वर्तमान परिवेश में नशे का मकड़जाल

मोनिका देवी

डॉ. मोनिका देवी

सहायक प्रवक्ता हिंदी विभाग
हिंदी महाविद्यालय, हैदराबाद



                   वर्तमान समय में पश्चिमी सभ्यता का बोलबाला है। देश का युवा वर्ग इसकी ओर आकर्षित हो रहा है, इस तथ्य से सभी भली-भाँति परिचित है। युवा वर्ग भारतीय संस्कृति को छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति की ओर भाग रहा है। नशा कई तरह का बनाया गया है। पद का नशा, बंगले, गाड़ी का नशा, धन-दौलत का नशा, लेकिन इन सबसे ज्यादा खतरनाक ‘मदिरा’ का नशा है। जो एक बार चढ़ता है तो बर्बाद करके ही पीछा छोड़ता है।

वर्तमान काल में नशे की समस्या बड़ी भयंकर होती चली जा रही है। देश की जनसंख्या आज 125 करोड़ के पार होती जा रही है। इनमें सबसे ज्यादा युवा वर्ग है। नशा एक ऐसी बिमारी है जो मानव के साथ-साथ उनके घर-परिवार, इज्जत, मान-सम्मान सबको बर्बाद कर देती है।

    मादक वैसे पदार्थ को कहते है, जिसे लगातार सेवन करने से व्यक्ति उसका आदी बन जाता है। आज कल नशा बहुत ही बढ़ता जा रहा है। छोटे बच्चे भी इसकी चपेट में आ जा रहे है। युवाओं के साथ-साथ बड़े बुजुर्ग भी इसकी गिरफ्त में हैं। लेकिन आज का युवा वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है।

     भारत में मदिरापान की प्रथा अत्यंत प्राचीन है। कई लोग वैदिक काल में पिये जाने वाले सोमरस को एक प्रकार का महारस ही माना है परंतु सोमरस तो एक लता का रस है। यह लता चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ ही फूलों से खिलती और फूलों से रहित हो जाती है। महाभारत काल में मदिरापान की चर्चा मिलती है राजाओं, महाराजाओं के विलास-भवन में मदिरापान की परंपरा प्रचलित है। इसलिए मदिरापान करने के पक्षपाती लोग कहते हैं शराबी पीने में हानि नहीं समझते और समाज में मदिरा के प्रचलन को बुरा नहीं मानते हैं। यूरोपीय देशों में तो महारस एक प्रकार की अनिवार्यता मानी जाती है जिसका मुख्य कारण वहाँ के प्राकृतिक वातावरण और जलवायु को बताया जाता है।

     भारत जैसे विषम परिस्थितियों वाले देश में मद्यपान की प्रवृत्ति वास्तव में अनेक दृष्टियों से हानिकार रही है। “शराब सर्वाधिक उर्त्तजक तरल पदार्थ है। जो अनेक प्रकार की बुराइयों को जन्म देकर अपने तथा समाज दोनों के लिए घातकs प्रमाणित होता है। यह व्यक्ति को अपनी वास्तविक पस्थितियों से यद्यपि क्षणिक रुप से भुलाए रखने की क्षमता रहता है।”

         कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी कृति ‘मधुशाला’ में प्रखर व्यंग्य प्रहार किया है। ‘सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम पी लेते हैं हाला।' मदिरापान का विरोध संस्कृत के नीति और स्मृति ग्रंथ भी करते है। मनुस्मृति में कहा गया है। ‘सुरा वै मलमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते।’ अर्थात सुरा अन्न का मल है, पाप है। मदिरा का सेवन केवल यक्ष और राक्षसों में ही प्रचलित माना गया है। यक्ष रक्ष पिशाचात्र यहाँ मांस सुरासेवन। महाभारत में मदिरापान का विरोध करते हुए कहा गया है “कुछ लड़खड़ाते है कुछ अनुचित बातें करते हैं, कुछ विक्षिप्त से हो जाने के कारण नग्न हो जाते हैं। जो इस पेय का सेवन करते है। वे पापी है।”

         मदिरा का रासायनिक नाम ‘इथाइल एल्कोहल’ है। यह शरीर का धीरे-धीरे विनाश करती है। इसका केवल करने से व्यक्ति की विचार शक्ति क्षीण हो जाती है। उचित अनुचित में करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। नशे से नैतिक पतन और सम्पत्ति का नाश होता है। धन के अभाव में वह घर के कीमती स्वर्ण आभूषण तक बेच देता है, लेकिन नशा अवश्य करता है। नशे से मानव का स्वयं का विनाश तो होता ही है, परंतु वह अपने हँसते-खेलते परिवार को भी नरक बना देता है। घर में रोज कलह का वातावरण बना रहता है। पूरा परिवार इससे परेशान होकर जीवन जीता है। शराब व्यक्ति को शक्तिहीन कर ऐसी अवस्था में पहुँचा देती है जब व्यक्ति स्वयं भी यह अनुभव करता है। कि मदिरा उसकी शिराओं में रक्त की जगह दौड़ रही है। जनसाधारण महंगी शराब पीने में असमर्थ रहते है। इसलिए वह सस्ती कच्ची शराब पी लेते है। कई बार तो ठेकेदार कच्ची शराब के स्थान पर जहरीली शराब भी बेच देते है।

     इसके सेवन से हजारों घर उजड़ जाते हैं, हँसते-खेलते परिवारों में मातम हो जाता है। शराब के सेवन से विभिन्न बीमारियाँ आ जाती है। इसी बात को ध्यान में रखकर कहा है कि नशा नहीं करना चाहिए।
             “मदिरा कबहुँ न पीजिए, तजिए विधवत जानि।
             धन विनसत अपजस मिलत, होत स्वास्थ्य की हानि।”

मानव नशा क्यों करता है यह प्रश्न जानना आवश्यक है यह जिज्ञासा रोचक है। कुछ लोग खुशी के अवसर पर अपनी पसंद को और बढ़ाने के लिए पीते है। विवाह, परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर, घर में पुत्र जन्म के अवसर पर, नौकरी, विदेश जाने  पर शराब के बिना पार्टी में रंग नहीं चढ़ता। प्राचीन समय में बड़ी इच्छा पूरी होने पर भगवान को धन्यवाद देते थे लेकिन वर्तमान में स्थिति बदल गई है लोग मधुशाला में जाते दिखाई पड़ते है। कोई ग़म भुलाने के लिए पीता है  तो कोई खुशी बढ़ाने के लिए पीता है।

      नशे को बढ़ावा सरकार की ओर से भी दिया जाता है। जनता को सरकार शराब पीने की नसीहत देती है। वही शराब के ठेकेदारों को लाइसेंस देकर शराब की दुकानें खुलवाती  है। चाहे अस्पतालों में दवा हो या न हो, लेकिन दुकानों पर सुरा अवश्य मिलेगी। नशे के बजार से सरकार को आय बहुत अधिक मात्रा में होती है। इसलिए सरकार इन्हें बंद नहीं करती। शराब के अवैध धंधे पुलिस प्रशासन की देख-रेख में चलते है। लोग कच्ची शराब पीने से मरते हैं और सरकार तमाशबीन बनी रहती है। शराब की हर बोतल पर लिखा होता है कि- “मदिरा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।” शिक्षित वर्ग इसे देखकर भी अनदेखा कर रहा है और शराब पीना कम नहीं करता। गरीब अपनी थकान मिटाने के लिए, पीता है, अमीर अपनी दौलत के अहंकार में पीता है। नशा राष्ट्र की प्रगति में बाधक है, इसलिए मुंशी प्रेमचन्द का कथन है –“जहाँ सौ में से अस्सी आदमी भूखे भरते है वहाँ सुरा पीना, गरीब का रक्त पीने के बराबर है।”  सरकार को शराब से मुक्ति के लिए कठोर कदम उठाने चाहिए। शराब के अवैध ठेके बंद करवाये जाए। जुलूसों, रेडियो, दूरदर्शन आदि द्वारा नशा विरोधी प्रचार करे महाविद्यालयों में छात्रों को नशे से होनेवाली हानि से परिचित कराये। नशा करना आधुनिकता की निशानी है, यह भ्रम लोगों के दिलों से निकालना चाहिए। साहित्यकार और समय का बुद्धिजीवी वर्ग शराब में दोष देखता है।

     हरिवंश राय वच्चन ने मदिरा पर अच्छी व्यंग्योक्ति की है। “भेद कराते मंदिर, मस्जिद मेल कराती मधुशाला।”   समकालीन समय का बहुत  बड़ा वर्ग आज नशों की चपेट में है कहावत है कि पहले शराबी-शराब पीता है फिर शराब, शराबी को पीती है। शराब एक ऐसी लत लग जाए तो आसानी से नहीं छूटती, जीवन की ज्योति बुझ जाती है लेकिन इसकी प्यास नहीं बुझती इसमें पहले लोग प्यास बुझाने के लिए इसे पीकर अपना स्वस्थ्य शरीर का कंकाल बना ले, इससे पहले ही सरकार को चाहिए की नशेबंदी के लिए कठोर कदम उठाए जाने चाहिए क्योंकि शब्द की उन्नति का भार इन स्वस्थ्य नागरिकों के कंधों पर हैं।
                     

संदर्भ:-
1. ‘उजाले की ओर’ - केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान राँची
2. ‘आधुनिक निबंध भारती’ – डॉ.  ओमप्रकाश शर्मा शास्त्री, पृष्ठ- 165
3. ‘श्रेष्ठ आधुनिक निबंध’ – तिलकराज शर्मा, पृष्ठ- 315
4. ‘निबंध-माला’ – निशि त्यागी,  पृष्ठ- 59
5. ‘निबंध-माला’ – निशि त्यागी,  पृष्ठ- 60
6. ‘निबंध-माला’ – निशि त्यागी,  पृष्ठ- 60
7. ‘निबंध-माला’ – निशि त्यागी,  पृष्ठ- 60

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