नमन बालकवि बैरागी

बालकवि बैरागी
(10 फ़रवरी 1931 - 13 मई 2018)
बेशक शब्द सनातन हैं पर, नए सिरे से जाँचो
एक बार 'संघर्ष' लिखो और, गहरे मन से बाँचो
और किसी को पूछोगे तो, नाहक उलझा देगा
माटी के दीपक से पूछो, फौरन समझा देगा
अँधियारे से लड़ना सचमुच कोई छोटा काम नहीं है
इसके शब्दकोश को देखो, वहाँ शब्द 'आराम' नहीं है।

ये प्रेरक शब्द कहने वाले बालकवि बैरागी आज हमारे बीच नहीं हैं। बाल्यावस्था में ही अपनी काव्य-प्रतिभा का लोहा मनवाने के कारण उनका मूल नाम नंदराम दास बैरागी ऐसा पीछे छूटा कि वे बालकवि के नाम से ही ख्यात हुए। लता मंगेशकर के स्वर और जयदेव के संगीत से सजा उनका गीत 'तू चंदा मैं चांदनी' आज 48 साल बाद भी तन-मन को झकझोर देता है। उनसे सीधा सम्वाद न होते हुए भी आप सब की तरह मैंने उनका लिखा हुआ तो पढ़ा ही है, बल्कि पिछले एक दशक में उनके बारे में उनके अनुज विष्णु जी द्वारा उनके बारे में और भी बहुत कुछ जाना है। इंटरनैट पर उपलब्ध उनके विडियो भी देखे हैं लेकिन मित्र विष्णु बैरागी जी के अनुभवों द्वारा एक बेहद साधारण पृष्ठभूमि से चलकर सफलता का शिखर छूने वाले इस सरल और अतिशय सुलझे हुए साहित्यकार, राजनेता और हिंदीसेवी को बहुत निकट से देखा है। सेतु सम्पादन मण्डल की ओर से विराट व्यक्तित्व के स्वामी बालकवि बैरागी जी को विनम्र नमन और श्रद्धांजलि।

राधानाथ सिकदर
(अक्टूबर 1813 - मई 1870)
पैंसठ वर्ष पहले इसी महीने (29 मई 1953) एडमण्ड हिलेरी और तेंज़िंग नोर्गे ने सागरमाथा (अर्थात एवरेस्ट) शिखर पर विजय पाने की अद्वितीय उपलब्धि सिद्ध की थी। यह भी एक संयोग ही है कि सागरमाथा की सटीक ऊँचाई मापकर पहली बार उसे संसार की सर्वोच्च चोटी स्थापित करने वाले गणितज्ञ राधानाथ सिकदर का देहावसान भी इसी महीने (17 मई 1870) में हुआ था। अक्टूबर 1813 में जन्मे राधानाथ ने महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण द्वारा सागरमाथा सहित हिमालय क्षेत्र के अनेक शिखरों की सटीक ऊँचाई पहली बार रिकॉर्ड की थी। आश्चर्य नहीं कि उनका पदनाम 'कम्प्यूटर' था। सिकदर द्वारा शिखर 15 (Peak XV) को सर्वोच्च शिखर घोषित किये जाने पर सन् 1865 में भारतीय सर्वेक्षण विभाग के पूर्ववर्ती राज भौगोलिक संस्थान (Royal Geographical Society) के तत्कालीन प्रमुख एण्ड्र्यू वाह (Major General Sir Andrew Scott Waugh) ने अपने पूर्ववर्ती जॉर्ज एवरेस्ट के सम्मान में शिखर 15 का नया नामकरण किया।

आपको यह याद दिलाते हुए प्रसन्नता हो रही है कि यह अंक सेतु का चौबीसवाँ अंक है। आगामी अंक हमारा वार्षिकांक होगा जिसके लिये आपकी उत्कृष्ट, मौलिक व अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। हम आपके समय का आदर करते हैं, और हमारे लेखकों से बार-बार एक ही बात के लिये पत्राचार करने से बचना चाहते हैं। इसलिये आपसे एक ही बार में कुछ अपक्षाएँ पूर्ण करने का अनुरोध है। एकाधिक पत्र-पत्रिकाओं को थोक में भेजी जा रही रचना कृपया हमें न भेजें। रचना भेजने से पहले कृपया वर्तनी, तथ्य आदि की जाँच कर लें। सेतु को भेजी गई रचना यूनिकोड में टंकित, स्वरचित, मौलिक, व अप्रकाशित होनी चाहिये। पहली बार रचना भेजते समय उसके साथ लेखक का संक्षिप्त परिचय तथा स्पष्ट चित्र भी हो। जैसा कि हम पहले भी आपसे निवेदन करते रहे हैं, रचनाएँ भेजने से पहले कृपया 'लेखकों से निवेदन' अवश्य पढ़कर अनुपालन करें।  रचना भेजने से पहले कृपया एक बार प्रूफ़रीड करके सामान्य व्याकरण त्रुटियाँ हटा दें। रचनाओं में विराम चिह्न तथा अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप का प्रयोग वाँछित है। इस सम्बंध में सहायता के लिये कृपया सही लिखें आलेख ध्यान से पढ़ें। प्रेषित रचना के साथ निम्न वचन भी ईमेल संदेश में अपेक्षित है:
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साहित्य का आनंद लेने के साथ-साथ सेतु पर आपको अपने गौरवशाली इतिहास-भूगोल की सामान्य जानकारी भी मिलती रहेगी। आपकी राय और सुझावों का स्वागत है। फ़िलहाल तो भारत के मैदानी क्षेत्रों की भीषण गर्मी से स्वयं को और अपने आसपास के मनुष्यों सहित पशु-पक्षियों को बचाइये। यदि सम्भव हो तो उनके लिये जल-व्यवस्था भी कीजिए। धन्यवाद!

शुभकामनाओं सहित,
अनुराग शर्मा


1 comment :

  1. ASHISH SHRIVASTAVAJune 5, 2018 at 5:48 AM

    सादर प्रणाम आदरणीय अनुराग जी, आगामी वार्षिकांक की अग्रिम बधाई ! वैसे तो सेतु के सभी अंक पठनीय होते हैं और आगामी अंकों की प्रतीक्षा भी तीव्रता से रहती है, लेकिन मई 2018 की संपादकीय पढ़ने के बाद उत्सुकता और भी बढ़ गई है। आपके द्वारा बहुत ही कुषलता पूर्वक किया गया रचनाओं का चयन सेतु को विषिष्टता प्रदान करता है और सेतु को उत्कृष्ट भी बनाता है। मेरी शुभकामनाएं
    भगवान आपको इतनी शक्ति, ऊर्जा प्रदान करें कि आप हिंदी को सेतु को और भी नई ऊंचाईयों पर ले जाने में सफल हों। बहुत ही सुंदर अंक प्रकाषन के लिए हृदय से धन्यवाद।

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