करने की योजना विचाराधीन है।       

शब्द-सूत्र: नाद-ब्रह्म, आहत नाद, अनाहत नाद, शुद्ध स्वर, विकृत स्वर, व्यञ्जन, प्रणव, ओ३म्।

पृष्ठभूमि: सङ्गीतोयोगी सात सुरों (स्वरों) से तो सभी परिचित हैं। शास्त्रज्ञों द्वारा इन स्वरों का नामकरण भी कर दिया गया है: षड्ज (सा), ऋषभ् (रे), गान्धार (ग), मध्यम (म), पञ्चम (प), धैवत (ध) और निषाद (नि)। यहाँ कुछ विचित्र प्रश्न मन-मस्तिष्क में उभर कर आते हैं:
यही नाम क्यों? इन विशिष्ट नामों के पीछे क्या कोई विशेष प्रयोजन या रहस्य है?
देवनागरी लिपि  की वर्णमाला में ‘व्यञ्जन’ वर्ग के अधीन स्थान पाने के बावजूद सा, रे, ग, म, प, ध, नि - इन वर्णों को सङ्गीत में ‘स्वर’ क्यों मान लिया गया है?
वर्णमाला के 33 व्यञ्जनों में से इन्हीं सात व्यञ्जनों को ही ‘स्वर’ के रूप में क्यों चयनित किया गया?
सङ्गीतोपयोगी शुद्ध स्वरों की सङ्ख्या ‘सात’ ही क्यों है और विकृत स्वरों को मिलाकर सङ्ख्या ‘बारह’ तक ही क्यों परिमित कर दी गई?

आदि-आदि। अनेकों ऐसे अबूझ प्रश्न हैं जिनको यदि अनदेखा कर भी दिया जाए तो सङ्गीत जगत् की कोई हानि होती दिखाई नहीं पड़ती। परन्तु मानव मन है कि उलझनों में डूबा ही रहता है। आर्ष ग्रन्थों में छिपे रहस्यों को उद्घाटित करने का जितना भी प्रयास किया जाए वही कम रह जाता है और वे रहस्य उतने ही गूढ़तर होते चले जाते हैं। फ़िर भी इन अबूझ और गूढ़ रहस्यों के सरल प्रस्तुतीकरण का दुःसाहस विद्वत् समाज जब तब करता रहता है, और करता ही रहेगा। यह शोध पत्र भी इसी दिशा में उठाया गया एक दुस्साहसिक कदम है।
इस आलेख में सभी उपरोक्त प्रश्नों को समेट पाना तो सम्भव नहीं हो पाएगा लेकिन कुछेक पर तो चर्चा होगी ही। बाकी अछूते और सम्भवतः कुछ अन्य नए विषयों का प्रस्तुतीकरण भविष्य के किसी शोधपत्र में करने की योजना पर विचार जारी है।   

सङ्गीत में ध्वनि और लय का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। ध्वनि तो शोर और कोलाहल भी हैं लेकिन सङ्गीत में केवल मधुर ध्वनियाँ ही अपेक्षित है। ध्वनि को ही नाद का नाम भी दे दिया गया है। रूढ़ अर्थों में मधुर ध्वनियों को ही नाद मान लिया जाता है। शब्द, ध्वनि और नाद जनसाधारण को तो पर्यायवाची प्रतीत होते होंगे परन्तु दार्शनिकों और वैयाकरणिकों की दृष्टि में इनका पृथक्-पृथक् अस्तित्व है। इस पृथकत्व को समझने के लिए भाषाविज्ञान और दर्शन की गहराइयों में डूबना-उतरना होगा।

व्युत्पत्तिपरक अर्थ में ‘सम्यक् रूपेण गीतं इति सङ्गीतम्’ अर्थात् भली प्रकार जो गीत गाया गया वह सङ्गीत है। दूसरे अर्थों में जो गीत रस और भावनाओं के प्राधान्य से तथा वाद्यों से अलङ्कृत करके गाया जाए वह सङ्गीत बन जाता है। अतः सङ्गीत की चर्चा में गीत की प्रधानता रहती है। शार्ङ्गदेव [2] भी मानते हैं:
गीतं च वादनं नृत्तं तद्देशीत्यभिधीयते।
नृत्तं वाद्यानुगं प्रोक्तं वाद्यं गीतानुवर्ति च॥
अर्थात् नृत्य वाद्य का अनुकरण करने वाला है एवं वाद्य गीत का अनुकरण करने वाला होता है, इसलिए गीत प्रधान है, जिसका वर्णन किया जाता है।
नारदकृत पञ्चमसार संहिता [7] के मतानुसार कोई भी गीत धातु और मातु के योग से ही बनता है।  धातु का स्वरूप नादात्मक होता है और अक्षर समूह को मातु कहा जाता है:
धातुमातु समायुक्तं गीतनित्याभिधीयते।
तत्र नादात्मको धातुर्मातुस्त्वक्षर सञ्चयः॥

अतः सङ्गीत के स्वरों की महत्ता का रहस्य हम धातु अर्थात् नाद और मातु अर्थात् अक्षर के गहन विश्लेषण में ढूँढने का प्रयत्न करेंगे।

नाद (धातु) तथा स्वर: भारतीय दर्शन के अनुसार ‘शब्द’ या ‘नाद’ आकाश का गुण है। जब ईश्वर ने मानस सृष्टि की कल्पना की तो सबसे पहले सूक्ष्मतम तत्व ‘आकाश’ (Ether) का निर्माण किया। इसके बाद क्रमशः अन्य चार तत्व ‘वायु’, ‘अग्नि’, ‘जल’, और ‘पृथ्वी’ निर्मित हुए। वायु में ‘शब्द’ और ‘स्पर्श’ दोनों गुण हैं। अग्नि में ‘शब्द’ और ‘स्पर्श’ के साथ ‘रूप’ का भी समावेश है तथा जल, अग्नि के सभी गुणों के साथ-साथ ‘रस’ से भी व्याप्त है। पृथ्वी, सभी पाँच गुणों – शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध को समाहित करती है। सारांशतः ‘शब्द’ सभी पञ्च भूतों में उपस्थित रहता है।

सामान्य जन के लिए ‘शब्द’ वर्णों का सार्थक समूह है परन्तु संस्कृत वैयाकरणिकों के अनुसार ‘शब्द’ में अक्षर वर्ण होना आवश्यक नहीं है। कोई वर्ण न होने पर भी शब्द का अस्तित्व बना रहता है क्योंकि वह पञ्च भूतों में उपस्थित है। तो प्रश्न उठता है कि यह ‘शब्द’ क्या है? वाक्यपदीय ([1] से उद्धृत) के अनुसार वक्ता की इच्छा के अनुरूप जब आन्तरिक वायु सक्रिय हो कर कण्ठ, तालु आदि से टकराती है तो अभिघात से यह वायु ‘शब्द’ बन जाती है:
लब्धक्रियः प्रयत्नेन वक्तुरिच्छानुवर्तिना।
स्थानेष्वभिहतो वायुः शब्दत्वं प्रतिपद्यते॥
इससे ये अभिप्रेत है की शब्द अन्तःस्थल में विद्यमान था लेकिन श्रवणीय शब्द की उत्पत्ति के लिए अभिघात की आवश्यकता हुई। यह श्रवणीय ध्वनि अभिघात-प्रणीत होने के कारण आहत नाद कहलाती है जबकि जो अन्तःस्थल में विद्यमान शब्द था उसे अनाहत नाद का नाम दे दिया गया। आचार्य मातङ्ग [8] और आचार्य शार्ङ्गदेव [2] दोनों ने ही शब्द की उत्पत्ति का कारक प्राणवायु (vital breath) तथा अग्नि (heat-energy) को माना है। क्योंकि प्राण को ‘नकार’ और ‘दकार’ को अग्नि माना जाता है अतः प्राण और अग्नि के संयोग से उत्पन्न होने से शब्द ही नाद है।

आचार्य मातङ्ग ‘बृहत्द्देशी’ [8] में अनाहत नाद से उत्पन्न होने वाली पाँच ध्वनियों का वर्णन करते हैं: सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म, व्यक्त, अव्यक्त और कृत्रिम। अवचेतन मन में स्थित अनाहत नाद, ध्वनि का ‘सूक्ष्म’ रूप है। इस सूक्ष्म रूप की हृदय में अभिव्यक्ति, ध्वनि का ‘अतिसूक्ष्म’ रूप कहलाता है। यही जब कण्ठ में पहुँचती है तो ‘व्यक्त’ मानी जाती है और तालु पर स्थान पा कर ‘अव्यक्त’ बन जाती है। मुख से उच्चरित होने पर यही अव्यक्त ध्वनि ‘कृत्रिम’ ध्वनि में परिवर्तित हो जाती है। इसे ही  वैखरी वाणी कहा जाता है। लौकिक संसार के सभी कार्यकलापों में यही प्रयुक्त होती है। किसी भी गीत में प्रयुक्त वर्णों के सार्थक समूह से बने शब्द भी नाद का वैखरी रूप ही है। इन शब्दों को मनोरञ्जक बनाने हेतु लय और ताल में निबद्ध कर लिया जाता है और सङ्गीत का निर्माण हो जाता है। आलापों और तानों में भी ‘आ’कार या ‘न’कार इत्यादि वर्ण ही मौजूद रहते हैं। घण्टी की आवाज़ के लिए टन टन टन; तबले पर धा, धिन, तिन; सितार, सरोद, वायलिन इत्यादि से उत्पन्न विभिन्न प्रकार के नाद को पृथक्-पृथक् वर्ण-समूहों की सहायता से वर्णित किया जाने का प्रचलन है। तराना में प्रयुक्त, निरर्थक प्रतीत होने वाले नोम, तोम, दीम, तनन जैसे शब्दों की सार्थकता का भी विशद विवरण उस्ताद आमिर ख़ान [10] के आलेख में मिलता है।

वैयाकरणिकों के अनुसार सृष्टि की परिकल्पना के समय नटराज (अर्थात् भगवान् शिव) ने अपने नृत्य की समाप्ति पर सनकादि ऋषियों को आशीर्वाद देते हुए अपने डमरू को नौ बार और पाँच बार, क्रमशः दाहिने और बाएँ पैर पर खड़े रह कर, कुल चौदह बार बजाया। उससे जो चौदह ध्वनियाँ निकलीं उन्हें आचार्य पाणिनी द्वारा लिपिबद्ध कर लिया गया जो शिव-सूत्र या माहेश्वर-सूत्र कहलाते हैं:
नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद ढ्क्वां नवपञ्चवाराम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्॥
एक अन्य मान्यता के अनुसार संस्कृत व्याकरण के जन्मदाता आचार्य पाणिनी की कठोर उपासना से प्रसन्न हो कर भगवान शिव ने अपने डमरू को चौदह बार बजाया। इन चौदह अभिघातों से जो ध्वनियाँ उत्पन्न हुईं, आचार्य पाणिनी ने उन्हें लिपिबद्ध कर लिया और उन्हीं से वर्णों का जन्म हुआ।

दोनों ही स्थितियों में ध्वनियाँ भगवान शिव के डमरू से ही उत्पन्न हुई हैं (यानि वाद्य-प्रणीत हैं) और आचार्य पाणिनी ने ही उन्हें लिपिबद्ध करके माहेश्वर सूत्र (शिव सूत्र) के रूप में प्रस्तुत किया है [6]। ये सूत्र इस प्रकार हैं:
अइउण्॥१॥ ऋलृक्॥२॥ एओङ्॥३॥ ऐऔच्॥४॥ हयवरट्॥५॥ लँण्॥६॥ ञमङणनम्॥७॥ झभञ्॥८॥ घढधष्॥९॥ जबगडदश्॥१०॥ खफछठथचटतव्॥११॥ कपय्॥१२॥ शषसर्॥१३॥ हल्॥१४॥
स्वयंसिद्ध है कि किसी भी अभिघात में पहले ध्वनि सुनाई देती है और उसके पश्चात उस ध्वनि का अनुरणन (Resonance) होता है। इसीलिए डमरू से उत्पन्न क्षणिक ध्वनि के अनुरणन को वर्ण नहीं माना जा सकता। इस व्यवस्था को लघुसिद्धान्तकौमुदी [5] के संज्ञाप्रकरण में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है:
हलन्त्यम् ।१।३।३॥  तस्य लोपः ।१।३।९॥
अर्थात् – अन्तिम हल् इत्सञ्ज्ञक होता है ।१।३।३॥ उस इत्सञ्ज्ञक का लोप होता है ।१।३।९॥
फलतः उपरोक्त सभी सूत्रों के अन्तिम हल् का लोप होने के बाद पहले चार माहेश्वर सूत्रों में संस्कृत वर्णमाला या देवनागरी लिपि के स्वर हैं तथा बाद के दस सूत्र व्यञ्जनों को जन्म देते हैं। यहाँ ‘जन्म देना’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि क् ख् ग् इत्यादि की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। कारिकावलि ([1] से उद्धृत) के अनुसार ‘शब्द’ जिस क्षण उत्पन्न होता है उसके अगले क्षण स्थिर रहता है और तीसरे क्षण विनष्ट हो जाता है। इसीलिए वर्णमाला में सभी व्यञ्जन “क्षणिक शब्द + अ = वर्ण”, के नियम का अनुसरण करते हैं। यथा, क् + अ = क, ख् + अ = ख, आदि, ताकि उनका क्षय न होवे।

स्पष्टतः ‘शब्द’ यानि व्यञ्जनों की स्थिरता बनाए रखने के लिए स्वरों की आवश्यकता होती है जबकि स्वर तो स्वयं ही रञ्जित रहता है: ‘स्वयमेव रञ्जति इति स्वरः’। अन्य शब्दों में, स्वर ही वर्णमाला के अस्तित्व का आधार हैं। स्वरों की उपस्थिति में वर्णों का क्षय नहीं होता इसीलिए इन वर्णों को ‘अक्षर’ भी कहा जाता है: ‘अक्षरं न क्षरं विद्यात् – न क्षीयते, न क्षरतीति वाsक्षरम्’ अर्थात् जो कभी क्षरित या विनष्ट न होवे वह अक्षर है। इन अक्षरों के सार्थक समूह से भाषा-विषयक शब्दों का निर्माण होता है जो वस्तुतः परोक्ष रूप में आकाश तत्वात्मक शब्द या धातु ही हैं। अतः आहत नाद यानि ध्वन्यात्मक वर्ण-समूहों को स्थायित्व प्रदान करने के लिए स्वरों की आवश्यकता रहती है। क्योंकि सङ्गीत आहत नाद के माध्यम से अनाहत नाद की प्राप्ति का साधन है इसलिए सङ्गीतोपयोगी स्वर, व्यञ्जन होकर भी स्वरों के नाम से विख्यात हो कर आहत नाद की निरन्तरता और स्थायित्व के परिचायक बनते हैं और शब्द-ब्रह्म रूपी अनाहत नाद के अक्षुण्ण अस्तित्व के द्योतक हैं।

सङ्गीतोपयोगी स्वरों की सङ्ख्या: इस्लामिक धारणा [3] है कि प्राचीन काल में हज़रत मूसा पैगम्बर नाव की सैर कर रहे थे। उसी समय उन्हें एक पत्थर दिखाई दिया। अचानक जैवरायूल नामक एक फरिश्ता आया और उसने पैगम्बर से कहा की इस पत्थर को तुम सदा अपने पास रखना। कुछ दिन बाद मूसा ने उसी जगह सैर करते हुए प्यास से व्याकुल होकर जल के लिए ख़ुदा से बन्दगी की। परिणामतः वर्षा होने लगी। पानी के पड़ते ही उस पत्थर के टुकड़े हो गए और उससे पानी की सात धाराएँ बह निकलीं जिनसे अलग-अलग ध्वनियाँ फूटीं, यही ध्वनियाँ सात स्वर मानी गईं।

भाषा-विज्ञान की दृष्टि से देखें तो उपरोक्त वर्णित पहले चार माहेश्वर सूत्रों में इत्सञ्ज्ञक का लोप होने के बाद जो स्वर बचते हैं वे हैं – अ, इ, उ, ए, ऐ, ओ, औ, इनकी सङ्ख्या सात ही है। उपरोक्त चर्चा के अनुसार स्वर ही वर्णमाला का आधार हैं। अतः ‘मातु’ का आधार ये सात स्वर ही बने। सङ्गीत का आधार भी परोक्ष रूप से ये सात स्वर ही माने गए हैं। यहाँ ‘ऋ’ और ‘लृ’ विशिष्ट स्वर हैं जो बनते नहीं अपितु सिर्फ सुने जाते हैं - ”ऋ – लृ श्रुत्याः” [6] अतः मुख्य स्वरों में इनकी गणना नहीं की जाती। यदि वर्णमाला के सभी स्वरों को लिया जाए तो वे हैं - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, इनकी सङ्ख्या बारह है। यहाँ नए सम्मिलित पाँच स्वर - आ, ई, ऊ, अं, अः, बाकी सात स्वरों के रूप में व्यक्त किये जा सकता है। अतः ये शुद्ध स्वर न होकर शुद्ध स्वरों का विकृत रूप हुए। निष्कर्षतः सात स्वर शुद्ध और पाँच स्वर विकृत स्वर बने। अतः सङ्गीत शास्त्र में प्रावधानित बारह स्वरों में भी सात को शुद्ध और पाँच को विकृत स्वर माना गया है और कुल स्वर सङ्ख्या बारह निर्धारित कर दी गई।

ध्यान देने योग्य बात यह हे कि यदि ऋ और लृ को भी सम्मिलित किया जाए तो तो स्वर सङ्ख्या चौदह पहुँच जाती है। परिणामतः निषाद के दोनों विकृत रूप – काकली और कैशिकी तथा गान्धार के दोनों विकृत रूप - अन्तर गान्धार और साधारण गान्धार की सार्थकता भी स्वतः स्थापित हो जाती है। परन्तु ऋ और लृ को मुख्य स्वर न माने जाने के कारण गान्धार और निषाद, दोनों के ही एक-एक विकृत स्वरूप को ही सङ्गीतोपयोगी स्वरों की मुख्य धारा में मान्यता दी जाती है। इसलिए किसी भी राग में नि और ग के दोनों-दोनों विकृत रूपों को स्थान नहीं देने की परम्परा है।

भारतीय परम्परा में सङ्ख्या ‘सात’ एक विशिष्ट स्थान रखती है - सात द्वीप, सात नदियाँ, सप्त-ऋषि, सात ग्रह, सप्त-लोक, सप्त-पाताल, सप्त-यौगिक चक्र, सप्त रङ्ग, सप्त वायु, सप्त भूत, सप्त-धातु, सात स्वर, आदि-आदि। सङ्गीत रत्नाकर [2] में भी सङ्ख्या सात का प्रयोग प्रचुर है यथा पिंडोत्पत्ति-प्रकरण में सात प्रकार की देह [२-७२], सात धातुओं: त्वचा, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्ल [२-७६] और सात आशयों: रक्ताशय,ष्लेमाशय, आमाशय, पित्ताशय, पक्वाशय, वाताशय, मूत्राशय [२-८१] का प्रसङ्ग है।

आध्यात्मशास्त्र के अनुसार ये विलक्षण ‘सात’, अन्य कुछ भी नहीं अपितु प्राणीमात्र के चैतन्य की सात अवस्थाएँ हैं। शरीर में सञ्चेतना (consciousness) एक विद्युत तरङ्ग की भाँति प्रवहमान है। ये इङ्गित सप्त अवस्थाएँ इसी तरङ्ग के विभिन्न आयाम (amplitudes) कहे जा सकते हैं। जिस प्रकार तरङ्ग के गतिमान रहने के लिए उसका ऊपर उठना और नीचे आना स्वाभाविक है उसी प्रकार प्राणी का चित्त भी मानसिक सञ्चेतनाओं के अभिभूत हुआ विभिन्न अवस्थाओं को प्राप्त होता है। इनमें से कुछ अवस्थाएँ क्षणिक हो सकती हैं, कुछ ऊर्ध्वोन्मुखी हो सकती हैं और कुछ अधोन्मुखी।  व्यक्ति के बौद्धिक और मानसिक विकास के साथ-साथ इनमें से कुछ स्थिरता को प्राप्त कर जीवात्मा के मन-मस्तिष्क को जीवन-पर्यन्त प्रभावित करती रह सकती हैं।
योग-शास्त्र में प्राणिमात्र की यही सञ्चेतना, कुण्डलिनी शक्ति या प्राण-ऊर्जा के रूप में जानी जाती है। मूलाधार चक्र से उठकर स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत (ह्रदय) चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र को स्पन्दित करती हुई यह कुण्डलिनी शक्ति (प्राण-ऊर्जा) सातवें चक्र – सहस्त्रार चक्र तक प्रवाहित होकर भौतिक या स्थूल शरीर का मन और आत्मा यानि सूक्ष्म शरीर के साथ तादात्म्य सुनिश्चित करती है। जब व्यक्ति लौकिकता से आध्यात्मिकता के ओर बढ़ता है तो ऊर्ध्वोन्मुखी सञ्चेतना स्वरों के आरोही क्रम से तादात्म्य स्थापित करती है परन्तु आध्यात्मिकता से विमुख हो कर लौकिक व्यवस्थाओं की ओर आकृष्ट होना ही स्वरों का अवरोही क्रम दर्शाता है। कुछेक विद्वानों के मतानुसार मूलाधार चक्र से नीचे की ओर, व्यक्ति के पैरों तक भी इसी प्रकार के सात चक्र उपस्थित रहते हैं। नख से शिख तक फैले इस सञ्चेतना–जाल में प्राण ऊर्जा के सञ्चालन के फलस्वरूप स्थूल शरीर स्पन्दित होता रहता है। इस स्पन्दन के परिणामस्वरूप उत्पन्न ऊर्जा ही नाद की कारक है। योगियों का मानना है कि शरीर में अनाहत नाद का स्थान शरीर में स्थित यौगिक सप्तचक्रों में से एक चक्र, ब्रह्मग्रन्थि है। सङ्गीत रत्नाकर [2] भी इस मत का समर्थन करता है - विवक्षमाण आत्मा मन को प्रेरित करता है तथा जठराग्नि को ताड़ित करता है। वहाँ ब्रह्मग्रन्थि में स्थित वायु, क्रम से ऊर्ध्व-पथ मे विचरण करता हुआ नाभि, हृदय, कण्ठ, मूर्धा, तथा मुख में ध्वनि उत्पन्न करता है।
आत्मा विवक्षमाणोsयं मनः प्रेरयते मनः।
देहस्थं वह्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥
ब्रह्मग्रन्थिस्थितः सोsथ क्रमादूर्ध्वपथे चरन्।
नाभिहृत्कण्ठमूर्धास्येष्वाविर्भावयति ध्वनिम् ॥
निष्कर्षतः ब्रह्मग्रन्थि में विद्यमान यह अनाहत नाद ही प्राण-ऊर्जा का कारक है। इस प्राण-ऊर्जा के माध्यम से अनाहत नाद (causal form) का आहत नाद (gross form) अर्थात ध्वन्यात्मक शब्दों में परिवर्तित होना और फिर इसी आहत नाद का ब्रह्माण्ड अर्थात् आकाश-तत्व यानी अनाहत नाद में लीन हो जाना ही सृष्टि का नियम है। योग की भाषा में इसे ओ३म्, प्रणव या ब्रह्म से उत्पन्न होकर उसी में लय हो जाना माना गया है ‘लिङ्गात्मकं स चराचर विश्वरूपम्’।

परन्तु मानव, इन्द्रियों के वशीभूत होकर विषय-वासनाओं में इतना आसक्त हो जाता है कि वह इस अनाहत नाद से पूर्णतः अनभिज्ञ ही रहता है। इस नाद को जानने और सुनने के लिए व्यक्ति को अन्तर्मुखी होने की आवश्यकता होती है। ऐन्द्रिक सुखों को तिलाञ्जलि देकर जब साधक अन्तर्मुखी हो कर इस नाद की अनुभूति करता है तो वह लौकिक संसार में उपस्थित रहता हुआ भी मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है, और इस अनाहत नाद से रूबरू हो कर परमतत्व के दर्शन करता है। यह स्वयम्भू अनाहत नाद ही शब्द-ब्रह्म, नाद-ब्रह्म, या स्फोट कहलाता है। यह अनाहत नाद ही ईश्वर की सत्ता का पर्याय है, परमतत्व है, प्रणव (ॐ) है, ब्रह्म है - ॐ इति एकाक्षरं ब्रह्म। सृष्टि में उद्भूत सभी नाद अन्ततः ‘ओ३म्’ या ॐकार से ही  उत्पन्न होकर ॐकार में ही विलीन हो जाते हैं। आचार्य उदयवीर शास्त्री [4] ‘ओ३म्’ पद के तीन वर्णों – अकार से आनन्द, उकार से चित् तथा मकार से सत् की अभिव्यक्ति मानते हैं। परिणामस्वरूप ‘ओ३म्’ सच्चिदानन्द अर्थात् परमात्मा का ही पर्याय बन जाता है। फलतः परब्रह्म, जीवात्मा में शब्द-ब्रह्म के रूप में विद्यमान रहता है और इसीलिए नाद-ब्रह्म या शब्द-ब्रहम ईश्वरतुल्य, वन्दनीय और स्तुत्य है।

नादबिन्दूपनिषद् [9] इस अनाहत नाद रूपी ओ३म् की चार मात्राओं (अकार, उकार तथा मकार और चतुर्थ अर्ध-मात्रा) की, प्रति मात्रा तीन कला के आधार पर, कुल बारह कलाओं का वर्णन करता है। सम्भवतः यही बारह कलाएँ इस प्रणव रूपी नादब्रहम के शुद्ध और विकृत बारह स्वर हैं। 

निष्कर्षतः आध्यात्मिक और भाषावैज्ञानिक - दोनों ही प्रकार के तर्कों से यह स्पष्ट होता है कि सङ्गीत के स्वरों का ‘स्वर’ कहलाना और इन स्वरों की सङ्ख्या को सात या बारह निर्धारित करना, दोनों ही व्यवस्थाएँ प्रयोजनमूलक भी हैं और सार्थक भी। इसीलिए सङ्गीत-साधना ईश्वर-प्राप्ति का सिद्ध मार्ग माना गया है। साधक की चितवृत्ति की सात्विकता और आध्यात्मिकता उसके स्वरों को अत्यन्त सम्मोहक बना देती है। स्वरों के इस सम्मोहन और आकर्षण में श्रोता डूबता-उतराता हुआ सच्चिदानन्द परब्रहम परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करता है और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की सार्थकता से अभिभूत हुआ मानसिक शान्ति का अनुभव करता है। यही सङ्गीत चिकित्सा (Music Therapy) का रहस्य भी है।

सन्दर्भ-सूची 
[1] आचार्य, डा॰ सुद्युम्न: दर्शन शास्त्र की परम्परा में भौतिक विज्ञान, परिमल पब्लिकेशन्स प्राइवेट लिमिटेड, 2015.
[2] गर्ग, डा॰ लक्ष्मीनारायण (अनुवादक): आचार्य शार्ङ्गदेव रचित सङ्गीत रत्नाकर – भाग एक, सङ्गीत कार्यालय, हाथरस, 2002.
[3] शर्मा, डा॰ पञ्कजमाला: सामगान, कात्यायन वैदिक साहित्य प्रकाशन, होशियारपुर, 1996.
[4] शास्त्री, आचार्य उदयवीर: पातञ्जल योगदर्शनम्, स्वामी विज्ञानान्द सरस्वती विरजानन्द वैदिक (शोध) संस्थान, उत्तर प्रदेश, 1978.
[5] शास्त्री, भीमसेन: लघुसिद्धान्त कौमुदी (भैमीव्याख्या-पूर्वार्धम्), भैमी प्रकाशन, दिल्ली, 1983
[6] सिंह, जयदेव: शिव-सूत्र (अङ्ग्रेज़ी अनुवाद), मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, 2012.
[7] सिंह, गुरु विपिन (सम्पादक), नारदकृत पञ्चमसारसंहिता तथा दामोदरसेन कृत सङ्गीतदामोदर: मणिपुरी नर्तनालय, कलकत्ता, 1984.
[8] आचार्य मातङ्ग कृत बृहत्द्देशी: https://ia801602.us.archive.org/27/items/Mus-SourceTexts/TxtSkt-bRhaddESI-of-matangamuni-Tvm-Xrx-0014.pdf
[9] नादबिन्दूपनिषद्: http://sanskritdocuments.org.
[10] Khan, Amir: The Tarana Style of Singing, Music East and West, Conference Proceedings, Ed. Roger Ashton, ICCR, 1966.

2 comments :

  1. दीर्घ्कालोपरांत एक बहुत अच्छा शोधपत्र पढ़ने को मिला | वागीशा जी को साधुवाद ! कुछ प्रश्न हैं जिन्हें बाद में जिज्ञासा समाधान हेतु प्रस्तुत करूंगा |

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