वर्तमान पत्रकारिता में गाँधी की प्रासंगिकता

शैलेशकुमार दुबे

- शैलेशकुमार दुबे

महात्मा गाँधी को महात्मा गाँधी बनाने में पत्रकारिता का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनकी सम्पूर्ण पत्रकारिता का आधारस्तंभ राष्ट्रीयता रही। उनके जीवन में सत्य और अहिंसा का स्थान सर्वोपरि था। गाँधी जी अपने आप को पत्रकारिता में विद्यार्थी समझते थे, लेकिन उन्हें पत्रकारिता का लगभग चार दशकों का अनुभव था। वे पत्रकारिता के महापंडित थे। व्यक्ति की महानता उसके विचारों से प्रकट होती है। जिसे गाँधी जी के विचारों से महसूस व समझा जा सकता है।

महात्मा गाँधी के विचारों से पूरा विश्व प्रभावित रहा। भारतीय पत्रकारिता भी प्रभावित रही। वर्तमान पत्रकारिता के बारे में ऐसा कहना शायद हास्यास्पद हो। इस समय की पत्रकारिता पर सबसे ज़्यादा प्रभाव राजनीतिज्ञों, विज्ञापन व पैसे का है। जिसे लोकतन्त्र का चौथा खम्बा कहा जाता था, वह लगभग हिलने लगा है। आज की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता व नैतिकता को खोजना पड़ता है। पेड न्यूज़ के जमाने में इन बातों को ढूढ़ना समय बर्बाद करने के अलावा कुछ भी नहीं। गाँधी जी ने सदैव पत्रकारिता में विज्ञापन का विरोध किया। अतः वर्तमान पत्रकारिता उनके विचारों से कितनी प्रभावित हो सकती है, इसे हम स्वयं सोच सकते हैं।

महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता का क-ख-ग विदेश में सीखा। लंदन में बैरिस्टरी करते समय ‘द वेजीटेरियन’ में उन्होंने बारह लेख की सीरीज लिखी। इसका सीरीज का प्रथम लेख 7 फरवरी, 1891 में छ्पा। दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी वकील से अधिक पत्रकार के रूप में प्रसिद्ध रहे। वहाँ समाचार-पत्रों में स्तम्भकार भी थे। वे अक्टूबर, 1899 में पत्रकार के रूप में बोअर युद्ध मैदान में जाकर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के लिए न्यूज़ भेजा था। ‘प्रिटोरिया न्यूज़’ के संपादक मि.विअर स्टेट ने उनके द्वारा युद्ध-स्थल से भेजी गई रिपोर्ट एवं चित्रों को छापा था।

दक्षिण अफ्रीका में 1903 में महात्मा गाँधी ने ‘इंडियन ओपेनियन’ समाचार पत्र प्रारम्भ किया तथा वे वहाँ जब तक रहे इसे प्रकाशन चलता रहा। गाँधी जी जब भारत में आए तो उन्होंने ‘नवजीवन’, ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ को संपादित व प्रकाशित किया।

गाँधी जी द्वारा संपादित ‘इंडियन ओपेनियन’ समाचार पत्र

गाँधी जी द्वारा संपादित ‘यंग इंडिया’ समाचार पत्र 


गाँधी जी द्वारा संपादित ‘इंडियन ओपेनियन’ समाचार पत्र के जून, 1903 को प्रकाशित अंक में ‘अपनी बात’ शीर्षक अग्रलेख अँग्रेजी, गुजरती, हिन्दी एवं तमिल में छपा। जिसे संपादकीय ही समझना चाहिए। इसके बाद उसके कई अंकों में अपनी आत्मकथा और ‘दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ पुस्तक के उद्देश्यों की चर्चा प्रस्तुत की। ‘इंडियन ओपेनियन’ के भविष्य के संबंध को लेकर उनकी अध्यक्षता में एक मीटिंग 23 अप्रैल, 1906 को डर्बन स्थित उमर हाजी आमद झवेरी के घर पर हुई। उन्होंने इस मीटिंग में ‘इंडियन ओपेनियन’ के संबंध में जो लक्ष्य निर्धारित एवं ध्येय बताए थे, वे 28 अप्रैल, 1906 को इसी समाचार पत्र में छपा।
 गाँधी जी ने ‘इंडियन ओपेनियन’ समाचार पत्र की घाटेवाली आर्थिक स्थिति को स्पष्ट किया तथा घोर वित्तीय संकट आने पर भी प्रेस के एक भी कर्मचारी के रहने तक प्रकाशन जारी रखने का संकल्प लिया। उनके अनुसार ‘इंडियन ओपेनियन’ समाचार पत्र का उद्देश्य निम्नलिखित है –

“1-हिंदुस्तानियों के दु:खों को शासनकर्ताओं एवं गोरों के सामने तथा इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में जाहिर करना।
2-हिंदुस्तानियों के दोषों को उन्हें बताना तथा उन्हें दूर करने के लिए प्रेरित करना।
3-हिंदुस्तानियों में हिन्दू-मुसलमान के बीच के भेद को तोड़ना तथा गुजराती –तमिल-बंगाली आदि की क्षेत्रीय खाइयों को पाटकर एकता पैदा करना।
4- इन विचारों को प्रजा में दृढ़ करना तथा प्रजा को शिक्षित करना।”
(गाँधी वाङ्मय –खंड-5– पृष्ठ क्रमांक –299-300)

गाँधी जी ने समाचार पत्रों की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए कहा कि- “इस (इंडियन ओपेनियन) समाचार पत्र की ज़रूरत के बारे में हमारे मन में कोई संदेह नहीं है। भारतीय समाज दक्षिण अफ्रीका के राजकीय शरीर का निर्जीव अंग नहीं है और इसलिए उसकी भावनाओं को प्रकट करनेवाले और विशेष रूप से उसके हित में संलग्न समाचार-पत्र का प्रकाशन अनुचित नहीं समझा जाएगा, बल्कि हम समझते हैं, उससे एक बड़ी कमी पूरी होगी। हमें अपने देशवासियों के उदार सहारे का भरोसा है। जो महान एंग्लो-सैक्शन क़ौम सप्तम एडवर्ड को अपना राजाधिराज कहती है,क्या हम उससे भी यही आशा नहीं कर सकते, क्योंकि हमारा ध्येय इस एक शक्तिशाली साम्राज्य के अनेक वर्गों में सद्भाव तथा प्रेम बढ़ाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।” (गाँधी वाङ्मय –खंड-3– पृष्ठ क्रमांक –406-407)

उपर्युक्त गाँधी जी के विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि आज मीडिया इन विचारों को कम महत्त्व देती हैं। वर्तमान में मीडिया का एक मात्र उद्देश्य पैसा कमाना है। जहाँ पैसे की बात आती है तो नैतिकता और देशभक्ति के बारे में क्या कहा जाय। इस पर आप स्वयं विचार कर सकते हैं। भारतीय मीडिया गाँधी जी के विचारों पर चले तो भारत देश में परिवर्तन की धार बहने लगे। अतः गाँधी जी वर्तमान पत्रकारिता में प्रासंगिक है, लेकिन उनके विचारों को क्रियान्वित नहीं किया जा रहा। यह विचारणीय मुद्दा है।

भारत में पत्रकारिता के माध्यम से लोकतन्त्र को सफल बनाने का प्रयास किया जा रहा, किन्तु उस तेजी से नहीं जिस तेजी से किया जाना चाहिए। आज के पत्रकार केवल केवल पत्रकार है, उन्हें अपने ध्येय के बारे में न सोचना है न बोलना है। वे अपने मालिक की या सरकार के ओर झुकते हुए दिखाई देते है। उनकी हाँ में हाँ मिलते नजर आयेंगे। यह गाँधी जी के सिद्धांतों से बिल्कुल अलग है। उनके अनुसार-“मैं आपसे (पत्रकारों से) कहूँगा कि आप उन जंजीरों को तोड़ डालिए जिनमें आप जकड़े हुए हैं। समाचार-पत्रों को आज़ादी का रास्ता दिखाने और आज़ादी के लिए जान देने का उदाहरण प्रस्तुत करने का गौरवमय सौभाग्य प्राप्त करना चाहिए।आपके हाथ में कलम है, जिसे सरकार नहीं रोक सकती।” (सम्पूर्ण गाँधी वाङ्मय –खंड-14– पृष्ठ क्रमांक –84)

पत्रकार को देश का सेवक होना चाहिए।“पत्रकार के लिए पत्रकारिता से आजीविका कमाना, धन कमाना तथा सुख-समृद्धि के प्रति लालची होना उचित नहीं है। पत्रकार के मूल उद्देश्य को इससे हानि पहुँचती है और बड़े अनर्थ होने की संभावना रहती है।”(सम्पूर्ण गाँधी वाङ्मय –खंड-14– पृष्ठ क्रमांक –82)देशभक्ति उसका धर्म है।
वर्तमान पत्रकारिता अथवा मीडिया में विज्ञापन का महत्त्व अति से ज्यादा है। यह लोकतन्त्र के लिए अभिशाप है। इस पर मंथन करना होगा। महात्मा गाँधी के अनुसार- “अब हमें ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विज्ञापन छापने का काम भी छोड़ देना चाहिए। पहले हमारा ख़्याल था कि विज्ञापन प्रकाशित करना गलत नहीं है, किन्तु ज़्यादा सोच-विचार के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह रिवाज बिलकुल अवांछनीय है। जो लोग पैसा कमाने के लिए आतुर हैं, वे अपने व्यापार में दूसरों से आगे बढ़ जाने के उद्देश्य से विज्ञापन प्रकाशित कराते हैं। विज्ञापनों की हवा आजकल ऐसी बढ़ रही है कि पैसे के लिए (सच्चे-झूठे)चाहे जैसे विज्ञापन दिए जाते हैं और लिए जाते हैं। आधुनिक सभ्यता का यह अत्यंत दु:खद लक्षण है और हम उससे मुक्त होना चाहते हैं। जो विज्ञापन व्यापार से संबंध नहीं रखते और लोकोपयोगी भी हैं, ऐसे विज्ञापनों को हम पैसा लेकर छापेंगे, क्योंकि उन्हें मुफ्त छापने से हमारा अख़बार केवल उन्हीं से भर जाएगा, किन्तु दूसरे विज्ञापन हम नहीं छापेंगे।जो विज्ञापन अभी हमारे पास हैं,उनके बारे में उनके मालिकों के साथ प्रबंध करके हम उनसे छुटकारा पाने का प्रयत्न करेंगे।”(सम्पूर्ण गाँधी वाङ्मय –खंड-6– पृष्ठ क्रमांक –326)

पत्रकारिता में पाठकों का भी महत्त्व होता है। अतः उनकी बात को भी समाचार मालिकों को गंभीरता से समझना होगा। आज के समय में पाठकों से पत्र तो मगाएँ जाते है, लेकिन उनके जवाब कम ही मिलते हैं। हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, किन्तु क्या अभिव्यक्ति देनी है, यह नहीं पता। गाँधी जी को पाठकों के पत्र बहुत मिलते थे, लेकिन इतने ज़्यादा मिलते थे कि उन्होंने पत्र-लेखक पाठकों के लिए कुछ शर्ते रखी थी-
1-बिना कारण कभी पत्र न लिखें,
2-पेंसिल से न लिखें,
3-लंबे पत्र न लिखें,
4- बार-बार एक ही बात न कहें,
5-जहां तक हो सकें, तर्क बिलकुल ही न दें तथा
6-अक्षर मोती के दानों जैसे लिखें। ”(सम्पूर्ण गाँधी वाङ्मय –खंड-52– पृष्ठ क्रमांक –78)

वर्तमान पत्रकारिता में गाँधी की प्रासंगिकता आज भी है, बल्कि कहें तो वे आज ज्यादा प्रासंगिक हैं। अतः समाज, जनता, मानवता तथा लोकतन्त्र ये सब एक दूसरे के पूरक है। जिसकी रक्षा पत्रकारिता के माध्यम से ही होगी। हमारा देश जागरूक भी होगा। आज उनके विचारों की ज़्यादा आवश्यकता है। अंत में मैं गाँधी की बात कहना चाहूँगा, “मुझे आशा है कि जब वह वक्त (दमन में कड़ी परीक्षा का) आएगा तो हिंदुस्तान के समाचार-पत्र (और उनके संपादक) निर्भयतापूर्वक राष्ट्रीय हित का प्रतिपादन करेंगे। किसी दबाव से दबे रहकर अखबार निकालने से बेहतर तो यह है कि अखबार निकाला ही न जाए।” (सम्पूर्ण गाँधी वाङ्मय –खंड-76– पृष्ठ क्रमांक –402)

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