कथा: शहर जो आदमी खाता है

तेजस पूनिया

तेजस पूनिया 

एक बड़ी दानवाकार कृति मेरे ऊपर आ बैठी है और एक विराट स्वरूप धारण करती जा रही है। अचानक मैं उठ बैठा पसीने से तरबतर। आज मुझे पूरे छ: साल हो गए थे दिल्ली शहर में रहते हुए। राजस्थान के अति दुर्गम स्थान जैसलमेर के एक ग्रामीण परिवेश में कितनी मुश्किलों के बाद मैं बारहवीं तक की तालीम हासिल कर पाया था। कारगिल युद्ध उस समय चल रहा था और भारत-पाकिस्तान दोनों देशों की सेनाओं के हौसले बुलुंद थे। दो-चार गोले उधर से आ गिरते तो जवाब में आठ-दस गोले भारतीय सेना भी बरसा रही थी। आसमान पूरा लाल हुए जा रहा था। जेठ की तपती गर्मी कुछ कम हो चली थी परन्तु मैं वहाँ से दिल्ली भाग आया। भागकर तो नहीं आना चाहता था पर मेरे पास कोई चारा भी न था। जिस मोहल्ले में हम रहते थे वहाँ गिनती के चार-छ घर ही थे। उनमें भी आधे मुसलमानों के, उनमें से एक को मैं अक्सर चचा कहकर बुलाता था। वैसे तो उनका नाम इकरम खान था पर मेरे लिए वे गुब्बारे वाले चचा ही थे। इकरम चचा अक्सर शहर जाया करते थे ट्रक लेकर। आते हुए वे मेरे लिए गुब्बारे लाते और रंग-बिरंगे उन गुब्बारों में हवा भरकर मुझे देते। मुझे उनसे विशेष लगाव सिर्फ गुब्बारों के लिए था यह कहना तो ठीक नहीं होगा, इसके पीछे एक कारण और था वह उनकी ईद। इकरम चचा रंग-धर्म-जाति किसी में भी कोई भेदभाव नहीं रखते। समभाव के साथ उनकी मुस्कान मुझे हमेशा आकर्षित करती थी। आज मैं फिर उन्हीं दिनों में लौट आया था। मुझे आज भी याद है जब मेरा जन्म हुआ। तो सबसे पहले इकरम चचा ने ही मुझे गोद में लिया था। यह सब मैंने अपनी माँ से जाना।
आज मैं पूरे पच्चीस का हो चुका हूँ और इस दानव का मेरे ख्यालों में आने का एक कारण यह भी था कि आज मेरा जन्मदिन है। अपनी जिंदगी के पच्चीस साल पीछे जाकर देखता हूँ तो सोचता हूँ
मैंने क्या पाया? यह शहर!
मुझे सब अच्छे से याद है जब 1999 के आषाढ में मैं दिल्ली आया था तो स्टेशन पर उतरते ही -
टिकट मास्टर – टिकट दिखाओ?
मैं एकदम से सकपका गया और धीरे से बोला नहीं है।
टिकट न होने के पीछे मैंने कई सफाईयां टिकट मास्टर को पेश की पर सब नाकाम रही।
वह मेरा हाथ पकड़ ऐसे खींचे ले जा रहा था कि मैं अचानक से गिर पड़ा। खाली पानी के भरोसे मुझे चार दिन होने को आए। जब मुझे होश आया तो मैंने खुद को पास ही के पुलिस स्टेशन में पाया।
कांस्टेबल मुझ पर इस तरह नजरें गड़ाए था जैसे कि मैं पाकिस्तान से भागकर आया कोई एजेंट या आतंकवादी हूँ। कई बार की जाँच पड़ताल के बाद जब कांस्टेबल चला गया तब पास में बैठे दो अधेड़ उम्र के कैदियों की आवाजें मेरे कानों से टकराने लगीं।
पहला कैदी – तुम्हारा नाम क्या है?
दूसरा – मनोज (पहले वाले के प्रतिउत्तर में) और तुम्हारा?
पहला – कबीर
कबीर - (मनोज से उसका दूसरा प्रश्न उसके यहाँ आने का कारण जानने का था) तो तुम यहाँ कैसे आए?
मनोज – कबीर से कहने लगा कि वह अपनी पत्नी के खून के अपराध में यहाँ आया है।
कबीर – तूने अपनी पत्नी का खून क्यों किया बे?
मनोज- अरे क्या बताऊँ वो उसका प्रेमी हरिया अक्सर उससे मिलने आया करता था।
कबीर – तो? फिर?
मनोज – तो फिर क्या? (थोड़ा रुककर) अरे उसका आना ही काफी नहीं था (कहते-कहते वह फिर रुक गया).... उसके उससे ...
कबीर – क्या उसके आने से क्या? रुक क्यों गया?
(कबीर अब उसमें अपनी रूचि दिखाने लगा। उसके चेहरे पर जो भाव अंकित हो रहे थे उन्हें मैं ठीक- ठीक तो नहीं पढ़ पा रहा था पर अब मैंने भी उसकी बातें सुनने के लिए अपने कान साफ़ किए और गौर से उनकी बातें सुनने लगा।)
मनोज – अरे! आना ही काफी नहीं उसके उससे संबंध भी थे।
कबीर – (अबकी बार जोरदार अट्टाहास करके बोला) तो संबंधों का कोई परिणाम भी निकला या नहीं?
मनोज – तू हँस रहा है?
कबीर – अरे नहीं मुझे तो कोई और बात याद आ गई।
मनोज – हाँ रहने दे, कौन सी बात?
अब मैं भी खिसककर उनके और करीब आ चुका था।
दोनों मेरी और कातर दृष्टि से घूरने लगे।
कबीर – तू यहाँ क्या कर रहा है हरामी?
मैं थोड़ा सकपका गया और डर के मारे कुछ नहीं बोल पाया। इतने में वही सवाल मनोज ने फिर से दोहराया।
अब मुझे कहना ही पड़ा कि मैं कारगिल युद्ध से जान बचा यहाँ भाग आया और टिकट न होने के कारण टिकट मास्टर ने यहाँ ला पटका। मैं उनसे कोई और बात कर पाता इतने में इंस्पेक्टर साहब वहाँ आ पहुंचे।
इंस्पेक्टर को देखते ही मैं पुन: खिसककर अपनी जगह आ गया।
इंस्पेक्टर - तो तू सै? बिना टिकट वाला?
मैंने – हाँ में सिर्फ गर्दन हिलाई पर जबान मेरी अभी भी बंद थी।
इंस्पेक्टर – के नाम सै तेरा ?
मैं इंस्पेक्टर के प्रति उत्तर में धीरे से फुसफुसाया (अंकित)
इंस्पेक्टर – नाम से तो किसी सभ्य परिवार का मालूम होवे सै। पर इत कैसे आ गया न्यू बता?
मैंने कहा – जी साहब मैं जैसलमेर से भागकर आया हूँ। किसी तरह ....
मैं अपनी बात पूरी बता पाता इससे पहले इंस्पेक्टर रौबदार आवाज में बोला .... भागकर आया सै?
मैं उसके हरियाणवी लहजे को समझ तो गया था पर ठेठ ग्रामीण होने के कारण समझ नहीं पाया कि यह भाषा कहाँ की है?
मैं कुछ कहता उससे पहले उसने एक डंडा जोरदार आवाज के साथ ठरकाते हुए पुन: पूछने लगा बोलता है या ....?
मैंने कहा – जी साहब व् वो ....
इंस्पेक्टर – वो वो क्या करता है?
मैं सकपकाते हुए – जी जी वो हमारे वहाँ युद्ध चल रहा है।
इंस्पेक्टर – (एकदम से चीखता हुआ सा बोला) यु युद्ध? पाकिस्तानी? तू पाकिस्तानी है? (इस बार उसकी चीख में गुस्सा और घबराहट दोनों थी।)
मैं – (धीरे से बोला) जी जी नहीं
इंस्पेक्टर – क्या जी जी करता है? अरे विक्रम इधर आ। (एक तेज आवाज के साथ उसने कांस्टेबल को जो आवाज दी उससे जेल की कमजोर दीवारें भी कांपने सी लगी थी।)
मैं- अरे साहब सु सुनो तो (इस बार मैं थोड़ा खुलकर बोलने लगा शायद इंस्पेक्टर की आवाज और लाठी खाने से बचने के कारण।)
इंस्पेक्टर – क्या? बक।
मैं - साहब जी मैं जैसलमेर के बैतूल गाँव से आया हूँ।
इंस्पेक्टर – झूठ बोलता है स्साला। (स्साला शब्द पर उसने ज्यादा जोर मुझे डराने के भाव से दिया।)
मैं – जी जी नहीं साहब, मैं हिन्दुस्तानी हूँ।
इंस्पेक्टर – तो भागा क्यों? और भागकर सीधा दिल्ली? (इस बार वह कुछ हंसते हुए सा बोला)
मैं – जी साहब वो युद्ध की वजह से।
इंस्पेक्टर – फिर युद्ध? फिर से युद्ध? (जैसे शायद उसे कुछ पता ही नहीं था।)
मैं- जी साहब जी कारगिल युद्ध। भारत-पाकिस्तान युद्ध। मैं जान बचाकर भागा हूँ साहब जी।
इंस्पेक्टर को अब ध्यान आया और एकदम से बोला – अच्छा कारगिल युद्ध?
मैं – जी साहब
इंस्पेक्टर – तो एकदम अकेला क्यों? बाकी परिवार?
मैं जी साहब – जी वो बहन को उठा कर ले गए और माँ-बाबू जी के साथ मैं खड़ा देखता रह गया। (मायूसी के भाव चेहरे पर लाते हुए आगे बोलने लगा) गाँव में आसमान आग बरसा रहा था साहब जी। बड़ी अक़ूबत पाई थी मैंने साहब जी।
इंस्पेक्टर – अच्छा चल ठीक तो तूने टिकट क्यों नहीं ली? तन्नै बेरा न सै बिना टिकट जुर्माना और जेल दोणों हो सके सै?
मैं - जी साहब पता है।
इंस्पेक्टर – तो फिर?
मैं – जी चार दिन से पानी पीकर गुजार रहा हूँ। कई ट्रेनों के धक्के खाकर यहाँ पहुंचा तो पता लगा कि दिल्ली आ गया हूँ।
इंस्पेक्टर – फिर झूठ बोलता है स्साला।
अबकी बार मुझे स्साला जैसे उसका तकिया कलाम सा प्रतीत हो रहा था।
इतने में कांस्टेबल आ चुका था और हमारी बातें कान लगाए सुन रहा था। इंस्पेक्टर ने जैसे ही उस पर नजर घुमाई वह एकदम से काँपते हुए बोला साहब आपने बुलाया था?
इंस्पेक्टर – हाँ
कांस्टेबल – जी साहब कोई काम?
इंस्पेक्टर – जी नहीं वापस जाओ।
कांस्टेबल के जाते ही इंस्पेक्टर ने सीधा मुझसे प्रश्न किया- तो तू यहाँ कैसे आया?
मैं- साहब जी बताया तो ट्रेनों के धक्के खाकर
इंस्पेक्टर – मसखरी करता है स्साला। (झुंझलाते हुए आगे बोलने लगा।) पुलिस स्टेशन।
मैं – जी साहब वो टिकट मास्टर ले आया घसीटते हुए।
इंस्पेक्टर को मेरी शक्ल और हालात पर अब दया सी आने लगी और बोले कुछ खाएगा?
मैंने सहमते और अपने में सिमटते हुए सिर्फ हाँ में गर्दन हिला दी।
इंस्पेक्टर ने फिर से कांस्टेबल विक्रम को आवाज दी और आदेश भी कि मेरे लिए खाने और नहाने का इंतजाम किया जाए। अब इंस्पेक्टर मुझे किसी भगवान से कम नहीं लग रहे थे। जब मैं खा-पी और नहा-धो फारिग हो गया तो इंस्पेक्टर साहब ने 100 रुपए का एक नोट मेरे हाथ में नसीहत के साथ थमा दिया।
इंस्पेक्टर – या तो फिर घर चले जाओ या जब सब कुछ छोड़ दिल्ली आ ही गए हो तो मेरे यहाँ साफ़-सफाई, मालीगिरी आदि का काम करो।

मेरा दिल्ली जैसे बड़े शहर में अपना कोई नहीं था इसलिए मैंने तुरंत काम करने के लिए हाँ बोल दिया। शाम तक मैं लॉकअप में ही बंद रहा उसके बाद शाम को मैं इंस्पेक्टर साहब के साथ उनके घर आ गया। घर पहुँचते ही इंस्पेक्टर साहब ने अपनी पत्नी से उन्हें और मुझे दोनों को खाना परोसने को कहा। इंस्पेक्टर साहब ने मुझे अपनी टेबल पर ही बैठाकर खाना खिलाया और पुलिस स्टेशन का सारा वाकया इस दौरान अपनी पत्नी से कह डाला। इंस्पेक्टर साहब के घर आने पर ही मुझे ज्ञात हुआ कि बाहर से वे जितने कठोर दिखते हैं अंदर से उतने ही नर्म दिल भी हैं। उनमें कठोरता अपने पेशे की वजह से थी और नरमी शायद मेरे प्रति इसलिए कि उनके कोई संतान न थी। उन्होंने मुझे रहने खाने को जगह दी बदले में मैं उनके सब काम करने लगा।

एक दिन यूँ ही अचानक इंस्पेक्टर साहब जल्दी घर लौट आए शायद तबियत खराब होने की वजह से या थाने में कोई ज्यादा काम का बोझ न होने के कारण। मैंने आते ही उनके जल्दी आने का कारण जानना चाहा। तो उन्होंने मुझे डाँट दिया और कहा कि जाकर मेरे लिए चाय का इंतजाम करो।  मैं भीतर जाकर चाय बनाते समय सोचने लगा आज तक तो वे ऐसे न थे। पिछले 3 महीने से मैंने उन्हें घर में कम से कम इस तरह का व्यवहार करते नहीं देखा था। फिर सोचते-सोचते चाय बनाने में व्यस्त हो गया। और थोड़ी देर बाद लॉन में जाकर बोला।
साहब जी- चाय
इंस्पेक्टर- हाँ रख दे।

मेरी हिम्मत न थी उनसे कुछ पूछने की। वे मुझे आज फिर पहले दिन वाले और थाने में बैठे इंस्पेक्टर साहब ही मालूम हुए। उनके इस व्यवहार से मुझे इतना दुःख पहुँचा कि मैं उनका घर रातों-रात छोड़कर भाग आया।
भागते-भागते मैं तीन मूर्ति के पास आकर रुका और थककर वहीं आकर पार्क में सो गया। सुबह तेज धूप पड़ने पर ही मेरी आँखें खुली।

मैं कई देर तक उस मूर्ति के गोल चक्कर के इर्द-गिर्द भागती हुई गाड़ियाँ देखता रहा। मेरे पास कोई घड़ी भी नहीं थी कि मैं समय देख पाता। तभी अचानक मेरी नजर सड़क के उस पार एक ठेले वाले पर जा पहुँचीं। वहाँ जा हाथ-मुँह धो चाय की चुस्कियाँ भरते हुए, भागती-दौड़ती दिल्ली को किसी स्वर्गनगरी की तरह अपने में समाने लगा। एकदम चौड़ी सडकें, हरियाली, गाड़ियों कि रेलम-पेल मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार देखी थी। दिनभर भटकने के बाद और कुछ खा-पीकर फिर से एक पार्क अपने सोने के लिए तलाशने लगा। पार्क तलाशते हुए मैं इंडिया गेट आ पहुंचा था और वहाँ देर रात में भी खूब-सारी रौशनी और आँखों के सामने एक बड़ा सा महल पाया। लोगों से पूछने पर पता चला कि यह राष्ट्रपति भवन है। जहाँ देश के प्रथम नागरिक निवास करते हैं और अपना ऑफिस भी देखते हैं। राष्ट्रपति भवन के ठीक सामने इंडिया गेट। जिसका भी नाम मैंने लोगों से ही जाना था। ये सभी मुझे किसी राम महल सरीखें मालूम होते थे।

कई देर इस चकाचौंध को देखकर जब मैं थक चुका तो सोने के लिए एक ऐसी जगह तलाश करने लगा जहाँ पहले से एक-दो लोग और सोने की तैयारी कर रहे थे। ऐसे ही उनके पास आकर लेट गया। इसी तरह कुछ दिन बीते इधर उधर भटकते हुए और जब तक फाके की नौबत न आ गई भटकता रहा। जेब में इंस्पेक्टर साहब के दिए 100 रुपए भी जब खत्म होने को आए तो अपने ही आप को कोसने लगा कि क्यों भाग आया। डांटा ही तो था। इसी तरह गाँव से भी तो भाग आया था। अब बारी थी काम ढूंढने की। अनजाने शहर में कोई किसी पर जल्दी विश्वास कर काम भी नहीं देता और काम मिल भी जाता है तो यहाँ का हर बड़ा आदमी पूरा शहर चबा जाने को आतुर है। आदमियों को शहर खाने की लत लग गई है। जहाँ देखो गाड़ियाँ, धुआं, गगनचुंबी इमारतें, ट्रेन की पटरियाँ जो दिल्ली के पेट को जहाँ-तहाँ फाड़कर बिछाई गई है। कभी जमीन, कभी उसके नीचे तो कभी विशालकाय खम्बों के सहारे ऐसे टिकी हैं जैसे कोई लता किसी पेड़ का सहारा पाकर ऊपर उठती है और ठीक इसी तरह तन्हाई ने मुझे लम्बा और दर-दर की ठोकरों ने मेरे शरीर को चौड़ा बना दिया है।

पहले पहल दिल्ली आने पर जिस अहसासात् से मैं गुजर रहा था। अब वही शहर मुझे खाने को दौड़ता। किसी तरह मारा-मारा फिरकर पार्कों की घास को अपना बिछौना बना और आसमान को छत, सोता रहा। जब जहाँ जो काम मिलता कर देता। किसी तरह दिन तो गुजर रहे थे पर पेट की क्षुधा कभी मिटती तो खाली पानी के सहारे मिटा लेता। इंस्पेक्टर साहब के घर से भागकर आए दो-तीन महीने गुजर चुके थे और पास में जो दो जोड़ी कपड़े थे वह भी अब मुझे खाने को दौड़ते। इंडिया गेट पर इन दो-तीन महीनों में सबसे अधिक रातें गुजारी थी मैंने। कारण बस सामने बड़ा महल देखना ही न था यहाँ से दिल्ली के मैं उन तमाम रसूखदार नेताओं को भी अक्सर गुजरते देखा करता था। जो संसद भवन से राष्ट्रपति भवन तक अक्सर दौड़ लगाया करते थे। अपनी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में।

अब वह दिन भी करीब आ गया जब देश अपने संविधान दिवस को याद करके इठलाना चाहता था और पूरी दुनिया को दिखा देना चाहता था कि वह कितनी एटमी ताकतें रखता है। पर मैं फिर से इसी उधेड़बुन में सोचने लगा कि क्या एटमी ताकतें मुझ जैसे जो भागे हुए हैं या जो किसी कारण से यहाँ प्रवासी बन बैठे हैं उनकी रक्षा, सुरक्षा और खान-पान का ध्यान रखने की ताकत रखती हैं? 26 जनवरी के दिन से पहले वहाँ से कई भिखारियों को भगा दिया गया था। ये भिखारी चाँद में दाग की तरह खुबसूरत नहीं देश को बदसूरत बना रहे थे। किसी तरह मैं भी वहाँ जोंक की तरह चिपक बना रहा। परेड वाले दिन छुप-छुपकर मैंने सब देखा। इसमें वह ट्रेन भी थी जो अब दिल्ली के पेट को फाड़ कर उसके अंदर चलने वाली थी। किसी तरह बचता बचाता मैं उस ट्रेन वाली झाँकी में घुस गया। उसके साथ चलने वाले लोगों के नाच में शामिल होकर। अब करीब छ:-सात माह बाद मेरी तकदीर बदल जायेगी यह सोचते  हुए। घुसा तो ठीक ऐसे ही कई मंदिरों में भी था ताकि मुझे प्रसाद मिल जाए और दिन फाके में न काटना पड़े। पर आदमी तो क्या बड़े शहरों के भगवान और उनके पुजारी भक्त भी आदमी खाते हैं, इसका अंदाजा पहली बार मुझे तब हुआ जब पंडित जी ने कहा – क्यों बे? चढ़ावा लाया है या ....?
मैं – पंडित जी चढ़ावा तो नहीं लाया फिलहाल चढ़ावा लेने आया हूँ।
पंडित – धत् भाग हरामखोर! चले आते हैं ...

मैं रुआँसा हो वहाँ से बाहर निकला तो कुछ प्रसाद मांगने वालों की लाइन में कई देर खड़ा रहा और वहाँ से जो प्रसाद पाता उससे कितनी बार मैंने अपने पेट की आग को ठंडा कर पाया मैं ही जानता हूँ। खैर अब मैं एक ऐसी ट्रेन की झाँकी में घुस चुका था जिसे मैट्रो नाम दिया गया था। इसी कारण से मैट्रो सिटी का उद्भव हुआ होगा इसका सहज अंदाजा लगाया। झाँकी के भीतर कई लोग मुझे अजनबी जान ऐसे घूर रहे थे मानो वे आदमी खाते हों। मैं कई देर हतप्रभ देखता रहा यह कैसा शहर है? जिसमें कोई आदमी खाता है तो कोई पूरा का पूरा शहर ही खा जाने की कुव्वत अपने में रखता है। उस झाँकी में काम कर रहे एक व्यक्ति से जब मेरी बातचीत हुई तो मैंने उसे अपने बारहवीं तक पढ़े-लिखे होने की सूचना दी और साथ ही यह भी बताया कि किस तरह फाके के दिन गुजर रहे हैं और मैं एक अदद नौकरी की तलाश में भटकता फिर रहा हूँ। शक्ल सूरत से वह भी पढ़ा लिखा ही मालूम होता था। उसने अपना नंबर और घर दोनों का पता मुझे दिया और नौकरी का आश्वासन भी।

कई दिन बीत गए और एक दिन अचानक मुझे बाराखम्बा मेट्रो स्टेशन के नीचे एक कोने में बेसुध पड़ा देख न जाने किसने उपचार के लिए पास ही के नर्सिंग अस्पताल में भर्ती करा दिया। होश आने पर मैंने सामने उन्हीं इंस्पेक्टर साहब को पाया जिनका घर छोड़ मैं भाग आया था। अब मुझे और भी ज्यादा शर्मिंदगी और खुद पर गुस्सा आने लगा था। लेकिन इंस्पेक्टर साहब की पेशानी पर शिकन तक न थी। कुछ देर बाद जब मैं बोलने की हालत में आया तो उनसे माफ़ी मांगने लगा। इंस्पेक्टर साहब ने खुद चलकर मुझे अपना नाम, पता और फोन नंबर दिया और यह भी कहा की मैं चाहूँ तो उनके यहाँ फिर से काम कर सकता हूँ। लेकिन मैंने उन्हें मना कर दिया और कहा कि सरोज बाबू जी मैं एक साधारण ग्रामीण आदमी अपनी आदमियत के दम पर कुछ करना चाहता हूँ। इतना सुनना था कि इंस्पेक्टर साहब तो वहाँ से चले गए और मैं भी दो-तीन दिन में नर्सिंग होम से छुट्टी पा वापस सड़क पर भटकने लगा और एक दिन ऐसे कि किसी नेता के घर के सामने थककर सो गया।
सुबह जब नेता जी धड़धड़ाती आवाज के साथ गाड़ियों के काफिले में अपने ऑफिस के लिए गुजरे तो मुझे वहाँ सोता देख उन्होंने मुझे अपने नौकरों से बाहर फेकनें का आदेश दिया। मुझे वहां से जलील कर भगा दिया गया और उन नेताओं के साथ-साथ पूरे शहर के प्रति निराशा का एक भाव मेरे मन में जाग गया। जहाँ कोई किसी दूसरे के लिए नहीं अपने लिए जीता है।

वहां से मुझे फेंक दिए जाने के बाद मैं एक टूटे फूटे से कमरे में दाखिल हुआ। जो न जाने कब से बंद पड़ा था। दूर से ही जो बदबू आ रही थी वह मेरे लिए असह्य प्रतीत हो रही थी। फिर भी न जाने क्यों उसके मुहाने पर आकर मैं खड़ा हो सोचने लगा कि बड़े घरों में इंसानियत कहाँ बरसती है? और लक्ष्मी की कृपा भी उन्हीं रसूखदारों के यहाँ क्यों? अब रातों में थोड़ी ठंडक बढ़ने लगी थी कोई चारा न देख मैं सरोज बाबू के घर के सामने आ खड़ा हुआ। उन्होंने मुझे जब वहाँ पाया तो मेरी हालत पर तरस खा मुझे घर के भीतर बुला लिया। एक पूरे देश जैसे इस शहर में वही एकमात्र मेरी आशा की किरण थे। लगभग तीन-चार दिन के आराम के बाद उन्होंने मुझे अपने एक बड़े अधिकारी से मिलवाया। जिन्होंने मुझे एक बार अस्थाई तौर पर पुलिस स्टेशन में ही नियुक्त कर लिया था।
आज मैं फिर से अपनी जिंदगी के छ: साल जो दिल्ली में गुजारे थे उन्हें याद करने लगता हूँ तो सोचता हूँ कि सरोज साहब न होते तो इस अनजाने शहर में मेरा कौन था? इन बीते छ: सालों को याद करते-करते न जाने कब 9:30 हो गए मुझे ध्यान ही न रहा। ऑफिस 10 बजे पहुंचना होता था जल्दी-जल्दी में नहा-धो सारे काम कर ऑफिस पहुंचा तो घड़ी में 10 से ऊपर 15 मिनट हो रहे थे। आज एक बार फिर देश अपने संविधान का जश्न मना रहा था। भागती-दौड़ती दिल्ली संग मैं भी 6 सालों से इस कदर भाग रहा था कि अब घर-परिवार भूले-बिसरे ही याद आता। शहर के लोगों जैसा शायद मैं भी हो चला था। शहरों की यही तो खासियत है कि वे आदमी को इस कदर खा जाते हैं कि यहाँ जो एक बार आया फिर मुड़कर अपना घर-बार बरसों में एक-आध बार ही याद किया करता है।

ऑफिस में आज कोई नया आदमी आया था उस दिन। उससे पता चला कि वह भी मेरी ही तरह कहीं से आया था। उसके इस तरह आने पर मैं अचानक चौंक पड़ा और उससे नाम पूछता उसके बीच उसका फोन बज पड़ा। हम तेरे शहर में आएं हैं, मुसाफिर की तरह, सिर्फ एक बार मुलाक़ात का मौका दे दे। वह फोन पर बतियाने लगा पर मेरा मन उस गाने को गुनगुनाते हुए अपने गाँव के चक्कर लगा आया। और मैं अपने गाँव से शहर तक की छ: सालों की यादें संजोने लगा। शायद मेरा माज़ी मुझे अपनी कैद से बाहर नहीं निकलने देता था और माज़ी में रहने वाले अक्सर अपना मुस्तकबिल खो दिया करते हैं।

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