साक्षात्कार: रत्नाकर नराले

भारतीय संस्कृति, कला के प्रसारक, कैनेडावासी श्री रत्नाकर नराले जी से विदुषी मृदुल कीर्ति की वार्ता 


डॉ. मृदुल कीर्ति
1. रत्नाकरजी, आपका संक्षिप्त परिचय?

     मैं गत 50-वर्ष से टोरंटो, कनाडा में निवासी हूँ और गीता, रामायण, योग, संगीत, हिंदी, संस्कृत एवं भाषा तथा भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार कार्य में कटिबद्ध हूँ। मैं रायर्सन युनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाता हूँ। मैंने गीता, रामायण, योग, संगीत, संस्कृत, हिंदी,  तमिल, उर्दू, बांग्ला, मराठी आदि सीखने की पुस्तकें कई लिखी और लगभग 35 पुस्तकें एमेजोन पर प्रकाशित की हैं।

     मैं नागपुर के पास वाले काटोल नामक गाँव से आता हूँ। मैंने नागपुर विश्वविद्यालय से B.Sc., पुणे से, M.Sc., IIT खड़गपुर से Ph.D. और कालिदास संस्कृत युनिवर्सिटी नागपुर से भी Ph.D. की है। मेरी मातृभाषा मराठी है, अतः मराठी से अतिरिक्त अन्य सभी भाषाएँ, संगीत व कलाएँ पिछले पचास वर्ष में विद्यादेवी की कृपा से कैनेडा में ही स्वयंपठित अवगत की हैं।

     मेरी हिंदी गीत रचनाओं का भारत के अनेक महान संगीत महारथियों ने प्रमाणपत्रों द्वारा समर्थन किया है, जैसे कि - भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खान परिवार, पद्मभूषण पं. देबू चौधुरी, पद्मविभूषण अमजद अली खान, पद्मश्री उस्ताद ग़ुलाम सादिक खान, उस्ताद रशीद मुस्तफा थिरकवा, पद्मभूषण उस्ताद साबरी खान, पं. बिरजू महाराज, और कई।

2. आपने कितनी पुस्तकें लिखी और उनमें कौनसी हिंदी पुस्तकें विशेषतम हैं

रत्नाकर नराले
मैंने 35 से आधिक पुस्तकें लिखी हैं, उनमें से संगीत-गीतादोहावली और संगीत-श्री-कृष्ण-रामायण महाकाव्यकाव्य-जगत में अनूठी व विशेषतम रचनाएँ हैं।

संगीत-गीतादोहावली कदाचित विश्व की सबसे दीर्घ संगीतमय हिंदी कविता है। गीता की अन्य अनुवाद-टीकाऔं में जो नहीं है या संदिग्ध है वह इसमें स्पष्ट किया गया है।

संगीत-श्री-कृष्ण-रामायण एक इतिहास रचनेवाला “न भूतो न च भविष्यति” प्रमाण का महाकाव्य है। काव्य परम्परा में नवरसों युक्त विभिन्न छन्दों व संगीतात्मक गीतों की सुरलिपि से सुसज्जित यह अद्भुत ग्रंथ है जिसमें प्रेरक, शिक्षाप्रद तथा नैतिक लघु कथाएँ विभिन्न दृष्टान्तों के साथ नूतन रूप में प्रस्तुत की गईं हैं। इसमें कहीं भगवान श्रीकृष्ण की अलौकिक बाल क्रीड़ाओं की झाँकी मन को सम्मोहित करती है, कहीं योगेश्वर श्रीकृष्ण के रूप में किंकर्तव्य विमूढ़ मानव को ज्ञान, कर्म व भक्ति का संदेश देकर उसकी अन्तर्चेतना को जगाते हैं। कहीं मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पुरुषार्थ का आदर्श प्रस्तुत करती हैं, कहीं श्रीरामभक्त हनुमान की श्रद्धा, निष्ठा व स्वामीभक्ति का त्रिवेणी संगम भक्ति रस में अवगाहन कराता है, तो कहीं राधा और सीता के दैवी रूप। इस कविता को रागनियोंसे परिपूर्ण भजन, गीत, आरती, कीर्तन, कीर्जन, ग़ज़ल, मुक्तक अपने विभिन्न रंग की छटा के स्वरबद्ध गीतों से आदि से अन्त तक ओतप्रोत सज़ाया है। राम-कृष्ण कथाओं का इतना सुंदर, मधुर, सुव्यवस्थित और संगीतमय नवीनतम वर्णन अन्यत्र नहीं है। इस महाकाव्य में त्यौहार, योग, कर्म, तत्त्वज्ञान, आत्मज्ञान, नारी शक्ति, निसर्ग वर्णन, भारत दिग्दर्शन आदि के जितने और जितने सुंदर नये पद्य पाये जाते हैं, उतने और कहीं नहीं। कलेवर बड़ा होने के कारण कविता दो भागों में पुस्तकस्थ है।

3. राम-कृष्ण की तो कई कथाएँ उपलब्ध हैं, तो वहीं कथाएँ फिर से क्यों?

इसका उत्तर दो परतों में है। पहला यह, कि बचपन से ही उपलब्ध कथाएँ पढ़ कर या चलचित्रों में देख कर मुझे उन घटनाओं का अन्त अविचारपूर्वक लगता था। अस्वस्थ हो कर सोचता था कथाएँ फिर से लिखूँ, फलस्वरूप आज यह मधुर महाकाव्य प्रस्तुत है। कुछ उदाहरण देखिए - मथुरा में कंस का सब बच्चों को मार डालना, गोकुल में कृष्ण का माखन-मटकी फोड़ना, वृंदावन में विषैले कालिया का जन-पशु-पक्षी को मार डालना, गोवर्धन की कथा में अतिवृष्टि से घर-जन-पशु की हानि, लंका-दहन में संपूर्ण लंका का भस्म होना, हनुमान का अशोक-वाटिका उध्वस्त करना, राम-कृष्ण के हाथों मर कर लोगों का नरक लोक में जाना, आदि अनेक। मेरे सुविचार में इन सभी घटनाओं में कथा का अन्त अविचारपूर्वक किया गया है। मेरा मत है कि न तो भगवान के हाथों कोई भी हानि होती है न ही भगवान के हाथों मरा या राम-कृष्ण की सेवा में मरा हुआ कोई भी अधोगति में जा सकता है। अतः मैंने वहीं कथाएँ सुविचारपूर्वक नए रूप में लिखीं हैं। दूसरा कारण, पूर्णरूप से छंद-राग-संगीतमय कथाएँ पहले कभी नहीं लिखी गई।

4. आपकी कृष्णायन व रामायण की नई कथाओं का स्वरूप कैसा है?

इस कविता की 233 कथाएँ हैं। प्रत्येक कथा के आरंभ में उस कथा का निष्कर्ष किसी नई छंद रचना में और फिर श्लोक में कहा है, फिर शिव-पार्वती या गणेश का वंदना गीत, फिर दोहे-चौपाइयों में कथा का एक भाग और उसका नोटेशन के साथ रागबद्ध गीत, फिर उसी प्रकार से कथा के अन्य भाग, बीच में शार्दूलविक्रीडित, वसंततिलका, शिखरिणी, पृथ्वी, भुजंगप्रयात, फटका आदि किसी सुंदर छंद में समयोचित पद्य हैं, और कथा के अंत में कहरवा या दादरा ताल में उस संपूर्ण कथा का सारांश गीत। इस शैली से कथाओं का स्वरूप सजाया है।

5. कवियों के लिए ज्ञातव्य बात क्या है?

इस ग्रंथ के आरंभ का संज्ञा-प्रकरण संगीत की बुनियाद अवगत करने वालों के लिए इससे अच्छा पद्यमय सोदाहरण अनन्य भंडार और कहीं नहीं मिलेगा. इस पुस्तक में 450 से अधिक छंदों की व 60 से अधिक रागों की दोहाबद्ध व्याख्याएँ सोदाहरण स्पष्ट की हैं। राग-छंद की रुचि रखने वाले कवि और प्रेमियों के लिए यह एक अथाह अलंकार सागर है।

6. आपकी सर्वाधिक मनपसंद छंद-रचनाएँ कौनसी हैं?

मेंने 450 से अधिक छंदों में पद्य प्रस्तुत किये हैं उनमें से मेरे सर्वाधिक मन पसंद छंद हैं शार्दूलविक्रीडित, वसंततिलका, शिखरिणी, पृथ्वी, भुजंगप्रयात, फटका और कुंडलिया। इन छंदों के अनेक सुंदर पद्य इस कविता में यथोचित दिए हैं।


7. आपकी सर्वाधिक मनपसंद राग-रचनाएँ कौन सी हैं?

मेंने 60 से अधिक रागों में नोटाशन के साथ भजन, गीत, आरती, कीर्तन, कीर्जन, ग़ज़ल आदि प्रस्तुत किये हैं उनमें से मेरे सर्वाधिक मन पसंद राग हैं आसावरी, पीलू, भैरवी, मालकंस, वृंदावनी-सारंग, काफी, देस, दरबारी, बसंत, दुर्गा, खमाज, केदार, बागेश्री, जौनपुरी, आदि। इन रागों के अनेक सुंदर गीत इस कविता में प्रस्तुत हैं। याद रहे कि “कीर्तन” हमारा अपना संगीत शैली का एक आविष्कार है। इस महाकाव्य में श्री राम, सीता, कृष्ण, राधा, सुदामा, हनुमान, शिवजी, गौरी, विष्णु, लक्ष्मी, गणेश, दत्त, लव-कुश, सरस्वती, गंगा, गुरु, त्यौहार, योग, कर्म, तत्त्वज्ञान, आत्मज्ञान, नारी शक्ति, देववाणी, राष्ट्रभाषा, निसर्ग वर्णन, भारत दिग्दर्शन आदि के जितने और जितने सुंदर नये लिखे हुए गीत पाये जाते हैं उतने और कहीं नहीं।

8. अपने महाकाव्य का संक्षिप्त सामाजिक मूल्यांकन कीजिए

आज-कल के अवगुण और अश्लीलता का समर्थन करने वाले और कर्कशता का विष उगलने वाले गीत-संगीत को प्राधान्यता पाने वाले कलियुग में सत्-युग की सभ्यता को फिर से उचित स्थान देने वाले इस हिंदी-संगीत-महाकाव्य के बारे में आरंभ के ही सर्वप्रथम गीत (1/765) में स्पष्ट किया है किः

इसमें वो है जो करने सही है, अवगुणों की प्रशंसा नहीं है।
वेद-शास्त्रों का आशय यही है, ऋषि-मुनियों ने गाया वही है।।

अतः इस राग-छंद-बद्ध गीत-संगीत के विशाल सिंधु में उच्च भारतीय संस्कृति व निष्ठा का ऐसा कोई अहम पहलू नहीं है, ऐसा कोई बड़ा त्यौहार नहीं है, ऐसी कोई पवित्र वस्तु नहीं है, ऐसा कोई पूज्य देव-देवता नहीं है जिस पर यहाँ नोटेशनयुक्त गीत या छंद प्रस्तुत नहीं किया गया हो। यह समाज के हित के लिए अमूल्य बात है।

इसी लिये एजैक्स के हनुमान मंदिर के पं. रविंद्रनाथ तिवारी जी, मिसिसागा के सारेगम-अखिल-संगीत-अकादमी की संगीत-विशारद रसिका जोग जी, हिंदु-स्वयंसेवक-संघ ब्राम्पचन के प्रधान श्री राजकुमार शर्मा जी, तथा पनवार म्यूज़िक-डांस-प्राडक्शन के 2016 के हेमंत व वैशाली पनवार जी ने भी सराहना की है। हिंदी-राइटर्स-गिल्ड के श्री विजय विक्रांत जी लिखते हैं, “हारमोनियम तथा तबले पर संगीत सीखने, सिखाने एवं काव्यानंद लेने की यह एक ऐसी अनोखी पुस्तक है जिसमें सारी नई रचनाएँ रागबद्ध धुनों के साथ प्रस्तुत की गई हैं। संगीत विषय का शायद ही कोई पहलू होगा जो इस ग्रंथ में न हो”।

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खान ट्रस्ट के उस्ताद नाज़िम जी वाराणसी से लिखते हैं, “श्री रत्नाकर जी ने बंदिशों की रचना को यों शब्दों में ढ़ाला जो कि अपने आप में भविष्य में एक मिसाल कायम करने वाला है”। नई दिल्ली से पद्मभूषण अमजद अली खान और पद्मश्री उस्ताद ग़ुलाम सादिक खान ने भी लिखा है, “My heartiest congratulations to Shri Ratnakar Narale for his wonderful lyric.”

      एक और विशेष सामाजिक बात यह कि, यह पुस्तक कैनेडा में लिखी गई है इस लिए देवनागरी न जानने वाले यहाँ के हमारे युवकों-बुजुर्गों के लाभ के लिए इस संपूर्ण बृहत महाकाव्य में हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी भाषांतर भी दिया हुआ है।

       अतः यह महाकाव्य अनेक दृष्टि से समाज के लिये एक बहुमूल्य सांस्कृतिक व शैक्षणिक साधन है।

संपर्कः
डा. रत्नाकर नराले,
प्रो. हिंदी, रायर्सन युनिवर्सिटी, टोरंटो, कनाडा.
+1 4166666932
books.india.books@gmail.com
http://books-india.com/
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