कहानी: लेडी विद बुक

सौरभ शर्मा

सौरभ शर्मा


1993, दिल्ली विश्वविद्यालय का वक्त

दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन का फार्म भरने के लिये जब मैं कॉलेज पहुँचा तो मैंने उसके हाथों में महादेवी वर्मा की पुस्तक देखी। उस वक्त भी सिनेमा लोगों के दिलो-दिमाग में छाया हुआ था और किताबों का चलन कम हो रहा था। ऐसे में किसी लड़की के हाथों में एक पुरानी पीढ़ी की लेखिका की किताब देखना अद्भुत अनुभव था। पुरानी फिल्मों में ऐसे दृश्य अक्सर होते हैं। शायद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ऐसा होता हो कि आर्ट्स डिपार्टमेंट में पढ़ने वाली किसी लड़की के हाथ में ऐसी किताबें हों, शायद वो कभी हाथों से गिर भी जाती हों और किसी फिल्म का दृश्य भी बन जाती हों, जैसा 'मेरे महबूब' फिल्म में हुआ। साधना और राजेंद्र कुमार पर फिल्माया गया गाना जिसमें साधना के हाथों से किताब गिर जाती है और गाने का मुखड़ा बनता है: 'मैंने एक बार तेरी एक झलक देखी है। मेरी हसरत है कि मैं फिर तेरा दीदार करूँ।' शायद गीतकार मुंबई आ गए हों और ये गाना लिख दिया हो।

किताब के साथ कोई लड़की अपने आप में एक कविता है। देर शाम मैं घर लौटा और सारी पुरानी फिल्मों के दृश्य याद करने लगा। लेडी विद द लैंप की तरह मेरे दिमाग में लेडी विद बुक का चेहरा नजर आने लगा। याद आया खामोशी फिल्म का वो गीत, हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू। नायिका के हाथ में मेघदूतं। जीवन विस्मय से भरा है। फिल्मों की लड़कियाँ कभी-कभी हमारे शहरों में भी नजर आती हैं।

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यह बीते महीने की घटना थी लेकिन उस लड़की का चित्र मेरे जेहन में बैठ गया था। कुछ बातें कभी नहीं भूलतीं, वो तब तक आपके याददाश्त में बनी रहती हैं जब तक स्मृति भ्रंश न हो जाए। मैंने डीयू में लिटरेचर की क्लास में दाखिला लिया। मैंने देखा कि क्लास की तीसरी बेंच में लेडी विद बुक भी बैठी है। लिटरेचर की क्लास चलती रही, अधिकतर लड़के-लड़कियाँ बिना रुचि साहित्य पढ़ते रहे। लेडी विद बुक बड़ी तन्मयता से पढ़ती रहतीं। मेरा ध्यान विषय से बाहर सभी के चेहरों पर होता। बहुत से चेहरे सपाट होते, कुछ चेहरे मुक्ति का इंतजार करते। कुछ हम जैसे चंचल लोग भी थे जिनकी दिलचस्पी इस बात में थी कि लेडी विद बुक जैसे केरेक्टर कैसे प्रयोगवादियों की कठिन कविता का रस ले रहे हैं।

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भक्ति काल में हमें सदगुरु के बारे में सिखाया जाता है। यह कहते हैं कि सदगुरु को मालूम होता है कि कौन सच्चा शिष्य है। तो हमारे प्रोफेसरों अर्थात सदगुरुओं को भी पता चलने लगा कि सच्चे शिष्य कौन हैं और कौन केवल तफरीह करने यहाँ पहुँच रहे हैं। सबसे पहले जिस शिष्य का चिन्हांकन सदगुरुओं ने किया वो थीं लेडी विद बुक। क्लास में इतने स्टूडेंट होते थे कि टीचर्स को यह जानने की सुध भी नहीं होती थी कि इनका नाम क्या है। बस उन्होंने चेहरा पहचान लिया था और हर अध्याय के बाद लेडी विद बुक और तीन-चार ऐसे ही लेडी विद बुक तथा एक-दो जेंट्स विद बुक से भी प्रश्न पूछे जाते। वैसे लिटरेचर की क्लास में आने वाला कोई भी विद्यार्थी निरंक नहीं होता। उसे कविता की थोड़ी समझ तो होती है। वो थोड़ा बहुत रसिक तो होता ही है भले ही वो रसिक पाठकों की तरह ब्रह्मानंद सहोदर का आनंद लेने की क्षमता नहीं रखता हो। फिर सबसे बड़ी बात उसमें एक अलग किस्म की उत्सुकता रहती है जो शायद उससे एकदम भिन्न प्रजाति के वैज्ञानिकों में ही होती होगी।

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मेरी उत्सुकता कविता के प्रति उतनी नहीं थी जितनी उस वस्तु की ओर थी जिससे कविता पैदा होती है। मुझे लेडी विद बुक की अध्ययनशीलता, चीजों को लेकर उसकी समझ बहुत आकर्षित करती। मैंने प्रयत्न कर उसका नाम भी जान लिया। उसका नाम आशा था। आशा मतलब होप। जिंदगी का उजला पक्ष। फिल्में आपके जीवन में गहरा प्रभाव डालती हैं और जब भी क्लास में लेक्चर होता तो मुझे वो गीत याद आता। तुमको देखा तो ये ख्याल आया, जिंदगी धूप तुम घना साया, लेडी विद बुक का नाम आशा की जगह साया भी हो सकता था।

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लेडी विद बुक और ऐसे ही प्रखर लोगों तक पहुँच बनाना हम जैसे मीडियाकर लोगों के लिए आसान नहीं था। उस बौद्धिक रूप से आभिजात्य वर्ग में शामिल होने के लिए असाधारण रूप से पढ़ाकू होना जरूरी था और यह मेरे लिए कठिन था। फिर भी मैंने कोशिश करनी आरंभ कर दी, कॉलेज के बाद देर तक लाइब्रेरी में बैठा रहता। काव्य शास्त्र की समझ बनानी मुश्किल थी लेकिन कवियों की निजी जिंदगी के बारे में पढ़ना अच्छा लगता था। मैंने भक्ति और रीतिकालीन कवियों के निजी जीवन पर उनकी कविता में पड़े प्रभाव पर रिसर्च करना शुरू कर दिया। फिर मैंने अपनी रिसर्च कभी-कभी क्लास में उड़ेलनी शुरू की। काव्यशास्त्र की परंपराओं की तरफदारी करने वाले रूढ़िवादी प्रोफेसरों ने मेरा प्रतिरोध किया और लीक से हटकर कहते हुए मेरी बातों को खारिज कर दिया। इस बीच मेरे लिए राहत जोशी सर की ओर से आई। वे साहित्य के ऐसे टीचर थे जो कहते थे कि कम से कम साइंस को विज्ञान की तरह न पढ़ो। बजाय इस बात को जानने में कि कविता में रस क्यों मिल रहा है रसपान करना उचित है और उन कवियों की ओर जाओ जिनमें यह रसपान सबसे अधिक है। भक्तिकाल की उनकी क्लास बड़ी सुखद थी। उन्होंने तुलसी की कविताओं का एवं उनकी भक्ति का सार सबसे पूछा। सभी ने रटी-रटाई रामचंद्र शुक्ल और अन्य विशेषज्ञों की व्याख्या को कह दिया। मुझे आश्चर्य हुआ कि लेडी विद बुक भी इस लीक से हट नहीं पाईं, यद्यपि उन्होंने जो कहा वो बिल्कुल शास्त्रसम्मत था। मैंने कहा श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारूणं। भगवान राम का ध्यान भय से मुक्त करने वाला है। वो गरीबी दूर करने वाला है। तुलसी ने अपनी कविता में मोक्ष को आधार नहीं रखा, न भगवतदर्शन की इच्छा रखी। इस लोक में रहकर लाखों भक्तों को कैसे कष्टों से मुक्ति मिले, यह तुलसी की कामना थी। मैंने पूरे आत्मविश्वास से अपनी बात कही और जोशी सर ने इसकी खुलकर प्रशंसा की। ... फिर ऐसे ही एक दिन लाइब्रेरी में बैठे हुए किताबें पलटते हुए मैंने अपने बगल की सीट में आशा को पाया। आशा ने मुझसे कहा कि उस दिन आपने तुलसी की कविता की बहुत अच्छी व्याख्या की, मुझे बहुत पसंद आई। क्लास में ऐसी बहस और मौलिक विचार रखने का वातावरण बनता है तो अच्छी साहित्यिक समझ विकसित होती है। मैंने कहा कि मुझे ये बहुत अच्छा लगा कि क्लास के गुणीजन भी हम जैसे मीडियाकर लोगों को ध्यान से सुनते हैं। फिर वो मुस्कुराई, सच में क्या मैं भी गुणीजनों की श्रेणी में आती हूँ? मैंने कहा- बिल्कुल हम जैसे लोग और पढ़ने के मामले में हमसे भी बदतर लोग हमेशा आप लोगों की अध्ययनशीलता की बातें करते हैं। उसने कहा कि आपकी व्याख्या तो अच्छी है लेकिन आप मजाक बहुत बुरा करते हैं। मैंने मन में कहा- लेडी आफ बुक आप सचमुच गुणीजनों की श्रेणी में आती हैं और प्रगट रूप में कहा कि इस तरह का मजाक यदि कोई मुझसे करे तो मैं घंटों सुनना पसंद करूँगा। वो मुस्कुराई और अपना ध्यान किताब की ओर कर लिया।

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जाते वक्त उसने कोई किताब ली होगी, मैंने चुपके से वापसी की तारीख भी देख ली। इसके बाद क्लास में रीतिकाल की पढ़ाई शुरू हो गई। बौद्धिक रूप से आभिजात्य और संस्कारिक लोग चुप रहे, हम लोग इस लिए चुप रहे कि संस्कारी लोग कहीं हमें गलत न समझ लें। अचानक क्लास में काव्य प्रेमियों और समीक्षकों का एक ऐसा वर्ग उदित हुआ जिसके अस्तित्व का हमें अब तक बोध नहीं था। ठाकुर, घनाराम और बिहारी इनके प्रिय कवि थे। जोशी सर हमेशा की तरह इन्हें प्रोत्साहित करते रहे। भक्तिकाल भले ही हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल रहा होगा लेकिन इस वर्ग के रसिकों के लिए रीतिकालीन कविता ही आदर्श रही। रीतिकालीन कवि राज्याश्रित होते थे और राजा को कविता लिखना भी सिखाते थे। नवोदित कवियों ने एकलव्य की तरह इन रीतिकालीन कवियों को अपना गुरू मानकर रस, छंद और नायिका भेद का अध्ययन कर कविताएँ रचनी शुरू की। कुछ रचनाएं बेहद उम्दा थीं, ये जंगली फूलों की तरह थीं जिनमें अतिशय सुंदरता और दूर तक फैलने वाली खुशबू होती है लेकिन जंगल में मोर के नाच की तरह इनकी बेपनाह खूबसूरती भी सीमित पाठक वृंद तक खो जाती है। लेडी आफ बुक की साहित्यिक व्याख्या के बाद मेरी दूसरी पसंद इन नवोदित कवियों की कविता होती थी। अपनी सीमित बुद्धि में तो एक-दो कविता मुझे सतसई के दोहों से भी अच्छी लगी। फिर भी इस तरह के बिहारी जैसे टेलेंटेड लोग महफिल में एक-दो ही थे। अधिकतर लोग वैसे ही कवि थे जिनके बारे में ठाकुर ने लिखा है। ढेल सो बनाये आये मेलत सभा के बीच, लोगन कबित्त कीबो खेल करि जानौ है। इनकी कविता बेहद उब से भरी थी, ऐसे ही कवियों की वजह से कई लोगों ने साहित्य से दूरी बढ़ा ली होगी।

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नियत दिन पर मैं लाइब्रेरी में मौके पर मौजूद था। वो आई और कहा कि इन दिनों आपकी व्याख्या सुनने नहीं मिल रही। मैंने कोरा झूठ बोला कि रीतिकालीन कविता के बारे में मेरी जानकारी बहुत कम है। उसने कहा जबकि मुझे तो लगा कि रीतिकालीन कविता आपके करीब होगी क्योंकि ये कविता इसी दुनिया के बारे में है इसमें भक्ति काल की तरह ब्रह्म या ईश्वर को खोजने की मेहनत नहीं की जा रही है। मैंने कहा कि प्रेम को व्यक्त करने में भक्तिकालीन कवि शालीनता बरतते थे लेकिन रीतिकालीन कवि कोई पर्दा नहीं रखते। भक्तिकालीन कवियों ने ईश्वर की आड़ रख ली, रीतिकालीन कवि सीधे अपनी इच्छाएँ प्रगट करते हैं। एक गहरी बेचैनी रीतिकालीन कवियों में नजर आती है जो प्रेम के शांत स्वभाव से बिल्कुल अलग है। मैंने देखा, मेरी व्याख्या के बाद लेडी आफ बुक में भी वैसी ही उत्सुकता तैर गई जैसे अक्सर क्लास में उनकी व्याख्या सुनकर मुझे होती है। फिर उन्होंने कहा, रीतिकालीन कविता श्रेष्ठ कविता नहीं है भटकी हुई कविता है लेकिन फिर भी इसमें भी सुकून है। यह सुकून इसलिए उपजता है क्योंकि यह ऐसे लोगों द्वारा लिखी जा रही थी जो ऐसे कालखंड में थे जो संकटग्रस्त नहीं था। अपने सामंतों के अधीन उन्हें दो जून की रोटी और उससे भी अधिक मिल रहा होगा, ऐसे में वे जीवन के सुखकर पक्षों को देख सके। वे भय के साये से निकल सके थे, तभी जीवन का श्रृंगारिक पक्ष भी वे देख पाये और इसे लिख पाये। मैंने कहा कि हाँ यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे हम बचपन में किसी शाम को अपने मम्मी-पापा के साथ मीनाबाजार चले जाते थे। वहाँ एक अलग ही दुनिया नजर आती थी, हम उत्सुकता से भरे हुए एक के बाद दूसरे स्टाल जाते थे। रीतिकालीन कविता भी ऐसी ही है। फिर उसने कहा कि कविता के मर्मज्ञ लोगों के साथ गुजारा हुआ समय भी मीनाबाजार सा होता है, कविता के पाठकों के लिए लाइब्रेरी मीनाबाजार की तरह ही है।

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मुगल काल में मीना बाजार शाही परिवार के लिए मनोरंजन के केंद्र होते थे, विशेषकर हरम में रहने वाली शहजादियों के लिए जिनका जीवन एक सोने के पिंजड़े में बंद चिड़िया की तरह होता था। फिर ऐसे में जब वे आजादी महसूस करती होंगी तभी दिलचस्प कहानियों का जन्म होता होगा। क्या लेडी आफ बुक भी ऐसी ही शहजादी है जिसका मीनाबाजार लाइब्रेरी में है। कॉलेज के बाद का समय मैंने अपने लिए इस मीनाबाजार के लिए तय कर दिया। यहाँ आशा अक्सर आती। वो किताबें जल्दी-जल्दी पढ़ लेतीं। मैं उसकी पसंद की किताबों को देखता, आज उसने गुनाहों का देवता पढ़ा। इसे अभी क्यों पढ़ा होगा? ऐसे ही तमाम तरह के सवालात दिमाग में आते। अगर लेडी आफ बुक रिसर्च का विषय होती तो मुझे पीएचडी मिल गई होती।

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इतनी सारी किताबें और सबके लेखक बहुत उलझे व्यक्तित्व वाले, फिर भी यह लड़की इतनी शांत कैसे है? यह मेरी जिज्ञासा का प्राथमिक बिंदु था। मैंने एक दिन घर वालों के बारे में पूछा। उसने बताया कि उसके पिता संस्कृत के प्रोफेसर हैं इलाहाबाद में। मुझे लगा कि रीडिंग हैबिट इनके परिवार में है। चूँकि हैबिट है इसलिए खाने-पीने की तरह की जरूरत है। ये काजल की कोठरी में भी बेदाग निकल जाने वाले लोग हैं। इन्हें किस्सागोई पसंद है ये किस्से का हिस्सा नहीं बनते।

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अल्बर्ट आइंस्टीन से जब किसी ने कहा कि सापेक्षता का सिद्धांत बड़ा कठिन है यह समझ नहीं आता। वक्त कैसे धीरे या जल्दी बीतता है। तब उन्होंने एक उदाहरण दिया कि जब आपको जलती हुई अंगार में बिठा दिया जाए तो एक-एक पल बहुत कष्ट में बीतेगा, किसी खूबसूरत लड़की के साथ बैठे तो यह लंबा सा पल भी कब गुजर जाए, इसका अनुभव नहीं होगा। इसी तरह हिंदी साहित्य का हजार साल का इतिहास एमए की संक्षिप्त कक्षाओं में कब गुजर गया, पता नहीं चला। फिर एक दिन जूनियर्स ने हम लोगों का फेयरवेल रखा।

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 फेयरवेल में सभी ने अपने-अपने अनुभव साझा किए। शायद सभी को हिचक थी, इसलिए हम सभी ने प्रोफेसरों के साथ हुए हमारे संवाद का जिक्र तो किया लेकिन आपस के संवाद की स्मृति सार्वजनिक मंच पर साझा नहीं कर पाए। जाते वक्त लेडी विद बुक ने कहा कि उनके पिता का तबादला बनारस हो गया है और वो अब इलाहाबाद न जाकर बनारस जाएंगी। आगे का करियर कैसा रहेगा, यह पूछने पर उनके चेहरे पर एक मुस्कान तिर गई। इस मुस्कान का मतलब मैं समझ नहीं पाया। कई दिनों तक इसके मायने समझने की कोशिश करता रहा, फिर भूल गया।

25 बरस बाद ... 

बसंत ने फिर दस्तक दी है। मुगल गार्डन एक महीने के लिए खुलने वाला है। मैंने लाल किले में कई बार मीनाबाजार तो देखा है लेकिन मुगलों का गार्डन नहीं देखा। आज जब मैं मुगल गार्डन पहुँचा तो बताया गया कि मैं इस बार भी बदकिस्मत हूँ और ऐसे दिन पहुँच गया हूँ जिस दिन गार्डन बंद रहता है। फिर एक दूसरा विकल्प था प्रगति मैदान में बुक फेयर का।

किताबें मैंने अरसे से नहीं पढ़ी, हिंदी कवियों के बारे अब इतना ही जानता हूँ जितना अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा था। अब हिंदी के कवि और लेखक अखबारों से बाहर हैं। किताबें पढ़ने का साहस भले ही न हो, लेकिन किताबों के प्रेमियों को उनका रंगरूप बहुत खूबसूरत लगता है, कुछ ऐसे ही और घूमने के उद्देश्य से मैं बुक फेयर पहुँच गया। यहाँ हिंदी साहित्य के स्टाल में युवा कम ही थे। अचानक एक ऐसी लड़की मुझे दिखी जिसके हाथों में गुनाहों का देवता पुस्तक थी। उस लड़की को देखकर बरसों पहले डीयू में देखा लेडी विद बुक का चेहरा फिर आँखों के सामने उतर आया। यह चेहरा भी वैसा ही था, उसी तरह के नैन-नक्श। वो जब तक दूसरी पुस्तकें पलटती रही, मेरी आँखों के सामने पचीस साल पुराना वक्त घूमने लगा।

फिर अचानक पंद्रह मिनट बाद लड़की के पेरेंट्स उसके पास आ गए। मैंने देखा, वो तो आशा थी, उम्र उसके चेहरे पर अब तक पूरी तरह सवार नहीं हुई थी, जैसे वो मेरे चेहरे पर पूरा असर दिखा रही थी। आशा ने मुझे पहचान लिया। उसने कहा "नवीन, इतने बरस बाद तुम्हें देख रही हूँ। कैसे हो?" उसके चेहरे पर वैसे ही मुस्कान तिर गई, जैसे 25 साल पहले विदाई के मौके पर अंतिम बार मैंने देखा था। इतने बरसों में उसने अपनी मुस्कान को अक्षुण्ण रखा, इससे अच्छा और क्या हो सकता है। फिर उसने मुझे अपने पति से मिलवाया। कहा कि कॉलेज में फेयरवेल के वक्त मैं इस इंसान के प्रति शुक्रिया व्यक्त करना चाहती थी जिसने मेरी साहित्यिक बोध को ही नहीं, जिंदगी जीने के प्रति मेरी समझ को भी बढ़ाया, पर यह हो न सका, आज मैं आपके सामने इन्हें कहती हूँ कि नवीन आप हमारे कॉलेज के सबसे ब्राइट स्टूडेंट थे।

मैंने कहा, "जो बात मैं नहीं कह सका वो भी अभी कह देता हूँ। मैं अपने दोस्तों के बीच आपको लेडी विद बुक कहता था, हमेशा हाथों में किताबें।"

"आप मुझे बुक वर्म भी कह सकते थे" आशा ने मुस्कुराते हुए कहा, "लेकिन तुमने ऐसा नहीं कहा, उन दिनों मैं कहती थी कि नवीन तुम व्याख्या अच्छी करते हो, लेकिन मजाक बड़ा बुरा करते हो, मैं आज भी इस पर कायम हूँ।"

मैंने कहा कि आज तो मैंने बेबी विद बुक को भी देख लिया, लगता है पुस्तकें पढ़कर ज्ञान का आतंक कायम करने का आपका पारिवारिक पेशा है। आशा ने कहा मुझे आशा है कि अब लेडी विद बुक को आने वाले बरसों में ऐसे ही बुरे मजाकों का सामना हर वीकेंड पर करना पड़े। उन्होंने मुझे इस वीकेंड पर खाने पर घर आने का न्यौता दिया है।

व्हाटसएप और फेसबुक की दुनिया में कोई परिवार अब भी पुस्तकों को दिल से लगाए हुए है यह जानना मेरे लिए बहुत सुखद है। मैंने हिंदी के नये लेखकों की किताबें आज किताब मेले में ली है। इन्हें पढ़ूँगा ताकि लेडी विद बुक और उनके परिवार की गहन अध्ययनशीलता के सामने खाने के दौरान होने वाली बातचीत में टिक सकूँ, बरसों बाद घड़ी फिर उसी जगह अटक गई है जहाँ इसकी शुरूआत हुई थी, मैं एक युवा पाठक की तरह पुनः तरोताजा अनुभव कर रहा हूँ और साहित्य की दुनिया में गोते लगाने तैयार हूँ।

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