गैर सरकारी संगठन और नरक मसीहा

- सुरेश यादव


-: नरक मसीहा: भगवानदास मोरवाल :-



आधुनिक समाज के हाशिये की उपेक्षित उदासियों का अन्वेषण करने वाले उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल ने इस उपन्यास में भारत में तेज़ी से पनप रही एनजीओ संस्कृति के यथार्थ का चित्रण प्रस्तुत किया है। ये सभी एनजीओ अर्थात् गैर सरकारी संगठन अपने आप को समाज की मुख्यधारा में मानने का वहम रखते हैं। उपन्यासकार ने इसी मुख्य धारा की खबर इस उपन्यास में ली है। यह मुख्य धारा जो कई प्रकार की अमानवीय एवम् असामाजिक गतिविधियों से उस ढाँचे का निर्माण करती है जिसे हम समाज के रूप में देखते हैं तथा जानते हैं। इस उपन्यास नरक मसीहाका विषय गैर सरकारी संगठनों की भीतरी दुनिया है। जहाँ देश के लोगों के दुःख दुकानों पर बिक्री के लिए रखी चीजों की तरह बेचे और ख़रीदे जाते हैं। ये गैर सरकारी संगठन समाज के विकास के नाम पर अपने स्वार्थों की पूर्ति करते हैं। सामाजिक, आर्थिक विकास की गंभीर भंगिमायें किस प्रकार पलक झपकते ही इन मसीहाओं के बैंक बेलेंस में बदल जाती है इसका पता भी नहीं चल पता है। यह उपन्यास बताता है कि आजादी के बाद सामाजिक, वैचारिक प्रतिबद्धताओं के सत्व का क्षरण किस प्रकार हुआ है और कितनी तेजी से हुआ है। किस प्रकार से गाँधी जी के विचारों को पूजने वाले ही उनके विचारों को तिलांजलि देकर स्वार्थ सिद्धि की दौड़ में शामिल होते जा रहे हैं और आज वे किस प्रकार समाजघाती रूप में हमारे समक्ष सक्रिय होते जा रहे हैं। जो लोग कल समाज के लिए  सब कुछ न्यौछावर करने के लिए उदात्तता से दीप्त थे। वे ही लोग कब, कैसे पूरे समाज, उसके पवित्र विचारों, विश्वासों, प्रतीकों और अवधारणाओं को किस प्रकार अपने निजी हितों के लिए इस्तेमाल करने लगे। यह काम वे कितने निर्लज्ज आत्मविश्वास के साथ करते हैं इस पहेली को खोलना शायद आज के समाज के विकास के रूप में सबसे जरूरी काम हो गया है।

 इस उपन्यास में दिए गए विवरणों से हमें इस जरूरत को और गहराई से महसूस करने को विवश कर देता है। उपन्यास के पात्र अपने स्वार्थों की नग्नता में जिस तरह यहाँ प्रकट हुए हैं, यह बहुत ही डरावना है। पैसा कमाने के तर्क को वे जहाँ तक ले चुके हैं वह एक खौफनाक जगह है। यह सचमुच का नरक है और जिस भविष्य का संकेत यहाँ मिलता है वह बहुत ही वीभत्स है।

सुरेश यादव
भगवानदास मोरवाल ने अपनी नई औपन्यासिक कृति नरक मसीहामें सामाजिक आंदोलनों की छद्म दुनिया को हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हुए उनके किरदारों और कृत्यों से हमारा परिचय करता है। इस उपन्यास में एक नई दुनिया से हमारा सामना होता है और यह दुनिया एनजीओ की अनसुनी और अनकही कहानियों की दुनिया है। इस उपन्यास में कई कहानियाँ हैं। इनमें से कई कहानियाँ अपने आप में अपूर्ण लगती हैं तो कई पूर्ण भी हैं। जैसे मार्था एक्का की कहानी, एनजीओ की देह व्यापार की संलिप्तता को ध्यान में रखकर यह कथा कही गई है। जिसमें सरला बजाज, कबीर, सानिया पटेल, बहन भाग्यवती, वंदना राव, आदि पात्र अपने-अपने खूनी पंजों से समाज को घायल कर रहे हैं। ये हमेशा शिकार की तलाश में रहते हैं और जहाँ धंधे का कोई सूत्र नजर आता है उसी तरफ लपककर उसे धरने का जुगाड़ बिठाने लगते हैं।

उपन्यास में इस दुविधा से घिरे दो पात्र नजर आते हैं। एक गंगाधर आचार्य और दूसरे सोहन लाल प्रचंड। गंगाधर आचार्य जो गाँधीवादी विचारों को आज भी संजोये हुए हैं तथा आज के इस समाज में लुटे हुए गाँधी जी की लंगोट पकड़ कर घिसट रहे हैं। साथ ही साथ अपने आदर्श अर्थात् गाँधी जी के लुटने का तमाशा देख रहे हैं। दूसरे प्रचण्ड जो ध्वस्त होते तख़्त पर बैठे ऐसे कम्युनिस्ट नेता हैं जो समाजवाद की दुर्गति बैठे-बैठे देख रहे हैं। उन्हीं के परम शिष्य कबीर जो कभी लाल किले पर लाल परचम लहराने के गीत गाता था। वे सभी छद्म गाँधीवादी बन चुके हैं तथा पूर्ण रूप से पूँजीवादी व्यवसाय तथा साम्राज्यवादियों के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं। भगवानदास मोरवाल ने इन पात्रों के माध्यम से गाँधीवादी मूल्यों और मार्क्सवादी चिंतन और आन्दोलनों की अधोगति का चित्र उकेरा है।

यह उपन्यास उन मसीहाओं की कहानी कहता है, जिन्होंने जन सेवा के नाम पर लोगों के सपनों के साथ छल किया है। अपना नाम चमकाया, दाम कमाए, बड़े-बड़े पुरस्कार पाए लेकिन उस समाज का कोई खास भला नहीं किया जिसकी भलाई के संकल्प के साथ इन एनजीओ का निर्माण किया जाता है तथा इन एनजीओ का विकास किया जाता था। यह सच है कि सभी एनजीओ ऐसे नहीं होते हैं जो जन सेवा का काम न करते हो लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ऐसे एनजीओ बहुत कम रह गए हैं। जन कल्याण की जो एक बड़ी उम्मीद 90 के दशक में उभरी थी वह अब टूट चुकी है। जो जनता पहले सरकार के द्वारा किये जाने वाले झूठे वादों से ठगी जाती थी वही जनता आज इन एनजीओ के हाथों  छली जा रही है। इन गैर सरकारी संगठनों द्वारा सामान्य जनता का शोषण किया जा रहा है।

उपन्यास में एक तरफ आदर्श को थामे गाँधीवादी गंगाधर आचार्य और कम्युनिस्ट सोहन लाल प्रचंड है तो दूसरी तरफ बहन भाग्यवती है जो गाँधीवादी मूल्यों को ताक पर रखकर जुगाड़ द्वारा राष्ट्रीय बाल एवं महिला कल्याण परिषद् की अध्यक्ष बनकर दफ्तर के वातानुकूलित कक्ष और गाड़ी का सुख उठाते हुए गैर सरकारी संगठनों को दिए जाने वाले अनुदान पर कमीशन खाने में लगी रहती है। कॉमरेड सोहन लाल प्रचण्ड अपने सिद्धांतों और मूल्यों के साथ उम्र की ढलान के साथ एक कोठरी में खस्ताहाल तख़्त पर उद्विग्न होकर पड़े रहते हैं। कॉमरेड प्रचंड के कम्युनिस्ट चेले कबीर जो सर्वहारा फाउंडेशन के कर्ता-धर्ता हैं और ग्रासरूट फाउन्डेशन की एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर सानिया पटेल दोनों पति-पत्नी मार्क्सवादी सिद्धांतों को तिलांजलि देकर अपने-अपने गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से दोनों हाथों से पैसा बटोर रहे हैं। उपन्यास में बहन भाग्यवती गंगाधर आचार्य से कहती है कि क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जनाधार सत्याग्रह यात्रा के नाम पर विदेशों से भी धन मिल रहा है कबीर को... इतना ही नहीं सर्वहारा फाउन्डेशन को अमेरिका यूरोप से सिल्क रूट, फेस्टीवल, गोल्डन पथ, हिमालय दर्शन, जन सागर जैसी अनाम परियोजनाओं के नाम पर लाखों डॉलर और यूरो के रूप में इतना अनुदान मिल चुका है कि उन्हें रुपयों में बदलकर उनके पीछे लगे शून्यों को गिना जाये तो गिनते-गिनते आपको चक्कर आ जायेंगे।[1] ‘नरक मसीहा’ में तत्कालीन समय और समाज की समस्याओं की पहचान कर वर्तमान में तेजी से पनप रही एनजीओ वादी संस्कृति की भयावहता को उजागर करने का प्रयास किया है।

आज के समय में गई सरकारी संगठन अपने कर्त्तव्यों  से विमुख होकर स्वार्थलिप्सा में लीन होते जा रहे हैं। एक गैर सरकारी संगठन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य समाज का विकास और मानव का कल्याण करना है। गैर सरकारी संगठन आज अपनी साख ज़माने के लिए समाज को बेवकूफ बनाकर उसके दुःख दर्दो के नाम पर व्यापर कर अपने स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं। देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब यह एनजीओ संस्कृति अस्तित्व में आयी तो वैचारिक और सामाजिक उत्थान के नाम पर सरकारी संगठनों ने पिछड़े लोगों के विकास और उनके उत्थान को लेकर अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने का कार्य किया। उपन्यास में अखिल भारतीय अबला मंच में स्त्री को अबला नारी से सबला नारी बनाने के शानदार उद्देश्य से सरकारी अनुदान पाना और साधारण पिछड़े वर्ग की स्त्री आक्रान्ता की आँखों में डालने के लिए मिर्ची पाउडर के पाउच बाँटकर सरकारी अनुदान का दुरूपयोग और निजी लाभ के रूप में प्रयोग करना गैर सरकारी संगठनों की स्वार्थलिप्सा को दर्शाता है। लेखक ने उपन्यास में एनजीओ वाली संस्कृति पर आघात करते हुए साफ़ लिखा है कि, “सच्चाई तो इस एनजीओ की दुनिया में घुसने से ही पता चलता है कि कौन उनका दोहन कर रहा है। और कौन उनका शोषण कर रहा है और असल में उपेक्षितों ओर वंचितों का मासिहा बन कर बोस उनकी सेवा कर रहा है।”[2] लेखक उपन्यास के उद्देश्य को पूर्णत: स्पष्ट करते हुए कहते है कि लिखते हैं कि महानगरों के चतुर सुजान ग्रामीण निर्धनता का मजाक उड़ाकर भी अपना उल्लू सीधा करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

निम्न स्तर के लोगों की आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण इनकों उच्च और मध्य वर्ग के लोगों के यहाँ कार्य करना पड़ता है। उच्च वर्ग के लोग उनसे मन चाह काम करवाते हैं और न के बराबर मजदूरी प्रदान करते हैं। यही दलित एवं निम्न वर्ग का शोषण है। लेखक ने भी अपने उपन्यास में इसी प्रकार की दशा का वर्णन किया है। इसका वर्णन करते हुए कबीर कहता है कि “एनजीओ की कामयाबी सबसे बड़े औजार हमारे ये उजड़े हुए आदिवासी दलित होते हैं – यानी ये उजड़े हुए वंचित समुदाय जिनकी जमीन से गुजरा करने के साधन जैसे जंगल और जमीन अधिग्रहण में चली जाती है। जो हिम्मत सिंह जैसे थोड़े ही लोग बच गए, वे कर्ज में डूबने के चलते भूमिहीन हो गए हैं इन भोले वंचितों के पास सिवाय सपनों के होता भी क्या है , जिन्हें पूरा करने के लिए ये कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।”[3] इस प्रकार देखा गया है कि किस प्रकार एनजीओ द्वारा आज इन दलितों का शोषण किया जा रहा है, इन पर अत्याचार किया जा रहा है।

उपन्यास में बताया गया है कि यदि सरकार ने निम्न वर्ग के लिए एवं समाज के विकास के लिए गैर सरकारी संगठनों को मंजूरी दे भी दे दी होती तो क्या हुआ। जो ये एनजीओ चला रहे हैं  वो ही लोग तरक्की और विकास कर रहे हैं  और आम जनता भूख-प्यास से बेहाल होकर बेरोजगार दर-दर की ठोकरें खा रही है। इस उपन्यास में कई स्वार्थलोलुप राजनीति और शासनों में व्याप्त भ्रष्टाचार के उदाहण देखने को मिलते हैं जो राजनीति के स्वार्थी स्वरूप को हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। लेखक ने इस उपन्यास में एनजीओ संस्कृति की समस्याओं के साथ-साथ राजनीति की समस्याओं को भी रेखांकित करने का प्रयास किया है। भारतीय राजनीति में हुए स्वतंत्रता संग्राम और उसमें निहित आमजन की भागीदारी को भी दर्शाया है। इसी कारण मोरवाल जी अपने इस उपन्यास में एन.जी.ओ के राजनैतिक गठबन्धन एवं स्वार्थपरक प्रवृत्तियों को उजागर करने में सफल हो सके हैं।

उपन्यास को ध्यान में रखकर देखे तो आज का यह समाज सांस्कृतिक पतन की और अग्रसर हो रहा है। लोग पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण कर रहे हैं। जिनको इस गैर सरकारी संगठनों की सह प्राप्त है। पश्चिमी देश भी अपनी संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। उनका अनुदान देने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही है कि हमारे देश का सांस्कृतिक पतन हो। यहाँ सरकार उनकी नीतियों के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई नीति नहीं बनाए। यही यथार्थ इस उपन्यास ने उजागर किया है।

इस प्रकार हम अनुमान लगा सकते हैं कि आज के समय में समाज में गैर सरकारी संगठनों अर्थात् एनजीओ संस्कृति की क्या भूमिका है। ये गैर सरकारी संगठन जो समाज के विकास को ध्यान में रखकर खोले जाते है। उनकी इस समाज के विकास में क्या भूमिका है। इसी सत्य को उजागर करता है भगवानदास मोरवाल का यह उपन्यास नरक मसीहा। जो इन गैर सरकारी संगठनों के यथार्थ को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का एक प्रशंसनीय प्रयास है।

सन्दर्भ:-
1. भगवान दास मोरवाल, ‘नरक मसीहा’ पृ.10
2. भगवान दास मोरवाल, ‘नरक मसीहा’ पृ. 235
3. भगवान दास मोरवाल, ‘नरक मसीहा’ पृ.280

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