शब्द जो शोषण और संघर्ष के दस्तावेज़ हैं: नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द

निशान्त मिश्रा

 झारखंड राज्य के दुमका जिले केदुधनी कुरुवागाँव में एक संथाल आदिवासी परिवार में 06 मार्च 1972 ई. को जन्मी  ‘निर्मला पुतुलआदिवासी जीवन के बहुविध आयामों को लेकर अपने हिंदी काव्य-संग्रहनगाड़े की तरह बजते हैं शब्दमें उपस्थित होती हैं। इस संग्रह में कुल अड़तीस कविताएँ संग्रहीत हैं। चूँकि कवयित्री पिछले पंद्रह वर्षों से भी अधिक समय से शिक्षा, सामाजिक विकास, मानवाधिकार और आदिवासी महिलाओं के समग्र उत्थान के लिए व्यक्तिगत, सामूहिक एवं संस्थागत स्तर पर सतत रूप से सक्रिय हैं और आदिवासी महिलाओं के विस्थापन, तस्करी, पलायन, उत्पीड़न, स्वास्थ्य, शिक्षा, जेंडर संवेदनशीलता, मानवाधिकार एवं संपत्ति पर अधिकार इत्यादि मुद्दों पर कार्य भी कर चुकी हैं। ऐसे में यह देखना काबिले-गौर होगा कि उनके जीवन संघर्ष और अनुभव के अदहन से किस प्रकार का स्वर उनकी कविताओं में फूट रहा है। अपने समय और समाज के यथार्थ को किस रूप में वे संबोधित कर रही हैं और किस प्रकार के चिंतन के लिए पाठकों को आमंत्रित कर रही हैं?

 
काव्य-संग्रह की पहली कविताक्या तुम जानते होमें कवयित्री पूरी मार्मिकता के साथ इस तथ्य को रूपायित करती है कि - मात्र देह नहीं है स्त्री। हाँड़-माँस के शरीर के अतिरिक्त वह एक भावना भी है जो संवेदना के तंतुओं से जुड़ना चाहती है। किंतु उसका यह अपेक्षित जुड़ाव आज तक उपेक्षित ही है। क्योंकि वह आज भी नेत्रों का ही विषय बनी हुई है। उसके लिए हृदय पटल का विषय होना अभी भी दु:साध्य है। जब तक वह हृदय प्रदेश का विषय न बनेगी तब तक उसके प्रति देहवादी दृष्टि बनी रहेगी और जब तक यह देहवादी दृष्टि बनी रहेगी तब तक स्त्री, भावना का विषय न बन सकेगी। और जब तक स्त्री भावना का विषय न बन सकेगी तब तक उसे समझने और उसका हमदर्द होने का दावा झूठा ही साबित होगा और स्त्री अस्मिता के कटघरे में खड़ा किया जाता रहेगा
"तन के भूगोल से परे          
एक स्त्री के           
मन की गाँठें खोल कर
कभी पढ़ा है तुमने
अगर नहीं!
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में?"1.

 
यह न जानना ही उस स्त्री दर्द का प्रमुख कारण है जिसका दंश वह अनादिकाल से झेलती आ रही है। और वह दर्द हैअसमानता और परतंत्रता के साथ वस्तु रूप में पहचान। दरअसल, स्त्री के विषय में रसोई और बिस्तर तक सीमित समझ ने ही जहाँ उसके समान होने के भाव को दमित किया, वहीं उसकी स्वतंत्रता को भी बाधित किया। इससे भी बढ़कर उसकी पहचान को वस्तु रूप में तब्दील कर दिया। वह पैदा तो इंसान के रूप में होती है किंतु उसके साथ व्यवहार एक वस्तु जैसा ही होता है। वह पहले पिता के घर में एक वस्तु के रूप में पाली जाती है जिसके सारे निर्णय उसके पिता द्वारा लिए जाते हैं और तत्पश्चात पति के घर में भी वह वस्तु के रूप में ही स्थानांतरित कर दी जाती है। जहाँ वह पति और घर की देखभाल करती है और तत्पश्चात बच्चों का पालन-पोषण करती है। किंतु बावजूद इसके न तो घर और संपत्ति पर ही उसका कोई स्वामित्व होता है और न ही निर्णय लेने संबंधी कोई अधिकार ही उसके पास होता है। स्त्री के साथ इस दोयम दर्जे का व्यवहार उस मानसिकता का ही प्रतिफल है जिसमें स्त्री को पुरुषों की अपेक्षा शक्तिहीन माना जाता है और घर एवं बच्चों तक ही उसकी भूमिका को सीमित माना जाता है। इस विडंबना के प्रति अपना तीव्र आक्रोश व्यक्त करती हुई कवयित्री लिखती है कि
यह कैसी विडम्बना है
कि हम सहज अभ्यस्त हैं
एक मानक पुरुष-दृष्टि से देखने को
स्वयं की दुनिया
मैं स्वयं को स्वयं की दृष्टि से देखते
मुक्त होना चाहती हूँ अपनी जाति से”2.

 
इस प्रकार उक्त पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री, अपनी जमीन तलाशती बेचैन स्त्री की भावनाओं को शब्दबद्ध करती है। पितृसत्ता के इस तीव्र प्रतिरोध के साथ ही कवयित्री अपने आदिवासी समाज की स्त्रियों के श्रम-मूलक शोषण की भी बखिया उधेड़कर रख देती है। यह श्रम-मूलक शोषण अर्थगत भी है और यौनगत भी है। श्रम के अर्थगत शोषण के अंतर्गत कठोर श्रम के बाद भी उचित पारिश्रमिक आदिवासी स्त्रियों को नहीं मिलता। वे दिन भर चटाई, पत्तल, झाड़ू इत्यादि वस्तुओं का निर्माण तो करती हैं किंतु पारिश्रमिक तौर पर इतना भी नहीं मिलता कि भरपेट भोजन कर सकें।बाहामुनीशीर्षक कविता में इसी दर्द को उकेरते हुए कवयित्री लिखती है कि
तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हजारों
पर हजारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट” 3.

इस विडंबना के चित्रण के साथ-साथ ही कवयित्री उन कारणों पर भी स्पष्ट रूप से प्रकाश डालती है जो इन परिस्थितियों के प्रमुख कारक हैं। भूमंडलीकरण के कारण बाजार रूप में परिवर्तित होते देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। इस वर्चस्व की भेंट सबसे ज्यादा गृहउद्योग ही चढ़े हैं। सीमित संसाधनों और कठिन परिश्रम के फलस्वरूप उत्पादित गृहउद्योग के उत्पादों के स्थान पर लोग सस्ते औद्योगिक उत्पादों का इस्तेमाल करना अधिक श्रेयस्कर समझने लगे हैं। ऐसे में आदिवासी हस्त कलाओं का क्रमशः क्षरण होता जा रहा है।रणेन्द्रकृत उपन्यासग्लोबल गाँव के देवतामें ऐसी ही एकअसुरआदिवासी हस्तकलालोहा पिघलाकर यंत्र बनानाका क्षरण देखने को मिलता है।शिंडाल्कोऔरवेदांगजैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने न केवल असुरों की हस्तकला का क्षरण किया अपितु उनकी अपराजेय जिजीविषा को भी खत्म कर दिया - “जो लड़ाई वैदिक युग में शुरू हुई थी, हज़ार-हज़ार इन्द्र जिसे अंजाम नहीं दे सके थे, ग्लोबल गाँव के देवताओं ने वह मुक़ाम पा लिया था।” 4. और इस मुक़ाम को पाने में हाथ था - पूंजी-सत्ता गठजोड़ का।ढेपचा के बाबूशीर्षक कविता में कवयित्री भी इन्हीं दुरभिसंधियों की ओर इशारा करती है। इस कविता में बेरोजगारी, भुखमरी और गरीबी से त्रस्त ढेपचा के पिता कश्मीर, बहनसुगियाबंगाल औरढेपचाअसम को पलायन कर जाता है। किंतु ढेपचा की माँ नहीं छोड़ पाती अपना घर और झेलती है पीड़ा भूमंडलीकरण के मार की। वह अपनी पीड़ा बयान करती हुईढेपचा के बाबूसे कहती  है कि
दोना-पत्तल भी नहीं बिकता
और न ही लेता है कोई चर-चटाई
झाड़ू, पंखा, दातुन का भी बाजार नहीं रहा अब
भूले-भटके गर कभी कोई पैकार आता भी है
तो रुपये जोड़ा माँगता है पंखा
और सौ रुपये दर्जन चटाई
एक तो सब छोड़-छाड़ दिन-भर लगे रहो
उस पर भी गर पचास-साठ नहीं निकले
तो उसे करने से क्या फायदा?”5.

 
श्रम के इस अर्थगत स्त्री-शोषण के बरअक्स यौनगत स्त्री-शोषण का चित्रण भीनिर्मला पुतुलकी कविताओं में देखने को मिलता है।ढेपचा के बाबूकीसुगियाजैसी अनेक आदिवासी स्त्रियाँ भूख की मार से त्रस्त होकर या फिर उज्ज्वल भविष्य के तलाश हेतु बंगाल, दिल्ली, असम इत्यादि शहरों को रोजगार हेतु पलायन कर जाती हैं। जहाँ पर उनका यौन-उत्पीड़न होता है।चुड़का सोरेन सेशीर्षक कविता में इसी संदर्भ पर प्रकाश डालती हुई कवयित्री लिखती है कि
धनकटनी में खाली पेट बंगाल गयी पड़ोस की बुधनी
किसका पेट सजाकर लौटी है गाँव?” 6.

 
इस प्रश्न का जवाब भी कवयित्री स्वयं इसी कविता के भीतर देती है। वहदिलावर सिंहजैसे बाहरी घुसपैठियों के साथ-साथस्टेला कुजूरएवं प्रधान जैसे घरभेदियों की शिनाख्त करती है। ये वही लोग हैं जो शादी, पढ़ाई, सुनहरे भविष्य, रोजगार इत्यादि के सब्जबाग दिखाकर आदिवासी स्त्रियों को आनंद-भोगियों के हाथ या आया बनाने वाली फैक्टरियों में झोंक देते हैं। जहाँ पर उनका यौन-उत्पीड़न होता है। कवयित्री इन लोगों को पहचानने और इनसे सावधान रहने की अपील करती हुई लिखती है कि – “शाम घिरते ही अपनी बस्तियों में उतर आये उन खतरनाक शहरी-जानवरों को पहचानो चुड़का सोरेन
पहचानो
पाँव पसारे जो तुम्हारे ही घर में घुसकर बैठे हैं!”7.

इस श्रम आधारित स्त्री-शोषण के अतिरिक्त कवयित्री उन सामाजिक कुरीतियों को भी उल्लिखित करती है जो स्त्री-शोषण के प्रमुख कारक हैं। इन सामाजिक कुरीतियों में अत्यधिक मद्यपान, स्त्रियों द्वारा हल चलाने या छप्पर छाने पर रोक, संपत्ति पर अधिकारहीनता, बहुपत्नी विवाह एवं डायन रूपी विकट अंधविश्वास प्रमुख रूप से चित्रित हैं। अत्यधिक मद्यपान जहाँ आर्थिक स्थिति को खराब करता है वहीं इसका लालच बाहरी लोगों को बहू-बेटियों के साथ दुर्व्यवहार करने की छूट भी प्रदान करता है और उनका व्यापार करने की सुविधा भी प्रदान करता है।चुड़का सोरेन सेशीर्षक कविता में कवयित्री ने इन्हीं संदर्भों को रूपायित करते हुए लिखा है कि
देखो तुम्हारे ही आँगन में बैठ
तुम्हारे हाथों बना हड़िया तुम्हें पिला-पिलाकर      
कोई कर रहा है तुम्हारी बहनों से ठिठोली
कैसा बिकाऊ है तुम्हारी बस्ती का प्रधान
जो सिर्फ एक बोतल विदेशी दारू में रख देता है
पूरे गाँव को गिरवी
और ले जाता है कोई लकड़ियों के गट्ठर की तरह
लादकर अपनी गाड़ियों में तुम्हारी बेटियों को
हजार पाँच-सौ हथेलियों पर रखकर” 8.

स्त्रियों के द्वारा हल चलाने और छप्पर छाने पर रोक जैसी रूढ़ियों पर भी कवयित्री करारा प्रहार करती हुईकुछ मत कहो सजोनी किस्कू!’ शीर्षक कविता में लिखती है कि
घर चूS रहा है तो चूने दो
छप्पर छाने मत चढ़ना
जातीय टोटमके बहाने
पहाड़पुर कीप्यारी हेम्ब्रमकी तरह
तुम्हारा मरद भी करेगा तुमसे जानवराना बलात्कार
और नाक-कान काट धकिया निकाल फेंकेगा घर से बाहर” 9.

इसके साथ ही इस कविता में संपत्ति का अधिकार मांगने पर डायन करार देकर मारने-पीटने और घर से निकाल देने जैसे अमानवीय कृत्यों पर भी कवयित्री सख्त प्रतिरोध दर्ज करती है। वहढेपचा के बाबूशीर्षक कविता में डायन करार दिए जाने के अंधविश्वास जनित पहलू पर भी प्रकाश डालती है औरढेपचा की माँके वक्तव्य द्वारा इस अमानवीय प्रवृत्ति के निकृष्ट स्वरूप को उजागर करती हुई लिखती है कि
और एक दिन तो गजब ही हो गया
लखना के बेटे को साँप ने काटा
तो सबके सब आ धमके हम पर
कहने लगे डायन हैं हम
कुछ कर दिया है उसके बच्चे को
वह तो अच्छा हुआ शरबतिया ने साँप देख लिया
नहीं तो पकलू बुढ़िया की तरह
मुझे भी घसीटकर ले जाते लोग कुलि में
और भरी पंचायत में सर मुँडवा
नचा देते नंगा
कर देते मुँह पर पेशाब
ठूँस देते मैला”10.

महुआ माजीकृत उपन्यासमरंग गोड़ा नीलकंठ हुआके प्रमुख पात्रसगेनकी ताई के संदर्भ में भी इस तथ्य को भलीभाँति देखा जा सकता है। मरंग गोड़ा में यूरेनियम खनन के पश्चात निकलने वाले अवशिष्ट के अनुचित निस्तारण से स्केलिटन डिफॉरमिटिस, आबूर्द, माइक्रो कैथेली, मेगा कैथेली, थैलेसिमिया, डाउन सिंड्रम, बाँझपन इत्यादि बीमारियों की चपेट में मरंग गोड़ा के निवासी आ जाते हैं। किंतु समुचित शिक्षा के अभाव में और अंधविश्वास के प्रभाव में वे इसे डाइन का प्रकोप मानते हैं। और इस मानने की भेंट चढ़ती है सगेन की ताई। जिसका खुद का बच्चा बीमारियों की भेंट चढ़कर जीवित नहीं बचता है। उसे ही बच्चे खाने वाली डाइन कहकर तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है। पहले उन्हें पड़ोस के लोगों द्वारा बेरहमी से पीटा जाता है और मानव मल खिलाया जाता है। तत्पश्चात उन्हें एक अंधेरे कमरे में इस शर्त के साथ बंद कर दिया जाता है कि दो दिन पूर्व मृत बच्चे की लाश को जीवित करना होगा। लोगों के अंधविश्वास के कारण -सगेन की निर्दोष ताई उस बंद अंधेरे कमरे में एक गंधाती लाश के साथ यातनाएँ झेलती रही। पता चलने पर सगेन के ताऊ ने लोगों को समझाने की बहुत कोशिश की मगर किसी ने उनकी एक न सुनी। उन्हें छोड़ने की एक ही शर्त रखी गयी थीबच्चे को जिंदा करना होगा।” 11. इस प्रकार अंधविश्वास के प्रभाव में और शिक्षा के अभाव में आदिवासी स्त्रियों कोडायन का प्रकोपजैसी तरह-तरह की कुरीतियों की अमानवीय प्रताड़नाओं को झेलना पड़ता है।

 
इस स्त्री-जीवन के बहुविध आयामों के अतिरिक्त पर्यावरण संरक्षण एवं प्रकृति प्रेम, जल-जंगल-जमीन के प्रश्न, आदिवासी जन-समाज का इतिहास, भूमंडलीकरण का प्रभाव, आदिवासी संकट एवं संघर्ष के स्वर भी काव्य-संग्रह में अभिव्यक्त हैं। आदिवासी जीवन और प्रकृति के बीच सहजीविता और सहअस्तित्व का संबंध होता है। इसी संदर्भ मेंरमणिका गुप्तालिखती हैं कि – “आदिवासी जीवनशैली में मनुष्य और प्रकृति तथा उसके जीव-जन्तु साथ-साथ जीते हैं, साथ-साथ कष्ट झेलते हैं, हँसते गाते हैं, रोते-बिसूरते हैं। इनके पहाड़, इनकी नदियाँ, हवा या आग इनके देवता हैं। ... जिसकी रक्षा करना ये अपना कर्तव्य मानते हैं और इनका दृढ़ विश्वास है कि प्रकृति इन्हें पालती-पोसती है।” 12. अर्थात् आदिवासी जीवन और प्रकृति के बीच अन्योन्याश्रित संबंध है। और इस संबंध की रक्षा हेतु वे अपना सर्वस्व समर्पित करने को तैयार रहते हैं।आओ, मिलकर बचाएँशीर्षक कविता में कवयित्री इसी पर्यावरण संरक्षण के स्वर को अभिव्यक्त करती हुई लिखती है कि
बचाएँ डूबने से
जंगल की ताजा हवा
नदियों की निर्मलता
पहाड़ों का मौन” 13.

इसी आत्मीयता और प्रेममूलक एवं संरक्षणपरक अवधारणा के कारण ही आदिवासी स्त्री उस स्थान पर अपना विवाह नहीं करना चाहती जहाँ जंगल, नदी और पहाड़ न हों। इसके साथ ही उस व्यक्ति से भी विवाह नहीं करना चाहती जिसने अपने जीवन में कभी कोई वृक्ष न लगाया हो।उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!’ शीर्षक कविता में कवयित्री लिखती है कि
जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहाँ मत कर आना मेरा लगन
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ 
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाये”14.

ऐसी मान्यताओं और संस्कारों से ही आदिवासी जीवनशैली और प्रकृति के बीच प्रेममूलक और सहजीविता का संबंध रहा है जबकि सभ्य कही जाने वाली तथाकथित विकसित संस्कृतियों के साथ प्रकृति का संबंध संघर्षमूलक ही रहा है। और इस वर्चस्व की जंग में प्रकृति निरंतर लहूलुहान होती जा रही है। लहूलुहान होने की इस पीड़ा और दर्द कोबूढ़ी पृथ्वी का दुखशीर्षक कविता में अभिव्यक्त करती हुई कवयित्री लिखती है कि
क्या तुमने कभी सुना है
सपनों में चमकती कुल्हाड़ियों के भय से
पेड़ों की चीत्कार?
सुना है कभी
रात के सन्नाटे में अँधेरे से मुँह ढाँप
किस कदर रोती हैं नदियाँ?
कभी महसूस किया कि किस कदर दहलता है
मौन समाधि लिये बैठा पहाड़ का सीना
विस्फोट से टूटकर जब छिटकता दूर तक कोई पत्थर?
अगर नहीं, तो क्षमा करना!
मुझे तुम्हारे आदमी होने पर सन्देह है!!”15.

 
इस प्रकार स्पष्ट है कि आदिवासी संस्कृति में प्रकृति रक्षा की भावना संस्कार के रूप में बसी हुई है। अतः यह कहना अनावश्यक न होगा कि पर्यावरण या प्रकृति को केवल वे ही लोग बचा सकते हैं जिनकी संस्कृति में प्रकृति को बचाने की चिंता कूट-कूट कर भरी हो। लेकिन, विडंबना यह है कि जिस आदिवासी समुदाय की संस्कृति और परंपरा में पर्यावरण को बचाने की चिंता निहित है, वह स्वयं अपने अस्तित्व और अस्मिता के संकट से जूझ रहा है। उसका देश ग्लोबल गाँव के देवताओं की सर्वभक्षी भूख की भेंट चढ़कर गायब होता जा रहा है।रणेन्द्रहमें अपने उपन्यासगायब होता देशमें इसी कटु एवं मार्मिक सत्य से रूबरू करवाते हैं। मुंडाओं केसोना लेकन दिसुमअर्थात् सोने जैसा देश के गायब होने का कारण खनिजों का अंधाधुंध होने वाला खनन ही है – “इन्हीं ज़रूरत से ज़्यादा समझदार इंसानों की अंधाधुंध उड़ान के उठे गुबार-बवंडर में सोना लेकन दिसुम गायब होता जा रहा था। सरना-वनस्पति जगत गायब हुआ, मरांग-बुरु बोंगा, पहाड़ देवता गायब हुए, गीत गाने वाली, धीमे बहने वाली, सोने की चमक बिखेरनेवाली, हीरों से भरी सारी नदियां जिनमें इकिर बोंगाजल देवता का वास था, गायब हो गईं। मुंडाओं के बेटे-बेटियाँ भी गायब होने शुरू हो गए। सोना लेकन दिसुम गायब होने वाले देश में तबदील हो गया।”16. ‘सन्थाल परगनाभी ऐसा ही एक गायब होने की कगार पर खड़ा परगना है। जिसके संदर्भ में कवयित्री लिखती है कि
सन्थाल परगना
अब नहीं रह गया सन्थाल परगना
बहुत कम बचे रह गये हैं
अपनी भाषा और वेशभूषा में यहाँ के लोग
उतना भी बच नहीं रह गयावह
सन्थाल परगना  में
जितने कि उनकी
संस्कृति के किस्से!”17.

इस प्रकार वैदिककाल से जो खदेड़ने का उपक्रम आदिवासियों के साथ शुरू हुआ था वह आज और भी विकट रूप में विद्यमान है। किंतु इस खदेड़े जाने के विरुद्ध उनका जो संघर्ष वैदिक काल से विद्यमान था वह आज भी अनवरत रूप से जारी है। और इस संघर्ष में कवयित्री सामाजिक और साहित्यिक दोनों धरातलों पर पूरी तत्परता के  साथ संलग्न है।उतनी ही जनमेगी निर्मला पुतुल!शीर्षक कविता में अपनी इसी प्रतिबद्धता को व्यक्त करते हुए वह लिखती है कि
अगर किसी तरह हारी इस बार भी
तो कर लो नोट दिमाग की डायरी में
आज की तारीख के साथ
कि गिरेंगी जितनी बूँदें लहू की धरती पर
उतनी ही जनमेंगी निर्मला पुतुल
हवा में मुट्ठी-बंधे हाथ लहराते हुए!”18.

 
इस प्रकार निष्कर्ष रूप में कहें तोनिर्मला पुतुलने अपने संघर्ष और अनुभव के अदहन से प्रस्तुत काव्य-संग्रह का जनन किया है। यह कोई कल्पना की उड़ान से उद्भूत काव्य-संग्रह न होकर ठोस धरातल के कठोर संघर्ष के गर्भ से जन्मा संग्रह है। जैसा कि कवयित्री ने अपनी कविताजो कुछ देखा-सुना, समझा, लिख दियामें अपने कवि-कर्म के ईंधन को स्पष्ट किया है, ठीक वैसा ही सरल, सहज एवं चिंतनशील प्रभाव भी पाठकों के जेहन में उत्पन्न कर दिया है। संग्रह की कविताएँ स्त्री जगत के मानसिक पर्यावरण के साथ-साथ आदिवासी जीवन के खुरदुरे यथार्थ से भी पाठकों का संवेदनशील साक्षात्कार करवाती हैं। आदिवासी समाज, संस्कृति एवं धर्म के प्रत्येक पहलू को मार्मिकता एवं गंभीरता के साथ विवेचित-विश्लेषित किया गया है।सुगिया’, ‘अपने घर की तलाश में’, ‘क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए’, ‘क्या तुम जानते होएवंअपनी जमीन तलाशती बेचैन स्त्रीशीर्षक कविताओं में स्त्री-मन की अंतर्छवियाँ अभिव्यक्त हैं। उनकी आकांक्षा एवं एहसास के मानचित्र कविताओं में उत्कीर्ण किए गए हैं। इसी प्रकार आदिवासी स्त्री के शोषण, उत्पीड़न और तस्करी इत्यादि के संदर्भ – ‘बाहामुनि’, ‘चुड़का सोरेन से’, कुछ मत कहो सजोनी किस्कू!’, ‘ढेपचा के बाबूएवंपिलचू बूढ़ी सेइत्यादि कविताओं में अभिव्यक्त हैं। सिर्फ शोषण के स्वरूप का ही चित्रण कविताओं में नहीं किया गया है अपितु शोषण के कारणों की भी गंभीर शिनाख्त उनमें दर्ज है और साथ ही दर्ज है तल्ख प्रतिरोध भी।
 
इसी प्रकार गैर-आदिवासी नजरिये के स्वरूप को भी – ‘मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नजर मेंएवंये वे लोग हैं जो ...’ शीर्षक कविताओं में रूपायित किया गया है। प्रकृति-प्रेम एवं संरक्षण के प्रश्नों को भी – ‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!’ एवंआओ, मिलकर बचाएँजैसी कविताओं में पूरी शिद्दत के साथ दर्ज किया गया है। आदिवासियों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी – ‘चुड़का सोरेन से’, ‘सन्थाल परगनाएवंकहाँ गुम हो गयेशीर्षक कविताओं में गंभीरतापूर्वक बयान किया गया है। आदिवासी संघर्ष और प्रतिरोध को – ‘खून को पानी कैसे लिख दूँ’, ‘पहाड़ी स्त्री’, ‘पहाड़ी पुरुष’, ‘उतनी ही जनमेगी निर्मला पुतुल!एवंमैं चाहती हूँइत्यादि कविताओं में तल्ख स्वरों में अभिव्यक्त किया गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आदिवासी जीवन के बहुविध आयामों से कवयित्री ने हमारा संवेदनात्मक साक्षात्कार करवाया है। जिसकी गूँज नगाड़े की आवाज की तरह निरंतर हमारे जेहन में बनी रहती है और सार्थक परिवर्तन के लिए आंदोलित भी करती रहती है।

संदर्भ ग्रंथ सूची
1.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 08.
2.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 09.
3.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 12.
4.
रणेन्द्र (2013), ग्लोबल गाँव के देवता, नयी दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 100.
5.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 44-45.
6.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 21.
7.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 22.
8.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 19-20.
9.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 24.
10.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 41-42.
11.
माजी, महुआ (2015), मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 156-157.
12.
गुप्ता, रमणिका (2014), आदिवासी अस्मिता का संकट, नई दिल्ली, सामयिक प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 86.
13.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 76-77.
14.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 49-50.
15.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 31-32.
16.
रणेन्द्र (2014), गायब होता देश, गुड़गांव, पेंगुइन बुक्स इंडिया प्रा. लि., पृष्ठ संख्या – 03.
17.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 26-27.
18.
पुतुल, निर्मला (2012), नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ संख्या – 91.

1 comment :

  1. एक शानदार और ईमानदार कवयित्री के रचना संसार की झलक ने चौंकाया और आश्वस्त किया |समीक्षक और संपादक को धन्यवाद | इनकी कुछ रचनाएं पूरा पढ़ने को मिलें तो अच्छा रहे |

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।