कविता: मैं शिव होना चाहती हूँ

प्रियांकी मिश्रा
शिव होना चाहती हूँ मैं
शिव होना ही होगा मुझे
कुछ पता नहीं है तुम्हें
इसके सिवा कोई पथ,
सूझता ही नहीं है मुझे

नीलकंठ होना चाहती हूँ मैं
नीलकंठ होना ही होगा मुझे,
हलाहल की गगरी, छलकती हुई,
यत्र तत्र विभीषिका का रूदन,
विषपान करना ही होगा मुझे

बाहुभूतः होना चाहती हूँ मैं
बाहुभूतः होना ही होगा मुझे
शूल बिखरे हुए चहुँ ओर,
रक्तपात और दावानल
दिग दिगंत उपस्थित होना होगा मुझे

भालनेत्र होना चाहती हूँ मैं
भालनेत्र होना ही होगा मुझे
आतंकी परचम वसुधा पर
अवशोषित है जनमानस
विकृत पशु मानव टोली
भस्म करना होगा मुझे

अचिंत्य होना चाहती हूँ मैं
अचिंत्य होना ही होगा मुझे
हृदय वेदना,तन-मन मूर्च्छित्
चंद्रमणि और भुजंग हार धर
कायाकल्प करना ही होगा मुझे

2 comments :

  1. मानवीय मूल्यों के गिरते स्वरूप के कारण अन्तमॆन के वेदना का अतिशय भावुक और ममॆस्पशीॆ प्रस्तुतीकरण अत्यंत सराहनीय है.शिव बनकर युग की अनीतियों प्रताडनाओं और मानवीय मूल्यों के हलाहल पान करके नीलकंठ बनने और त्रिनेत्र खोलकर अन्याय एवं पापों को भस्मीभूत करने की उत्कट आकांच्छा अदभुत नारी शक्ति का द्योतक है.अनुठी रचना के लिये बधाई !भविष्य के लिये हादिॆक शुभकामनायें.

    ReplyDelete
  2. Adhunik yug me samaj ke anekanek anyay vishamta evam virodhabhas ka paan karke hijivan ko jiya ja sakta hai aur sarthakta sidhha ki ja sakti hai jaise shiv ne halahal paan karke sansaar ko vishmukt kiya aur neel kanth ban gye,bahut bade tathya ki sashakta aur sundar abhivyakti

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।