युगद्रष्टा मुक्तिबोध की रचनाधर्मिता में आधुनिकता का स्वर: समय की मांग

डॉ. किरण ग्रोवर
किरण ग्रोवर

(स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, डीएवी कॉलेज,अबोहर) 

सारांशः-
रचनाकार का उचित दृष्टिकोण उसकी आधुनिक दृष्टि है और इस दृष्टि के अनुरूप आचरण ही आधुनिकता। रचनाकार का रचनात्मक उद्देश्य ही वह कारण है जो एक ही युग के दो रचनाकारों की रचना में अन्तर लाता है। इसी रचनात्मक उद्देश्य को मुक्तिबोध संवेदनात्मक उद्देश्य कहते हैं। युगद्रष्टा रचनाकार अपने साहित्य में उन मूल्यों को रूपायित करने लगता है जो आज के लिए तो आधुनिक है ही, पर जो कल के लिए भी मूल्यवान पृष्ठभूमि बन जायेंगे। मुक्तिबोध आधुनिक साहित्य के सजग कलाकार थे। उनको कवि के रुप में संस्कार देने का कार्य उनकी जिज्ञासा वृत्ति, विविधमुखी परिस्थितियाँ, और मार्क्सवाद की वैचारिक यात्रा ने किया। उनका आधुनिकता विषयक चिन्तन दो सन्दर्भों में प्रतिबिम्बित होता है - साहित्यिक व सामाजिक सन्दर्भ में। उनके लिए मुख्य प्रश्न जीवन चेतना का प्रश्न है न कि अभिव्यक्ति सम्पदा के अन्वेषण का। उन्होंने आधुनिक भाव बोध को नयी कविता की आत्मा माना। मानवीयता से ओत प्रोत उनकी विश्व दृष्टि गरीब व अभावग्रस्त आदमी के इर्द गिर्द घूमती रही। उनके लेख जेनेवा कॉन्फ्रेंस के नेपथ्य में मृत्यु संगीत, फ्रांस किस ओर, मिस्र के विरुद्ध इतना रोष क्यों, नाटो के नाटक का नया दौर, सुऐज नहर का राष्ट्रीयकरण, ऐशियाई अफ्रीकी राष्ट्रवाद का संयुक्त मोर्चा, बगदादी राजनीति का चक्कर आदि में उनकी अन्तर्राष्ट्रीय पकड़ का आभास मिलता है। उन्होंने मार्क्सवाद को राजनीतिक विचारधारा के रुप में मानव कल्याण हेतु उपयोगी दर्शन स्वीकारा। भारतीय समाज की वर्तमान अराजक स्थिति के लिए दार्शनिक स्थितियों-परिस्थितियों को भी मुक्तिबोध दोषी माना। कृषिक्षेत्र में फैली हुई अराजकता की ओर मुक्तिबोध ने सरकार का ध्यान दिलाना चाहा। परिवार,जाति और पूंजी को भारत के आधुनिक राष्ट्र बनने में मुक्तिबोध बाधक तत्त्व माना। साहित्य, समाज, राजनीति, अर्थनीति के क्षेत्र में मुक्तिबोध उन शक्तियों का विरोध किया जोकि जड़ता को बनाये रखने में सहायक हैं। मुक्तिबोध की आधुनिकता में अपनी और दूसरों की ज़िन्दगी को बेहतर स्थितियाँ देने के प्रति प्रतिबद्धता ही उनकी रचना धर्मिता की प्रथम शर्त है क्योंकि यही ज़िन्दगी की मांग है।

बीज शब्दः- प्रतिबद्धता, अराजकता, मुक्तिबोध, सामान्यीकरण, संघर्षात्मक संसर्ग सौन्दर्यासक्ति।

मूल प्रतिपादनः-
आधुनिकता देश काल सापेक्ष अवधारणा है। हर काल की अपनी आधुनिकता होते हुए भी परवर्ती काल खण्ड पूर्ववर्ती कालखण्ड से ज्यादा आधुनिक होता है क्योंकि परवर्ती काल तक आते आते मनुष्य की बुद्धि अनेक तत्त्वों को छोड़ने की प्रक्रिया में होती है। अपने युग को अभिव्यक्त करने के लिए रचनाकार उचित दृष्टिकोण को अपनाता है। रचनाकार का उचित दृष्टिकोण उसकी आधुनिक दृष्टि है और इस दृष्टि के अनुरुप आचरण ही आधुनिकता। रचनाकार का रचनात्मक उद्देश्य ही वह कारण है जो एक ही युग के दो रचनाकारों की रचना में अन्तर लाता है।1 इसी रचनात्मक उद्देश्य को मुक्तिबोध संवेदनात्मक उद्देश्य कहते हैं। रचनाकार का उद्देश्य युग के यथार्थ को मानव जीवन युक्त स्वरुप देना और उस यथार्थ को गतिशीलता सहित भविष्य तक पहुँचाना होता है। युगद्रष्टा रचनाकार अपने साहित्य में उन मूल्यों को रुपायित करने लगता है जो आज के लिए तो आधुनिक है ही, पर जो कल के लिए भी मूल्यवान पृष्ठभूमि बन जायेंगे। मुक्तिबोध आधुनिक साहित्य के सजग कलाकार थे। उनकी आधुनिकता का प्रथम आधाम उनकी इतिहास चेतना है। इतिहास सम्बन्धी उनका अध्ययन अत्यन्त गहन, वैज्ञानिक एवम् दृष्टि वस्तुनिष्ठ थी। युग की निर्मिति में परम्परा के योगदान को मुक्तिबोध वहीं तक स्वीकारते हैं जहां तक मूल्यों के विकास में सहायक होती है।

जिस प्रकार माता-पिता से प्राप्त पैतृक संस्कारों और घर के वातावरण ने गजानन माधव मुक्तिबोध के व्यक्तित्व का निर्माण किया,उसी प्रकार बाहरी परिवेश, मित्रों एवम् विचारधाराओं का भी सम्पूर्ण सहयोग रहा। मुक्तिबोध को कवि के रुप में संस्कार देने का कार्य उनकी जिज्ञासा वृत्ति, विविधमुखी परिस्थितियाँ, मार्क्सवाद की वैचारिक यात्रा ने किया। उनका विवेक किसी दर्शन के लिए भटकने लगा जो समाज के लिए मानवीय व्यवस्था प्रदान कर सके। अपने युग के विराट सत्य को समेटे मुक्तिबोध का जब पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ तब वे अचेतावस्था में थे। इस काव्य संग्रह की कविताओं के बारे में इन्द्रनाथ मदान जी ने लिखा है कि ‘इनकी कविता का अन्दाज़ और बयान और है जिसे दोहराया नहीं जा सकता--इनकी कविताओं में अनेक स्वर हैं- दहशत का है, खौफ का है, घृणा और स्नेह का है, अकेलेपन का है, साथीपन का है, टूटने और जुड़ने का है, इस तरह इनकी कविता में मानसिक तड़पन, अकुलाहट और छटपटाहट है और होने में तनाव है, सादगी और टेढ़ापन है, सरलता और जटिलता है, आस्था और अनास्था है, शंका और विश्वास है। इसका न तो सरलीकरण हो सकता है और न ही सामान्यीकरण और यदि किया गया तो कविता से दूर और अपने निकट होकर।’2 मुक्तिबोध जिस परिवेश में जिये वह अत्यन्त जटिल एवम् त्वरित परिवर्तनकारी परिवेश था, उन्होंने दो युगों को अपने जीवन काल में जिया-आज़ादी के संघर्ष का काल और आज़ादी के बाद का काल।

आज़ादी के बाद की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों के अन्तर्विरोधों से उत्पन्न स्थितियों ने समाज में अराजकता फैलाई जोकि मुक्तिबोध से छिपी न थी। राजनीतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार, अवसरवादिता,वोट की राजनीति में सफल नेतृत्व का अभाव रहा। आर्थिक क्षेत्र में पंचवर्षीय योजनाएँ शहरी भारत का ही निर्माण कर सकी जिसके कारण मानवीय सम्बन्ध धनाधारित हो गये व शहरों से गाँव का सम्पर्क टूटा। समाजवाद के नारे तले पूंजीपतियों के हित में कानून बने।3 गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी समाज के स्थायी भाव हो गये, जनसंख्या को नियंत्रित न किया जा सका, क्षेत्रीयतावाद फैलने लगा व युवा पीढ़ी मूल्यहीनता की ओर बढ़ने लगी। सम्पूर्ण विश्व 21वीं सदी में प्रविष्ट हो चुका है, राजनीतिक सीमाएँ टूट रही हैं, ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया चल रही है, आदमी मंगल पर बसने के स्वप्न देख रहा है लेकिन विश्व समाज का एक वर्ग अब भी इन्सान होने के अधिकार की लड़ाई, रोटी कपड़े व मकान की लड़ाई लड़ रहा है। मुक्तिबोध के लिए आदमी की भूख का दर्द सबसे सच्चा दर्द है, इसका निदान किये बिना समाज के विकास की कोई सार्थकता नहीं। कविता,राजनीति व सौन्दर्यशास्त्र की बहसों का कोई मूल्य नहीं। प्रजातांत्रिक समाजवाद का सपना देखने वाले मुक्तिबोध यह कैसे सहन कर सकते थे कि करोड़ों लोगों के सपनों को कुचल कर मुट्ठी भर लोगों के हाथ सता सिमट जाये?

आधुनिकता की अवधारणा प्रत्य़क्ष रुप में तो मुक्तिबोध की विचाधारा में दृष्टिगोचर नहीं होती लेकिन विचारक अपने समय व समाज को प्रभावित करने वाले कारकों व प्रक्रियाओं से अवगत रहता है उसी प्रकार मुक्तिबोध भी आधुनिकता की प्रक्रिया व उसके कारकों से परिचित थे। पॉल वैलरी ने भी कहा था-‘लेखक का दर्शन सोच के विषयों में नहीं बल्कि सोच की प्रक्रिया व उसके व्यवहार में निहित होता है।’4 मुक्तिबोध के आधुनिकता विषयक चिन्तन पर यह बात लागू होती है कि आधुनिकता उनकी सोच की प्रक्रिया व उसके व्यवहार में निहित है। मुक्तिबोध का आधुनिकता विषयक चिन्तन दो सन्दर्भों में प्रतिबिम्बित होता है- साहित्यिक व सामाजिक सन्दर्भ में। उनके दृष्टिकोण का मूल्यांकन करें तो मुक्तिबोध ने समकालीन जीवन अनुभवों से अर्जित मूल्यों के आधार पर काव्य की आलोचना की है। जीवन के प्रति अधिकाधिक प्रामाणिक होने के कारण मुक्तिबोध के आधुनिक कविता के काल खण्ड के लम्बा होने के प्रति विश्वास व्यक्त करते हैं। छायावादी कवियों की कल्पना शक्ति व भावनाओं की गूढ़ता अब पुरानी हो चुकी है और वैविध्य के संघर्षात्मक संसर्ग से उत्पन्न मानवीय मनोभावों की उत्कटता की कसौटी पर काव्यात्मकता को परखते हैं। इस कसौटी से गुज़र कर जो काव्य मानवता के अधिक निकट होता है उसे वे आधुनिक मानते हैं।

छायावादी काव्य को पिछली काव्य परम्परा से आन्तरिकता के धरातल पर मुक्तिबोध ने आधुनिक माना तथा नयी कविता आन्तरिकता के धरातल पर नहीं यथार्थपरकता और लौकिकता के धरातल पर छायावादी काव्य की तुलना में आधुनिक थी। नयी कविता में काल संसक्ति, युगीन यथार्थ के साथ कवियों का सम्बन्ध तथा जीवन के प्रति उनकी पहुँच अधिक मूत्र्त है। मुक्तिबोध मानते हैं कि विगत साहित्यिक पीढ़ी का रोमाण्टिक काव्य वर्तमान भारतीय जीवन के यथार्थ पर आधारित नहीं है।5 नये कवि समय और समाज के यथार्थ के साथ नया सम्बन्ध बना सके,उन्होने अपने काल की उपेक्षा नहीं की तथा वर्तमान यथार्थ के अभिप्राय को समझने की सचेत कोशिश भी की। मुक्तिबोध के लिए मुख्य प्रश्न जीवन चेतना का प्रश्न है न कि अभिव्यक्ति सम्पदा के अन्वेषण का।6

नई कविता के व्यक्तिवादी शिविर के प्रति संघर्ष उनकी आधुनिकता का प्रमाण है स्पष्ट है कि नई कविता में व्यक्तिवाद अस्तित्ववाद की निराशाओं की उपज था। उन्होने व्यक्ति स्वातन्त्र्य को वहीं तक सीमित रखा जहां तक अन्यों के अधिकारों का हनन नहीं करता और समाजवाद के मार्ग में बाधक नहीं बनता। सामान्य जनता अंग्रेज़ों की रंगभेद नीति से पीड़िज थी, मुक्तिबोध ने लिखा है कि अंग्रेज़ अपने आप में एक शासक जाति बन गये थे। वे भारतीय जनता से दूर रहते थे। वे अपने गोरे रंग के कारण भी भारतीयों से द्वेष रखते थे। अंग्रेज़ हिन्दुस्तान में रहने के लिए नहीं आया, माल की लूट करने और सात समुद्र पार अपना घर भरने के लिए आया था।’7
जनतंत्र और समाजवाद का समन्वय ही उनका प्रधान लक्ष्य रहा क्योकि इसी में मानव गरिमा और जनतांत्रिक समाजवाद की स्थापना उनकी विचारधारा का राजनीतिक पहलू है और आर्थिक पहलू भी है। राजनीति के हाथ में ही है कि वह कौन सी आर्थिक व्यवस्था को अपना कर चले? आर्थिक व्यवस्था का प्रश्न भी एक प्रकार से राजनीतिक प्रश्न बनकर मुक्तिबोध की विचारधारा में प्रतिबिम्बित होता है। पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि, उद्योग, सिंचाई, बिजली, शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य, बेकारी, गरीबी आदि के सम्बन्ध में विकास कार्यों को चलाया गया परन्तु यह उतना ही सच है कि अनुभवहीनता वश बनी अव्यावहारिक नीतियों, वोट की राजनीति, प्रशासनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार और बढ़ती जनसंख्या ने विकास की गति पर प्रश्न चिह्न लगा दिया। उत्पादकतावादी दृष्टि की बजाये समाज में उपभोक्तावादी दृष्टि का प्रचार प्रसार हुआ।8

नयी कविता जीवन चेतना के इस सवाल पर जो भाव बोध धारण करती है। मुक्तिबोध उस भाव बोध को आधुनिक भाव बोध से जोड़ कर देखते हैं। मुक्तिबोध लिखते है कि आज के कवि के अन्तःकरण में जो कड़वाहट, दुखानुभव, आत्मग्लानि, सौन्दर्यासक्ति, आलोचनाशीलता आदि भाव हैं, वे सब आधुनिक समाज व्यवस्था के अन्तर्गत उपस्थित जीवन प्रसंगों में अर्थात् वास्तविक और परिस्थिति के प्रति संवेदनात्मक प्रक्रियाओं के पुंज हैं अथवा उनके आधार पर किये गये सामान्यीकरण हैं। उनमें जो भाव दृष्टि प्रकट होती है, वह भाव दृष्टि उस संवेदनात्मक स्थिति में पड़े हुए मनुष्य की भाव दृष्टि है।’9 मुक्तिबोध आधुनिक भाव बोध को नयी कविता की आत्मा मानते हैं। आधुनिक भाव बोध के अन्तर्गत उनके विचार हैं- ‘मानवता के भविष्य निर्माण के संघर्ष में हम और भी दतचित हों तथा हम वर्तमान परिस्थिति को सुधारें, नैतिक ह्रास को थामें, उत्पीड़ित मनुष्य के साथ एकात्म होकर अपनी मुक्ति की उपाय योजना करें।’10

मुक्तिबोध का संघर्ष उन्हें तनाव दे सकता है किन्तु पलायन के लिए मजबूर नहीं कर सकता। उन्होंने अपनी कविताओं में लाखों दुबले, उपेक्षित, चिर अपमानित गरीबों के संघर्षमय जीवन को अभिव्यक्ति प्रदान की है। उनके सामने क्रान्ति करने के कारण, साधन और परिणाम तीनों ही स्पष्ट हैं तथा सामाजिक परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ उनके लिए अमूर्त चीज़ नहीं हैं। अपनी ओर दूसरों की ज़िन्दगी को बेहतर स्थितियाँ देने के प्रति प्रतिबद्ध किसी भी रचनाकार का आस्थावान होना उसकी रचना धर्मिता की प्रथम शर्त होती है क्योंकि वह ज़िन्दगी की मांग है। उनका मानवतावाद आँसू बहाने तक सीमित रहकर ही निष्क्रिय नहीं रहता अपितु गरीबों के दुख में शामिल हो उसे समझता है, विश्लेषण करता है, कारण खोजता है, उनके जीवन को स्वयं अनुभव करता है और जरुरत पड़ने पर उन्हें क्रान्ति के लिए प्रेरित भी करता है। मानवीयता से ओत प्रोत उनकी विश्व दृष्टि गरीब व अभावग्रस्त आदमी के इर्द गिर्द घूमती है। मुक्तिबोध के शब्दों में ‘घर में,परिवार में समाज में,मनुष्य को मानवोचित जीवन प्राप्त हो। आर्थिक तुला के आधार पर ‘घर में ,परिवार में समाज में मनुष्य अपनी ओर तत्सम्बन्धी चिन्ताओं से छूटकर निर्माण और समाज के कार्य में लगकर समाज की उन्नति व प्रगति में योग दें।’11
आधुनिक भाव बोध में निहित राजनीति का मुक्तिबोध विरोध करते हैं लेकिन भारतीय सन्दर्भों में उसके अनुकूलन किये जीने के कारण उसकी पक्षधरता भी प्रकट करते हैं। आधुनिक भाव बोध का विरोध वे जिस कारण से करते हैं उसका स्पष्टीकरण भी देते हैं-‘एक कला सिद्धान्त के पीछे एक विशेष जीवन दृष्टि होती है, उस जीवन दृष्टि के पीछे एक जीवन दर्शन होता है,उस जीवन दर्शन के पीछे आजकल के ज़माने में एक राजनीतिक दृष्टि लगी रहती है।’12 नयी कविता की फिलाॅसफी के रूप में कला सिद्धान्त लाया गया। कला सिद्धान्त के पीछे आधुनिक भाव बोध का सिद्धान्त आया। व्यक्ति स्वातन्त्र्य के नाम पर सामाजिक राजनीतिक दर्शन भी प्रस्तुत हुआ। मुक्तिबोध की राजनीतिक चेतना का एक ओर आयाम उनकी अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर गहरी पकड़ थी। उनके लेख जेनेवा कॉन्फ़्रेंस के नेपथ्य में मृत्य संगीत, फ्रांस किस ओर, मिश्र के विरुद्ध इतना रोष क्यों, नाटो के नाटक का नया दौर, सुऐज नहर का राष्ट्रीयकरण, एशियाई अफ्रीकी राष्ट्रवाद का संयुक्त मोर्चा, बगदादी राजनीति का चक्कर आदि में उनकी अन्तर्राष्ट्रीय पकड़ का आभास मिलता है। उन्होंने विश्व की साम्राज्यवादी ताकतों का विरोध किया जोकि इपनी सामरिक शक्ति के बल पर विश्व को ही अपना उपनिवेश समझती हैं -
भवन के सातवें तले पर कुछ लोग/दुनिया की आत्मा की चीर फाड़----/ सरहदें सीमाएँ बनाते ही जाते हैं।13
पूँजीवाद राजनैतिक, सामाजिक एवम् आर्थिक व्यवस्था तीनों मुक्तिबोध के लिए एक ही साथ है। इन विकृत्तियों के मूल में व्यवस्था का सदोष अर्थतंत्र ही है जो भारत को लन्दन और वाशिंगटन बना देना चाहता है जोकि

भारतीय ज़मीन और परिस्थितियों के लिए उचित नहीं हो सकता-
पैसों की संस्कृति/भारतीय आकृति में बंधकर/दिल्ली को/वाशिंगटन व लन्दन का उपनगर/बनाने पर तुली है।14
पूँजीवाद व्यवस्था में ईश्वर की खोज लोगों को निष्क्रिय बनाती है और ज़िन्दगी का व्यावहारिक समस्याओं का निदान निराधार अध्याय में खोजती है। मुक्तिबोध ने ईश्वर की खोज को लोगों का बिना बत्ती का गोल सिफर में चक्कर लगाना बताया है-
खोजते हैं जाने क्या/ बेछोर सिफर के अंधेरे में बिला बत्ती सफर/भी खूब है।15

बुद्धिजीवी वर्ग पर व्यक्तिवादी पूँजीवादी वैचारिकता का प्रभाव है, इसलिए यह वर्ग घातक हो उठता है। जब अपनी वैचारिकता और रचना में व्यक्तिवाद को स्थापित करने लगता है। ‘एक फोड़ा दुखा’ कविता में यही रेखांकित किया है कि इनका व्यक्तिवाद इतना गहन है कि ‘एक दुखते फोड़े के दर्द को ये दार्शनिक जामा तक पहना सकते हैं और जिसकी वजह से इनके अस्तित्व और व्यक्तित्व दोनों कायम हैं-
दर्द ने जगह जगह/फिट किये स्क्रू और ढिबरियाँ---/ फोड़ों के पहरेदार /बना दिये मन्तव्य,विचार,अभिमत।16
मुक्तिबोध की विविधमुखी समाज चेतना के पीछेे उनका मन्तव्य न केवल भारत से अपितु विश्व से भी पूंजीवाद के विनाश का स्वप्न कार्यरत था क्योंकि यह व्यवस्था गरीब व अमीर के बीच विषमताओं का पहाड़ खड़ाकर दो विषम संस्कृतियों को पनपाती हैं जोकि अत्यन्त अमानवीय है। उनकी कविताओं में भी क्रान्ति चेतना का स्वर मिलता है-
पूँजी से जुड़ा हुआ हदय बदल नहीं सकता/ स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी / छल नहीं सकता मुक्ति के मन को/जन को।17

इन पंक्तियों में मुक्तिबोध की मुक्ति समाज को ताक पर रखने वाले व्यक्तिवादी व्यक्ति का अकेली मुक्ति नहीं है बल्कि यह मुक्ति तो सामूहिक है-
कभी अकेले में मुक्ति न मिलती/ यदि वह है तो सबके साथ है।18

अंग्रेज़ों के भारत आगमन के बाद भारतीय चिन्तन में नया मोड़ अवस्थित हुआ। यह परिवर्तन भारतीय ही नहीं अपितु विश्व चिन्तन में तब उपस्थित होता है जब डाार्विन का विकासवादी दर्शन जीवन की उत्पत्ति को कार्य कारण सिद्धान्त द्वारा सिद्ध कर दर्शन के केन्द्र में आध्यात्मिक और अलौकिक सत्ता की बजाये मानव को रखता है। ईश्वर से मुक्ति द्वारा इस दर्शन की विचारधारा ने नये मानववाद को जन्म दिया। मुक्तिबोध ने मार्क्सवाद को राजनीतिक विचारधारा के रुप में मानव कल्याण हेतु उपयोगी दर्शन स्वीकारा। अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में वे राष्ट्रीय राजनीति को समझने का प्रयास करते हैं। उनके लेख नेहरू जी की जर्मनी यात्रा का महत्त्व, दून घाटी में नेहरू, संयुक्त महाराष्ट्र का निर्माण एकदम जरुरी, भारत का राष्ट्रीय संग्राम, ‘अंग्रेज़ गये पर इतनी अंग्रेज़ी पूंजी क्यों’ राष्ट्रीय राजनीति की परख का परिचय देते हैं। उनका मानवतावाद मानवात्मा के सन्दर्भ में विश्व के प्रत्येक आदमी की आत्मा को एक मानता हैं। उनकी छाया देश देशांतरों में सागर तरंगों पर भागती जाती है और प्रियतरों का मौन चरण स्पर्श करते हुए उनके घरों में घूमती है। आज़ादी के बाद भारतीय समाज में राजनीति के नेतृत्व में जो भ्रष्टाचार, अवसरवाद, भाई-भतीजावाद, चारित्रिक पतन, वोट की राजनीति, साम्प्रदायिकता आदि के संश्लिष्ट दृश्य उभर कर सामने आये । राजनीति से रिस कर भ्रष्टाचारी आचरण का यह ज़हर आम आदमी की नसों में शामिल हो गया और एक समय के बाद भ्रष्टाचार और मूल्यहीनता विसंगति न होकर जीने का एक तरीका हो गये। मुक्तिबोध ने इस स्थिति पर विक्षुब्ध होकर व्यंग्यात्मक ढंग से कहा कि ‘सफलता के लिए सामर्थ्य नहीं,समर्थन लगता है। समर्थन ही सामर्थ्य है। इस महान सत्य को लेकर जो काम करते हैं,वे अन्धी दीवार से टकराते हैं।---बुद्धिमानी इसमें है कि दरारें देखो और उसमें चुपचाप रेंग जाओ और रेंगते हुए ऊंची से ऊंची सतह तक पहुँचो। यह है वास्तविक जीवन कला।’19 मुक्तिबोध की रचनाओं में यही राजनीतिक माहौल फैंटसी की वजह से ज्यादा भयावह रुप में उभरकर सामने आया। चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूल गलती, जमाने का चेहरा, बीमार स्टालिन, अंधेरे में आदि कविताओं में राजनीजिक तेवर देखते ही बनते हैं-
काले-काले घोड़ों पर खाकी मिलिट्री ड्रैस/चेहरे का आधा भाग सिन्दूर गेरुआ/ आधा भागा कोलतारी भैरव----/ यह शोभा यात्रा है किसी मृत्यु दल की।20

मुक्तिबोध की राजनीतिक चेतना स्थापित करती है कि वे सच्चे अर्थों में श्रेष्ठ राजनीतिक कवि थे। उन्होने यह साबित कर दिया कि जिस क्षेत्र में कदम रखते हुए लोग भय खाते हैं,परन्तु मुक्तिबोध वे उस क्षेत्र का वरण निर्भय होकर किया।

जहाँ तक आधुनिकता का सवाल है तो मुक्तिबोध आधुनिकता के केन्द्र के रुप में यूरोप और अमेरिका को देखते हैं और उनके अनुकरण को भारतीय सन्दर्भों में गलत मानते हैं परन्तु फिर भी आधुनिकता को भारतीय परिपे्रक्ष्य में ढालना चाहते हैं स्पष्ट है कि आधुनिकता को अनुकूलित करना चाहते हैं क्योंकि आधुनिकतावादियों के बारे में मुक्तिबोध का मानना है कि ‘आधुनिकतावादियों को मैंने देख लिया है। उनमें दम नहीं है, वे पोचे हैं। वे समस्या को बड़ा करके बताते हैं, आदमी को छोटा करके नचाते हैं। वह भी एक स्वांग है।’21 मुक्तिबोध ने बुद्धिजीवी वर्ग पर व्यक्तिवादी पूंजीवादी वैचारिकता का प्रभाव स्वीकारा है। यह वर्ग तब और घातक हो उठता है जब अपनी वैचारिकता और रचना दोनों में व्यक्तिवाद को स्थापित करने लगता है। यह वर्ग आत्मसंघर्ष में लीन है, सुविधाभोगी और समझौतापरस्त है तथा इसने कभी आदर्शों और रचनात्मकता का दामन नहीं छोड़ा। मुक्तिबोध ने मध्यम वर्ग के प्रतीक ब्रह्मराक्षस के आत्म संघर्ष का चित्र खींचा है-
पाप छाया दूर करने के लिए/दिन रात स्वच्छ करने के लिए/ब्रह्मराक्षस घिस रहा है देह---/फिर भी मैल, फिर भी मैल।22

देश व समाज के लोगों के जीवन को जानने के लिए मुक्तिबोध इतने उत्सुक हैं कि बाहर से पत्थर लगने वाला भी वस्तुतः हीरा होने का आभास दे जाता है। हर छाती में अपने दर्दों को समेटे अधीर आत्मा उन्हें नज़र आती है-
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में/चमकता हीरा है/हर एक छाती में आत्मा अधीरा है।23
निराशा के बादल तब छँटने लगते हैं जब वे अपने क्रान्ति का जनता में गहरा असर देखते हैं तब उन्हें अहसास होता हेै कि आशाएँ और निराशाएँ भी आत्म संघर्ष का अभिन्न अंग हैं। यही आत्म संघर्ष का सकारात्मक परिणति है और मुक्तिबोध आत्मसंघर्ष पर विजय पा ही लेते हैं-
अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे/उठाने ही होंगे/तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब--/ जादुई झील को करनी ही होगी मेरी प्रतीक्षा ।24

आधुनिकता के प्रति नितान्त निजी दृष्टिकोण मुक्तिबोध के चिन्तन में देखने को मिलता है। आधुनिकता उनकी आलोचानात्मक दृष्टि में अनुस्यूत प्रतिबिम्बित होती है। उन्होंने लिखा है कि समाज के विकास के साथ साथ मनुष्य की मनोवैज्ञानिक समृद्धि, आन्तरिक तथा बाह्य स्वाधीनता और अधिक मानवीय दृष्टिकोण का विकास होता चला जाता है। मुक्तिबोध का करुणा सिक्त मन अनजान प्रियतरों के बीच तो भटकता ही है परन्तु अपने भी उनकी मानवीय दृष्टि में अटक जाते हैं। एक मित्र के प्रति, मनमीत, तुम्हारा पत्र आया, आत्मा के मित्र मेरे, पिता तुम्हारी आती है याद आदि कविताओं में उनका अपनत्व झलकता है-
पिता की तस्वीर/उर के तिमिर परदे पर उतरती/आ रही गम्भीर।25


मानवीय धरातल पर जनसामान्य से बंधने के बाद मुक्तिबोध से वे सच्चाईयाँ छिपी नहीं जो मानवीय बन्धन के पवित्र धागों को कुतर जाती हैं,इन सच्चाइयों को उन्होंने मानवता के रास्ते का बाधक माना है-
आदतों की दासता ने, भावों की शिथिलता ने/ढिलाई ने कुतर -कुतर डाला है।26

इतिहास और संस्कृति के सन्दर्भ में मुक्तिबोध की अवधारणा है कि भारत में आधुनिक सभ्यता का उदय अंग्रेज़ों के कारण हुआ। राष्ट्रवाद के अभ्युत्थान की आधारभूमि अंग्रेज़ों ने जाने अनजाने ढंग से तैयार की। मुक्तिबोध अंग्रेज़ों के आगमन काल से भारत में आधुनिक काल के आविर्भाव को जोड़ कर देखते हैं। इसमें अंग्रेज़ी शिक्षा की भूमिका स्वीकारते हुए लिखते हैं कि‘यदि अंग्रेज़ी शिक्षा पूर्व को पश्चिम की व्याख्या दे रही थी तो ये पूर्वीय विद्वान एक ओर पश्चिम को तथा दूसरी ओर पूर्व को, पूर्व ही की व्याख्या दे रहे थे।’27 भारतीय इतिहास बोध के सन्दर्भ में यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जिससे न हमारा इतिहास बोध समृद्ध हुआ है बल्कि जाने अनजाने संचालित भी हुआ है। जो इस प्रक्रिया को समझ सके उन्होंने साम्राज्यवाद के इस सांस्कृतिक हमले से अपने इतिहास बोध की रक्षा की ,जो न समझ सके वे सांस्कृतिक उपनिवेश की प्रक्रिया के शिकार बन गये। इस दृष्टि से इतिहास लेखन एक बड़ी चुनौती साबित हुई। समाज की व्यवस्था का भयावह रुप मुक्तिबोध की कविताओं में भी दृष्टिगत होता है। यान्त्रिक सभ्यता ने सहज जीवन, गौरवमयी परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों का तो खून ही सोख लिया है-
क्यों मारी मारी फिरती है/मन की यह गहरी सज्जनता/दुख के कीड़ों ने खाई क्यों/ ये जूही पतियाँ जीवन की।28

समाज की व्यवस्था ने आदमी के जीने के प्रति सोच को ही बदल डाला। इस व्यवस्था का शिकार आदमी मानवीय मूल्यों को ताक पर रखकर प्रतिष्ठा तथा सफलता की आँख से व्यक्ति को देखना व आंकना सीख गया है-
उन्नति के क्षेत्रों में प्रतिष्ठा के क्षेत्रों में/मानव की छाती की, आत्मा की, प्राणों की/ सोंधी गन्ध/कहीं नहीं, कहीं नहीं।29

अंग्रेज़ों के औद्योगीकरण ने स्वावलम्बी ग्रामीण व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर शहरीकरण को जन्म दिया। औद्योगीकरण के कारण पूंजी के बढ़ते प्रभाव ने मानव सम्बन्धों को पूरी तरह से बदल डाला। पारिवारिक सम्बन्धों में मानवीयता, कोमलता और औचित्य बुद्धि को तिलांजलि दे दी गई। आदमी का मूल्य इस बात से लगाया जाने लगा कि वह कितना कमाता है। मुक्तिबोध ने लिखा है कि ‘परिवार में पुराने सामन्ती संस्कार विचारों के इलावा मौजूदा व्यक्तिवादी धनवादी दुराग्रहों के वातावरण के अस्तित्व के कारण, घर में दम घुटने या घोंटे जाने के दृश्य इतने विशाल और असंख्य हैं कि क्या कहना-व्यक्ति के सुख,विकास और आत्मोन्नति का साधन होने की बजाये जब परिवार एक कोठा हो जाता है,तब आप उसे क्या कहियेगा।’30

आम आदमी सामन्तीय और पूंजीवादी दोंनो व्यवस्थाओं के बीच झूलने लगा,उसकी दोहरी मानसिकता भी इसी वातावरण में उपजी। यही कारण है कि जीवन में औद्योगीकरण से उत्पन्न नई जीवन शैली और आदमी के बीच फासला आ गया। इस खालीपन को मुक्तिबोध ने लिखा है कि ‘जो पुराना है, अब वह लौटकर नहीं आ सकता लेकिन नये ने पुराने का स्थान नहीं लिया--उस व्यापक, उच्चतर, सर्वतोमुखी मानवीय अनुशासन की हार्दिक सिद्धि के बिना हम नया नया चिल्ला उठे, लेकिन वह नया क्या है ? ---हम नहीं जान सके। क्यों नया जीवन, नये मान मूल्य, नया इन्सान परिभाषाहीन और निराकार हो उठे?।’31

भारतीय समाज की वर्तमान अराजक स्थिति के लिए दार्शनिक स्थितियों-परिस्थितियों को भी मुक्तिबोध दोषी मानते हैं। भाववादी दर्शन के रुप में गांधीवादी दर्शन की आलोचना की। उन्होंने अन्य मनीषियों व चिन्तकों को भी दोषी ठहराया क्योंकि उन्होंने मानव जीवन का वस्तुपरक विश्लेषण करते हुए मनुष्य के निकट के जीवन दर्शन को प्रस्तुत न करके अपने व्यक्तिगत जीवन अनुभवों के आधार पर अपनी मनोवृत्ति के अनुसार आदर्शमयी दर्शनों को गढ़ा जिन्हें छूना भी मनुष्य के लिए सम्भव न था। कृषिक्षेत्र में फैली हुई अराजकता की ओर मुक्तिबोध ने सरकार का ध्यान दिलाना चाहा और कहा कि किसान पहले साहूकार का कर्ज़दार था अब वह सरकार का कर्ज़दार और सरकारी कर्ज चुकाने के लिए सहकारी बैंकों का कर्ज़दार हो रहा है।32 वेतनभोक्ता भारतीयों में आर्थिक विषमता के कारण अमीर और गरीब का खाई बढ़ रही है। आम जनता के आर्थिक वैषम्य को सामाजिक और मानवीय स्तर पर रेखांकित किया गया है। मुक्तिबोध की सूखे काटकर नंगे पहाड़, उलट पलट शब्द, भविष्य धारा, ओ अप्रस्तुत श्रोता, हर चीज अब अपनी, लकड़ी का रावण आदि कविताएँ आर्थिक विषमता सम्बन्धी व्यवस्था को उकेरती हैं।

परिवार, जाति और पूंजी को भारत के आधुनिक राष्ट्र बनने में मुक्तिबोध बाधक तत्त्व मानते है। जाति तो सामन्ती अवशेष है परन्तु परिवार में न केवल सामन्ती अवशेष देखते हैं बल्कि मानते हैं कि ‘धन, अर्थ, सांसारिक सफलता और उससे मिली हुई कीर्ति की तानाशाही जितनी परिवार में चलती हें उतनी बाहर भी नहीं।’33 मुक्तिबोध अपने लेख ‘अंग्रेज़ गये पर इतनी अंग्रेज़ी पूँजी क्यों’ में पूंजी के पक्षघरों के निहित स्वार्थों व उनकी राजनीति को तथ्यों व आंकड़ों के आधार पर परखते है तथा लिखते हैं कि विदेशी पूँजी भी हमें आत्मनिर्भर बनाने वाले उद्योगों में न लगाकर केवल कच्चा माल तैयार करने वाले उद्योगों में ही लगाई गई है -- विदेशी पूँजी भारतीय धोती पहन कर सामने आती है। नाम भारतीय रख दिया जाता है, एकाध भारतीय पूंजीपति को डायरेक्टर बनाकर बिठा दिया जाता है। किन्तु अधिकाँश पूँजी विदेशी होती हे और नियंत्रण भी विदेशी कम्पनियों के हाथ रहता है।34

साहित्य, समाज, राजनीति, अर्थनीति के क्षेत्र में मुक्तिबोध उन शक्तियों का विरोध करते हैं जो जडता को बनाये रखने में सहायक हैं। मुक्तिबोध जब आत्मान्वेषण करते हैं जो उनकी ज़िन्दगी उन्हें भूल का नक्शा जान पड़ती है। उनकी यही विचारधारा सामाजिक,आर्थिक राजनीतिक सन्दर्भों में सही प्रमाणित होती है। मध्यकाल की जड़ता के लिए राजपूत शासकों व उनकी धर्म नीति को, तत्कालीन शिक्षा पद्धति को जिम्मेदार ठहराते हैं। मुक्तिबोध ने जब स्वातन्त्र्योतर भारत की जन्म कुण्डली बनाने का उपक्रम किया तब लिखते हैं कि पुराना गया लेकिन नया नहीं आया ,नये के नाम जो कुछ आया, वह पुराने का आसन ग्रहण न कर सका। जीवन का व्यापक अनुशासक सत्य मर गया और नया तो केवल भ्रूण है, अभी उसके हाथ पैर बनने हैं, विकसित होने हैं।’35

मुक्तिबोध की पक्षधरता तब पराकाष्ठा को पहुँचती है जब वे दधीचि की तरह अपनी अस्थियों का अस्त्र बनाकर जनता के हाथों में थमा देना चाहते हैं जिससे जनता मानव पशुओं के खिलाफ़ उसका प्रयोग कर क्रान्ति की राह पर आगे बढ़ सके। मुक्तिबोध की काव्य भाषा अपने शक्तिशाली कथ्य की विविध भंगिमाओं की देन है। उनका शब्द विन्यास, पद चयन, वाक्य विन्यास और मुहावरा चयन उनके संवेदनात्मक उद्देश्य से ही परिचालित होते हैं। उनकी काव्य भाषा को विस्तार देने में जीवन के विविध क्षेत्रों से गणित, भूगोल, अर्थशास्त्र, रसायन शास्त्र, इतिहास, खगोल शास्त्र, सैनिक क्षेत्र आदि से ली गई शब्दावलियाँ जिम्मेदार हैं। उनकी फैंटेसी केवल भयावह यथार्थ का ही चित्रण नहीं करती वरन् उस यथार्थ के खिलाफ़ जन क्रान्ति के लिए वातावरण भी तैयार करती है। राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर दायित्व बोध से उपजी मुक्तिबोध की पक्षधरता जब गरीबों और शोषितों की पक्षधर बनती है तो मुक्तिबोध का हदय उनके प्रेम में गलकर बह जाता हैं और वे संधर्षरत लोगों के साथ उठने बैठने में आनन्द महसूस करते हैं, यही मुक्तिबोध की आधुनिकता का प्रतिफल है। उन्होंने परिवार,जाति और पूंजी को भारत के आधुनिक राष्ट्र बनने में बाधक तत्त्व माना व साहित्य, समाज, राजनीति, अर्थनीति के क्षेत्र में उन शक्तियों का विरोध किया जोकि जड़ता को बनाये रखने में सहायक हैं तथा स्वातन्त्र्योतर भारत की जन्म कुण्डली बनाने का उपक्रम करते हुए कृषिक्षेत्र में फैली हुई अराजकता के लिए आर्थिक वैषम्य को व भारतीय समाज की वर्तमान अराजक स्थिति के लिए दार्शनिक स्थितियों-परिस्थितियों को भी दोषी माना। मुक्तिबोध की आधुनिकता में अपनी और दूसरों की ज़िन्दगी को बेहतर स्थितियाँ देने के प्रति प्रतिबद्धता ही उनकी रचना धर्मिता की प्रथम शर्त है क्योंकि यही ज़िन्दगी की मांग है।

सन्दर्भ ग्रन्थः-
1 साधना शाह, नई कहानी में आधुनिकताबोध, पुस्तक प्रकाशन, जयपुर,1978,पृ. 121
2 सं लक्ष्मणदत गौतम, गजानन माधव मुक्तिबोध, पृ. 16
3 रामधारी सिंह दिनकर, आधुनिकताबोध, नेशनल पब्लिशिंग हाउस,नई दिल्ली,1989, पृ. 18
4 रमेश कुन्तल मेघ, आधुनिकताबोध और आधुनिकीकरण, अक्षर प्रकाशन,दिल्ली,1969, पृ. 35
5 गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध ग्रन्थावली खण्ड 5, पृ. 261
6 वही, पृ. 338
7 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 6, पृ. 552
8 गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध ग्रन्थावली खण्ड 5, पृ. 277
9 पृ. 335
10 वही, पृ. 197
11 वही, 254-255
12 वही, 324-326
13 मुकुन्द लाठ,हमारी आधुनिकता,पूर्वाग्रह, अंक 118, सितम्बर-नवम्बर 2002, पृ. 2
14 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 2, पृ. 189
15 वही, पृ. 195
16 वही, 491
17 वही, 350-51
18 वही, 350-51
19 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 4, 177
20 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 2, 174
21 गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध ग्रन्थावली खण्ड 5, पृ. 43
22 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 2, 316
23 वही, 172
24 चंचल चैहान, मुक्तिबोध-प्रतिबद्ध कला के प्रतीक, 16
25 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 1, 324-325
26 वही, पृ. 371
27 गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध ग्रन्थावली खण्ड 6, 558
28 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 2, 252
29 वही, पृ. 287
30 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 4, 174-175
31 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 2, पृ. 332-333
32 सं नेमिचन्द्र जैन, मुक्तिबोध रचनावली खण्ड 4, पृ. 53-54
33 गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध ग्रन्थावली खण्ड 4, 43
34 गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध ग्रन्थावली खण्ड 6, 65
35 गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध ग्रन्थावली खण्ड 4, 41

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