कृपया सही लिखें – हिंदी लिखना सरल है

अनुराग शर्मा

सही लिखना, पढ़ना और बोलना सक्षम सम्वाद की आवश्यकता है। साहित्य के क्षेत्र में सही लिखना एक अनिवार्यता है। फिर भी इस विषय में बहुत से भ्रम मौजूद हैं और समुचित जानकारी का अभाव है। सेतु सम्पादन मण्डल के पास बहुत सी ऐसी सामग्री आ रही है जिसके बहुत अच्छा होने पर भी हम उसका उपयोग मात्र इस कारण नहीं कर पाते हैं क्योंकि लेखन की त्रुटियाँ ठीक करना एक लम्बा और उबाऊ कार्य है जिसके लिये पर्याप्त समय दे पाना हमारे लिये सम्भव नहीं है। ऐसा भी हुआ है जब 10-15 पंक्ति के परिचय या लघुकथा में 40-50 त्रुटियाँ ठीक करनी पड़ी हैं। सो, आपके समक्ष अच्छी हिंदी लिखने से सम्बंधित कुछ सामान्य और सरल बातें प्रस्तुत हैं। आशा है यह आलेख आपके लिये उपयोगी और हमारे लिये लाभप्रद होगा। ‍‍(सम्पादन मण्डल)
अनुराग शर्मा
अच्छी हिंदी लिखने में आने वाली तमाम बाधाओं में सबसे सरल बाधा वर्तनी की है। मामूली अभ्यास से ही आप सामान्य वर्तनी त्रुटियों से बचे सकते हैं। ध्यान रहे कि प्रामाणिक हिंदी वर्तनी के लिये इंटरनैट पर गूगल खोज आदि विश्वसनीय स्रोत नहीं हैं। बीबीसी हिंदी समेत कितने ही प्रतिष्ठित समाचारपत्रों/स्रोतों में त्रुटिपूर्ण वर्तनी एक सामान्य बात है। आमतौर पर किसी प्रामाणिक कोष का सहारा लेना लाभदायक होगा मगर यह ध्यान रहे कि सभी शब्द किसी भी शब्दकोष में नहीं समा सकते। जब एक मित्र "आवंटन" शब्द को त्रुटिपूर्ण सिद्ध करते मिले तो उत्सुकतावश मैंने उनसे कारण पूछा। पता लगा कि फ़ादर कामिल बुल्के के शब्दकोश में आबंटन शब्द है परंतु आवंटन नहीं है। यह किसी सही शब्द को त्रुटिपूर्ण सिद्ध करने का पर्याप्त आधार नहीं है। संशय की स्थिति में किसी विद्वान या जानकार मित्र की सलाह लेना अच्छा होगा। ज्ञान, ऋतु, मंजु, स्वाति, राशि, व्यवसाय, स्वास्थ्य, बॉलीवुड, बॉक्स आदि को क्रमशः ग्यान, रितू, मंजू, स्वाती, राशी, व्यव्साय, स्वास्थय, बोलीवुड/ बॉलिवुड, बाक्स आदि लिखने से बचें। कुछ सामान्य वर्तनी त्रुटियां:
  • सम्मान (सही), सन्मान (त्रुटिपूर्ण), संमान (त्रुटिपूर्ण)
  • अद्भुत (सही), अद्भुद (त्रुटिपूर्ण)
  • नमस्कार (सही), नमश्कार (त्रुटिपूर्ण)
  • कृपया (सही), कृप्या (त्रुटिपूर्ण)  
  • अंत:करण (सही), अंतकरण (त्रुटिपूर्ण)
  • प्रसिद्ध (सही), प्रसिद्द (त्रुटिपूर्ण)
  • प्रात:काल (सही), प्रातकाल (त्रुटिपूर्ण)
  • सहस्र (सही), सहस्त्र (त्रुटिपूर्ण)
  • स्रोत (सोता, उद्गम), स्तोत्र (स्तुति गान, प्रार्थना), स्त्रोत (त्रुटिपूर्ण) 
  • चिह्न (सही), चिन्ह (त्रुटिपूर्ण) 
  • हौसला (सही), होंसला (त्रुटिपूर्ण)
यहाँ यह ध्यान रहे कि सामान्य व्यवहार में अनेक तत्सम शब्दों के तद्भव/उर्दू/देशज/अपभ्रंश रूप भी प्रचलित हैं और उन्हें त्रुटिपूर्ण नहीं कहा जा सकता है। वसंत की जगह बसंत या वर्ष की जगह बरस का प्रयोग स्वीकार्य है। तो भी अल्प-स्वीकार्य क्षेत्रीय विकृतियों के सामान्य प्रयोग से बचना चाहिये। रमेश को रमेस या रामेश्वर को रमेसर कहना किसी ग्रामीण पात्र के सम्वाद में जायज़ है लेकिन सामान्य विवरण में ऐसा नहीं लिखा जाना चाहिये। यदि किसी व्यक्ति या स्थान का नाम ही ऐसा है तो बात अलग है, जैसे कि प्रसिद्ध लेखकों प्रेमचंद तथा क्रिश्न चंदर को प्रेमचंद्र या कृष्णचंद्र जैसे नामों से सम्बोधित नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक को तिलक लिखना भी अनुचित होगा।

सकार

स, श, और ष के अंतर के प्रति सचेत रहें। इन तीनों का उच्चारण भी अलग है और इनके दुरुपयोग से शब्दार्थ भी प्रभावित होता है। ष के बारे में सेतु में पहले लिखा जा चुका है। अधिक जानकारी के लिये कृपया “श और ष का अंतर” आलेख पढिये।

अंक

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को भारत संघ की राजभाषा बनाते समय देवनागरी लिपि को अपनाया गया था। इसके साथ ही यह भी निश्चित किया गया था कि संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। अर्थात हिंदी लिखते समय ०, १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९ के स्थान पर क्रमशः 0,1,2,3,4,5,6,7,8,9 का प्रयोग किया जाना चाहिये। हिंदी के कुछ तथाकथित विद्वान हिंदी अंकों के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप को रोमन अंक कहते हुए पाए गए गये हैं जिसका कारण भ्रम या अज्ञान हो सकता है। रोमन अंक भारतीय अंकों जैसे दशमलव आधारित नहीं होते। रोमन अंक में शून्य व अनंत की अवधारणा भी नहीं है, 1 से 6 तक के अंक रोमन चिह्नों द्वारा I, II, III, IV, V, VI लिखे जाते हैं। न उनमें बड़ी संख्याएँ सरलता से लिखी जा सकती हैं और न ही उनमें जटिल गणित सहज है। उदाहरण के लिये यदि आपको 3887 को रोमन अंकों में लिखना पड़े तो MMMDCCCLXXXVII लिखा जाएगा। 1, 2, 3 आदि को रोमन अंक कहना त्रुटिपूर्ण है, वे भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय मानक स्वरूप हैं, जिन्हें कई बार हिंदू-अरेबिक अंक भी कहा जाता है।  सेतु में हमारा प्रयास भी देवनागरी अंकों के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप के पालन का ही है  

अर्धाक्षर

अर्धाक्षर से आरम्भ होने वाले शब्द सामान्यतः त्रुटिपूर्ण बोले परंतु सही लिखे जाते हैं। उन पर विस्तार से चर्चा भविष्य में कभी हिंदी वाचन से सम्बंधित आलेख में होगी परंतु अभी इतना ही अनुरोध है कि स्त्री और इस्त्री जैसे शब्दों के अंतर को ध्यान में रखें तथा स्पष्ट और अस्पष्ट, कृतज्ञ और कृतघ्न जैसी ध्वनियों के विपरीतार्थी स्वरूप को पहचानें। इस्तीफ़ा को स्तीफ़ा या अस्तीफ़ा लिखना सही नहीं है। स्तर और अस्तर दो अलग बातें हैं। ज्ञ को आजकल ग्य जैसे कहना प्रचलन में है परंतु ज्ञ की सही ध्वनि की पहचान हमें अनेक त्रुटिपूर्ण प्रयोगों से बचा सकती है।

व्याकरण चिह्न

पूर्णविराम के लिये विराम चिह्न (।) का प्रयोग किया जाये, पाइप (|), तिर्यक रेखा (/ या \), एक या अनेक बिंदुओं (.) या किसी अन्य अमान्य चिह्न का नहीं। कुछ प्रकाशनगृहों ने विराम चिह्न (।) के स्थान पर बिंदु (.) का प्रयोग अपनाया था जिससे छपाई में कुछ स्याही अवश्य बची होगी जोकि नगण्य है, साथ ही आज के ऑनलाइन लेखन में उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। विराम चिह्न (।) की जगह (.) का प्रयोग इसलिये भी सही नहीं है क्योंकि वह अल्पविराम से भी छोटा होने के कारण  विराम चिह्न जितना स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं होता।

व्याकरण चिह्नों यथा ।, ?, ! आदि से पहले खाली जगह छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि इन्हें खाली छोड़ना खतरनाक है जो कई बार हास्यास्पद परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। उदाहरण के लिये एक प्रकाशित पुस्तक से निम्न अंश देखिये जिसमें पंक्ति के प्रारम्भ में बिखरे विराम चिह्न अनाथ नज़र आ रहे हैं।

तीन ( ...) बिंदु विराम का विकल्प नहीं हैं, तीन से अधिक या कम तो पूर्णतया अस्वीकार्य हैं। तीन बिंदु  यानि लोपचिह्न सामान्यतः अधूरी, छोड़ी गई या छूट गई बात को व्यक्त करते हैं। वाक्यों के बीच में विराम चिह्नों की जगह इनका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये। निम्न उदाहरणों में प्रयुक्त बिंदुओं का कोई औचित्य नहीं है।

भारतीय भी ये त्योहार पूरे जोशो-ख़रोश से मनाते हैं... यहां बॉलिवुड संगीतकारों को बुलाया जाता है...भारतीय एक जगह एकत्र होते हैं...जहाँ सब मिलकर एक साथ त्योहार मनाते हैं।
“ नहीं नहीं... कोई ख़ातिर-वातिर नहीं चाहिये मुझे... तुमसे बात करना ही भा रहा है मुझे... तुम बोलो, सुन रहा हूं मैं तुम्हारी बात...”
"क्या जवाब देते....।" चाँद और दीपक की रोशनी में होठों के साथ आँखों में भी हरकत हुई
वहां..इतने भोले बन रहे हैं जैसे कुछ मालूम ही न हो...” “मैडम... आप यकीन नहीं करेंगी...हम फील्ड के चैंपियन हैं...भीड़ जुटाते हैं...आप छोटे एरिया में मूव करती हैं.,,रैलियों के टाइम में जरुर हमें पैसे मिलते हैं
रसोई में तड़का लगायें तड़का.. ....... तड़का तो साली ने लगाया ही है, कहीं तो..... कहीं तगड़ी सैटिंग है
एकदम नवोढ़ा लग रही है....... पर ये आँखें.......उफ़्फ़..... मैं क्यों नहीं पढ़ पाया इनको ......।

अनुस्वार (शिरोबिंदु) तथा अनुनासिकता चिह्न (चंद्रबिंदु)

अनुस्वार व्यंजन है और अनुनासिकता स्वर का नासिक्‍य विकार। मतलब यह कि अनुस्वार का प्रयोग दो अन्य अक्षरों के बीच में एक अक्षर की तरह होता है जबकि चंद्रबिंदु जिस स्वर के ऊपर लगा है उसके साथ ही नासिका स्वर देता है। पंचमाक्षर (म, न, ण  आदि) की जगह अनुस्वार का प्रयोग हिंदी में सामान्यतः स्वीकार्य है, जैसे हिन्दी को हिंदी और सम्पूर्ण को संपूर्ण लिखना। पंचमाक्षर के बाद किसी अन्य व्यंजन समूह का कोई वर्ण प्रयोग होता है तो पंचमाक्षर को ही लिखा जाना चाहिये। इस स्थिति में पंचमाक्षर की जगह अनुस्वार का प्रयोग त्रुटिपूर्ण होगा। वाङ्गमय, अन्य, चिन्मय, उन्मुख, कार्यान्वित, आदि (वांमय, अंय, चिंमय, उंमुख, कार्यांवित आदि रूप स्वीकार्य नहीं होंगे)। इसी प्रकार संस्कृत वाक्यांशों को हिंदी में लिखते समय भी अनुस्वार का दुरुपयोग नज़र आता है, जिससे बचना ही ठीक है। यथा अमृतम् गमय को अमृतंगमय, या इदम् न मम् को इदन्नमम लिखना स्वीकार्य नहीं है।

कुछ उदाहरण: मात्राएँ, कविताएँ, लघुकथाएँ, समझूँ, बनूँ, दूँ, आँसू, आँख, बाँह, पाँच, पाँव, गाँव, माँ, हूँ, आएँ, हँस (हँसना, हँसी), हंस (पक्षी), चंद्रमा, बिंदु

जिन शब्दों में पंचम वर्ण दो बार प्रयुक्त होता है वहाँ उसे अनुस्वार में बदले बिना दोनों बार लिखा जाना ही सही है यथा, सन्न्यासी अन्नपूर्णा, सम्मान, सम्मति आदि।

डैश, हाइफ़न या योजक चिह्न

शब्द-युग्म में प्रयोग करते समय डैश के आगे-पीछे जगह न छोड़ें। सामान्य प्रयोग के कुछ उदाहरण:
  • सीता-राम, साथ-साथ, आगे-पीछे, लेन-देन, आदि युग्म शब्दों में
  • मिलते जुलते शब्दों से अंतर स्पष्ट करने के लिए, यथा भू-तत्व (पृथ्वी-तत्व) तथा भूतत्व (भूत होने का भाव) में भेद करने के लिये 
  • शब्दों की ध्वनि स्पष्ट करने के लिये प्रयोग किया जा सकता है, यथा अल-कतरा बनाम अलक-तरा  
  • सम्वाद से पहले डैश की जगह, अल्पविराम का प्रयोग अपेक्षित है, यथा: 
मैंने कहा- “कहिये!” के स्थान पर मैंने कहा, “कहिये!” लिखा जाए।

कथन, उद्‍धरण, व शब्द चिह्न (इन्वर्टेड कॉमा, कोट, अपॉस्ट्रॉफ़ी आदि)

शब्दों को उद्धृत करते समय या प्रमुखता देते समय ऊपर एकल चिह्न (इन्वर्टेड कॉमा / सिंगल कोट) का प्रयोग लिया जाना चाहिये जबकि किसी सम्वाद या कथन को उद्धृत करते समय दोहरे चिह्न (डबल कोट्स) का प्रयोग होना चाहिये। आरम्भिक/पहले चिह्न (ओपनिंग कोट) से पहले खाली स्थान हो परंतु पहले चिह्न के बाद खाली स्थान नहीं होना चाहिये। इसी प्रकार अंतिम/द्वितीय चिह्न (क्लोज़िंग कोट) से पहले स्थान न हो, परंतु बाद में हो। यथा: मैंने उनसे जब कहा, “मुझे तुमसे हुआ है प्यार” तो बोले, “चल झूठी।”


कि और की का अंतर

कि और की का अंतर महत्वपूर्ण लेकिन सरल है। फिर भी इस मामले में लापरवाही देखने को मिलती है, जिसे आसानी से सुधारा जा सकता है। स्वामित्व या सम्बंध के अर्थ में 'की' का प्रयोग होता है, जिसके अन्य रूप 'का' और 'के' भी हैं, यथा: राम की कुटिया, कृष्ण की लीला, लीला के पात्र, कवि का पत्र, ध्यान देने की बात, आदि।

किसी संयुक्त वाक्य के प्रधान और आश्रित उपवाक्यों को परस्पर जोड़ने वाले शब्द व्यधिकरण समुच्चयबोधक कहलाते हैं। दो उपवाक्यों को परस्पर जोड़कर उनका उद्देश्य स्पष्ट करने वाले शब्द उद्देश्यसूचक कहलाते हैं। यथा: क्योंकि, जबकि, जोकि, हालांकि, जैसे कि, ताकि, न कि, चूंकि आदि जैसे संयुक्त रूप में भी। कि का स्वतंत्र प्रयोग सामान्यतः दो वाक्यांशों के सकारात्मक योग में होता है। दो वाक्यों के नकारात्मक योग में कि से पहले न के प्रयोग से वह ‘न कि’ का रूप लेता है।

दो वाक्यों को संयुक्त करते समय यदि आश्रित उपवाक्य किसी संज्ञा अथवा सर्वनाम के स्थान पर आता है तब वह संज्ञा उपवाक्य कहलाता है। संज्ञा उपवाक्य से पहले 'कि' का प्रयोग होता है, यथा: वह चाहता है कि मैं यहाँ कभी न आऊँ। कुछ अन्य उदाहरण:
  • पहले यह विचार करना होगा कि पत्र का विषय क्या है ।
  • आपने कैसे सीखा कि अच्छी हिंदी कैसे लिखी जाये? 
  • मेरे शिक्षक ने मुझे सिखाया कि अच्छी हिंदी कैसे लिखी जाये। 
ध्यान देने की बात यह है कि, ‘कि’ द्वारा जोड़े गये संयुक्त वाक्यों को सामान्यतः ‘कि’ के बिना भी सरल रूप में लिखा जा सकता है। निम्न सारणी में कुछ उदाहरणों के सरल रूप देखिये: 
“कि” के साथ
“कि” के बिना
आपने कैसे सीखा कि अच्छी हिंदी कैसे लिखी जाये?
आपने अच्छी हिंदी लिखना कैसे सीखा?
पहले यह विचार करना होगा कि पत्र का विषय क्या है
पहले पत्र के विषय पर विचार करना होगा
मेरे शिक्षक ने मुझे सिखाया कि अच्छी हिंदी कैसे लिखी जाये
मेरे शिक्षक ने मुझे अच्छी हिंदी लिखना सिखाया
यदि ऐसा होता 'कि' किसी आचार्य 'की' कक्षा में छात्रों ने ध्यान दिया होता तो आज ऐसी मुश्किल न होती
यदि किसी आचार्य की कक्षा में छात्रों ने ध्यान दिया होता तो आज ऐसी मुश्किल न होती
हमारी तो यही स्थिति रही है कि सावन हरे न भादों सूखे।
हमारी तो सदा सावन हरे न भादों सूखे वाली स्थिति रही है
ज्योंही सोहन ने माताजी के पर्स में हाथ डाला कि ऊपर से माताजी आ गईं।
ज्योंही सोहन ने माताजी के पर्स में हाथ डाला, ऊपर से माताजी आ गईं।
लगता है कि आज वर्षा होगी
लगता है जैसे आज वर्षा होगी
तुम जानते नहीं कि मैं कौन हूँ
तुम मुझे नहीं जानते

आशा है कि इस आलेख ने आपके कुछ संशयों का नाश किया होगा आपके सुझावों और सलाह का स्वागत है कृपया हमें अपनी राय से अवगत करायें