अहिंसा अपनाने की प्रविधि है: सकारात्मकता

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


कभी-कभी यह सभी के मन में विचार आते हैं कि हम क्या गलत कर रहे हैं और क्या सही। क्या अनुचित कर रहे हैं या क्या उचित। यह भावबोध देव चिंतन-मनन और दानव चिंतन-मनन दोनों में मिलता है। हम अपने धर्म-पुराण और उपनिषद को पढ़ें तो ऐसी कई कथाएँ मिलेंगी कि सामान्य मनुष्य, ऋषि-मुनियों और योगियों, देवता भगवान तथा राक्षस सभी के मन में ऐसे विचारों का उत्पादन-पुनरुत्पादन होता रहा है। यह भी बातें आती हैं कि जिसने इस सही और गलत को समझकर अनदेखा किया उसका परिणाम उसे उस जन्म और जन्म-जन्मान्तर तक मिला। इस पृथ्वी पर प्रत्येक धर्म और वैचारिकी में इस प्रकार के तथ्य मिलते हैं। यह प्रवृत्ति सभी में मिली। इसका मतलब यह एक ऐसा सूत्र है जिससे सभी कहीं न कहीं प्रभावित हुए हैं। सभी को कुछ खट्टा-मीठा इसका आस्वाद मिला है। वस्तुतः हर चीज के पीछे हमारी सकारात्मकता और नकारात्मकता का बहुत बड़ा अवदान है। सकारात्मक चीजें या इसे हम चीज न कहें सोच कह लें, तो सकारात्मक सोच किसी भी सफलता का बड़ा कारण होती है और इसके उलट नकारात्मक सोच उसके पतन का कारण बनती है। नकारात्मक सोच किसी भी अवनति का कारण होने के पीछे कुछ कारण होते हैं। इससे व्यक्ति या व्यवस्था प्रायः अनिष्ट की ओर उन्मुख हो जाता है। अनिष्ट की विचारणा मन में लाता है और वह अनिष्ट करने पर आमादा हो जाता है।

सही दिशा में सोच रखना किस दशा में हो पाता है और गलत व्यक्ति या व्यवस्था क्यों सोचती है इसे, इसके पीछे समय-काल-परिस्थितियाँ होती हैं। कभी भी अनिष्ट सोचने वाला व्यक्ति यह नहीं कहता कि उसका भटकाव अब नकारात्मक सोच की ओर बढ़ चला है। युद्ध और हिंसा, द्वेष और घृणा इस नकारात्मकता की वजहें हैं। संचय की वृत्ति भी इसकी एक वजह है। अपनी संप्रभुता की चिंता भी इसकी वजह है। अपने विस्तार की चिंता भी इसकी वजह बनती है। अपनी महत्वाकांक्षाएँ भी नकारात्मक सोच की ओर प्रवृत्त करती हैं। हालांकि महत्वाकांक्षाओं की प्रतिपूर्ति और विस्तार या संप्रभुता का विस्तार सकारात्मक सोच का भी हिस्सा माना गया है। और इसे अच्छा भी माना गया है लेकिन नकारात्मकता में भावबोध और इच्छाओं की जो असीमता होती है वह क्रूरता को जन्म देती हैं जिससे हिंसा कि वृत्ति बढ़ जाती है। यहीं से कोई व्यक्ति या संस्था नकारात्मक हो जाती हैं और अपने आस-पास की चीजों को प्रभावित करना प्रारंभ करती हैं क्योंकि अब उसके लिए वह अतिक्रमण करने की प्रवृत्तियाँ सहज उसके जीवन में घटना शुरू हो जाती हैं। येन-केन-प्रकारेण किसी भी लक्ष्य तक पहुँचने या पाने की भी इच्छाएँ नकारात्मकताओं को जन्म देती हैं। इन नकारात्मकताओं की वजह से हिंसा बढ़ती है, अतिक्रमण बढ़ते हैं, अपराध बढ़ते हैं। इसका कारण है अधिकार की भावना का विस्तार और कर्त्तव्य-भावबोध की शून्यता। इस दशा में सच में व्यक्ति-व्यवस्था हरेक चीज पर अपना अधिकार जमाने की चेष्टा ज्यादा करती है और उसके बरक्स उसका कर्त्तव्य भी कुछ बनता है कि नहीं, इस पर ध्यान नहीं देतीं। इन अधिकार-बोध ने ही नकारात्मकता को जना है। यदि यही कर्त्तव्यबोध का आधिक्य होता तो नकारात्मकता नहीं पनपती क्योंकि तब त्याग की भावना होती। त्याग ही तो प्रेम है। यानी प्रेम के अभाव से नकारात्मक सोच का जन्म होता है। प्रेम की भावना होती तो वहाँ त्याग की भावना की ज्यादा दिखती। इसलिए ही तो घृणा और हिंसा की समस्या बढ़ी है। उत्तरोत्तर नकारात्मक सोच की वजह से घृणा और हिंसा बढ़ी है। और यदि सकारात्मकता होती तो प्रेम और अहिंसा होती। इसका अर्थ अब यह मान लेना चाहिए कि सकारात्मकता अहिंसा का मार्ग है। इसके अब अगर उदाहरण ढूंढें तो बहुतेरे उदाहरण हमारे इतिहास में उपलब्ध हैं। महाभारत, रामायण, गीता और अन्य महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ ऐसे बहुतेरे उदाहरण हमें प्रदान करते हैं जिसमें यह सविस्तार कथाओं के जरिये समझाया गया है कि सकारात्मकता-पॉजिटीविटी अहिंसक होने, अहिंसक व्यवहार करने का मूल स्रोत है। यदि दुर्योधन सकारात्मक होता तो वह श्रीकृष्ण की बात मान लेता और ऐसा नहीं कहता कि पाँच गाँव क्या... हम सुई की नोक के बराबर भी पांडवों को जमीन नहीं देंगे। यह एक बड़ा उदाहरण है। नकारात्मक सोच हमें, हमारे समूल का नाश कर देती हैं, यह सम्पूर्ण महाभारत को पढ़ते हुए कोई भी व्यक्ति जान-समझ सकता है। मैं तो कहूँगा कि इस धरती पर जितने भी हिंसक युद्ध हुए या हिंसा हुई उसके पीछे कहीं-न-कहीं हमारी नकारात्मक सोच ने काम किया। पूरे विजितों ने भले जश्न मनाया हो। अपने विजय की गाथाएँ लिखी हों लेकिन इसमें हुई हिंसा और मानवीय क्षति यह बताती है कि हिंसा हमेशा मनुष्य के नकारात्मक सोच की वजह से उपजी वह विषबेल रही है जिसने पूरी सभ्यता और संस्कृत को विनष्ट किया।

महत्त्वपूर्ण यह है कि मनुष्य या जो भी इस सार्वभौम सत्ता में है वह सकारात्मक क्यों नहीं बन पा रहा है? क्यों परस्परता और एक दूसरे के प्रति त्याग या कर्त्तव्यबोध जागृत नहीं हो पा रहे हैं? क्यों लोगों के प्रति या खुद के प्रति सकारात्मक भाव अपना प्रभाव नहीं दिखा पा रहा है और नकारात्मकता हावी होती जा रही है? यह ऐसे सवाल हैं, जिस पर प्रत्येक व्यक्ति को चिंतन करने की ज़रूरत है। यह विचार करने की आवश्यकता है की नकारात्मकता की जगह हम सकारात्मकता को कैसे ज्यादा विस्तारित करें। सकारात्मकता जैसी संकल्पना पर काफी कुछ लिखा जा चुका है और इस पर कई सूत्र भी ईजाद करने के दावे भी किये जाते रहे हैं लेकिन इसकी एक महत्त्वपूर्ण बात जो मुझे अहिंसा में दिखती है, वह बहुत ही क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। अहिंसा कि सोच का उद्भव हमारे सकारात्मक भाव से संभव है और इसे अपनाने में कोई हर्ज़ नहीं होना चाहिए। यह तो मनुष्यता की स्थापना की एक तरीके से बात की जा रही है। इससे सभ्यताओं में आमूलचूल परिवर्तन देखा जा सकता है। हिंसा से बचा जा सकता है। उस वैभव को पाया जा सकता है जो हमारी परम्परा में रहे हैं। सर्वे भवन्तु सुखिनः की हमारी परम्परा सकारात्मकता से ही विस्तारित और संरक्षित हो सकती है। यह तो मानवता का मूल मंत्र है। यदि हम सकारात्मक सोचेंगे तो वैसा आचरण भी करना प्रारंभ करेंगे। स्वयं को प्रसन्न रखना भी सकारात्मकता है और दूसरों को प्रसन्नता प्रदान करना भी सकारात्मकता है। इस प्रसन्नता को और बढ़ाने की आवश्यकता है। इसलिए आज जब दुनिया में अशांति ज्यादा बढ़ रही है तो आवश्यकता इस बात की है कि अहिंसा को अपने जीवन-आचरण में लाएँ और यह तभी संभव है जब हम सकारात्मक होंगे। सकारात्मक होना कठिन नहीं है कठिन केवल है अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण। यदि इन्द्रियों पर अनुशासन हो जाए तो इच्छाओं का दमन स्वतः हो जायेगा। हमारी विध्वंसक महत्त्वाकांक्षाएँ भी मर जाएंगी। ऐसे में वही सकारात्मकता के गुण पूरी सभ्यता के सौन्दर्य को प्रस्तुत करेगा जो एक सभ्य समाज की निशानी है।

1 comment :

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।