व्यञ्जन: बफौरी - ललित कुमार

भापोरी या बफौरी

घर से दूर, अकेले रहने का और कोई लाभ हो अथवा न हो, लेकिन एक लाभ अवश्य होता है - बचपन में माँ के हाथ का खाया हुआ हर एक व्यञ्जन याद आने लगता है और अगर आपकी इच्छा अदम्य है तो आप उसे पूर्ण करने का प्रयत्न भी करने लगते हैं...

पूर्वाञ्चल की धरा बहुत ही समृद्ध है चाहे वह भोजन हो, भाषा हो अथवा पूर्वाञ्चल क्षेत्र का फैलाव हो। शायद यही कारण है कि पूर्वाञ्चल के पूर्व में "बफौरी"के नाम से जाना जाने वाला व्यञ्जन पश्चिम तक जाते जाते "भापोरी" का नाम पा लेता है या यूँ कहें कि पूर्वाञ्चल के पश्चिम की "भापोरी" पूर्व में "बफौरी" कहलाने लगती है। क्या इसका नामकरण वाष्प (भाप) के प्रयोग के कारण है?

सामग्री:
1. दाल - अगर मसूर की हो तो उत्तम है - आवश्यकतानुसार।
2. नमक, मिर्च, हल्दी, जीरा, लाल मिर्च और गरम मसाला, अन्दाज से, स्वादानुसार।
3. अगर आप भोजन में सात्त्विकता के अधिक आग्रही नहीं हैं तो आप इसमें लहसुन भी मिला सकते हैं स्वाद के लिए।

विधि:
बफौरी बनाने के एक दिन पहले दाल को पानी में भिगोकर रख दें। दाल कम से कम 10-12 घण्टे तो पानी में फूलना ही चाहिए। फिर अच्छी तरह से फूले हुये दाल को ग्राइण्डर या सिलबट्टे पर पीस लीजिये। पीसते समय ही आप इसमें लहसुन, मिर्च, लालमिर्च, हल्दी, जीरा गरम मसाला और नमक इत्यादि मिला लें तो अच्छा रहेगा। पिसाई एकदम महीन भी न हो, थोड़ा खुरदरा... दर्रा की तरह।

अब एक बडे, चौडे मुँह वाले बरतन में भरपूर (लगभग आधे से भी अधिक) पानी भर कर इसे चूल्हे पर अथवा गैस पर उबलने के लिए रख दें। इससे पहले कि पानी खौले और उससे भाप निकलना शुरू हो, आप एक साफ सुथरा, अगर सफेद हो तो और भी अच्छा, सूती कपडा लेकर बरतन के मूँह पर बाँध दें। फिर उस कपड़े पर इस मिश्रण को छोटे छोटे, गोल गोल बड़ियों के आकार में खोंट दें अथवा पार दें और आँच तेज कर बरतन को ढँक दें। पन्द्रह से बीस मिनट में बफौरी तैयार हो जाती है अगर बड़ियाँ मध्यम आकार की हैं तो। आप इसे पकने तक आँच पर रखे रह सकते हैं।

फिर जब बफौरी तैयार हो जाये तो आप हरी धनिया और मिर्च की चटनी के साथ इसका आनन्द उठायें... धन्यवाद।

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