अबुझमाड़ में वसंत

सौरभ शर्मा

सौरभ शर्मा

जगदलपुर के बस स्टैंड में किताबों की एक दुकान है। यहाँ के संचालक की स्मृति विलक्षण हैं। आपने आखिरी बार यहाँ से कब किताब ली, आपको दिन और समय की जानकारी वो आपका चेहरा देखकर बता देंगे। यहाँ से दूसरी बार जब मैंने किताब ली, तब से यह पूछना शुरू कर दिया कि पिछली बार आपके यहाँ कब आया था। वे न केवल मुझे समय बताते, अपितु किताबों की मेरी अभिरुचि के संबंध मे भी जानकारी रखने लगे थे। दो लाख की आबादी वाले जगदलपुर की यह संभवतः इकलौती दुकान हैं जहाँ साहित्य की किताबें मिलती हैं। शायद पूरे बस्तर में ही यह अनोखी दुकान है। ऐसे ही एक बार रायपुर जाते वक्त मैंने यहाँ से चेतन भगत की पुस्तक 'थ्री मिस्टेक्स आफ माई लाइफ' खरीदी। मैंने दो या तीन पेज पलटाये थे तभी एक युवक करीब आया। उसने मुझसे कहा, क्या यह किताब दिखाएंगे। फिर किताब वापस करते हुए कहा, "वन मिस्टेक आफ माई लाइफ इज टू बी बॉर्न इन दार्जिलिंग।"

मेरी "क्यों?" के उत्तर में उसने बताया कि वह सीआरपीएफ की बारसूर स्थित बटालियन में है। दार्जिलिंग इतना सुंदर शहर है यहां के लोग दिल के इतने करीब है कि किसी के लिए भी उसे छोड़ देना काफी कठिन है। कोई दूसरा शहर होता तो कहीं भी किसी भी जगह नौकरी करना आसान होता।

मैंने उस जवान से पूछा कि गोरखालैंड का इशू अभी कैसा है। सुभाष घीसिंग के नहीं रहने पर अभी गोरखा मूवमेंट का नेतृत्व कौन कर रहा है। दो हजार किमी दूर एक अनजाने से शहर में अपने प्रिय नेता के बारे में सुनकर उसे बहुत अच्छा लगा। उसने बताया कि अब ये मूवमेंट बहुत कमजोर हो चला है। मैंने उससे पूछा कि आपने पहली भूल के बारे में बताया, आपने दो और गलतियाँ कौन सी कर लीं। उसने हँसते हुए बताया कि दूसरा मामला मेरी प्रेमिका से जुड़ा है। देर तक उसने अपने शहर दार्जिलिंग के बारे में बताया और फिर मेरा नंबर लिया। सेव करने के लिए जब मैंने उससे नाम पूछा तो उसने बताया- संदीप गुरुंग।

संदीप गुरुंग के भीतर कमाल की ऊर्जा थी, उसकी इंग्लिश बड़ी अच्छी थी, अब तक मेरी धारणा थी कि अच्छी इंग्लिश केवल फौज में साहबों की होती होगी लेकिन संदीप ने मेरी तमाम धारणाओं को खारिज कर दिया। दूसरे पेशों से जुड़े लोग अपने पेशे की बहुत बुराई करते हैं हमें अपने पेशे में बहुत सी खामियाँ नजर आती हैं। इसके उलट सुरक्षा बलों में ऐसा नहीं है। फौजी जितनी विपरीत परिस्थिति में होते हैं अपने काम के लिए उनका जज्बा और बढ़ जाता है।

रायपुर से दंतेवाड़ा आते वक्त सुबह जब मेरी नींद खुली, तो मैंने बास्तानार में कुछ आदिवासी युवक-युवतियों को हमारी बस में चढ़ते देखा। वो चार लोग थे, तीन लड़कियाँ और एक लड़का। ऐसा कहना सही होगा कि वे चारों किशोरावस्था की अंतिम दहलीज पर थे। वे आपस में गोंडी में बात कर रहे थे और गोंडी समझ पाना असंभव सा है। फिर भी उनकी आँखों की भाषा से मैं काफी कुछ समझ पा रहा था। मुझे लगा कि लड़कियाँ लड़के की रैगिंग ले रही हैं। रैंगिंग थोड़ी सख्त भाषा है शरारत ज्यादा सही है। लड़कियाँ लड़के से शरारत कर रही थीं और लड़का लजा रहा था। इस क्षण पर आकर महसूस हुआ कि मैं रायपुर के टाइमजोन से निकल कर बस्तर पहुँच चुका है। वैसे शर्माने वाली लड़कियों के बारे में बचपन में ही सुना था और इन्हें कभी देखा नहीं, फिर भी रायपुर के टाइमजोन में शर्माने का पेटेंट अब तक लड़कियों ने अपने पास सुरक्षित रखा है। बस्तर बिल्कुल अलग है। यहाँ की लड़कियाँ बेहिचक अपनी बातें रखती हैं। अपने हक की लड़ाई में भी आगे रहती हैं। कई जनसमस्या-निवारण शिविरों में मैंने देखा है कि लॉरेटो जैसे स्कूलों से पासआउट कलेक्टरों के सामने भी यह अपनी बात कहने से नहीं हिचकतीं। बस में बैठी लड़कियाँ कुछ कहती थीं, फिर सभी जोर से मुस्कुराते थे। यह मुस्कुराहट कभी भी ठहाकों में नहीं बदलती थीं। मैंने देखा कि उनके पास स्मार्ट फोन नहीं थे, इसलिए उनके पास व्हाट्सएप भी नहीं था, इसलिए संता-बंता का मनोरंजन भी नहीं था। फिर वे किस बात पर मुस्कुरा रहे होंगे और इतने खुश, इनकी खुशी का स्रोत क्या है? मैं उन्हें खुश देखकर सोचता रहा।

आखिर में मैंने लड़के से पूछा, आप लोग कहाँ से आ रहे हो। उसने बताया कि रात वे बास्तानार हाट-बाजार में थे। आज शाम घोटपाल मेले जाएंगे। आज दंतेवाड़ा में देवी दर्शन करेंगे, फिर मेले जाएंगे। उसने मुझे बताया कि वो मुझे जानता है। मैंने पूछा-कैसे? उसने बताया कि आप कभी-कभी लाइवलीहुड कॉलेज आते हो, मैं वहाँ ट्रेनिंग कर रहा हूँ। मैंने उसे कहा कि वक्त मिले तो मेरे आफिस जरूर आना, बहुत सी ऐसी बातें हैं जो मुझे जाननी हैं।

बस्तर आने से पहले मेरे दिमाग में प्राथमिक जिज्ञासा नक्सलवाद को लेकर थी जो शायद हर बाहरी इंसान की होती है। इसके साथ ही बस्तर की प्राकृतिक सुंदरता भी बहुत आकर्षित करती है। एक बार जब मैं स्कूल में था तब पापा को एलटीसी मिला था और हम लोग दक्षिण भारत गए थे। हम लोग रायपुर से जगदलपुर, भद्राचलम होते हुए हैदराबाद के लिए निकले थे।  रायपुर से हम लोग रात को निकले, सुबह जब आँखें खुलीं तो चारों ओर साल और सागौन के पेड़ थे। हम लोग साल वनों के द्वीप में थे। सुबह नित्य क्रिया के लिए हमें एक नाले के पास उतारा गया। बस्तर के घने जंगलों को चीरते हुए यह नाला पूरे उत्साह से बह रहा था और साल के पत्तों से छनकर आने वाली सुबह के सूरज की रौशनी इसमें चांदी का भ्रम पैदा कर रही थी। इस नाले के पानी में स्नान से ऐसी शीतलता ने शरीर के भीतर प्रवेश किया कि यह नाला हमेशा के लिए मेरी जेहन में कैद हो गया। कई साल बाद मैं इस नाले को बस्तर में खोजता रहा। फिर पता चला कि यह नेशनल हाईवे में ही है लेकिन इसकी चमक खो चुकी थी।

जल्द ही नक्सलवाद की जगह एक नई तरह की जिज्ञासा ने मेरे दिमाग में घर किया। ये बस्तर के लोग थे। सुबह बाल्कनी में चाय के प्याले के साथ जब मैं अपनी प्रिय पुस्तकों को लेकर बैठता तो अचानक मुझे कर्णप्रिय गानों की धुन सुनाई पड़ती। सुबह-सुबह ट्रैक्टर में युवक-युवतियाँ अपने प्रिय लोकगीतों को गाते गुजरते, कभी वे पैदल ही दातुन करते निकलते। साप्ताहिक बाजारों से खरीदी गई छोटी-छोटी शृंगारिक वस्तुओं से लड़कियाँ खूब सजी होती। लड़के विशेष तरह का फेंटा लगाए हुए अपनी धुन में रहते। इन लोकगीतों के क्या मायने हैं, इनके जीवन में खुशी का राज क्या है। नक्सलवाद की भयंकर त्रासदी के बीच यह लोग इतने खुश कैसे हैं। यह सब जानने की खूब इच्छा होती।

पंद्रह दिनों के बाद एक शाम मुझे एक मिस कॉल आया। यह संदीप का था। मैंने वापस कॉल बैक किया, उसके रिंगटोन में भूपेन हजारिका का गीत बज रहा था। एक कली दो पत्तियाँ, नाजुक-नाजुक ऊंगलियाँ, तोड़ रही थी कौन ये एक कली दो पत्तियाँ, रतनपुर बागीचे में। संदीप ने बताया कि वो वापस बारसूर आ गया है। उसने बताया कि एक महीने की छुट्टी में वह भरपूर ऊर्जा बटोरकर आया है। दार्जिलिंग के चप्पे-चप्पे में घूमा, अपने गाँव गया। मैंने उससे पूछा कि इस रिंगटोन के मायने क्या हैं। उसने मुझे बताया कि इसके पीछे लंबी कहानी है।

"दार्जिलिंग में लोग चाय बागानों में काम करते हैं। मेरे पिता जी वहाँ सुपरवाइजर हैं। हमारे बागान में एकाउंट्स देखने पड़ोसी गाँव की एक लड़की आती है। कई बार बागान में पापा का टिफिन छोड़ने जाता। वो मुझे भी विश करती। उसका नेचर बहुत अच्छा है, इसलिए ऑफिस का वातावरण भी बहुत अच्छा रहता है। कई बार मैं सोचता कि पिता जी से कहूँ कि अब आप आराम करो, मैं आपका पूरा काम संभाल लूंगा लेकिन सुपरवाइजर के पद में हमारे बड़े परिवार का खर्चा कैसे चलेगा। मैं जहाँ भी रहूँ, उसकी याद मुझे आती रहे, इसलिए यह रिंगटोन मैंने सेव कर लिया। यह गीत मुझे बचपन से पसंद था और इसे सुनने पर मुस्कुराती हुई चाय की पत्तियाँ तोड़ती लड़की की तस्वीर मेरे दिमाग में बनती थीं। अब माउस से नजर हटाकर मुस्कुराते हुए विश करने वाली लड़की की तस्वीर इस गाने से बनती है इसलिए मैंने इसे सेव कर लिया।"

मुझे संदीप से बहुत सी बातें करनी थीं लेकिन ऑफिस के लिए देर हो रही थी, इसलिए निकल आया।

इसके कुछ दिनों के बाद बस वाला लड़का मुझसे मिलने आया, मैं उसका चेहरा भूल चुका था, उसने बताया कि मैं सोढ़ी हूँ आपने मिलने बुलाया था। मैंने सोढ़ी से कहा- उस दिन तुमसे थोड़ी ही बात हो पाई थी, मैं चेहरे बहुत जल्दी भूल जाता हूँ। सोढ़ी से मैंने उसके गाँव के बारे में पूछा। उसने बताया कि वो मूचनार का है। मूचनार में संभवतः पटेल पारा में घर होने की बात उसने कही। मूचनार बारसूर के पास छोटी सा गाँव है। यहाँ इंद्रावती नदी अपने सबसे सुंदर रूप में बहती है। यहाँ का घाट केरल के घाटों की तरह सुंदर है। गर्मी के दिनों में जब इंद्रावती सिकुड़ जाती है। तन्वंगी रह जाती है तब दूर-दूर तक रेत नजर आती है और बीच-बीच में पत्थर उभरे रहते हैं। सिकुड़ी हुई पारदर्शी धारा नजर आती है। पास ही मगर पसरे हुए रहते हैं। बारिश के दिनों में छोटी डोंगी से उस पार जाते हैं। इस छोटी डोंगी में बैठना आपको बहुत सहज लगेगा लेकिन धारा में प्रवेश करते ही जब नौका डोलती है तो तुरंत यमराज के दर्शन का भ्रम होने लगता है। सोढ़ी ने मुझे बताया कि प्रशासन ने डीजल से चलने वाली बोट दी थी जिसे अंदर वालों (नक्सली) ने डूबो दिया था, अब यह बोट उसके घर के पास ही रखी है। सोढ़ी से आरंभिक जानकारी लेकर मैंने उसे विदा किया। वह मेरे लिए अबुझमाड़ की कुंजी जैसा था। उसकी पोजीशन बिल्कुल नरसिंह अवतार की तरह थी, न घर के भीतर, न घर के बाहर, देहरी पर। वो अबुझमाड़ की देहरी पर था। बारसूर में सीआरपीएफ की बटालियन ने अपनी स्थापना दिवस पर एक कार्यक्रम रखा था। उस कार्यक्रम में मैं संदीप से मिला। संदीप से अबुझमाड़ की अंदर की दुनिया के बारे में जानकारी लेनी चाही, मुझे बहुत निराशा हुई, उसके पास मेरे लिए ज्यादा कुछ नहीं था। या तो खुफिया जानकारी न देने के प्रोटोकॉल की वजह से या उसके पास सचमुच अंदर की कोई जानकारी नहीं रही होगी। यह इसलिए भी कि सीआरपीएफ का नाता स्थानीय लोगों से कभी बन नहीं पाया, वे उन्हें अविश्वास से देखते रहे, ये भी उन पर भरोसा नहीं कर पाये। संदीप ने बताया कि चाय वाली लड़की से उसकी इंगेजमेंट तय हुई है और अगली छुट्टियों में इंगेजमेंट और फिर शादी कर वापस लौटेगा।

एक रात मैं जब दोस्तों के साथ बैठा हुआ था तब अचानक प्रधानमंत्री का संदेश सुना। अब हजार और पाँच सौ के नोट अस्तित्व में नहीं रहेंगे। दंतेवाड़ा जैसे छोटे शहर के लिए कैश मैनेजमेंट काफी मुश्किल था। सारे एटीएम खाली थे। दवा दुकान वालों ने कुछ समय दरियादिली दिखाई लेकिन आखिर में उन्होंने मरीजों से कहना शुरू कर दिया, छुट्टे लेकर आओ, तभी दवा मिलेगी। इसी मौके पर सोढ़ी भी मेरे पास आया और कुछ चिल्हर पैसे माँगे। मेरे एक बैंकर दोस्त की मदद से मुझे कुछ छुट्टे मिल गए थे और आशा थी कि ये रसद नोटबंदी की क्राइसिस से मुझे कुछ समय तो निकाल ही लेगी। मैंने इसमें से सौ रुपए दिये, जब मैंने यह पैसे सोढ़ी को दिए तो बगल में बैठे मेरे दोस्त ने कहा कि नोटबंदी के दौर में जब सौ रुपए का नोट बेहद दुर्लभ है यह बहुत दरियादिली है। मुझे अपने आप पर घमंड हुआ।

सोढ़ी कुछ समय बाद पैसे लौटाने आया, मैंने पूछा किसकी तबियत खराब थी। उसने बताया, "जब हम लोग बस में बैठे थे, आपने सुक्की को देखा होगा, उसी की है।"

मैंने कहा कि मैं तो सुक्की का चेहरा भूल चुका हूँ। उसने मुझे अपने जेब से निकाल कर एक फोटो दिखाई। फोटो दंतेवाड़ा के ही किसी स्टूडियो की लग रही थी। सुक्की और सोढ़ी के पीछे ताजमहल का बैकग्राउंड था। ऐसा लग रहा था कि शाहजहाँ और मुमताज ने अपने मकबरे के सामने एक फोटो खिंचा ली है। वो दोनों फोटो में चुप थे लेकिन बहुत सुंदर लग रहे थे। मैंने पूछा, "तुम सुक्की से शादी करोगे?" सोढ़ी ने बताया, "उसी दिन घोटपाल के मेले में हम लोगों ने तय कर लिया था, शादी करेंगे और रात भर मेले में नाच-गाना किया था। सुक्की पदमेटा की है अबुझमाड़ के उस पार उसका गाँव है।"

एक दिन संदीप ने मुझे फोन किया, उसने बताया कि बाहुबली की टीम के कुछ प्रोफेशनल इधर आए थे। वे हमसे अनुमति लेकर हांदावाड़ा गए। उन्होंने हांदावाड़ा के कुछ स्केच लिये। वे बाहुबली-2 फिल्म के लिए अनूठा जलप्रपात चाहते थे, उन्होंने हांदावाड़ा के बारे में सुन रखा था। मैंने संदीप से कहा कि राजामौली से कहो- प्रभास की जगह तुम्हें रख ले। संदीप हँसा और कहा नक्सलियों से बचाकर उन्हें सुरक्षित निकाल लेने के लिए कम से कम भल्लालदेव का तो रोल मिल ही सकता है। संदीप ने बताया कि वो आज निकल रहा है इंगेजमेंट के लिए कुछ दिनों की छुट्टी ली है। फिर आ जाएगा। जिस दिन इंगेजमेंट हुआ उसने मुझसे फोटो शेयर की। मैंने फोन लगाया, एक कली दो पत्तियाँ की रिंग टोन बजी। उसने रिसीव नहीं किया। मुझे बहुत खुशी हुई। संदीप का घर बस रहा था। मैंने फिर से भूपेन हजारिका का गीत सुना। लक्ष्मी और जुगनू की लगन ऐसी आई, डाली-डाली झूमी लेकर अंगड़ाई।

हांदावाड़ा में बाहुबली की टीम पहुँचने की खबर अखबारों की दुनिया में भी पहुँच गई। सबके लिए इस जलप्रपात को लेकर विस्मय बढ़ गया। विशेष रूप से युवाओं के लिए तो यह सबसे प्रिय जगह हो गई। धीरे-धीरे टोलियाँ यहाँ पहुँचने लगी। एक दिन सोढ़ी ने भी सुक्की को लेकर हांदावाड़ा का प्लान बनाया। उनके जैसे कई जोड़े इस सुंदर जलप्रपात के एकांत को तोड़ रहे थे। अबुझमाड़ का यह इलाका माओवादियों का गढ़ है यहाँ उनसे पूछे बगैर कोई नहीं आता। ऐसे में युवाओं का बेहिचक यहाँ आ जाना नक्सलियों को पसंद नहीं आया। दुर्भाग्य से जिस दिन सोढ़ी और सुक्की वहाँ पहुँचे उस दिन नक्सली कमांडर भी अपने दल के साथ पहुँचा। उसने सभी को इकट्ठा किया। सबकी पतासाज़ी की। सबने अपना पता बताया। सुक्की पदमेटा की थी, हांदावाड़ा की सबसे नजदीकी पंचायत। सबने महसूस किया कि सुक्की के बारे में कमांडर ने कुछ ज्यादा ही पतासाजी की। फिर सख्त चेतावनी के बाद छोड़ दिया।

इस घटना के दो महीने बाद मैं सोढ़ी से मिला। सोढ़ी बहुत अपसेट नजर आ रहा था। उसने बताया कि नोटबंदी के दौरान नक्सलियों ने कुछ पैसे बदलाने गाँव वालों को दिये थे। इसकी पूरी तरह से रिकवरी नहीं हो पाई थी। एक दिन उन्होंने सभी नजदीकी गाँव वालों को मीटिंग में बुलाया। मीटिंग में बड़ा दबाव बनाया। नोटबंदी मामला सुलझाने के बाद कमांडर ने कहा कि जल जंगल जमीन की सुरक्षा की जिम्मेदारी सबकी है। बेटियाँ भी बेटों के बराबर हैं क्रांति के लिए उनका खून भी जरूरी है। सभा के बाद वे सुक्की को साथ ले गए। अबुझमाड़ की कहानी अब बुरी लगने लगी थी, मैंने सोढ़ी को बुझे मन से विदा किया। .... संदीप भी छुट्टियों से वापस आ गया था। उसने बताया, "पहली बार बहुत खूबसूरत हादसा हुआ। चाय वाली लड़की मेरे घर आ जाएगी। अब दार्जिलिंग की कमी उस तरह से नहीं सताएगी क्योंकि जिंदगी ने इससे भी खूबसूरत चीज मुझे दे दी है।"

बारिश के चार महीने आपरेशन पूरी तरह रूक जाते हैं यह समय नक्सलियों के लिए सुस्ताने का होता है और फौज के लिए भी। पतझड़ में जब पर्णपाती वन अपने सारे पत्ते झाड़ देते हैं और पूरा जंगल नग्न हो जाता है तब नक्सलियों के लिए भी टैक्टिकल आपरेशन के दौर शुरू होते हैं और फौज भी एरिया डामिनिटिंग में जुट जाती है। ऐसे ही एक लंबी रात को व्हाटसएप में मैसेज आया। इंद्रावती पार फौज और नक्सलियों की मुठभेड़। हर दो दिन में ऐसे मैसेज आते हैं और हम इनसे बेपरवाह हो अपनी सुकून भरी दुनिया में जीते रहते हैं। मैसेज देखकर मैं सो गया।

अगली सुबह जब घूमने निकला तो दंतेवाड़ा थाने में भीड़ जमी हुई थी। देर रात एनकाउंटर में चार नक्सली मारे गए थे। उनके शव गाड़ियों में रखे थे। इसके साथ ही उनसे जब्त सामग्री भी पड़ी हुई थी। मैं उत्सुकतावश इस सामग्री को देखता रहा। इसमें फ्रंटलाइन जैसे अंग्रेजी के मैगजीन थे। बैंक के इस्तेमाल किए हुए चेक पड़े थे। क्रांति के बारे में सामग्री पड़ी हुई थी। क्रोसीन जैसी दवाइयों के पैकेट बिखरे थे। इसके साथ ही कुछ बर्तन भी। यह हंडे जैसे बर्तन थे, इन्हीं में रोज का खाना पकता होगा। फिर मैंने देखा कुछ कपड़े पड़े थे। इन्हें बड़े सलीके से रखा गया था। एक शृंगारदान भी थी। मैंने इसे खोलकर देखा। इसमें सुक्की और सोढ़ी की वही ताजमहल वाली फोटो थी। मैंने शृंगारदान बंद किया। उधर सुक्की की लाश पड़ी थी।

इधर व्हाट्सएप में एक और सूचना आई। कल रात अबुझमाड़ में हुए नक्सली मुठभेड़ में चार नक्सलियों की जान गई एवं दो जवान भी शहीद हुए हैं। शहीद होने वाले जवान में संदीप गुरूंग का नाम भी शामिल था। संदीप अब कभी न आने के लिए अपने घर चला गया था। संदीप का फोन बंद बता रहा था। एक कली दो पत्तियों की ध्वनि खामोश हो चुकी थी। उस रात मैंने फिर से भूपेन हजारिका का वो गीत सुना। गीत की कुछ पंक्तियाँ मुझे कंपाने लगी। एक कली दो पत्तियाँ खिलने भी न पाईं थीं, इतने में बागीचे में दानव आया रे, दानव की परछाई में कांप रही थी पत्तियाँ, बूझने लगी मासूम कली, दानव की परछाई में।

बरसात के बाद इंद्रावती पुनः प्रवाह में थी। माई जी की डोली निकल कर जगदलपुर जा रही थी। पारंपरिक ढोल बाजों से दंतेवाड़ा शहर गुंजायमान हो रहा था। ऐसे में भीड़ के बीच मुझे सोढ़ी पुनः नजर आया। अपने शोक को हराकर वो पुनः जीवन शक्ति बटोर चुका था। उसने बताया कि डीएफ की वेकेंसी आई है और वो उसके लिए आवेदन कर रहा है। उसे उम्मीद थी कि उसका चयन इसके लिए हो जाएगा। उस दिन मैंने अबुझमाड़ में वसंत देखने का निश्चय किया। देर तक मैं इंद्रावती के किनारे बैठा रहा। इसके दूसरी ओर वसंत अपने पूरे रंग में था। अबुझमाड़ बरसों से पतझड़ झेलता आया है और हर बार अपनी ऊर्जा से उठ खड़ा होता है और दोनों हाथों से वसंत का स्वागत करता है। यह खुशी लेकर मैं घर आया और भूपेन दा का पूरा गीत सुना। ढोल मादल बजने लगे, मादल ऐसे बाजे रे, लाखों मिलके नाचे रे, दानव डर के भागा, दानव डर के भागा।

4 comments :

  1. सच से साक्षात्कार करती रचना

    ReplyDelete
  2. मर्मस्पर्शी ,धरातल पर यही सच्चाई है।सायद ये कभी बदल सके ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. कोई नहीं बदलना चाहता इसे ...सिवाय मज़बूर स्थानीय आदिवासियों के । राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव... बेशुमार उगाही ....उन्मूलन राशि की वारिश ....और सत्ता की ख़ुराक इसे कभी बदलने नहीं देंगे ।

      Delete
  3. यहाँ रोज ही न जाने कितनी सुक्कियाँ उठा ली जाती हैं जनताना सरकार को मज़बूत बनाने के लिये । आये दिन मुठभेड़ में मार दी जाती हैं कई सुक्कियाँ... छपता है अख़बार में तो दूर-दराजां के लोग ख़ुश होते हैं पढ़कर ...कि अच्छा हुआ मार दी गयी एक और माओवादी । उन्हें नहीं होता पता कि सुक्की तो खिलखिलाना चाहती थी ....गदराना चाहती थी महुआ की तरह ...और बसाना चाहती थी एक प्यारा सा घर ....नहीं चाहती थी मरना ...पर मार दी जाती है सुक्की । आये दिन बलिदान हो जाते हैं न जाने कितने संदीप गुरुंग ...बस्तर और भी सहम जाता है ।
    मैं कभी नहीं मिला नंदिनी सुंदर से ...लेकिन दर्द होता है कहीं बहुत गहरे में जब वे रहती हैं ख़ामोश जवानों के बलिदान पर और किसी सुक्की के बना दिये जाने पर एक माओवादी लड़ाका ...जिसे नहीं होता पता ...क्या होता है माओवाद !
    हॉस्पिटल में आते-जाते दो-तीन बार देखा है बेला भाटिया को ....मिलने का मन नहीं हुआ कभी ....यहाँ के कुछ लोग उन्हें स्लीपर सेल का सदस्य मानते हैं ।

    मुठभेड़ में मारे जाते हैं जब जब माओवादियों ...तब-तब मानवीय संवेदनायें जाग उठती हैं कुछ विद्वानों की ...जो नहीं जाग पातीं कभी किसी सुक्की के हाथों में थमा दिये जाने से बंदूक ।

    गांधी ने कहा था कि नफ़रत मत करो किसी से ...किंतु मैं न चाहकर भी करने लगा हूँ नफ़रत ...कुछ लोगों से ...यह नफ़रत नहीं ज्वालामुखी है जिसे बहुत दबाकर रखना पड़ता है मुझे ।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।