गोदान के होरी का समसामयिक संदर्भ

आदित्य आंगिरस

- आदित्य आंगिरस 

गोदान प्रेमचंद का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें उनकी कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची है। गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन - उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता और भारतपरायणता के साथ स्वार्थपरता ओर बैठकबाजी, उसकी बेबसी और निरीहता- का जीता जागता चित्र उपस्थित किया गया है जिसमें उसकी गर्दन जिस पैर के नीचे दबी है वह उसी को सहलाता, अपनी पीड़ा, क्लेश और वेदना को झुठलाता, 'मरजाद' की भावना पर गर्व करता, ऋणग्रस्तता के अभिशाप में पिसता, तिल-तिल शूलों भरे पथ पर जीवन यापन करते हुए दिखाया है। वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरुदंड यह किसान कितना शिथिल और जर्जर हो चुका है, यह गोदान में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है। गोदान वास्तव में, 20वीं शताब्दी की तीसरी और चौथी दशाब्दियों के भारत का ऐसा सजीव चित्र प्रस्तुत करता है वैसा साहित्य की किसी भी अन्य शैली में मिलना दुर्लभ है। नगरों के कोलाहलमय चकाचौंध ने गाँवों की विभूति को कैसे ढँक लिया है, जमींदार, मिल मालिक, पत्रसंपादक, अध्यापक, पेशेवर वकील और डाक्टर, राजनीतिक नेता और राजकर्मचारी जोंक बने कैसे गाँव के इस निरीह किसान का शोषण कर रहे हैं और कैसे गाँव के ही महाजन और पुरोहित उनकी सहायता कर रहे हैं, गोदान में ये सभी तत्व प्रेमचन्द के इस उपन्यास में हमारे सामने स्वतः ही प्रत्यक्ष हो जाते हैं। गोदान में बहुत सी बातें एक साथ कही गई हैं। जान पड़ता है प्रेमचंद ने अपने संपूर्ण जीवन के व्यंग और विनोद, कसक और वेदना, विद्रोह और वैराग्य, अनुभव और आदर्श सभी को इसी एक उपन्यास में एक साथ भर देना चाहा है। अतः कई आलोचक इसी कारण यदि उसमें शिथिलता की बात करते हैं तो वे गलत नहीं हैं क्योंकि उसका कथानक शिथिल, अनियंत्रित और स्थान-स्थान पर अति नाटकीय जान पड़ता है। ऊपर से देखने पर पाठकगण निश्चित रूप से महसूस करते हैं परंतु यदि सूक्ष्म रूप से देखें तो गोदान में लेखक का अद्भुत उपन्यास-कौशल दिखाई पड़ेगा क्योंकि उन्होंने जितनी बातें कहीं हैं प्रखरता से उनका कहीं न कहीं निर्वहन किया गया हैं। सभी बातें कहने के लिये उपयुक्त प्रसंगकल्पना, समुचित तर्कजाल और सही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रवाहशील, चुस्त और दुरुस्त भाषा और वणर्नशैली में उपस्थित कर देना प्रेमचंद का अपना विशेष कौशल है और इस दृष्टि से उनकी तुलना में शायद ही किसी उपन्यास लेखक को रखा जा सकता है। यह तो निश्चित रूप से मान्य तथ्य है कि जिस समय प्रेमचन्द का जन्म हुआ वह युग धार्मिक सामाजिक रुढ़िवाद से भरा हुआ था और भारतवर्ष पराधीन होने के साथ-साथ न केवल मूल्य संक्रमण के दौर से गुज़र रहा था अपितु भारतीय अर्थव्यवस्था का ढाँचा भी बदल रहा था जिसमें भारत परम्परागत कृषि को त्याग कर पश्चिमी औद्योगिक नीतियों को स्वीकार कर रहा था।

यह तो निश्चित रूप से सर्वमान्य तथ्य है कि उपन्यासकार प्रेमचंद के द्वारा सन 1936 में रचा गया गोदान हिंदी साहित्य की एक ऐसी महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसने भारतीय संस्कृति की आधारशिला कृषक का मार्मिक वर्णन मिलता है। यद्यपि प्रेमचंद ने इससे पहले भी उपन्यास लिखे जो अपनी दिशा व उद्देश्य के अभाव में या तो केवल उपदेशवादी और सुधारवादी स्वरों को अभिव्यक्त करने वाले बन गये अथवा गांधीवादी विचारधारा का परिपोषण करने वाले बन गये थे। ये उपन्यास पाठकों के मनोरंजन की ही पृष्ठभूमि तैयार कर रहे थे जिसमें मनुष्य के सामाजिक कर्तव्यों के बारे में बड़े ही सुलझे तरीके एवं व्यंजित भाव से बात की गई है। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन, कर्मभूमि आदि प्रेमचंद के कतिपय ऐसे ही उपन्यास हैं परन्तु उनकी यही कला का चरमोत्कृष्ट रूप उनके द्वारा रचा गया उपन्यास गोदान में ही देखने को मिलता है जहाँ वे उपदेशात्मकता के अभाव में यथातथ्य भारतीय सामाजिकता का स्वरूप प्रकट करते हैं और हिन्दी साहित्य में प्रेमचन्द का यह उपन्यास उनकी रचनात्मक परिपक्वता और उनके यथार्थवादी चित्रण के लिए जाना जाता है। आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में - "हिंदी उपन्यास साहित्य में प्रेमचंद के आगमन को एक ऐतिहासिक घटना माना जा सकता है।"

हिन्दी साहित्य में गोदान को किसान जीवन की समस्याओं, दुखों और त्रासदियों को द्योतित करता हुआ महाकाव्य माना जाता है और इस महाकाव्य की कथा में गाँव और शहर के आपसी द्वंद्व, भारतीय ग्रामीण जीवन के दुख, गाँवों के बदलने टूटने बिखरने के यथार्थ और जमींदारी के चक्र में उलझ कर आतंकित किसानों की पीड़ा का मार्मिक एवं विषद चित्रण एवं विश्लेषण है जिसे पढ़कर सहृदय पाठक न केवल भारतीय किसान की विषम स्थिति के बारे में करुणापूर्वक विचार करता है अपितु सामाजिक परिस्थितियों में भी परिवर्तन की अपेक्षा करता है जिसके परिणामस्वरूप किसान की आर्थिक दशा में सुधार हो सके। इस उपन्यास की कथा का मूल होरी नामक किसान है जो न तो धीरोदात्त नायक है न ही वह धीरललित अथवा धीरप्रशान्त अथवा धीरोद्धत प्रकार का नायक है और न ही उसके चरित्र में किसी प्रकार की महानता अथवा चमत्कार प्रकट होता है। वह एक अति साधारण मनुष्य है जो भारतीय कृषि में अनुस्यूत व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है। यदि होरी का व्यक्तिगत साक्षात्कार करने की आकांक्षा हो तो उस व्यक्ति को केवल धूप से झुलसी, सांवली और सूखी पड़ी त्वचा, पिचका हुआ मुँह, सिर पर अन्दर की ओर धंसी हुई निस्तेज आँखें और कम उम्र में ही अकारण ही संघर्ष की मार से मुरझाया हुआ मुख की मात्र कल्पना करना ही उचित होगा। होरी के इस बिंब से किसी भी भारतीय किसान का चेहरा बरबस सामने आ जाता है। होरी के जीवन की आर्थिक दुर्दशा का चित्र प्रस्तुत करते हुए प्रेमचंद लिखते हैं – "घर का एक हिस्सा गिरने को हो गया। द्वार पर केवल एक बैल बंधा हुआ था, वह भी नीमाजान- अब इस घर के संभलने की क्या आशा है- सारे गाँव पर यही विपत्ति थी। ऐसा एक भी आदमी नहीं था जिसकी रोनी सूरत न हो। चलते फिरते थे, काम करते थे, पिसते थे, घुटते थे, इसलिए कि पिसना और घुटना उनकी तकदीर में लिखा था। जीवन में न कोई आशा और न कोई उमंग, जैसे उनके जीवन के सोते सूख गए हों और सारी हरियाली मुरझा गई हो, भविष्य अंधकार की भांति उनके सामने है।"

प्रेमचन्द का इस रचना में गांधीवाद से मोहभंग इसीलिये हुआ है क्योंकि गांधीवाद किसी भी प्रकार से होरी जैसे किसानों की समस्या का निदान देने में असमर्थ रहा था और इसी कारण गोदान में आकर यथार्थवाद नग्न रुप में हमारे सामने अपने को प्रस्तुत करता है। क्योंकि कोई भी नेता कृषकों की समस्याओं को न तो समझता है और न ही समस्या के निवारण हेतु प्रयास करते हैं। यह बात भी यहाँ बताना आवश्यक है कि भारतीय नेता किसानों की समस्याओं का निदान ढूंढने में असमर्थ रहे है और कृषि संबंधी समस्याओं ने वर्तमान युग में विकराल रूप धारण कर लिया है जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान समय में किसान आत्महत्या करने के लिये बाधित हो जाता है।

"गोदान" एक भारतीय कृषक की ऐसी कथा है जिसमें कृषक जीवन भर अथक प्रयास करता है कि उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो सके, इसी कारण वह अनेक कष्ट सहता है ताकि वह मर्यादा की रक्षा कर सके। वह दूसरों को प्रसन्न रखने का प्रयास भी करता है, किंतु उसे इसका फल नहीं मिलता और अंत में लुटने के लिये मजबूर होना पड़ता है और अपनी उस मर्यादा को बचा नहीं पाता जिसका उद्धरण वह बात-बात में देता रहता है। परिणामतः वह जप-तप के अपने जीवन को ही "मरजाद" की रक्षा के लिये होम कर देता है। यह होरी की कहानी नहीं, उस काल के हर भारतीय किसान की आत्मकथा है।। 'गोदान' में उन्होंने ग्राम और शहर की दो कथाओं का इतना यथार्थ रूप और संतुलित मिश्रण प्रस्तुत किया है। दोनों कथाओं का संगठन इतनी कुशलता से हुआ है कि उसमें प्रवाह आद्योपांत बना रहता है। प्रेमचंद की कलम की यही विशेषता है।

होरी के शोषण के ऐतिहासिक कारण हैं। रामविलास शर्मा इन्हीं संदर्भों में अपना मत अभिव्यक्त करते हुये कहते हैं कि "गोदान में किसानों के शोषण का रूप ही दूसरा है। रायसाहब के कारिंदे सीधे होरी का घर लूटने नहीं जाते, मगर होरी लुट जाता है कचहरी कानून के सीधे हस्तक्षेप के अभाव में भी उसकी जमीन छिन जाती है। होरी जैसा किसान शोषण के औपनिवेशिक तंत्र के सामने अकेला और निरीह है। होरी कहता है गाँव में इतने आदमी तो हैं, किसी पर बेदखली नहीं आई, किस पर कुड़की नहीं आई। धनिया के पारिवारिक जीवन का अनुभव यह है कि कितनी भी कतर ब्योंत करो, लगान बेबाक होना मुश्किल है। इसी मुश्किल और असंभवता को प्रेमचंद ने गोदान का सार बना डाला है। गोदान अंततः दो सभ्‍यताओं का संघर्ष है एक ओर किसानी सभ्यता है जिसका प्रतिनिधित्‍व होरी करता है जबकि दूसरी ओर महाजनी सभ्‍यता है। यह स्‍वाभाविक है कि सामंती सभ्यता से महाजनी सभ्यता के इस बदलाव में आखिरकार होरी पराजित होता है। मरजाद की जिद के साथ होरी का मरना गोदान के अंत को एक त्रासद बिंदु बना देता है। इस यथार्थवादी उपन्यास के नायक होरी का यह त्रासद अंत पाठक को देर तक और दूर तक अपनी जद में लिए रहता है।"

होरी कितने भी कष्ट सहकर मरजाद का मोह नहीं छोड़ पाता है। उसके जीवन का आधार मरजाद है और उस पर धर्म, संस्कारों, नैतिकता और आदर्शों का दबाव भी बहुत गहरा है। एकाध स्थान पर जब वह अपनी नैतिकता से डगमगाता भी है तब भी वह अपने नैतिक द्वंद्व और दर्द का अनुभव करता है कि उसे जो नहीं करना चाहिये वह वही कर रहा है क्यों कि वह सदा से ही दूसरों के दबाब में है। होरी जैसे मामूली से किसान को भी लेखक ने ऐसी निम्न मध्यवर्गीय नैतिकता का शिकार दिखाया है जिसके द्वंद्व के कारण वह न तो पूरी तरह से नैतिकता का पालन कर पाता है और न अपने स्वार्थों की पूर्ति कर पाता है। होरी की यह नैतिकता एक आम आदमी की अपरिभाषित और ओढी हुई नैतिकता का एक ऐसा जामा है जो भारतीय मनुष्य को धर्मभीरु बनाए रखता है होरी की जिंदगी की यही ओढ़ी हुई नैतिकता जन्य नियति आज भी आम किसानों की नियति बन जाती है जहाँ वह अपने जीवन को गौरवपूर्ण बनाना चाहता है परन्तु अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप वह अपने जीवन को सामाजिक मर्यादा के अनुसार चलाने के लिये बाध्य हो जाता है। गरीबी और शोषण के बावजूद मर्यादा से साधारण जीवन जीने की इच्छा और जिद में पिसता हुआ होरी भारतीय समाज के सामने आज भी उद्धृत किया जाता है। सारे गाँव के सामने अपनी पत्नी को पीटने में उसकी इज्जत नहीं जाती और अकारण ही पुलिस द्वारा उसके घर की तलाशी से जाती है। ठाकुर जी की आरती के लिए वह इसलिए नहीं उठ सकता क्योंकि उसके पास चढ़ावे के लिए तांबे का एक भी पैसा नहीं है और ऐसी स्थिति में वह सबकी आँखों के सामने हेठी होगी जब ग्रामीण समाज को उसकी आर्थिक स्थिति का पता चलेगा। अपनी जान पर खेलकर कुल मर्यादा की रक्षा करने वाला होरी परम्पराओं, रुढियों और धार्मिक कुरीतियों का निरीह शिकार दिखाई देता है। शोभा द्वारा पूछे गए सवाल कि इन महाजनों से कभी पीछा छूटेगा या नहीं के उत्तर में होरी कहता है "इस जनम में तो आशा नहीं है भाई। हम राज नहीं चाहते, भोग विलास नहीं चाहते, खाली मोटा झोटा खाना और मरजाद के साथ रहना चाहते हैं"। होरी गृहस्थ का आधार केवल जमीन को मानता है। अपने भाइयों से और फिर अपने बेटे गोबर से अलगोझे का आघात भी उस जैसे मरजाद पालक के लिए बहुत बड़ा आघात है।

सम्पूर्ण गोदान में किसानों का खून चूसने वाली महाजनी सभ्यता का क्रूर शोषण चक्र दिखाई देता है जिसमें होरी और उस जैसे असंख्य गुमनाम किसान साधन विहीन किसान फँसे हुये हैं। व्यवस्था के शोषण के शिकार ये किसान अपमान और पीड़ा से भरी जिंदगी को मर-मर कर अपना जीवन जीते हैं। महाजनी सभ्यता द्वारा किये जा रहे शोषण और संत्रास को वह चुपचाप सहता है। वह इस लंबी परम्परा को न उलटता है और न पलटता है केवल बर्दाश्त करता है। वह मानता है कि जिन तलवों के नीचे गर्दन दबी हो उनको सहलाने में ही उसकी कुशलता है। यह उपन्यास जमींदार, अफसर,पटवारी, साहूकार, और पुरोहित के आतंक में फँसे होरी की लाचारी का मार्मिक बिंब है। महाजनी सभ्यता के क्रूर पंजों में फँसे होरी की कहानी किसी भी गरीब और शोषित भारतीय किसान की भांति ही है जो गरीबी की मार, बंटवारे का दर्द, कर्ज की मार के अलावा बैलों की जोड़ी के बिक जाने या मर जाने का सदमा, आधा खेत साझे की खेती का अपमान और अपने खेतों की नीलामी का दंश सहता हुआ आखिरकार मजदूरी करने को बाध्य हो जाता है। होरी के चरित्र में विद्रोह और क्रांति की इच्छा न दिखाकर प्रेमचंद ने होरी को एक आम किसान का प्रतिनिधि बनाए रखा जो निर्द्वन्द्व भाव से सभी कष्ट सह कर भी अपनी ओढ़ी हुई मर्यादा को प्रमुखता देता है। इसे लेखक का यह यथार्थवादी नजरिया कह सकते है कि जिसके चलते होरी क्रांतिकारी नायक नहीं बन पाता अथवा शोषण करने वालों का हृदय परिवर्तन नहीं दिखता क्योंकि महाजनी सभ्यता में यदि कुछ भी प्रमुख है तो वह केवल पैसा है जो होरी के पास नहीं है। परिणामवश प्रेमचंद ने औपन्यासिक कथा को दुखांत रूप दिया है। इसी सोच के कारण प्रेमचन्द सामाजिक व्यवस्था पर एक ऐसा प्रश्नचिन्ह लगाते है जो समसामयिक समय में भी वैध है। इन्हीं संदर्भों में उपन्यास का अन्तिम भाग द्रष्टव्य है:
"क्या करें, पैसे नहीं हैं, नहीं किसी को भेज कर डाक्टर बुलाती। हीरा ने रोते हुए कहा - भाभी दिल कड़ा करो। गोदान करा दो, दादा चले।“
 धनिया ने उसकी ओर तिरस्कार की आँखों से देखा। अब वह दिल को और कितना कठोर करे? अपने पति के प्रति उसका जो धर्म है, क्या यह उसको बताना पड़ेगा? जो जीवन का संगी था, उसके नाम को रोना ही क्या उसका धर्म है? और कई आवाजें आईं - हाँ, गोदान करा दो, अब यही समय है। धनिया यंत्र की भाँति उठी, आज जो सुतली बेची थी, उसके बीस आने पैसे लाई और पति के ठंडे हाथ में रख कर सामने खड़े मातादीन से बोली - महराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका गोदान है। और पछाड़ खा कर गिर पड़ी।"

उपन्यास का यह अन्त पाठकों के मन में गहरी संवेदना भर देता है। कारण स्पष्ट है कि भारतीय कृषि व्यवस्था में गौ वंश का महत्व बहुत ही अधिक था और हिन्दू धर्म गोदान को मोक्ष का साधन मानता है। मामला यहीं तक सीमित होता तो और बात थी। बल्कि उत्तरोत्तर संयुक्त परिवार के विघटन की पीड़ा होरी को तोड़ देती है परन्तु गोदान की इच्छा उसे जीवित रखती है और वह यह इच्छा मन में लिए ही वह इस दुनिया से कूच कर जाता है और। 'आजीवन दुर्धर्ष संघर्ष के बावजूद उसकी एक गाय की आकांक्षा पूर्ण नहीं हो पाती'। प्रेमचंद ने गोदान को संक्रमण की पीड़ा का दस्‍तावेज़ बनाया है। इस उपन्यास में होरी ही एकमात्र ऐसा पात्र है जो समयानुसार परिवर्तित नहीं होता है। होरी का समयानुसार अपने को न बदल पाना ही उसके व्यक्तित्त्व का अहम पक्ष है। भारतीय सामाजिक बदलाव के युग में सामंतवाद से पूंजीवाद की ओर बदलते युग में होरी का बेटा गोबर किसान से मजदूर बन जाता है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि यद्यपि गोबर का भी शोषण चलता रहता है लेकिन उसमें प्रतिरोध का स्‍वर बना रहता है अत: वह बच जाता है। यहाँ तक कि धनिया भी विद्रोहिणी है, वह गाँव भर के सामने सबसे लोहा लेती है। किंतु केवल एक होरी ही है जो संक्रमण काल को समझ नहीं पाता वह सामंतवादी प्रथा के मूल्‍यों को ही ढोता रहता है, वह न तो अपनी मरजाद को छोड़ पाता है न ही गाँव को, न जमीन को और न कृषि को। अंतत: वो मरता भी है गाँव को शहर से जोड़ने वाली सड़क को बनाते हुए, वही सड़क जो अंतत: गाँव पर शहर के अधिपत्‍य की घोषणा है। यह सड़क सामंतवाद के पतन की और पूंजीवाद की जीत की निशानी है। वह अपना जीवन मर्यादा के परम्परागत मानकों को पूरा करने के लिए झोंक देता है और अपनी मृत्यु के समय भी गाय के दान जैसे काम को न कर पाने के दुख से भरा हुआ है, ये तो विद्रोहिणी धनिया ही है जो मजदूरी के सिक्‍के को मृत होरी के हाथ में दबा घोषणा करती है कि यही होरी का गोदान है।

सम्पूर्ण गोदान में किसानों का खून चूसने वाली महाजनी सभ्यता का क्रूर शोषण चक्र दिखाई देता है। इस चक्र में फंसा हुआ होरी साधनविहीन हैं जिस पर सामन्तवादी व्यवस्था रहम नहीं करती और न ही पूंजीवादी व्यवस्था क्योंकि दोनों का आधार अर्थ है। व्यवस्था के शोषण के शिकार ये किसान भिन्न-भिन्न रूप से प्रताड़ित, अपमानित और पीड़ा से भरी जिंदगी को मर-मरकर जीते हैं पर उन पर किसी भी व्यक्ति को करुणा नहीं आती। शोषण और संत्रास को चुपचाप सहते जाने की इस लंबी परम्परा को होरी न उलटता है और न पलटता है केवल बर्दाश्त करता है। वह मानता है कि जिन तलवों के नीचे गर्दन दबी हो उनको सहलाने में ही कुशल है। यह उपन्यास जमीदार, अफसर, पटवारी, साहूकार, पुरोहित के आतंक में फँसे होरी की लाचारी का मार्मिक बिंब है। महाजनी सभ्यता के क्रूर पंजों में फँसे होरी की कहानी किसी भी गरीब और शोषित भारतीय किसान की भाँति ही है जो गरीबी की मार, बंटवारे का दर्द, कर्ज की मार, बैलों की जोड़ी के बिक जाने या मर जाने का सदमा, आधा खेत, साझे की खेती का अपमान और अपने खेतों की नीलामी का दंश सहता हुआ आखिरकार मजदूरी करने को बाध्य हो जाता है। होरी के चरित्र में विद्रोह और क्रांति की इच्छा न दिखाकर प्रेमचंद ने होरी को एक आम किसान का प्रतिनिधि बनाए रखा।

उपन्यासों में पात्रों एवं चरित्र चित्रण का अत्यधिक महत्त्व इसलिये होता है क्योंकि वे हमारे सामने जीवन का वास्तविक रूप प्रस्तुत करते हैं। यह तो निश्चित है प्रेमचन्द को अपने जीवन का यह कटु आभास रहा है कि सामन्तवादी अथवा पूंजीवादी परम्परा में बड़ी-बड़ी सभी समस्याओं की मूल कारण अर्थाभाव है। होरी का प्रत्येक मामला धन पर आश्रित है। मुंबई में रहते वक्त मुंशी प्रेमचंद ने अपना समकालीन रचनाकार जैनेन्द्र कुमार के नाम पर लिखे गये पत्र में अपना यह कटु जीवन अनुभव इस प्रकार व्यक्त किया है "कर्ज़दार हो गया था, कर्ज़ पड़ा दूँगा, मगर और कोई लाभ नहीं है। उपन्यास (गोदान) के अंतिम पृष्ठ लिखने बाकी है। उधर मन ही नहीं जाता। (जी चाहता है) यहाँ से छुट्टी पाकर अपने पुराने अड्डे पर जा बैठूँ। वहाँ धन नहीं है, मगर सन्तोष अवश्य है। यहाँ तो जान पड़ता है कि जीवन नष्ट कर रहा हूँ।" अपना यह कर्ज़ अदा करने का और 'जीवन नष्ट होने' का विवरण वास्तव में प्रेमचंद का अपना अनुभव ही व्यक्त किया है। गोदान के होरी को हमारी धर्म से, अर्थ से और काम से तनिक भी मोक्ष नहीं मिलता है क्योंकि वे किसान के लिये केवल आलंकारिक शब्द मात्र है। डॉ. महेन्द्र भटनागर इन्हीं संदर्भों में कहते है, "होरी के दयनीय चित्र द्वारा प्रेमचंद ने समाज को चुनौती दी है कि किसान अस्तित्व-अस्तित्व के दोराहे पर खडा है, जहाँ से आगे या तो आत्म-संहार की अतुल जलराशि है या स्वत्व छीन कर इन्सान की तरह जी जाने के संकल्प की कठोर-विषम-भूमि विनाश है या क्राँति।" यह तो निश्चित है कि मनुष्य अपनी सामाजिक व्यवस्था से अलग होकर रह नहीं सकता है। यह प्रणाली प्रकृतिगत नियमों से बंधी हुई है। ये व्यवस्था कभी कभी तलवार के समान उनके सिर के ऊपर रहते है जो साधनहीन है। इसलिए वर्तमान में भी किसानों के आत्महत्या की संख्या में उत्तरोत्तर विकास हो रहा है। सभी प्रकार की कमज़ोरियाँ पैदा करना वर्तमान व्यवस्था का ही परिणाम है जिसका फ़ल भारतीय किसान को भुगतना पड़ता है। हम गोदान की होरी में यह कमज़ोरी देख सकता है। हर समाज में और वातावरण में घटित होने के समान यहाँ भी राय साहब होरी का नाजायज लाभ उठाता है और उसके मन में होरी के प्रति मानवीयता की भावना शून्य है। इसी कारण उनका मार्क्सवादी दृष्टिकोण होरी कुछ इस प्रकार बताता है कि "भगवान सबको बराबर बनाते है। यहाँ जिसके हाथ में लाठी है, वह गरीबों को कुचलकर बडा आदमी बन जाता है।" होरी गँवार था। लाल पगड़ी देखकर उसके प्राण निकल जाते थे, लेकिन मस्त साँड पर लाठी लेकर पिल पड़ता था। वह कायर न था, मारना और मरना दोनों ही जानता था, मगर पुलिस के हथकण्डों के सामने उसकी एक न चलती थी। बँधे-बँधे कौन फिरे, रिश्वत के रुपये कहाँ से लाये, बाल-बच्चों को किस पर छोड़े, मगर जब मालिक ललकारते है, तो फिर किसका डर? तब तो वह मौत के मुँह में भी कूद सकता है।" अत: प्रेमचंद का वास्तविक होरी जहाँ पाठक की करुणा का पात्र बनता है वहीं सहृदय पाठक यह भी आवश्यकता महसूस करता है कि कहीं न कहीं वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में बदलाव होना चाहिये ताकि साधनहीन व्यक्ति भी समाज में सुखपूर्वक रह सके। साफ़ शब्दों में कहा जाये तो गोदान में शोषण के अबाध चक्र को प्रस्तुत कर उसके प्रति जनजीवन को सावधान करते और अंत में वर्गहीन समाज मे सामंजस्य का संदेश देने का प्रयास किया है ताकि जिन व्यवस्थावादी परिणामों को हमारे पुरखों ने झेला है वे हमारी आने वाली सन्तानों को न झेलने पड़ें।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।