अश्वत्थामा: यातना का अमरत्व (अनघा जोगळेकर)

पुस्तक समीक्षा: नयना कानिटकर

अश्वत्थामा: यातना का अमरत्व
(ऐतिहासिक उपन्यास)

लेखिका: अनघा जोगळेकर
प्रकाशक: उद्वेली बुक्स, ठाणे - 400604
मूल्य: ₹ 200/- रुपये
ISBN: 9789387154124


              बचपन में मैने, इतिहास में रुचि रखने वाले मेरे पिता से, अश्वत्थामा की कहानी सुनी थी। अनेकों प्रश्नों और विचारों के बीच बहुत-सा अंतराल बीत गया। मेरे दिमाग से भी अश्वत्थामा बाहर निकल गया। मैं विज्ञान की विद्यार्थी 'अमरत्व' जैसी बात मानने के लिए सहज तैयार न होती थी। बहुत बहस करती अपने पिता से कि जब सब कुछ नश्वर है तो अश्वत्थामा का जीवित होना... मेरे गले नहीं उतरता। कभी-कभी समाचारों में, टी. वी. और सोशल मीडिया पर अश्वत्थामा का उल्लेख मिलता कि उसे ग्रामीणों ने देखा है और उसकी पहचान महाभारत में वर्णित जाति चिन्हों के आधार पर की गई है।

       मुझे लगता है हम लोग थोड़ा मिथकजीवी हैं और आम व्यक्ति को थोड़ा मिथकों में जीना/रमना अच्छा लगता है। महाभारत के अनेकों पात्रों पर अनेक काव्य और कृतियाँ रची जा चुकी हैं किंतु अश्वत्थामा जैसा पात्र सदा उपेक्षित ही रहा है। महाभारत का यह योद्धा अमरत्व के बारे में पूर्व निर्मित रुमानी कल्पनाओं को ध्वस्त करता है।

         श्री कृष्ण ने दुर्योधन के सहभागी अश्वत्थामा को अभिशाप दिया था। किंतु क्या उसका अपराध इतना बड़ा था कि उसकी छवि एक दुराचारी कुटिल की बना दी गई? अनेक प्रश्न सामने थे, तभी मेरे हाथ आया अनघा जोगळेकर का उपन्यास "अश्वत्थामा: यातना का अमरत्व"। कुल बारह अध्यायों में बंटा यह उपन्यास, हर अध्याय की कथा के अंत में 'दंत कथा' पर प्रकाश डालते हुए पाठक के लिए एक प्रश्न छोड़ता है, जिसका उत्तर ढूंढने में कही-कही लेखक ने अपने अनुमान का प्रयोग भी किया है।

अनघा जोगलेकर
           युद्ध की विभीषिका को वहन करने वाले शारण देव को आत्मकथ्यात्मक शैली में सुनाते हुए लिखे इस उपन्यास में अश्वत्थामा जब यह कहता है कि "प्रारब्ध----कौन निश्चित करता है प्रारब्ध? स्वयं मनुष्य या वह अद्भुत शक्ति जिसके कारण यह पूरा विश्व चलायमान है? कोई भी हो  परंतु मेरा प्रारब्ध तो मैंने स्वयं रचा है। जिसका साथ ईश्वर ने छोड दिया हो उसे किसी ओर के साथ की क्या आशा हो सकती है और यहाँ तो श्री कृष्ण ने स्वयं मेरे इस शापित शरीर को युग-युगों तक निस्सहाय भटकने के लिए अमरत्व दे दिया है। ...अमरत्व, "यातना का अमरत्व"!

              तब यकायक पाठक भी विचलित हो उठता है कि आखिर महायुद्ध की अनेकों बडी-बडी भूलों को उपेक्षित करके कृष्ण ने अश्वत्थामा को ही यह शाप क्यो दिया होगा?

          उपन्यास के आरंभ में ही अश्वत्थामा ने माता कृपि व मातुल कृप के जन्म की कथा सुनाई है कि किस तरह एक दिन शरद्वान के सुखासन की मुद्रा में वीर्य स्खलित हो गया तो उनके आसन के नीचे की लकड़ी में यकायक प्राण आ गये जिसे नानाजी ने क्रोध में दो हिस्सों मे चीर दिया और एक निश्चित समय बाद माँ कृपी और मातुल कृप बने।  इस मिथक का उत्तर आप पुस्तक में ही पढें तो ज्यादा अच्छा होगा।

समीक्षक: नयना कानिटकर
            उसी तरह पिता द्रोणाचार्य का जन्म भी ऋषि भारद्वाज के एक क्षण के संयम खोने का प्रतिफल था या उस क्षण से उपजा इस महाभारत का बीज जिसका परिणाम नियत समय पर आ चुका था, पुस्तक में इसका विस्तृत वर्णन और शब्दों का प्रवाह पाठक को कथा से बाँधे रखने में सक्षम सिद्ध हुआ है।

     अपने स्वयं के जन्म के विषय में अश्वत्थामा ने ज्यादा विस्तृत नहीं बताया है। बस इतना ही कि उसका माथा मणि के समान चमकदार था और अश्व के समान प्रथम विलाप के कारण ही उसका नाम अश्वत्थामा रखा गया होगा और उसी दिन से... सृष्टि ने उसका भाग्य लिखना आरम्भ कर दिया।

      बीच के छह अध्याय तक उसके बालपन की बातें, शस्त्र-अस्त्र की शिक्षा, पिता के साथ उसके संबंधों पर प्रकाश डालते प्रसंग आपको पुस्तक से चिपके रहने को मजबूर करते हैं। मात्र एक बात बार-बार खटकती है कि जब शरण देव उनसे कथा सुनने रोज जंगल में जाते तब आसपास के वातावरण में इतना रक्त और मवादमय  होने पर भी... मतलब कि अश्वत्थामा के शरीर से निकलते रक्त और मवाद का वर्णन कुछ अतिरेक लिए हुए लगता है।

           शस्त्र-अस्त्र और शास्त्रार्थ की शिक्षा देते वक्त पिता द्वारा शिष्यों व अश्वत्थामा के बीच भेदभाव की कहानी भी पिता के विरोध के साथ कही गई है कि किस तरह वह अपने पिता के कई मुद्दे पर सहमत नहीं था किंतु पितृ सम्मान का निर्वाह करते हुए चुप्पी लगा गया। और महाभारत के युद्ध के अंत के पश्चात क्रोधाग्नि में जलकर नियम विरुद्ध किया गया कृत्य, निन्द्रावस्था में लीन दौप्रदी के पाँचो पुत्रों की शिविर में, भ्रमावस्था में की गई हत्या ब्रम्हास्त्र का प्रयोग और श्री कृष्ण के अनुनय के बावजूद भी अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भस्थ शिशु पर उसे छोडना उसके शाप का कारण बना। आप उपन्यास में इसे सविस्तार पढते हुए तथ्यों के अधिक निकट पहुँच पाएँगे।

सारांश यह है कि आज भी हमारे बीच महाभारत के सभी पात्र जीवित हैं फिर  चाहे वो बलात्कारी दूर्योधन हो या मूकदर्शक भीष्म व द्रोण, बच्चों के गलत आचरण पर  चुप्पी साधे धृतराष्ट्र या बेकसूर को मारते, भ्रूणहत्या की कोशिश करते अश्वत्थामा। अब हमें अपने अंदर के मर चुके कृष्ण को जीवित करना होगा तभी दूसरे महाभारत से बचा जा सकेगा।

उपन्यास को पढते हुए मेरे मन के अनेक प्रश्नों के जवाब मिले। कुछ तक मैं पहुँच नहीं पायी। इस उपन्यास का उपशीर्षक भी बहुत कुछ कहता है। एक बात अवश्य है कि हर विचारवंत व्यक्ति को इस उपन्यास का पठन इसमें निहितार्थ उद्देश्य के लिए अवश्य करना चाहिए।

समीक्षक: नयना (आरती) कानिटकर
nayana.kanitkar@gmail.com
शिक्षा:- एम.एस.सी, एल.एल.बी
संप्रति:- पति के चार्टड अकाउँटंट फ़र्म मे पूर्ण कालावधि सहयोग
रुचि:- हर वह रचनात्मक कार्य जो मन को सूकून दे, यथा: पठन, पाठन, गायन, सिलाई-कढाई आदि

2 comments :

  1. Excellent narration. While understanding the contents of the book, it also generates interest in the reader to look for more in the book itself.
    Keep it up.

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