वस्त्रम यानि खादी: वस्त्र यानी खादी और अमीर खुसरो

अपर्णा झा

अपर्णा झा

कपड़ा बुनने की कला यानी वस्त्रम् जिसे गांधी जी ने स्वतंत्रता के दौरान लोगों को एक नई पहचान से जोड़ा था और जिस विचार से भारतीयों ने स्वाबलंबी होकर मैनचेस्टर को ललकारा था, वह पहचान 'खादी' की थी। चरखे की मदद से हाथ से बनाये जाने वाले कपड़े भारत के हर घर की पहचान बने। कपड़ा बुनने की कला एवं परम्परा भारत के सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। यह परम्परा विश्व को भारत की देन मानी जाती है। यह परम्परा उतनी ही पुरानी है जितनी कि भारतीय सभ्यता।

ऋग्वेद में हाथ से बुने कपड़ों का नाम है; वस्त्र - जो कि कपास की रुई से सूती धागा कात कर बनाया जाता था। पुरुष खेतीबाड़ी और बाहरी कार्यों को सम्पन्न करते थे और स्त्रियाँ घरेलू कार्यों के साथ वस्त्र बुनने का कार्य भी करती थीं और संग ही बच्चों को संस्कार ज्ञान भी देती थी। इस कारण वैदिक काल से ही 'वस्त्र' कपड़ा 'बुनना' ही नहीं एक' विचार' भी माना जाता रहा है। वैदिक 'वस्त्र' जो कि संस्कार था, वह परिवारों से निकल सजायाफ्ता कैदियों, विधवाओं, परित्यक्ताओं के पास स्थान्तरित होते हुए जुलाहे जाति-वर्ग के रूप में बदल गया। रामायण काल में तो रेशम के कपड़ों का रिवाज़ था। कहा जाता है कि राजा रानी के वस्त्र तो रेशम के होते ही थे, परन्तु उस समय की दासियाँ भी रेशम ही पहना करती थीं। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में गांधी जी ने जिस 'खादी' यानि घरों में चरखा कातना और कपड़े बुनने को पहचान दिलाई थी उसे 13-14वीं सदी के मध्य में भी देखा जा सकता है। अमीर खुसरो ने शाही दरबार और फौज की दुनिया को बहुत करीब से देखा था और अनेक अच्छे-बुरे अनुभवों से होकर जीवन जिया था। अपने इन्हीं अनुभवों पर आधारित जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर उन्होंने अपनी संतानों को शिक्षित और संस्कारवान बनाने हेतु मसनवियाँ लिखी जिसमें 'आइने सिकंदरी' और 'मजनूं व लैला' अपने दो बेटों के लिए, तथा 'मतला उल अनवार' यानी ‘प्रकाश स्रोत’ या ‘उजाले की ओर’, अपनी बेटी के लिए लिखा था।

'खादी' एक फ़ारसी शब्द है जिसका अर्थ सौभाग्यम् होता है। कहा जाता है कि अमीर खुसरो की बेटी बहुत ही सुंदर थी और उसे वह बहुत प्यार करते थे। वह एक ऐसा समय था जिसमें किसी भी घर की बहू-बेटियाँ, माँ या पत्नी सुरक्षित नही थीं। शाही परिवार के लोग या फौजी जहाँ से भी गुजरते, किसी की भी स्त्री पर निगाह पड़ने पर उसके परिवारवालों को उस स्त्री को शाही हरम में भेज देने का फरमान जारी हो जाता था। फिर वह स्त्री कैदी, सेविका या हरम की रखैल बना दी जाती थी। चूँकि अमीर खुसरो शाही दरबारों और फौज में रहते हुए ऐसे कई दर्द भरे दृश्य देख चुके थे इस कारण विवाह के पश्चात अपनी इकलौती बेटी को विदा करते समय सुखद भविष्य की कामना में उसे अपने जीवन से मिले अनुभवों पर आधारित कई जीवनोपयोगी बातें समझाईं। यही बातें 'मतला उल अनवार' मसनवी में लिखी गईं। यह मसनवी को 15 दिनों के अंतराल में लिखी गई है। इसमें 3324 पद हैं और विषय नैतिकता और सूफी मत का है। फारसी में लिखे गए एक पद में वस्त्र बुनने की अहमियत बताते हुए लिखा -

"दो को तोजन गुज़ाश्त न पल अस्त,
हालते-पर्दा पोकिंश्शे बदन अस्त।
पाक दामाने आफ़ियत तद कुन, रुब ब दीवारों पुष्ट बर दर कुन।
गर तमाशाए-रोजनत हवस अस्त,
रोजनत चश्मे-तोज़ने तो बस अस्त।"*

भावार्थ यह है कि, "बेटी! चरखा कातना तथा सीना-पिरोना न छोड़ना। इसे छोड़ना अच्छी बात नहीं है क्योंकि यह परदापोशी का, जिस्म ढँकने का अच्छा तरीक़ा है। औरतों को यही ठीक है कि वे घर पर दरवाज़े की ओर पीठ कर के घर में सुकून से बैठें। इधर-उधर ताक-झाँक न करें। झरोखे में से झाँकने की साध को 'सुई' की नकुए से देखकर पूरी करो। हमेशा परदे में रहा करो ताकि तुम्हें कोई देख न सके। उपर्युक्त प्रथम पंक्ति में यह संदेश था कि जब कभी आने जाने वाले को देखने का मन करे तो ऊपरी मंज़िल में परदा डालकर सुई के धागा डालने वाले छेद को आँख पर लगाकर बाज़ार का नज़ारा देखा करो। चरखा कातना इस बात को इंगित करता है कि घर में जो सूत काता जाए उससे कढ़े या गाढ़ा (मोटा कपड़ा) बुनवाकर घर के सभी मर्द तथा औरतें पहना करें।"
(*फ़ारसी मूल एवं भावार्थ अंतर्जाल से लिये गये है)

अमीर खुसरो की इस सोच के पीछे स्त्री की सुरक्षा, स्वावलंबन एवं सृजनात्मकता छिपी है। एक स्त्री अपनी पूरी उम्र पर्दे में रह कर व्यर्थ न कर दे और खुद को एक खूँटे में बंधे मवेशी के जैसा न समझे; इसके लिये खाली समय में वस्त्र बुनने से अच्छा क्या हो सकता था जिससे घर की सहायता भी हो और कलात्मकता भी दिखाई जा सके।

यदि भारत के इतिहास को कपड़ों की नज़रिये से देखें तो समाज की व्यवस्था में कहीं यह समानता को दिखाती है तो कहीं सम्पन्नता, कहीं विपन्नता, कहीं धार्मिकता तो कहीं स्वावलंबन, कहीं पर्दा, कहीं भ्रांति तो कहीं क्रांति की लहर। जिस प्रकार प्राचीनकाल में वस्त्र संसार को भारत देश की देन है, उसी प्रकार आज भी भारतीय वस्त्रों की मांग विश्वपटल पर हमें गर्वान्वित करती है।

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