कहानी: हनी

मनमोहन भाटिया
- मनमोहन भाटिया

ऑफिस के टूर पर पंकज एक शहर से दूसरे शहर घूमता रहता है। मार्केटिंग की नौकरी में महीने के बीस दिन टूर पर निकल जाते हैं पाँच दिन ऑफिस में बीस दिनों का लेखा-जोखा देने में और नई रणनीति बनाने में खर्च हो जाते हैं। बाकी बचे पाँच दिन परिवार के संग गुजरते हैं। चलो शुक्र है कि एक साथ पाँच दिन छुट्टी के मिलते है। कंपनी अहसान तो कर नहीं रही। बकरे को हलाल करने से पहले मोटा-ताजा भी तो करना है तभी पाँच दिन की एक मुश्त छुट्टी मिलती है।
पाँच दिन की छुट्टी के पश्चात पंकज ने अपना बोरा-बिस्तर बांध कर टूर की तैयारी कर ली। सुबह छह बजे की रेलगाड़ी से टूर पर निकलना है। रात को पुनिता जिद पर अड़ गई कि इतनी लंबी जुदाई नहीं बर्दाश्त होती,  उसे भी साथ जाना है।
"पुनिता मेरे बीस दिन सफर में और मार्केट, ऑफिस और दुकानों के चक्कर काटने में लग जाते हैं। बीस दिन में सात शहर निबटाने हैं। तुम कहाँ-कहाँ मेरे साथ भटकती रहोगी।"
"जब सात फेरे लेकर जीने मरने की कसम खाई है तब बीस दिन में सात शहर भी भटक लूंगी। सात शहर देखने को मिलेंगे। हमेशा बीस दिन अकेले गुजारती हूँ। एक बार साथ ले चलो। मैं तुम्हारे काम में रुकावट नहीं बनूंगी।
मुझे मालूम है कि बिना काम गृहस्थी नहीं चलती। एक पत्नी की पूरा हक है कि वह अपने पति की कठिनाइयों को समझे और यथासंभव मदद करे।"
"मेरी आरक्षित टिकट है। तुम्हारी टिकट करवाता हूँ।" मोबाइल पर ऑनलाइन टिकट वेटिंग लिस्ट में बुक हुआ।
"यदि टिकट कन्फर्म नहीं हुई तब परेशानी हो जाएगी।"
"एक टिकट है उसी में चल पड़ेंगे। टिकट चेकर को पैसे देकर काम चला लेंगे।" पुनिता ने पंकज के कान में
फुसफुसाया और गालों पर एक चुम्बन अंकित कर दिया। पंकज मुस्कुरा दिया।
पुनिता की रेल की टिकट कन्फर्म नहीं हुई। एक अनारक्षित टिकट ली। एसी कोच में एक सीट पर पंकज और पुनिता बैठ गए। टिकट चेकर ने कहा कि अनारक्षित टिकट पर एसी कोच में सफर मना है। आपको जनरल कोच में सफर करना पड़ेगा।
"टिकट बना दीजिये।"
"सीट खाली नहीं है।"
इतना सुनकर पुनिता ने कहा। "कोच में आधी सीटें खाली नजर आ रही हैं। आप कहते हो कि सीट नहीं।"
"मैडम जी, बुकिंग चार्ट देख लो। सीट होती तो टिकट बना देता।"
"खाली सीट हैं आपको क्या दिक्कत है? पैसे ले लो।"
रिश्वत की बात सुन कर टिकट चेकर बौखला गया लेकिन संयम के साथ बोला। "मैडम जी, आप ऐसी बात मत कीजिये। औरत होने जा लिहाज कर रहा हूँ। कोई मर्द होता तब उसे ट्रैन से उतार देता।"
पंकज चुपचाप देखता रहा लेकिन पुनिता ने मोर्चा संभाल रखा था।"खाली सीटों पर आपको क्या दिक्कत है?"
"मैडम जी हर स्टेशन का अपना अलग कोटा होता है। अगले स्टेशनों से लोग आना शुरू हो जाएंगे।"
"फिर ऐसा करो आप अगले स्टेशन की टिकट बना दो। जब कोई आ जाएगा। हम एक सीट पर गुजारा कर लेंगे।"
"ठीक है तीन स्टेशन की बना देता हूँ। उसके बाद कोई सीट खाली नहीं है।"

टिकट चेकर के जाने के पश्चात पुनिता ने पंकज को छेड़ा। "तुम डर गए। मैंने टिकट बनवा ली ना। तुम कैसे
सैल्समैन हो, देखना पड़ेगा। बारीकी से जाँच पड़ताल करनी पड़ेगी।"
तीन स्टेशन बाद सीट वाले सज्जन आ गए और पुनिता को पंकज के साथ एक सीट पर सोना पड़ा। रेल की छोटी सी सीट एक व्यक्ति के लिए छोटी पड़ती है। जरा सी करवट बदली नहीं कि सीट से नीचे गिरने का खतरा बना रहता है। रात का समय था, रेल अपनी अधिकतम गति से दौड़ी जा रही थी। कोच की बत्तियाँ बंद थी। हल्के नीले रंग की कुछ बत्तियाँ जल रही थी। एसी कोच में कंबल ओढ़े सब सो रहे थे। एक सीट पर पंकज और पुनिता लेटे हुए थे। पुनिता ने देखा उनके सामने वाला व्यक्ति दूसरी ओर मुंह करके सो रहा है और ऊपर वाली सीट वाले भी सो रहे हैं। मौके का फायदा उठाते हुए पुनिता ने पंकज के कान में बुदबुदाया। "इतना चिपक कर तो घर पर भी नहीं सोते हो।" कह कर हल्का सा चुम्बन अंकित किया।
"पुनिता तू आज पिटवाएगी, शरारत बंद कर।"
"कोई नहीं देख रहा। सब सो रहे हैं।"
"कोई उठ गया तो?
"पति पत्नी हैं। कोई भाग कर तो नहीं जा रहे हैं।" कह कर पुनिता ने पंकज के गालों को चुटकी से मसल दिया।
सुबह पाँच बजे मंडी गोबिंदगढ़ का स्टेशन आ गया। रेलगाड़ी दो मिनट रुकती है। पंकज सामान बांध कर कोच के गेट पर खड़ा हो गया। गाड़ी के रुकते ही पंकज ने पुनिता को पहले उतारा, उसको सामान पकड़ाया और फिर स्वयं उतरा। सुबह की हल्की ठंड थी। पंकज ने सूटकेस खोल कर स्वेटर पहना और पुनिता ने शाल ओढ़ी।
रेलगाड़ी से मात्र चार-पाँच सवारियाँ ही उतरी। पंकज और पुनिता ने अपने सूटकेस उठाये और स्टेशन के बाहर चलने लगे। तभी एक युवती तेजी से भागते हुए आई और ट्रेन की ओर भागी। रेलगाड़ी सीटी बजा कर चलने लगी।
मंडी गोबिंदगढ़ एक छोटा स्टेशन है जहाँ मालगाड़ियों की आवाजाही अधिक है। गाड़ी के कोच के दरवाजे बंद थे। वह युवती गाड़ी के साथ भागने लगी और खुले दरवाजे को तलाशने लगी। गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी। रेलगाड़ी की रफ्तार तेज होते देख युवती ने बंद दरवाजे की रेलिंग को पकड़ना चाहा लेकिन विफल रही और प्लेटफार्म पर गिर गई।
सुबह के सन्नाटे में उसके गिर कर चोट लगने के कारण चिल्लाने की आवाज गूंजी। पंकज और पुनिता दोनों पलटे, उस युवती को देखा। वह औंधी पड़ी थी। पुनिता और पंकज ने उसे सहारा दे कर प्लेटफार्म के बेंच पर बिठाया।
गिरने से उस युवती की सलवार घुटनों से फट गई थी। कोहनी और घुटनों पर चोट लग गई थी। रगड़ खाने पर खून निकल रहा था।
"पागल हो गई है क्या? चलती ट्रेन को पकड़ने में तेरे को क्या भारत रत्न मिल जाता?"
"पुनिता इसे चोट लगी है। खून निकल रहा है, इसको रोकना होगा।"
"ठीक कहते हो पंकज।"
पुनिता सोचने लगी कि दोनों घुटनों पर क्या बांधा जाए। फिर पुनिता ने उस युवती के मुंह पर लिपटी चुन्नी उतार कर दो फाड़ की और दोनों घुटनों से निकलते खून को रोकने के लिए बांधी। युवती के मुंह से चुन्नी हटते पंकज ने युवती को पहचान लिया।
"हनी तुम?"
हनी ने पंकज को देख शर्म से अपना मुंह हाथों से ढक लिया।

"पंकज तुम इसको जानते हो? हैरानी से पुनिता ने पंकज से पूछा।
"हनी जॉली साहब की बेटी है। बहुत बड़ी फैक्ट्री है इनकी। फैक्ट्री में बने गेस्ट हाउस में हमारे रहने को प्रबंध है।
जॉली साहब हमारे सबसे बड़े खरीददार हैं। मैं इनके गेस्ट हाउस में ठहरता हूँ। यही से लुधियाना, जालंधर, खन्ना और आसपास के शहर के टूर करता हूँ। अक्सर जॉली साहब डिनर के लिए घर ले जाते हैं। घर के हर सदस्य को मैं जानता हूँ। मैं जॉली साहब को फोन करता हूँ।"
पंकज को देख हनी रो पड़ी। "वीर जी डैडी नू कुछ न कहणा। मैं अपणे आप घर चली जावांगी।"
हालत की नजाकत को देख पुनिता ने हनी के समीप बेंच पर बैठ कर पुचकारते हुए पूछा। "कुछ तो बता क्या बात है? चलती ट्रेन को पकड़ रही थी। घर से भाग कर आई है क्या?"
हनी ने रोते हुए सर झुका लिया। "मैं आपे घर चली जावांगी। वीर जी तुसी डैडी नू फोन न करो।"
"देख तुझे कोई कुछ नहीं कहेगा। मुझ पर भरोसा रख। तुझको कोई उंगली से भी नहीं छू सकेगा। तेरे हाथों और पैरों पर गहरी चोटें है। भगवान का शुक्र कर कि गिर कर ट्रैन की चपेट में नहीं आई नहीं तो तेरे जिस्म की बोटी-बोटी हो जाती।" हनी को सांत्वना देकर पुनिता ने पंकज को कहा। "जॉली भाई साहब को फोन मिलाओ।"
पंकज ने फोन मिला कर जॉली साहब को रेलवे स्टेशन आने को कहा। पाँच मिनट में हनी के माता-पिता और
चाचा-चाची दनदनाते हुए रेलवे स्टेशन पहुंच गए। हनी के पिता जॉली अपना आपा खो बैठे और हनी को जोरदार दो थप्पड़ मारते हुए बिगड़ गए।
"तैडी इतनी जुर्रत! घर तो नस रही सी।"
हनी के परिवार के तीखे तेवर देख कर पुनिता हनी के आगे आड़ बन कर खड़ी हो गई। "देखिए अंकल बच्चों को गाली-गलौज या मारपीट से नहीं जीता जाता। आराम से हर समस्या का समाधान मिलता है। पहले इसे डॉक्टर के पास ले चलो। गहरी चोटें है, टिटनस का इंजेक्शन लगा कर दवाई और ड्रेसिंग करवाओ। फिर बात करते हैं।"
पुनिता की बात सुनकर हनी का परिवार शांत हुआ। सब कार में बैठे और पहले नर्सिंग होम जाकर हनी को टिटनस का इंजेक्शन लगवाया और ड्रेसिंग करवाई। डॉक्टर ने दवा दी। नर्सिंग होम में पुनिता ने अपने कपड़े हनी को पहनने के लिए दिए।
"यार हनी कपड़े एकदम फिट आए हैं। अब देखती हूँ कि जिस्म एक जैसा है तो सोच भी एक जैसी होनी चाहिए।
अब यह बता तू घर से क्यों भागी?"
"मैं लल्लू मुंडे नाल विया हरगिज नहीं कड़णा।"
"हनी मेरा पंजाबी ज्ञान न के बराबर है। तू हिंदी में बात कर।"
"डैडी ने जो लड़का पसंद किया है। मुझे नहीं पसंद है। एकदम लल्लू जैसा है। कोई पर्सनलिटी ही नहीं है।
दिल्ली में पढ़ी हूँ। शादी मंडी गोबिंदगढ़ में कराना चाहते हैं। दो दिन रह के देखो यहाँ। दुबारा कभी नहीं आओगी।
धूल मिट्टी और फैक्टरियों के अलावा कुछ नहीं है यहाँ। मेरे भी कुछ अरमान है। कोई कुछ सोचता ही नहीं कि मेरी पसंद क्या है।"
"हनी तुम किसी से प्यार करती हो?"
"नहीं।"
"नहीं तब क्या दिक्कत है। अगर तुम्हारी नजर में कोई लड़का नहीं है तब माता-पिता की पसंद से शादी कर लेनी चाहिए। इसमें घर से भागने की क्या जरूरत थी?"
"जिस तरह का लड़का मुझे पसंद है कम से कम वैसा तो होना चाहिए।"
"मैं सब समझ गई। अब मै डैडी जी से बात करती हूँ और तेरे से भी। अब तू घर चल।"

लंगड़ाते हुए हनी पुनिता के पीछे छिपते हुए बाहर आई। हनी का परिवार गुस्से में था। उनको देख पुनिता को लगा जैसे हनी को जिंदा खा जाएंगे। पुनिता ने उनको शांत रहने को कहा। घर पहुंच कर पुनिता हनी संग उसके कमरे में गई और दरवाजे की कुंडी लगा कर हनी का मन टटोलने लगी।
बाहर पूरा परिवार अशांत था। हनी का चाचा हनी के डैडी पर बिगड़ पड़ा। "भाई साहब आपने हनी को लाड़ प्यार में बिगाड़ दिया है। क्या जरूरत थी दिल्ली के मिरांडा हाउस में पढ़ाने की और होस्टल में रखने की। पूरी बिगड़ गई है।
इसको देख कर कल हमारे बच्चे भी बगावत करेंगे।"
परिवार में अशांति और झगडा बढ़ते देख पंकज ने सबको शांत कराया।
"आप लोग थोड़ी तसल्ली रखो। मैं और पुनिता हनी से बात करते हैं। हनी पढ़ी लिखी समझदार है। समस्या का समाधान निकलेगा।"
हनी का चाचा बड़बड़ाया "हूँ समझदार होती तो घर से भागती। पंकज यदि तुम न होते तब हमारे मुंह पर कालिख पुत जाती।"
पंकज ने हनी के कमरे का दरवाजा खटखटाया। पुनिता ने पंकज को अंदर आने दिया। पंकज के आते हनी चुप हो गई। चूंकि पंकज उसके परिवार के करीब था। पुनिता ने पंकज को बाहर जाने को कहा। पंकज के बाहर जाने के पश्चात पुनिता और हनी का वार्तालाप फिर से आरंभ हुआ।
"हनी तुम्हें कैसा लड़का पसंद है?"
"लड़का खूबसूरत, हैंडसम, गोरा-चिट्टा, कैसानोवा टाइप होना चाहिए जिसके साथ मैं घर से बाहर निकलू तब हर लड़की गश खा कर गिर पड़े। उनकी छाती पर सांप लौटने लगे। कुछ ऐसा लड़का होना चाहिए। हीरो टाइप डैशिंग लड़के से शादी करना चाहती हूँ।"
पुनिता ने मुस्कुराते हुए हनी को अपना चेहरा आईने में देखने को कहा।
"क्या कमी है मुझमें?"
"हनी जिस लड़के की तुम ख्वाहिश रखती हो, वैसी ख्वाहिश हर लड़का भी रखता है कि लड़की फिल्मी अभिनेत्री जैसी हो। मान लो यदि कोई लड़का जैसा तुम चाहती हो, मिल भी जाए और वो तुम्हें नापसंद कर दे तब क्या?"
पुनिता की बात सुनकर हनी चुप हो कर पुनिता को टुक-टुक देखती रही।
"हनी मुझे और पंकज को देखो। हम दोनों का साधारण व्यक्तितव है। जैसे गुण तुम चाहती हो वो हम दोनों में नहीं हैं। हम दोनों को छोड़ो अधिकांश लड़के ओर लड़कियाँ साधारण होते हैं। हम दोनों खुश हैं और एक दूसरे पर जान छिड़कते है। तुम पंकज की नौकरी देखो महीने में बीस दिन मेरे से दूर टूर पर रहते हैं। सिर्फ पाँच दिन एक साथ रहते हैं। नौकरी में तनख्वा भी अधिक नहीं है। कई बार न चाह कर भी समझौते करने पड़ते है। चाह होती है यह खरीदूँ वो खरीदूँ लेकिन मन को समझाना पड़ता है। हमारे पास कार भी नहीं है। एक पुराना खटारा सा स्कूटर है जिस पर बैठ कर हम सफर करते है। तुम्हारे परिवार ने जो लड़का पसंद किया है वह उद्योगपति का लड़का है।
तुम्हें कोई कमी महसूस नहीं होगी जो हमें होती है। सब सपने पूरे हों यह जरूरी नहीं है हनी। तुम सोचो और
उचित निर्णय लो। अपने विवेक का इस्तेमाल करो। मैंने अपना अनुभव तुमसे सांझा किया है। तुम अकेले एकांत में सोच कर निर्णय लो। निर्णय लेने की कोई जल्दी नहीं है। अपना समय लेकर उचित निर्णय लो। कल परसों या अधिक समय, मुझे बताना। मेरी मदद की आवश्यकता हो तो निडर हो कर बड़ी बहन समझ कर दिल खोल कर अपना दिल सांझा करना।"

पुनिता ने हनी को एकांत में निर्णय लेने के लिए कमरे में अकेला छोड़ा और हनी के परिवार से शांति बनाए रखने को कहा। हनी का पूरा परिवार तनाव में था। सुबह से चूल्हा भी नहीं जला। पुनिता हनी की माँ को रसोई में ले गई।
"मुझे बताओ सामान कहाँ है। मैं चाय बनाती हूँ।" हनी की माँ के साथ पुनिता ने चाय बनाई। पुनिता के आग्रह पर बेमन सबने चाय पी। कुछ देर बाद हनी कमरे से बाहर आई और पुनिता से अनुरोध किया कि वह उसके साथ एक बार लड़के से मिल कर उसका मार्गदर्शन करे। यह सुनकर परिवार में तनाव कुछ कम हुआ और शाम की चाय पर लड़के वालों को आमंत्रित किया गया।
पुनिता ने सब पुरुषों को काम पर भेज दिया और महिलाओं संग शाम के कार्यक्रम की तैयारी में जुट गई। पुनिता ने हनी को सबसे अच्छे और प्यारे कपड़े पहनने को कहा।
"नहीं पुनिता दीदी, आज मैंने आपके कपड़े पहनने हैं।"
"मेरे पास तो सब घर पहनने वाले साधारण कपड़े है। पार्टी के मतलब का कोई नहीं है।"
"कोई बात नहीं। साधारण लड़की को साधारण ही रहना चाहिए।"
"बहुत फिलॉसफी बखान करने लगी है।"
"सुबह से आपकी फिलॉसफी सुन रही हूँ। अब तो दिमाग में घुस गई है। लगता है जिंदगी में कभी नहीं निकलेगी।"
"अच्छा लड़के का नाम क्या है?"
"प्रीत।"
"बहुत खूबसूरत नाम है। जोड़ी बनेगी, हनी-प्रीत या प्रीत-हनी।"
"दोनों हँस पड़े। हँसी की आवाज से हनी की माँ को सकारात्मक संदेश मिला। पुनिता के संग हनी ने भी माँ को रसोई में व्यंजन बनाने में मदद की।
शाम की चाय पर प्रीत हनी के घरेलू रूप को देख कर मुग्ध हो गया। पुनिता ने दोनों को अलग कमरे में बातचीत के लिए भेजा। पुनिता से मिलने के बाद हनी के विचारों में परिवर्तन आ चुके थे। हनी और प्रीत ने दोनों को पसंद किया। घर में खुशी का वातावरण हो गया। शगुन देकर रिश्ता पक्का कर लिया। हनी की माँ ने पुनिता को गले लगा लिया। "पुत्तर तूने हमारी मान और प्रतिष्ठा बचा ली वर्ना एक समय हमें लग रहा था कि हनी नाक कटवा के दम लेगी।"
रात को पुनिता ने हनी को घेर लिया। "पहले ना-नुकर क्यों कर रही थी?"
"थोड़ा मोटा है न इसलिए।"
"बेलन की पिटाई से पतला कर दियो।"
पुनिता और हनी ठहाका लगा कर हँस दीं।

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