श्रद्धांजलि सुशील सिद्धार्थ

सुशील सिद्धार्थ
(2 जुलाई 1958 - 17 मार्च 2018)
आता है जो तूफ़ाँ आने दो कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है
मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाए।

ये शब्द स्वर्गीय सुशील सिद्धार्थ की एक फ़ेसबुक पोस्ट से हैं। सेतु सम्पादन मण्डल के एक वरिष्ठ सदस्य के लिये 'स्वर्गीय' लिखते हुये अजीब सा लग रहा है। सेतु आरम्भ करते समय पत्रिका के नाम से लेकर, उसकी विषय-वस्तु, संरचना, तथा उद्देश्य पर उन से फ़ोन पर विस्तार से चर्चा हुई थी। पिछली प्रतियोगिताओं के विषय में बात करते समय उनका सुझाव एक व्यंग्य प्रतियोगिता के आयोजन का था ताकि वे निर्णायक होने का अनुरोध स्वीकार कर सकें। सोचा था कि इस बार की भारत यात्रा में साक्षात्कार होगा, लेकिन नियति का लेखा कोई नहीं जानता। सेतु सम्पादन मण्डल की ओर से सुशील जी को विनम्र श्रद्धांजलि।

7 जुलाई 1934 - 19 मर्च 2018
इसी महीने हमने साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त हिंदी विभागाध्यक्ष केदारनाथ सिंह को भी खोया है। सेतु सम्पादन मण्डल की ओर से उन्हें भी विनम्र श्रद्धांजलि।

सेतु द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता के परिणाम भी सामने आ चुके हैं। सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। प्रतियोगिता के निर्णायक मण्डल के सम्मानित सदस्यों का आभार जिन्होंने इस कार्य के लिये अपना महत्वपूर्ण समय निकाला।

इस महीने मैं भारतयात्रा पर था। दिल्ली, लखनऊ और मुम्बई सहित कुछ नगर घूमे, पर कितने ही छूट गये। जहाँ-जहाँ भी गया, प्रेम से अभिभूत हुआ। बचे हुए नगरों का भ्रमण आगामी भारत-यात्रा के लिये टल गया, लेकिन फिर भी बहुत से परिजनों, पुराने मित्रों और सहकर्मियों से भेंट हुई। समयाभाव, या अन्य कारणों से जिन हितैषियों से भेंट न हो सकी उन सबसे क्षमाप्रार्थी हूँ। इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि आदरणीय से. रा. यात्री के साथ एक भेंट रही जिन्होंने अपनी अस्वस्थता के बावजूद अपना भरपूर समय दिया। उनके सुपुत्र आलोक जी का हार्दिक आभार।
आदरणीय से. रा. यात्री जी
दिल्ली, ठाणे-मुम्बई, तथा लखनऊ यात्राओं के दौरान सुधेश जी, सुरेश ऋतुपर्ण जी सहित हिंदी के अनेक विद्वानों और साहित्यकारों के दर्शन का अवसर मिला।  साथ ही अपने बहुत से पुराने मित्रों और सहकर्मियों से यादें ताज़ा हुईं। लघुकथा के क्षेत्र में प्रसिद्ध मधुदीप जी से भेंट हुई। सबसे आश्चर्यजनक भेंट हिंदी ब्लॉगिंग के दिनों के मित्र जितेंद्र के साथ मॉरिशस के मित्र विनय से भी हुई जो थ्येटर ओलम्पियाड के सिलसिले में अपने दल के साथ भारत आये हुए थे। समयाभाव के साथ-साथ कुछ भारत-विशिष्ट समस्याओं के कारण अनेक मुलाकातें, न चाहते हुए भी, अगली यात्रा के लिये टालनी पड़ीं।

पिट्सबर्ग वापस आते ही बीमार पड़ गया, सो इस अंक के आने में कुछ देरी हुई। आपके सहयोग का धन्यवाद। चालीस से अधिक रचनाओं के साथ-साथ इस अंक में सेतु की लघुकथा प्रतियोगिता के परिणाम भी प्रकाशित हैं। सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद और सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई।

शुभकामनाओं सहित,
अनुराग शर्मा


4 comments :

  1. ASHISH SHRIVASTAVAApril 10, 2018 at 4:03 AM

    BHOPAL ME AAPKA SWAGAT HEI

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    1. धन्यवाद आशीष, सम्भवतः अगली बार। आभार

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  2. आपका हिंदी भाषा पर इतनी अच्छी पकड़ एवं विचारों की अभिव्यक्ति का ज्ञान आपके साथ कार्य करने के दौरान मैं
    जान ही न सका। परमपिता आपके यश एवं देश विदेश में अपनी मातृभाषा के प्रचार प्रसार को दिन दुगनी एवं रात चौगुनी उन्नति कराये, यही हमारी मनोकामना है।






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  3. अतिसुंदर एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति ....

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