कविताएँ: चंद्र मोहन भण्डारी

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

 ठहरा हुआ समय

मैं जब भी वहाँ पहुँचता हूँ
फाटक बन्द मिलता है
लेविल-क्रासिंग के दोनों ओर
तांगे, इक्के, कारों की कतारें
हवा में तैरती सी
एक उत्सुक प्रतीक्षा की गंध
वाहनों से उतर चहलकदमी करते
बीड़ी सुलगाते, बतियाते लोग
और यहाँ-वहाँ हल्का होने की
जगह तलाशते मुसाफिर.
पटरियों पर भागती गाड़ी
और उसके इंतजार में थमा समय
लम्बे इंतजार के बावजूद
धीरज से बतियाते लोग.

मैं क्यों नहीं ला पाता वैसा धीरज
जो हर एक को मिला है विरासत में
काल-प्रवाह को भूल
थोड़ी देर ही सही मैं उन सब में
शामिल क्यों नहीं हो जाता
वह दार्शनिक तटस्थता
वह समय-गति का विवेक
वह न चुकने वाला धैर्य
मेरे हिस्से में
क्यों नहीं आता

काश मैं भी सोच पाता
फाटक का बन्द मिलना
गाड़ी का देर से आना, एक लम्बा इंतजार
वैसे ही हैं जैसे
सूरज का निकलना, अस्त होना
तारों का टिमटिमाना
इन पर अपना बस
कहाँ चल पाता है
वक्त के लम्बे सफर में
हमारा सफर उलझ जाता है.
तभी  धड़धड़ाता
मालगाड़ी को खींचता स्टीम इंजन
क्रासिंग से गुजर जाता है
थोड़ी देर का ठहराव
कामकाजी सुगबुगाहट में बदल जाता है
स्वयं से पूछा गया मेरा प्रश्न
अगली ठहराव तक
एक बार फिर टल जाता है.

दास्तान

बहुत दूर निकल आये हम
पीछे मुड़कर देखें भी
नहीं मिलता निशान उस रास्ते का
हम जिसपर चले थे
उस पहाड़ी का, झरने का
पीछे छूट आये, नाजुक रिश्तों का
आगे ही बढ़ने को मजबूर - अकिंचन, अभिशप्त
जिजीविषा और जिज्ञासा
दोनों को नापते-तौलते
चलते रहने की कोशिश
चांद की असलियत जानते भी
उसकी खूबसूरती का तलबगार
उड़ानों की लम्बी दास्तान
दास्तानों की अंतहीन शृंखला
शृंखला के छोर पर खड़ा मैं।

बीहड़ अनजान रास्ता
घने काले बादलों को चीरती
रह-रह चमक उठती अंगार रेख,
आगे बढ़ने की पुरजोर कोशिश.
सोचता हूँ आसान रास्ते भी थे
पर वह अदम्य जिज्ञासा
चैन लेने देगी, तब
नहीं कहता, गलत था मेरा फैसला
ये बियाबान, ये सन्नाटा, काले स्याह पहाड़
जंगलों को गुंजाती हवाओं का गीत
डर है जिजीविषा को
पर जिज्ञासा – चैन लेने दे तब!

जिजीविषा, जिज्ञासा – दोनों का ही साथ
दिल से दिल की बात
हर मोड़ पर गूंज उठता वही गीत
रह-रह चमक उठती बिजली
और हर तड़ित-ऊर्जा में निर्मित होते अणु
अणुओं की शृंखला, प्रोटीनी विन्यास का प्रवेश
जीवन-यात्रा की लम्बी कठिन दास्तान का
प्रथम चरण –
धरती पर जीवन और जैविक विकास का
आरम्भ-बिन्दु!

अंजली  भर  सागर

टुकड़ा भर धूप
चुटकी भर प्यार
अपनी भेंट लिये
गया सागर के पास.
मैं समझ भी न पाया
उपहार में ले आया
अंजली भर सागर अपने साथ

तुम अंजली भर पानी ले आये
शायद अनुमान न था तुम्हें
सागर कहीं भी समा सकता है
अपनी विराटता के बावजूद
आकाश छोटी सी आंखों में
जगह पा जाता है

बूंद-बूंद से सागर बनना
सुना था मगर
बूंद में सागर समा लेना
आज पहचाना है।

आस्था 

पूर्ण नास्तिक हुआ करता वह
आज प्रगाढ़ भक्तिभाव में लीन
आस्था और विश्वास के साथ
चकित हुआ मैं, कैसे संभव था
अप्रत्याशित, अविश्वसनीय बदलाव
जिज्ञासा वश पूछा - कैसे यह हुआ संभव
कैसे जागी आस्था अपार
उन तार्किक विवेचनों का क्या
कैसे हुआ यह चमत्कार?

उसने कहा
नहीं यकीन चमत्कार में
है यहाँ पूर्ण वैज्ञानिक आधार,
तार्किक विवेचन का अनिवार्य निष्कर्ष
कार्य-कारण द्वैत से संचालित
विश्लेषण-विधि आधारित ठोस ज्ञान।

चार दशकों से परखता रहा था मैं
समाज को, देश को
समझता रहा था मैं
पूरे परिवेश को, देखा मैंने
दुनिया के सभी संभावित दंद-फंद
भ्रष्ट आचरण के सभी कारगर छंद
विद्यमान यहाँ हैं पूरे आवेग में
जोड़-तोड़ की हर बारीकी
साँठ-गाँठ की आधुनिक अभियांत्रिकी
रची बसी है पूरे परिवेश में।

बाहर देश हर रोज नीलाम होता है
अंदर ईमान बिकता है इन्सान मरता है
मुनाफा वसूली होती है
रकम अंदर पहुँचती है और इस सबके बावजूद
चलता रहता है हिन्दुस्तान
लंगडाता ही सही, चलता तो है।

सोचता हूँ इन हालात में जिसे
खड़ा भी होना मुश्किल था
वह बखूबी चल रहा है
बारहवीं सदी का मुसाफिर
इक्कीसवीं सदी की ओर
रफ्तार से बढ़ रहा है।

तुम बताओ
कौन चला रहा है इसे
कौन आगे बढ़ाता है
है कोई जवाब, नहीं है न?

तब ईश्वर सत्ता है निर्विवाद
पूरी कायनात को जो चलाता है
वह सर्व-शक्तिमान, सर्वज्ञ
सिर्फ वही तो है
जो इस देश का भी रखवाला है।

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