जनता की पक्षधरता और प्रगतिवाद

डॉ. योगेश राव

डॉ. योगेश राव

शोध-आलेख

   हिंदी का प्रगतिवादी साहित्य पूंजीवादी व्यवस्था से उत्पन्न सामाजिक एवं व्यक्तिगत शोषण के विरोध का साहित्य है। आधुनिक युग के प्रारंभ होते-होते भारत में पूंजीवादी व्यवस्था ने अपनी जड़ें जमाना शुरू कर दी थी। अंग्रेज शासकों द्वारा स्थापित बड़े-बड़े कल-कारखानों ने गाँव की दस्तकारी को समाप्त कर दिया। ये दस्तकार कारखानों में श्रमिक बनने को मजबूर हुए जहाँ इनका भरपूर शोषण होने लगा। श्रमिकों के श्रम से पूंजीपतियों की तिजोरियाँ भरने लगी, पर श्रमिक ज्यों-के-त्यों भूखे-नंगे रहे। जमींदारी व्यवस्था के अंतर्गत श्रमिकों का सा ही शोषण किसानों का भी हो रहा था।

    बीसवीं शती के प्रारंभ से ही बुद्धिवादी चिंतकों ने किसानों और मजदूरों का हितचिंतन प्रारंभ कर दिया। इसके पहले ही विश्व के रंगमच पर एक महती-विभूति का प्रादुर्भाव हो चुका था, जो मजदूरों और किसानों के शोषण का सबसे बड़ा शत्रु था। वह विभूति अपने व्यक्तिगत जीवन में कार्ल मार्क्स (1818-1883 ई.) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कार्ल मार्क्स ने अपने साम्यवादी सिद्धांतो की व्याख्या द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि अखिल विश्व में पूंजीवादी व्यस्था समाप्तप्राय है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर मार्क्स ने सिद्ध किया कि आगे आने वाला समय सर्वहारा वर्ग (मजदूर और किसान) के उत्थान का समय है। उसने ऐसे समाज की कल्पना की, जिसमें  सभी व्यक्तियों के अधिकार सामान होंगे, न कोई शोषक होगा, न कोई शोषित। सारे राष्ट्र की पूंजी प्रत्येक व्यक्ति की पूंजी होगी। मार्क्स ने अपने तर्कों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया कि धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियाँ उपस्थित हो रही हैं; जब बड़े-बड़े कारखानों पर मजदूरों का अधिकार होगा। इन कारखानों के लाभ से पूंजीपतियों की तिजोरी नहीं भरेगी बल्कि लाभ का सामान रूप से बँटवारा होगा।

    मार्क्स के सिद्धांत की प्रेरणा से रूस में क्रांति हुई और वह जारशाही से मुक्त हुआ। मार्क्स के साम्यवाद की सफलता ने संसार की आँखें खोल दीं। उसके सिद्धांतों का प्रचार विश्व के कोने-कोने में तेजी से हुआ  विश्व-चेतना के रूप में यह विचारधारा भारत में भी आयी और प्रबुद्ध चिंतकों का एक वर्ग इस विचारधारा को प्रश्रय देने के लिए तैयार हो गया। राजनीतिक क्षेत्र में साम्यवाद व समाजवाद कहलाने वाली इसी विचारधारा को साहित्यिक क्षेत्र में प्रगतिवाद की संज्ञा से अभिहित किया गया।

    मार्क्स ने साम्यवादी सिद्धांतों की स्थापना में जितनी अनुकूल परिस्थितियों का उल्लेख किया था, उनमें सभी भारत में भले ही न रही हो, फिर भी यहाँ पूजीवादी शोषण धीरे-धीरे बढ़ रहा था। इसके अतरिक्त विश्व-युद्ध के कारण व्याप्त मंहगाई, आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, उस पर पूंजीवाद का बढ़ता शोषण, पाशविक आचरण और दारिद्र्य का बोलबाला, इन सभी स्थितियों ने मिलकर देश के प्रबुद्ध चिंतकों को इनके विरोध में आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। प्रगतिवादी साहित्य के उद्भव का यह समय स्वतंत्रता के लिए की जाने वाली भयानक क्रांतियों का भी समय था। विश्व-मानवतावाद और सर्वधर्म समन्वयवाद भी भारत में स्थान पा रहा था। इस चिंतन को प्रगतिशील चिंतन की संज्ञा दी गयी है। भारत के प्रगतिशील चिंतन ने साम्यवादी चिंतन की उपयुक्त भूमिका तैयार की।

    इस प्रकार प्रगतिवादी साहित्य का प्रमुख केंद्र-बिंदु किसान और मजदूर वर्ग तथा मानव समष्टि का हितचिंतन है। प्रगतिवादी साहित्यकार पूँजीवाद और उससे उत्पन्न शोषण का घोर शत्रु है। वह किसानों और मजदूरों को एक होकर शोषकों के विरोध में महाक्रान्ति करने की प्रेरणा देता है। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए ही इस आन्दोलन को सार्थक दिशा दी जा सकती है और इसी में समस्त मानवता का कल्याण निहित है। प्रगतिवादी साहित्यकार मानव-समूह के यथार्थ चिंतन के समक्ष न तो किसी धर्म को प्रश्रय देता है न जातीयता को और न ही वर्गीय और प्रादेशिक या राष्ट्रीय विभाजन को। उसका दृष्टिकोण समस्त विश्व के मानवों को संतुष्टि देने वाला है। प्रगतिवादी साहित्यकार धर्म, ईश्वर और परलोक की भावना का विरोध करता है। मार्क्स ने आधुनिक युग में वर्ग संघर्ष की अनिवार्यता स्पष्ट करते हुए कहा है कि कुछ मिट्टी भर पूंजीपति समाज के धनोत्पादन के साधनों पर अधिकार रखे हुए हैं और वे निजी लाभ के लिए समाज का शोषण कर रहे हैं अत: एक ओर पूंजीपति सर्वहारा वर्ग का शोषण कर अधिकाधिक धनवान होते जा रहे हैं दूसरी ओर सर्वहारा वर्ग दरिद्र एवं विपन्न होता जा रहा है। इसलिए मार्क्स ने संसार के मजदूरों को संगठित हो जाने की प्रेरणा देते हुए कहा था जिस प्रकार राज्य जनता को भौतिक रूप से शोषित करता है उसी प्रकार धर्म भी जनता को मानसिक रूप से क्षयग्रस्त बनाता है - Religion represents the spiritual force of oppression just as the state represents the physical.

         मार्क्स के साहित्य सम्बन्धी विचार उसकी आर्थिक विचारधारा पर आधारित है उनका कहना था साहित्य एक निरपेक्ष सत्ता न होकर समाज की अर्थ-व्यवस्था से ही नियमित एवं संचालित होता है क्योंकि साहित्यकार एक सामाजिक प्राणी है और समाज की आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था उसका निर्माण करती है। अतएव उसकी उद्भावनाएँ इन शक्तियों द्वारा आवश्यक रुप से प्रभावित होती हैं और साहित्य युगीन अर्थ-व्यवस्था एवं उससे नियमित सामाजिक तंत्र की अभिव्यक्ति है। मार्क्स के शब्दों में- The mode of production in material life determines the social, political and intellectual life processes in general. It is not the consciousness that determines their being but on the contrary their consciousness.

          प्रसिद्ध समीक्षक चन्द्रबली सिंह अपने आलेख ‘आलोचना की कुछ समस्यायें और हिंदी आलोचना’ में लिखते है-“हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि न केवल साहित्य के क्षेत्र में ही वरन् आलोचना के क्षेत्र में भी हमारे यहाँ एक स्वस्थ प्रगतिशील परंपरा रही है जिसने रीतिकालीन सामंतवादी और साम्राज्यवादी विचारधाराओं से टक्कर ली हैं और हमें उससे बहुत कुछ सीखना और उसके सहारे आगे बढ़ना है।”1

         माओ-त्से-तुंग को उद्धृत करते हुए वे पुनः लिखते हैं, मो-त्से-तुंग के शब्दों में- “साहित्य और कला की हमारी आलोचना संकुचित दृष्टी के दोष से मुक्त होना चाहिए। साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष और राष्ट्रीय एकता के आम सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए हमें हर प्रकार और स्तर के राजनीतिक दृष्टिकोण वाले साहित्य और कला के प्रति सहनशील बनना होगा। किन्तु साथ ही साथ जब हम आलोचना करते हैं, उस समय हमें अपने सिद्धांतों और अपनी स्थिति पर दृढ़ होना चाहिए।”2
 
 हिंदी के वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह अपनी पुस्तक ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ में प्रगतिवाद की व्याख्या करते हुए लिखते हैं- “छायावाद के गर्भ से सन 1930 के आसपास नवीन सामाजिक चेतना से युक्त जिस साहित्य-धारा का जन्म हुआ उसे सन ‘36 में प्रगतिशील साहित्य अथवा प्रगतिवाद की संज्ञा दी गयी... ’प्रगतिशील साहित्य अंग्रेजी के प्रोग्रेसिव लिटरेचर’ का हिंदी अनुवाद है। अंग्रेजी साहित्य में इस शब्द का प्रचार 1935 के आस-पास विशेष रूप से हुआ जब ई. एम. फास्टर के सभापतित्व में पेरिस में ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था का प्रथम अधिवेशन हुआ। हिंदुस्तान में उसके दूसरे साल डॉ. मुल्क राज आनंद और सज्जाद जहीर के उद्योग में जब संस्था की शाखा खुली और प्रेमचंद की अध्यक्षता में लखनऊ में उसका प्रथम अधिवेशन हुआ तो यहाँ ‘प्रोग्रेसिव लिटरेचर’ अथवा प्रगतिशील साहित्य का प्रचार हो गया। कालक्रम अथवा प्रकारांतर से यही प्रगतिवाद हो गया।”3

       ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन’ संस्था के अधिवेशन का जो घोषणा-पत्र भारत भेजा गया इसका उल्लेख प्रेमचंद ने ‘हंस’ के संपादकीय में इस प्रकार किया है- “इस सभा का उद्देश्य अपने साहित्य और कलाओं को पुजारियों, पण्डितों, और अप्रगतिशील वर्गों के आधिपत्य से निकालकर जनता के निकटतम संसर्ग में लाना है, उनमें जीवन और वास्तविकता की सृष्टि करना है जिससे हम अपने भविष्य को उज्ज्वल कर सकें।”4

    समाज की यथार्थपरक समस्यायों पर आधारित यह चिंतन भारतेंदु युग से ही प्रारंभ हो गया था। द्विवेदी युग के कवियों में भी यह चिंतन मिलता है। छायावाद के दो कवियों निराला और पन्त में यह और भी तीखा होकर उभरा है। संक्षेप में मैथलीशरण गुप्त, नवीन, निराला, पन्त, दिनकर आदि कवि प्रगातिशील चिंतन के सजग प्रहरी रहे हैं। इनका पूरा चिंतन राष्ट्रीय समस्यायों की गोद में जन्म लेता है और राष्ट्रीय सन्दर्भों में ही इनका समाधान प्रस्तुत करने की चेष्टा इन चिंतकों ने की है। इस संदर्भ में वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह कहते हैं- “लेखक में शक्ति जनता से आती है, जनता के साथ उसका सम्बन्ध जितना घनिष्ठ होता है, उसमें उतनी ही अधिक रचनाशक्ति आती है और उसकी रचना में उतना ही अधिक सौन्दर्य बढ़ता है। इसके विपरीत ज्यों ही लेखक अपने उस अक्षय स्रोत से हट जाता है, उसकी सारी शक्ति जवाब दे जाती है। ...श्रेष्ठ रचना करने के लिए साहित्यकार को अनिवार्य रूप से जनता का पक्षधर होना ही पड़ेगा।”5   
    मार्क्स के भौतिक द्वंद्वात्मक विकासवाद और मूल्य वृद्धि के सिद्धांत तथा अर्थ-व्यवस्था के आधार पर विश्व-सभ्यता की व्याख्या तथा सामाजिक यथार्थवाद से प्रभावित हिंदी का प्रगतिवादी साहित्य इसी पर आधारित और स्थापित है। क्रांति, विप्लव, दुर्भिक्ष, झंडा, हँसिया-हथौड़ा, हड़ताल, विध्वंसात्मक तोड़-फोड़ रूस, चीन और माओ का गुणगान, ये सभी इस काव्यधारा के विषय है। धर्म को अफीम का नशा और वर्ग-भेद को कराल विष मानने वाली प्रगतिवादी विचारधारा आज विकृत होकर एक सांप्रदायिक नारेबाजी बन गयी है, मानव समष्टि के हित का चिंतन करते-करते वह लाल (खूनी) क्रांति और नरसंहार का विकराल रूप ले चुकी है और आज इससे पूरा देश इस आग की चपेट में है, यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इसके ठीक विपरीत हिंदी के प्रगतिशील कवि मानव समष्टि का वास्तविक हितचिन्तक और उसे एक वरेण्य मार्ग का दर्शन करने वाला है। प्रगतिवाद के सन्दर्भ में युगद्रष्टा समीक्षक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है- “प्रगतिशील आन्दोलन बहुत महान उद्देश्य से चालित है। इसमें साम्प्रदायिक भाव का प्रवेश नहीं हुआ तो इसकी सम्भावनाएँ अधिक है...यह आन्दोलन भी हो सकता है।”6

    द्विवेदी जी का यह कथन हमें विपरीत परिस्थितियों में नयी उर्जा और विश्वास के साथ-साथ भविष्य की संभावनाओं के लिए प्रेरणा देता हैं।  

    हिंदी के प्रगतिवादी कवियों में केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, डॉ. रामविलास शर्मा, रांगेय राघव, भवानीप्रसाद मिश्र, डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन, त्रिलोचन, भैरव प्रसाद गुप्त, अमृत राय, राजेंद्र यादव, रघुवंश, धर्मवीर भारती, शम्भुनाथ, ठाकुरप्रसाद सिंह, नामवर सिंह आदि मुख्यतया उल्लेखनीय है।

संदर्भ:-
1.        लोकदृष्टि और हिंदी साहित्य- चंद्रबली सिंह, 149, पीपुल्स लिटरेसी 517, मटिया महल, दिल्ली-11OOO6, प्रथम   संस्करण: 1986
     2.  लोकदृष्टि और हिंदी साहित्य- चंद्रबली सिंह, 148, पीपुल्स लिटरेसी 517, मटिया महल, दिल्ली-11OOO6, प्रथम संस्करण: 1986
3.  आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ- नामवर सिंह, पृष्ठ- 59, लोकभारती प्रकाशन, 15-ए, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद, नवीन संस्करण: 2004
4.  ‘हंस’ पत्रिका, जनवरी, 1936, संपादक- प्रेमचंद  
     5.  आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ- नामवर सिंह, पृष्ठ- 88-89, लोकभारती प्रकाशन, 15-ए, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद- नवीन संस्करण:2004
     6.  साहित्य : उद्भव और विकास- हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ- 261, प्रकाशन- राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1 बी.,  नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, संस्करण- 2003

1 comment :

  1. कोई भी विचारधारा अपने उद्भव काल व देश से आगे बढ़ते ही अन्य देश-काल के अनुरूप नए अर्थ और स्वरूप ग्रहण करना प्रारम्भ कर देती है । मार्क्स का साम्यवाद भारत की धरती तक आते-आते जिस रूप और अर्थ में प्रकट हुआ वह आम भारतीय के लिए ग्राह्य और अनुकरणीय नहीं हो सका । हाँ ! प्रगतिशील लेखन के नाम पर बहुत कुछ सार्थक लिखा गया, जिसमें पूँजीवादी व्यवस्था का विरोध मुखर हुआ है । किंतु यह लेखन कोई सामाजिक या राजनीतिक परिवर्तन कर पाने में अपेक्षित सफल नहीं हो सका । जातिवाद और भी विकृत स्वरूप में दिखाई देने लगा है, वर्गभेद भी कम होने के स्थान पर बढ़ा ही है । भारत को ऐसी प्रेरणा की आवश्यकता है जो सार्थक क्रांति के लिए लोगों को मनसा-वाचा-कर्मणा आगे ला सके ।

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